स्वाति गाडगिल की कविता

- स्वाति गाडगिल
स्वाति गाडगिल
सूनी गज़ल

आज ना जाने क्यूँ
बेजुबाँन हैं हम
दिल खाली खाली सा है
और आँखें हैं नम

जिंदगी बडी रुसवा है
ना कलम है ना फन
साँसें चल रही हैं
हाँ! जिंदा हैं हम

लगता है रूह निकल गई
वरना दो लफ्ज तो कह देते
गज़ल ना सही
कोई रुबाई सुना देते

भीड़ में अकेले हैं
आज इजहार करते हैं हम
आपका साया बनने चले थे

खुद बेरुह हैं हम
ऐ खुदा गले लगा ले
बड़ी सूनी है जिंदगी
जाम में डूब जाये
या हो जाए दिल्लगी

शाम सख्त हो चली है
रात ऐसी बिरह़न
ना सिसकियाँ सुनी
ना चूड़ियों की खन-खन
आज ना जाने क्यूँ
इतने बेबस हैं हम
न कोई कलाम सुनाया
ना कोई गज़ल।