राजकुमार जैन ‘राजन’ की कविताएँ

राजकुमार जैन 'राजन'
सभ्यता के सफर में 

सभ्यता के इस सफर में
रोज टूटते हैं कुछ सपने
हमारी आशाएं मकड़ी की तरह
जाले बुनती हैं
और मन के समंदर से उठता है
संवेदानाओं का सैलाब

हर कहीं राह में
दम तोड़ते हैं
कचरे-अधकचरे विचार
एक नया सवेरा पुकारता है मुझे
काले अंधेरों के पीछे से

हर इंसान के चेहरे पर
एक नकली चेहरा है
छद्म हंसी के पीछे
कपट बहुत गहरा है
आत्मीयता के स्थान पर
मुखौटे रिश्तों के रूप में मिलते हैं
सच झुठलाया जाता है
और झुठ सभ्य व्यक्ति की तरह
हाथ बांधे खड़ा मुस्कराहता है

तब मैं उगते हुए सूरज को
आशा से देखता हूँ
उसकी हर किरण में
गति और जागरण का संदेश पाता हूँ
उम्मीद के पंख लिए
ख्वाहिशें फिर
आसमान में उड़ने लगी हैं
मुझे विश्वास है, आज नहीं तो कल
मैं फिर चलूंगा आपनी संपूर्ण ऊर्जा  से

अब नहीं टूटेगा कोई सपना
स्वयं के पुरुषार्थ से।

(2)
खण्ड-खण्ड अस्तित्व

मरे हुए कई रिश्तों को
ढो रहा हूँ वर्षों से
सम्बन्धों के फैल गये विष को
अमृत बनाने की चाह में

जख्म जो उभरे सीने पर
ख्वाब में झिलमिलाते हैं
जब दिल का दर्द आंसू बनकर
आंख से छलकता है
वेदनाएं थकी सांस-सी चलने लगती हैं

मेरी हर अनुभूति, हर इच्छा की
होती रही अग्नि परीक्षा
रिश्तों से मिले हुए विष को
हमने पीने की कोशिश की
सुख की जो डोरी बंधी थी जीवन में
कतरा-कतरा टूट कर बिखरती रही

समय के साथ
संदर्भ भी बदलते गए
शून्य पथ, अंधी दिशाएं
मंजिलों के रास्ते कठिन होते गए
मेरे संपूर्ण व्यक्तित्व की डोर
कब मेरे हाथों से फिसल गई,
पता ही न चला
मेरा अस्तित्व रिश्तों को ढोते-ढोते
खण्ड-खण्ड हो गया

अचानक ही बुझते दियों के उच्छवास-से
अपनी नियति में चुकते प्रश्न चिन्हों ने
अपने ही होने का अहसास जगाया
अभिलाशाएं नए सूरज की खोज में
प्रज्वलित होने लगी
मेरी नाकाम हसरतें अपनी दृष्टि में
प्रकाश भर कर चलने लगी
मंजिलों की राहें स्वयं ही प्रकाशित होने लगी
और
लक्ष्य की पगडण्डियां
स्वयं ही मंजिल छूने लगी।

(3)
एक नया संघर्ष

रात चलती रही, रात भर
पीड़ा की घनघोर आंधी में
कल्पनाओं के आसमान ने
विवादों की जुबान बोलते
चमक-दमक को गिरवी रख
सूरज को भी बना लिया बंधक

खुद अपनी ही परिधि में घिरकर
सूर्यमुखी वादों और
विश्वासों के मासूम घरौंदों से
प्रकृति के दामन को तार-तार कर दिया

परछाई नापते सूरज
और हवाओं से उत्पन्न आहटें
पतझड़ द्वारा नंगे किए पेड़-सी
अपने जीवन की
खण्ड-खण्ड हुई विपत्तियों का
अहसास कराती
मौन है

पुरानी पत्तियों के गिरने से 
मरता नहीं कोई पेड़
सृष्टि में यह क्रम चलता रहता निरंतर
बहुत कुछ खोकर भी
बहार आती है फिर हर बार

किरणें धरती पर आकर
खोल देती हैं सुख के बंद दरवाजे
खुशियों के बादल देते अपना अमृत
तब फूटती है नन्ही कौंपलें
देती यह संदेश
शुरू होगा फिर एक नया संघर्ष
हारता नहीं जो परिस्थियों से
जितता है फिर वही
पाता है उत्कर्ष
एक नए सृजन के साथ।


(4)
सपनों की पगडण्डी

कितनी बार मोहभंग हुआ
खुद से खुद को तलाशने में
विषमताओं के बवण्डर में फंसा
अनुत्तरित प्रश्नों के घेरे में
अपना अस्तित्व कब तक
कायम रख पाऊंगा

जिन्दगी से समझौता तो सिर्फ
इसी शर्त पर है कि-
कभी तो स्याह अंधेरे से निकलकर
सुनहरे उजियारों को छू पाऊंगा
और महकने लगेगी जीवन की बगिया

पर हर बार
मोहभंग के क्षणों में
विश्वास-किर्च-किर्च बन टूट-सा गया
रिश्ते आजकल
कटूता की हल्की-सी आंच में भी
भाप बन उड़ जाते हैं
दोहरा जीवन, दोहरे प्रश्न
हर जगह दोहरापन
आखिर अपनी पहचान
बताना चाहूँ भी तो कैसे?

सपनों की पगडण्डी पर चलते-चलते
थम गए हैं मेरे पांव
भौतिकता के मीठे विष में
विश्वास भी गलत साबित होने लगा

मैं तो इन पीड़ाओं में भी
चल रहा हूँ, बढ़ रहा हूँ
सूर्य की तलाश में
भर देगा जो जीवन में 
सफलताओं के उजाले
एक नई सपनों की पगडण्डी
खुलने लगी राह में!


(5)
अंधकार के बीज

ज्योति-पर्व पर
जला रहे हो पीड़़ा के दीप
लील चुका है तम
परंपरा, संस्कृति और संस्कार

ज्योति-पर्व के अस्तित्व बोध में
अंधेरे से लड़ना चाहते हो
तो आओ
जला लो अपने भीतर की मशालें
संजो लो अंतर्मन में
अस्तित्व बोध का दीप

मन में जब जलती हैं मशालें
तब खुद-ब-खुद बदलने लगती हैं
इतिहास की इबारतें
कटने लगती हैं संवेदना की फसल

अपने अभिमान में
खण्ड-खण्ड होते आदमी हो तुम
समय के चित्र फलक पर गलत तस्वीर मत खींचो
ज्योति-पर्व पर
अंधकार के बीज मत बोओ
तुम्हारे भीतर एक सरसब्ज बाग है
उसे सींचो
जो प्रकाश मौन और म्लान हुआ है
देवदूत की तरह अंधकार को काटो

तुम पर समूचे भविष्य की आस्था है
और जिन्दगी महज अभिमान में तार-तार
अंधेरे का घोषणा पत्र नहीं
रूप है, रस है, गंध है, उजास है
आदमी आत्मा का छंद है।

राजकुमार जैन राजन
चित्रा प्रकाशन  आकोला-312205 (चित्तौड़गढ़) राजस्थान 
मोबाईल:-9828219919