वह उर्दू वाली गर्ल- शक्ति सार्थ्य


शक्ति सार्थ्य
बड़ी तादात में लोगों की भीड़ जमा देख मेरी आंखो में चमक आ चुकी थी। मेरा सलेक्शन शहर की एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी में हो चुका था। ये पहली बार नहीं था जब मैं अपने साथ हुए इस इत्तफाक से एक बड़ी ऊँचाई पर था। ऐसा कई बार हो चुका था मेरे साथ। ऐसा होना मैं आज तक नहीं समझ पाया था। और ये भी एक अजीब इत्तेफाक था।

आज दफ्तर में मेरा पहला दिन था। सारा स्टॉफ मेरे स्वागत के लिए मेन दरवाजे पर फूल-मालायें हाथ में लिए खड़ा था। मैं थौड़ा नर्वस था। लेकिन साथ ही साथ मैं अपने आपको गर्व से भरा हुआ महसूस कर रहा था। जोरदार तालियों के साथ कंपनी के एडवाईजर मैनेजर ने मेरा स्वागत किया था।

"आपका स्वागत है टेलीकॉम की दुनिया में मिस्टर रोहन" एडवाईजर मैनेजर ने कहा।
"जी शुक्रिया सर" मैंने होंठों द्वारा जबरन ढकेले गये अपने इन शब्दों से दफ्तर में प्रवेश किया।

दफ्तर का माहौल काफी खुश्नुमा था। मेरी अपनी दफ्तर की टेबेल से कुछ ही दूरी पर एक गार्डन था। उसकी सभी प्राकृतिक रचनायें आसानी से दिखाई दे सकती थी। मैं देख सकता था कि कैसे सुबह के खिलखिलाते हुए सुगंधित फूल दोपहर में अपनी मूर्छित अवस्था पा लेते थे। कि कैसे वो माली हर रोज पौधों की देखरेख करता। कि कैसे पास की कॉलोनी से आये छोटे बच्चे अजीब तरह की कलाकृतियां करके अपने आसपास मौजूदा लोगों का मनोरजंन करते। कि कैसे पवन का एक झोखा मेरे अंदर करलव ला देता।

मैं अपनी टेबल पर बैठ चुका था। दैनिक होने वाले कार्य की रूपरेखा को पढ़ ही रहा था कि ठीक मेरे सामने से आती हुई एक मधुर आवाज ने मेरा ध्यान तोड़ा।

"हैलो सर, गुड मॉर्निग मै आपकी असिस्टेंस शोफिया" एक चमकदार चेहरे के दो गुलाबी होंठ मेरी ओर आपस में एक दूसरे को स्पर्श करते हुए दिखाई दिये।

"ओह हैलो, मिस शोफिया मैं रोहन... रोहन शर्मा" मैं अपनी यादों की रील से होते हुए उस चेहरे को देख थोड़ी सी हड़बड़ी में बोला।

मुझे जहां तक याद है कि तो ये वही चेहरा है जो मेरी पहली मोहब्बत के साथ किसी सायें की तरह चिपका रहता था। तबस्सुम खानन की आपा का चेहरा।

वही 'उर्दू वाली गर्ल' जिससे मेरी मुलाकात एक इत्तफाक के साथ हुई थी। तबस्सुम खानन। बुर्के से झांकता हुआ एक चेहरा। जो किसी काली स्याह रात के बीच चांद सी मुस्कुराहट लिए था। जो अनायस ही आंखों में चमक भर देने वाला था। गर्म और झुलसती हुई जिंदगी पर एक ठंडी राहत का प्रतीक था। एक अहसास जिसे दिल के मानचित्र पर साक्षात संजोया जा सकता था। एक राह जिसको हमेशा सही ठहराकर उसपे कदमताल किया जा सकता था।

ठीक मेरे पीछे उर्दू के पेपर की Answer Copy पर एक चेहरा गढ़ा हुआ था। हालांकि अब तक मैने उसका चेहरा देखा तक ही नहीं था। लगभग दो घंटे बीत जाने के बाद ठीक मेरे पीछे एक आवाज आयी थी।
"मैं जब से आयीं हूँ तब से आपको खाली बैठा देख रही हूँ" वो बोली।

"जी मुझे उर्दू नहीं आती, इसलिए" मैने पीछे मुड़ते हुए बोला।

"ऐसा हो ही नहीं सकता कि आप उर्दू के पेपर देने आयें हों और आपको उर्दू ही नहीं आती हो" मेरे ओर सवालीय निगाह से देखते हुए उसने कहा।

"जी मुझे सच में उर्दू नहीं आती, मैने तो बस अपने एक दोस्त के कहने पर ही इसका फार्म भरा था। और कहा कि चल इस बार उर्दू से अपना फार्म भरते है.. और तू टेंशन मत लेना पास होने का जुगाड़ भी कर लूंगा मैं। मेरे मना करने के बावजूद भी उसने मेरा फार्म भर दिया" मैने सफाई देते हुए कहा।

"ओह! तो सच में आपको उर्दू नहीं आती, चलिए आप मुझे अपनी Answer Copy दीजिये मैं आपका पेपर हल कर देती हूँ" उसने न जाने कौन सा हक जताकर मुझसे कहा था।

"जी आप रहने दीजिए, हमारी कॉपी तो बाद में लिख ही जायेगी.. खामख्वाह आपका पेपर मेरे चक्कर में छूट जायेगा" थोड़ी सी घबराहट लिए मैं बोल रहा था क्योंकि अब तक टीचर की निगाह हम पर बन चुकी थी।

"मेरा तो पेपर कम्पलीट हो चुका है" उसने एक मुस्कुराहट के साथ कहा।

"इतनी जल्दी" मैं तवाक से बोल पड़ा।
"जी, मुझे तो ऊर्दू आती है न" चुलबुलाहट और कॉन्फीडेंस से बोल उठी वो।
मैं अब तक इस बात से अनजान था की टीचर पूर्णतया हमारी ओर ध्यान दे रहा था।
न चाहते हुए भी मैं न जाने कब और क्यों उससे कॉपी बदल चुका था।
और टीचर ये सब बात जानकर भी क्यों अंजान था ये भी मेरे समझ से बाहर था।
बहराल तीन घंटे का समय बीत चुका और कॉपी सब्मिट करने का समय भी हो चुका था।

मैं कॉपी सब्मिट करके बाहर अपने दोस्त अमित का इंतजार कर रहा था। ठहरो.. शायद मैं उस उर्दू वाली गर्ल का इंतजार कर रहा था। उसे थैंक्स बोलने के लिए।
"ओह! रोहन कैसा हुआ पेपर" अमित ने कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
मुझे तो अमित के आने की भनक तक नहीं लगी। शायद मैं उसके ख्यालों में खोया हुआ था।
"बहुत ही अच्छा हुआ पेपर यार" मेरे शब्दों में एक्साइटमेंट था।
अमित मुझे कुछ देर तक घूरता रहा और बोला "अबे तुने कब सीख ली उर्दू"
"बस अभी अभी" मेरी निगाह अब भी Exit Gate की तरफ थी।
"अबे क्या मजाक कर रहा है बे" यकीं न करने वाले एक्सप्रेशन बनाकर बोला।
वो हकीकत से अंजान था।
"नहीं यार, मुझे तो नहीं आती है किंतु उसे तो सब आती है" मैं भी नहीं समझ पाया कि क्या बोला था मैने अभी अभी।

"अबे क्या बोल रहा तू, मुझे घुमा मत.. चल सच सच बता क्या हुआ और 'उसे' इससे क्या मतलब है तेरा।" अमित मुझसे परेशान था ऐसा साफ देखा जा सकता था उसके चेहरे को देखकर।
मैं खुद हैरान था कि मैं भी क्या अमित को घुमा रहा हूँ। मैं अमित को सबकुछ साफ बता देना चाहता था। फिर मन ही मन में तैर रही उसकी स्मृति मुझे कहां कुछ बोलने दे रही थी।

'तो सुन अमित... जो जो वाकया अंदर हुआ सब कुछ एक सांस में बता दिया मैने'
"ओह! तो ये बात है" राहत की एक लम्बी सांस खीचते हुए बोला अमित।
"हां यार"
अमित थोड़ा लफंगबाज मिजाज का बंदा था। कोई भी रास्ते से उसके पास से गुजरती हुई लड़की निकलती तो वो कमेंट पास करने से बाज नहीं आता था। फिर चाहे अंजाम जो भी उसकी कोई चिंता नहीं करता वो।

एक वाकया यहां भी हुआ ऐसा ही। हम दोनो जब उसका इंतजार कर ही रहे थे, उससे कुछ दूरी पर एक खूबसूरत लड़की शायद हमारी तरह किसी का इंतजार रही थी को अमित कमेंट पास करने लगा।
"ओह होए क्या खूबसूरत बला है रे, एक दम मक्खन जैसी चिकनी, आह-हा बुर्के में भी क्या कमाल लग रही है, अब तो राह भी नहीं जा रहा है।"
मैं उसकी इसतरह की बेहूदा हरकत से हमेशा परेशान रहता क्योकि उसके साथ साथ मेरा भी स्टेटस गिरता था।
"अरे ये क्या कर रहा है अमित तू" समझाने के हैसियत से बोला मैं"
"अरे रोहन जब तक वो नहीं आती तब तक इससे ही टाईम पास करते हैं रे, वो नहीं तो उसकी बहन ही सही" आज फुल मूड में था अमित।
"अबे तुझे कैसे मालूम ये उसकी बहन है"
"अबे सिंपल है रे ये भी बुर्के वाली और तेरी भी बुर्के वाली, तो दोनों हुई न बहनें"
अब तक वो हमारी बातें सुनकर हमें खा लेने वाली नज़र से देख रही थी। 
मुझे शर्मिंदगी महसूस हो रही थी।

"ये अमित भी ना.." मैं सोंच ही रहा कि सामने से मुझे 'वो उर्दू वाली गर्ल' आती हुई नजर आई। मैं जैसे ही उसकी ओर आगे बढ़ ही रहा था कि वो दूसरी ओर खड़ी उस लड़की को ओर बढ़ने लगी। और मेरे दिल की धड़कने।

वो दोनो काफी देर तक आपस में बातें करती रही। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अब कैसे उससे बात करूं। क्या इसे सबकुछ बता तो नहीं दिया होगा उसने। क्या ये सच में उसकी बहन तो नहीं होगी ना। अगर ऐसा हुआ तो मैं इसका शुक्रिया कैसे अदा करूंगा।
"ये अमित भी ना कहीं भी मुहं मारता फिरता है। ये लफंगा खुद तो फंसता ही है और साथ में मुझे भी फंसाता है। कमीना कहीं का।" मुझे आज अमित का साथ खल रहा था। मैं आज अमित को एक जोरदार थप्पड़ जड़ देना चाहता था।

मैं गुस्से में बाईक उठाकर चल दिया। तभी किसी सुनी हुई अवाज ने मुझे पुकारा।
"हैलो! सुनिये.. इनसे मिलिये, ये है मेरी आपा शोफिया खानन और मैं तबस्सुम खानन।" बड़ी उत्सुकता से उसने मेरा परिचय उससे और खुद से कराया।
'तबस्सुम खानन' क्या सुंदर नाम था बिल्कुल उसकी तरह।
"और आपका नाम?" उसने पूछा।
"जी! रोहन... रोहन शर्मा।"
मैं घबराह रहा था कि कहीं उल्टा-सीधा सुनने को न मिल जाये मुझे।
तभी कुछ हिदायत सुनाई दी।
"देखो आप लोग हमसे दूर ही रहें तो ही बेहतर होगा हम सबके लिए" शोफिया कुछ चिंतित से लग रही थी।
"जी, लेकिन मैं तो अभी अभी Exam Hall में मिला था इनसे, और मैं तो बस शुक्रिया अदा करने आया था इनका जो इन्होंने मेरी हेल्प की थी, बस इससे और ज्यादा तो मैं जानता भी नहीं हूँ।" लगभग सफाई देते हुए मैने कहा।
"और इससे ज्यादा जानने की कोशिश भी नहीं करना तुम। ये बात गाँठ बांध लो। और हां साथ में अपने उस लफंगे दोस्त को भी समझा देना कि वो आईंदा ऐसे कमेंट पास न किया करे तो ही बेहतर होगा उसके लिए।" कुछ ज्यादा ही गुस्से में लग रहीथी शोफिया। मैं और तबस्सुम भौचक्के खड़े सुन रहे थे।

कुछ देर के बाद वो दोंनों वहाँ से निकल ली। किंतु तबस्सुम आंखों से कुछ इशारा कर गई थी। मैं अभी तक उसकी आपा की बातों से उभर नहीं पाया था कि तभी अमित ने पीठ थपथफा दी।
"क्या हुआ बे ऐसे कैसे खड़ा है जैसे बिल्ली रस्ता काट गई हो तेरा।" वो मजाक के मूड में था।
"साले.. अमित.. कमीने.. लफंगें... तू चुप हो जा। और चुप-चाप घर चलते है।" मैं अभी भी गुमसुम था।

दरासल मैं आपको कुछ बातें क्लियर कर देना चाहता हूँ। हम दोनो। यानी मैं और अमित B.Sc. फाइनल इयर के स्टूडेंट है। और ये जो उर्दू से दोबारा फार्म भरने का आईडिया है न अमित का है। ये इसलिए कि अमित बदला लेना चाहता था मुसलमानों से। क्योकि उसकी कॉलोनी की एक हिंदू लड़की एक मुस्लिम लड़के के साथ रफूचक्कर हो गई थी। उसकी घणी बेज्जती हुई थी। दूसरी कॉलोनी के लोग उसे ताना भी मारते थे। कोई हिंदू मर्द नहीं बचा था जो उस कठमुल्ले के साथ भाग गई कलमुई। बस इसी बात से आहत होकर उसने मुस्लिम लड़की को फंसा के और उसे भगा के ले जाने की सोची थी। यही कारण था कि हमें उर्दू ना आने के बावजूद भी उर्दू का पेपर देना पड़ रहा था।

अगला पेपर ठीक दो दिन के बाद था। मुझे उर्दू बेशक पल्ले नहीं पड़ रही थी लेकिन तबस्सुम की आंखों का इशारा खूब समझ आ रहा है। नैन मटक्का हो रहे थे हम। उसकी वो पहली मुलाकात रह रह के याद आ रही थी। ये इत्तफाक था। या फिर कुछ और। ये भी एक इत्तफाक बनकर रह गया। मैं अगले पेपर में अपनी दिल की बात उससे कह देना चाहता था। और कह देना चाहता था कि मैं भी उर्दू सीखना चाहता हूँ तुमसे। और कह देना चाहता कि तुम्हारी झील से आंखों का यूं इशारा करना दिल को बेवजह ही मार देता है। मैं ख्वाब बुन रहा था। संग साथ का। संग मिटने का। और संग हो जाने का।

पेपर का टाईम हो चुका था। और ये अमित अभी तक आया ही नहीं। पिछले दो दिन से अमित से मुलाकात भी नहीं हुई थी। मैं काफी देर तक इंतजार करता रहा। वो नहीं आया था। और वो भी नहीं आई थी। मैं पूरे तीन घण्टे तक उन्हीं को याद करता रहा। अपनी पीछे वाली सीट को निहारता रहा। वो टीचर भी मेरी ही तरफ देखता रहा। बहराल पेपर खत्म हो चुका था। मैं उदास मन लिए बाहर निकल चुका था। वो उर्दू वाली गर्ल के न होने पर मैं और मेरा पेपर दोनों ही अधूरे रह गये थे।

काफी वक्त के बाद मुझे पता चला कि इस अमित की बजह से ही मुझे फिर से परेशान रहना पड़ा।
दरासल हुआ यूं था कि अमित शोफिया को उड़ा ले गया था। उनका वहां मेरे साथ ऐसा वर्ताब करना महज एक सोंची समझी चाल थी। एक ऐसी चाल जिसकी मुझे भनक तक नहीं हुई। अमित और शोफिया कब मिले। और कब सैट हुए।  और कब भागनें की प्लानिंग की। मैं आजतक इस बात से वेखबर हूँ। उस दिन के बाद से तबस्सुम को घर में नजरबंद कर दिया गया। और जल्दी ही कोई लड़का देखकर उसको भी घर से विदा भी कर दिया गया।

मैं भी बुझे-बुझे मन से पढ़ता गया और सफलता की सीढ़ी लांघता गया।

आज शोफिया को मैं यहां देख थोड़ा भौचक्का हूं।
"शो... शोफिया तुम यहां" मैने उससे जानना चाह।
"हां सर, मैं यहां पिछले एक साल से जॉब कर रहीं हूँ" वो एक अपराधी के जैसे नजरे झुकाये खड़ी थी।
"और वो अमित कहां है? और तुम दोनों इतने वक्त तक कहां थे? मेरे बारें में किसी ने कुछ सोंचा तक नहीं क्यों? और तो और मुझे भनक तक नहीं लगने दी।" 
मैं सवाल पे सवाल दागे जा रहा था। और शोफिया अपनी सफाई पेश करती जा रही थी।

अमित पिछले दो साल से एक गंभीर बिमारी से ग्रस्त है। उसका जगह जगह मुंह मारना ही उसकी इस बिमारी का एक कारण भी है। और साथ ही साथ शोफिया भी इसकी चपेट में आ चुकी है। दोनों के परिवार वालें पहले से तो खफा थे ही अब तो उनसे घृणा भी करते थे। ये दोनों एक दम अकेले किसी गुमनामी में जीवन व्यतीत कर रहे थे। समाज इनसे परे हो गया था। आज इन्हे प्यार की जरूरत है इस बीमारी से लड़ने की हिम्मत देने की जरूरत है।

और मैं कल शाम इनके घर डिनर पर जा रहा हूँ। अपने लफंगबाज दोस्त से मिलने जो मुझसे कहीं दूर किसी गुमनामी में जीवन व्यतीत कर रहा है।
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