रानू उनियाल की तीन कविताएँ

रानू उनियाल
हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं की कवयित्री रानू उनियाल लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं। अंग्रेजी में आपके तीन काव्य संकलन छप चुके हैं और आपकी कविताओं का अनुवाद उर्दू, ओड़िया , मलयालम, उज़्बेकि, व स्पेनिश भाषाओं में हो चुका है। आप लखनऊ में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की संस्था पायसम से भी जुडी हैं और समाज में महिलाओं और बच्चों के प्रति विशेष रूप से अपना दायित्व निभाती हैं। वेबसाइट ranuuniyal.com


उम्र के उस छोर पर - माँ 

उम्र के उस छोर पर
अब और भी नमकीन लगने लगी है वह
बगैर साज सिंगार के, बिना ज़ेवर
सजने लगी है वह
इक मासूमियत ने उसके चेहरे पर
घर बना लिया है अपना
बिन बात के बच्चों सी चहकने लगी है वह
चाल में फुर्ती से नहीं,
सलीके से, चलने लगी है वह
उम्र सत्तासी की है फिर भी जवानों
से ज्यादा शोख लगने लगी है वह
डरती नहीं, दबती नहीं,
शब्दों से अब कुछ कहती नहीं
फिर भी अपनी दो टूक हँसी से
बहुत कुछ कहने लगी है वह
जब भी जिक्र होता है उसकी ताज़गी का
खुदा का शुक्र है यह कह कर सजदे में
झुकने लगी है वह।
रब के इश्क में सराबोर हो
जिंदगी के गिले शिकवों से दूर
अपनी ही चाल में मस्त
इक अनोखी खुशबू से लबालब
महकने लगी है वह।
***

घर के बूढ़े

दूध की तरह उबलते हैं
और दही
की माफ़िक जम जाते हैं
कभी बुरा मान जाते हैं।
तो कुप्पा सा फूल जाते हैं,
घर से निकल जाने की
धमकी देते हैं
फिर कमरे में बंद हो जाते हैं
रात भले ही नींद न करी हो
सुबह पाँच बजे से
खटर पटर करने लगते हैं
कहते हैं हम दिन भर
सोते नहीं
पर अक्सर दिन में ही
नींद पूरी कर लेते हैं
शाम की चाय का इन्हें
इंतज़ार रहता है
बड़े विचित्र होते हैं
घर के बूढ़े
कभी खीजते हैं
कभी खिजाते हैं
बिन बात मुस्कुराते हैं
झर-झर आँसू बहाते हैं।
चलते-चलते हाँफ जाते हैं
कुछ भी न पकड़े हो हाथ में
फिर भी काँप जाते हैं
कुछ अगड़म कुछ बगड़म
होते हैं घर के बूढ़े
घर इनके बगैर घर नहीं होता
घर में बूढ़े हो तो बच्चे भी
घर आते हैं
अनेक आशीर्वाद से खिल जाते हैं
घर की रौनक हैं बूढ़े
इनकी गोद में सर रख
हम निश्चित हो
दुनिया जहान घूम आते हैं
बूढ़े तो बूढ़े हैं
प्यार से सहलाते हैं
इनके क़दमों की ताकत से
पीर भी हिल जाते हैं।
घर का इतिहास हैं बूढ़े
तभी तो इतनी बातें हैं।
***

असमंजस में है लाल्टू

बहुत कुछ, कहना चाहता है लाल्टू
पर असमंजस में है लाल्टू
कि सच कहे भी तो कैसे।
तुम तो सुनते ही नहीं किसी का सच
करते हो बातें अपने ही आप से दिनभर।
और जब भी बेचारा कुछ कहने
की हिम्मत जुटाता
चुप कर देते हो एक झिड़की के साथ
कि आखिर मुँह खोलने की
तमीज़ किस दिन आएगी तुझे?
***

10 comments :

  1. Jawab nahi tumhara ranu,kis saadgi se keh di hum sab ke ghar ki baat,dil ki baat💐🌹

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  2. Jawab nahi tumhara ranu,kis saadgi se keh di hum sab ke ghar ki baat,dil ki baat💐🌹

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  3. Waah ranu,jawab nahi tumhara,kis saadgi se keh di hum sab ke ghar ki baat aur dil ki baat����

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  4. Woww! Bahut aasadharan!bahut bahut dhanyawad aaj k is samay m hum bacho ko boodhepan k khoobsoorat waranan se jagane k liye! Dhanyawad ma'am

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  5. Wah ranu tumne to sach ko itna acha shabdon mei likha hai ki dil ko choo gaya

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  6. Wow owesome tan bhi sunder man bhi sunder toh bhavon mein bhi sundarta bhala kyon naa nikhre ...dear yahi toh aap ki pahchan hai

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  7. बहुत ही सुन्दर, मर्मस्पर्शी कविताएं हैं, लाजवाब सम्वेदनशीलता से भरी हुई । कहीं मन को गहरे से छू लेती हैं " बूढ़े तो बूढ़े हैं इनकी गोद में सर रखकर...."

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  8. बहुत ही सुन्दर, मर्मस्पर्शी कविताएं हैं, लाजवाब सम्वेदनशीलता से भरी हुई । कहीं मन को गहरे से छू लेती हैं " बूढ़े तो बूढ़े हैं इनकी गोद में सर रखकर...."

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  9. बेहतरीन, सरल शब्दों में इतनी गहरी बाते

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  10. मेरे पास लिखने के लिये शब्द नही हैं थोडी ही में इतने भावों से इतनी खुबसूरत बात रख दी अति सुन्दर

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