समीक्षा 'एक पेग जिंदगी'

समीक्षा: कथा संग्रह "एक पेग ज़िन्दगी"
लेखिका: पूनम डोगरा
प्रकाशक: समय साक्ष्य, देहरादून
मूल्य: 165 रुपये
समीक्षक: डॉ लता अग्रवाल
पूनम डोगरा के कथा संग्रह 'एक पेग ज़िन्दगी' को मैंने घूँट-घूँट पिया। सच कहूँ तो इस एक पेग में उन्होंने कई कलेवर भर दिए हैं। लघु कथा और कहानियों के इस संग्रह में जीवन के विविध क्षेत्रों से विषयों का चुनाव किया है।

विशेष बात यह कि पूनम जी कई वर्षों से विदेश में रह रही हैं मगर उनके समस्त कथानक इसी भारत भूमि से उठाये गये हैं कुछ वे विषय हैं जिनकी प्रासंगिकता सदैव बनी रहती है, पूनम जी ने उन्हें अपने अंदाज में इस पेग में ढाला हैं।

हाँ! कुछ शीर्षकों में अवश्य वह प्रभाव हम देख सकते हैं, जैसे - डोज़ ए इन्सुलिन, सॉरी, बॉन्डिंग, सिगरेट बट्स, ओवर टाइम, कनेक्शन, फुल सर्कल, ट्रेनिंग, लव ब्लैक एंड व्हाइट, लव यू आलवेज, वेलेंटाइन। संग्रह में अधिकांश कथाएं मुझे नारी विमर्श को लेकर दिखाई दी। जाहिर है एक महिला लेखक का इन विषयों पर आधिकारिक लेखन होता है। चर्चा आरम्भ करूंगी कहानी ‘तैश’ में जहां कामवाली बाई यह कहती है,
"कितनी दफे कहा आपसे वो एक सुनाते हैं आप चार सुनाओ ... यह मरद जात कुत्ते के माफिक है।"

नारी के दो वर्गों से परिचय करता हैं एक और अशिक्षित महिला है मुखर वहीं दूसरी और शिक्षित सभ्य महिला जो धीरे से उच्च वर्ग में महिलाओं की खामोशी पर प्रश्न चिन्ह अंकित करती है। ‘ओवरटाइम’ - एक ओर महिलाओं के दोहरे दायित्व की सराहना करता है तो दूसरी ओर पूछने पर नायिका का यह कहना,
"और तुम्हारे पति! वो हाथ नहीं बटाते?"
"हाय! वो पति हैं हमारे... आप भी ना।"

नारी के भीतर कैद औरत को दर्शाती है। जिससे उसे खुद ही मुक्ति पाना होगी। उसी तरह ‘कड़वा घूंट’ - जिसे आज भी समाज की कई महिलाएं न चाहते हुए कंठ में समाए हुए हैं न उगल पाती न निगल पाती है। परिणाम यह कुंठा उसके जीवन को घुन की तरह सालती है। ऐसी ही एक घुन की शिकार है, ‘मेरा कसूर’ की नायिका, बचपन में दरिन्दगी की शिकार बच्ची को अपने दुःख और दर्द से उभरने का अवसर ही नहीं दिया गया बल्कि उलटे उसकी घुटन को दबा दिया गया कुंठा का वह बीज जाने-अनजाने उसके भीतर जड़ें जमा चुका है परिणाम वह वैवाहिक जीवन के प्रणय को भी उसी दरिन्दगी का हिस्सा मानती है और मानसिक रोगी घोषित कर पति के द्वारा बेरंग लौटा दी जाती है। ‘हादसा’ इस, तपन भरी राह में सुकून की छाँह देती लगती है जब एक माँ द्वारा बेटी को सम्बल मिलता है-
"बेटी! ज़िन्दगी में कई हादसों से गुजरना पड़ता है, ... एक हादसा यह भी।"

सच निश्चय ही इस आत्मीय भाव से वह बेटी पुनः जी उठती है। जीवन के प्रति सकारात्मक भाव को पूनम जी ने बखूबी दर्शाया है। आखिर क्यों ... बलात्कार का दर्द स्त्री के ही हिस्से आता है? क्या इसका कोई हल है?
इसका जवाब स्वयं उनकी कथा ‘इज्जत’ में कॉलेज की छात्रा देती है, -

"ताउजी! दो साल पहले आपके यहाँ भी डाका पड़ गया था ... क्या आपकी इज्जत चली गई थी ... ताऊजी?"
हाँ! डाका ही तो है किसी की आबरू पर, फिर तिजोरी पर डाका पड़े तो सहानुभूति, आबरू पर पड़े तो तिरस्कार? ये कैसा इंसाफ? एक अबोला प्रश्न समाज को देती कथा।
एक गृहस्थी बसाना नारी के लिए बड़ी तपस्या है जिसपर वह अपनी जाने कितनी अभिलाषाएं कुर्बान करती हैकिन्तु जब अंततः अपने हिस्से उपेक्षा पाती है तो टूट कर रह जाती है।
"तुम सफल बिजनेस मेन, मैं कुढ़ती, चिढ़ती गृहणी।"

‘खो गए गुलाब’ और ‘ज़ोर का झटका’ के माध्यम से पूनम जी ने उन्हीं नारियों की वेदना को आवाज दी है। कभी पूनम का चाँद लगने वाली अचानक क्यूँ अमावस का चाँद लगने लगती है एक बड़ा प्रश्न पुरुष समाज को देती हैं लेखिका।अर्थवादी युग में कलंकित रिश्तों का दर्द और उस दर्द की रिसन को ‘गर्म गोश्त’, ’ एक हादसा’, ‘आख़िरी किश्त’ और ‘विकृति’ के माध्यम से मुखर किया है।
"जहां गर्म गोश्त की कीमत सुनकर ही गरीब घर का ठंडा पड़ा चूल्हा धड़कने लगता है।"
"लतिका को फूलो में भी पिता का विकृत चेहरा नजर आता है।"
"वहीं गुरु शिष्य के रिश्ते का कलंक बया करती - उनकी अंतिम किश्त मैं कल उत्तर चुकी हूँ। "

ये वे अनुत्तरित प्रश्न हैं जो पूनम जी समाज को चिन्तन हेतु देती हैं, क्या यही एक उपाय है डिग्री हासिल करने का? क्या पिता पुत्री के बीच भी अब? वही समाज जहां गरीबी के नाम पर कच्ची उम्र की बोलियां लगती हैं?
‘अपने अपने मुखोटे’, सभ्य समाज में नारी के प्रति घरेलू हिंसा को उजागर करती है।

एक तीखे अंदाज की कथा है ‘सॉरी’, जीवन भर अपमान और उपेक्षा के घाव को सॉरी का मरहम नहीं भर पाता, यद्यपि वह अपने पति धर्म का पालन करती है किंतु पति के सॉरी कहते ही उसकी प्रतिक्रिया कुछ अलग होती है -

"एक शब्द सॉरी! और तुम कोरे के कोरे ... खींच लिया हाथ प्रभा ने, दनदनाती हुई निकल गई कमरे के बाहर।"

कुछ गलतियों को मन माफ़ नहीं करता बहुत सच्चाई के साथ पूनम जी ने इस बात को रखा। बधाई देती हूँ उन्हें। ये बात नहीं कि उन्होंने केवल टूटे मन या बिखराव की ही बात की बल्कि पति पत्नी के अटूट सम्बन्धों को कितनी खूबसूरती से रंग दिया है कि बरबस मुंह से निकल पड़ता है-
"कुछ ऐसे बन्धन होते हैं.... "
‘डोज़ ए इन्स्युलिन’, फ़िक्र है पति की शुगर न बढ़ जाये किन्तु उनकी चोरी को पकड़ उन्हें शर्मिंदा भी नहीं कर सकती। इसलिए रसोई में जाकर कहती है,
"सुनो! अपना इन्स्युलिन लगाना मत भूलना।"

यह है भारतीय नारी का प्रेम जिसमे तनिक भी बनाबट नहीं, जीवन के करीब की कथाएँ, इसी प्रकार ‘आई लव यू’, ‘पन्द्रह घण्टे बाद’, ‘मेरे जाने के बाद’ कथाएं सात फेरों के बंधन को सार्थक करती हैं। मेरे जाने के बाद में तो एक पत्नी का अपने अभाव में पति की चिंता में यह कह देना –

"काश! मुझसे पहले तुम चले जाते।" सारी संवेदना समेट ले जाता है।"

तेजाब पीड़ित की व्यथा को ‘शीरों तेरी सजा’, में बड़ी ही संजीदगी से जीवित किया है जिसकी कल्पना मात्र से इतनी दहशत छा गई। उसे नायिका कैसे जी रही है बस इसका एहसास कराना चाहती थी वह।
‘अंतराल’ खुले मन की कथा है जिसमें महज एक संवाद के माध्यम से एक बड़ा सवाल समाज को दिया है, क्या स्त्री पृरुष के बीच महज एक वही सम्बन्ध है?
"मैंने खुद को समेटा तुमने खुद को ... फिर चल दिए अपनी अपनी दुनिया में गुम हो जाने को... इन सबके बीच पाप कहाँ था, कोई समझायेगा मुझे?"

विस्तृत दृष्टि प्रदान करता है क्यों एक स्त्री पुरुष के सम्बन्धों को महज देह से जोड़कर देखा जाता है ?
इसे संग्रह की शीर्षक कविता जो निःसंदेह महत्व रखती है जिसे हम संग्रह की प्रतिनिधि रचना कह सकते हैं, ‘एक पेग ज़िन्दगी’ के माध्यम से पूनम जी स्पष्ट किया है पति के साथ सात फेरे उसे सम्पूर्ण परिवार से जोड़ते हैं किन्तु पति द्वारा छल मिलने पर उससे सम्बन्ध त्यागकर भी वह पति के परिवार के साथ सम्बन्ध कायम रहते हैं। इस कहानी के माध्यम से पूनम जी ने सम्बन्धों की नई परिभाषा गढ़ी है।

स्त्री का यह आत्मविश्वास सम्बन्धों को नया नाम देता है। ‘सिगरेट बिट्स’, ‘अधूरा प्रेम’, ‘फुल सर्कल’, ‘पीले पत्तों की खुशबू,’, ‘लव ब्लेक एन्ड व्हाइट’, ‘वेलेंटाइन’ आदि कथाएं ज़िन्दगी के सफर में कहीं पीछे छूटे प्रिय की कसक को कहीं डायरी के पन्नों में तो कहीं ख़ामोशी भरे एकांत में खोजती है।।

‘भक्षक रक्षक और चिता’, ये कथा एक नारी के प्रतिशोध की पराकाष्ठा है जिसमें समाज की नजर में कथित रक्षक वास्तव में भक्षक ... को अग्नि की भेंट चढ़ा जेल में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करती है। कैसी विडंबना है जिसपर जीवन धन लुटाती है वही उसका लुटेरा बन जाता है। नायिका के इस न्याय को समाज ने कितना स्वीकारा ये पाठक बतायेंगे।

थर्ड जेंडर पर ‘तीसरे लोग’, तीन पीढ़ी को जोड़ती ‘बॉन्डिंग’ और ‘डोर’ बताती है बदलते परिवेश में आवश्यकता है मानदंडों को बदलने की,
" दादा का पोते के कान में कुछ इस अंदाज में कहना, तेरा प्यो" दोनों पीढ़ी की डोर को मजबूत कर देता है।

बाकी और भी विषय हैं निराशा में आशा की ज्योति जलाती ‘जादू की झप्पी’,’ हाय मेरा दिल’। कम शब्दों में गहरी बात कहती। जमीन के दर्द को व्यक्त करती ‘चुपड़ी रोटी’,और ‘बुर्ज के अंधेरे’, वृद्धा वस्था की पीड़ा व्यक्त करती कथा, ’फिर मिलेंगे’, ‘जश्न रिहाई का’, टेढ़े होंठ’। अंत में बहुत बड़ा सवाल समस्त मानवता पर छोड़ती कथा है चीत्कार,
"कैसे पूजें इन्हें? ×××नहीं चाहिए कोई धर्म! यही हैं नफरत की जड़ें।"
पुनर्विचार, एक चिंतन, स्व आकलन हेतु विवश करती है।

यह तो थी कथानक पर चर्चा, मेरी समझ, शिल्प की बात करें तो लेखिका ने सहज और सरल शब्दों का प्रयोग किया है अतः शिल्प की दृष्टि से तराशने की सम्भावनाएं देखती हूँ, चिन्तन मनन की दृष्टि से कथा एवं कहानियां बेहतर बन पड़ी हैं, प्रत्येक कहानी अपने में समाज को एक संदेश देती है, चाहे वह ‘लोचा’, ‘उलटी’, ‘झुमकी की हसरतें’, हों या ‘माधुरी अलानि जूही फलानि’ हो, सभी विसंगतियों को समाज से रु ब रु करती हैं, तथा एक नये चिन्तन को रचने हेतु प्रेरित करती हैं, कहीं कहीं कालखंड दोष एवं भूमिका का होना खटकता है, तो कहीं- कहीं पंच लाईन सुंदर बन पड़ी हैं, जैसे -
‘हाय, वो पति हैं! आप भी न!’ ... ‘आखिर इस ऊंचाई की कुछ तो कीमत देनी पड़ेगी न’ ... ‘दुस्साहसी प्रेम सर कटकर भी सिंदूरी था’ आदि,

कुल मिलाकर पूनम जी की समस्त कथाएं सार्थक प्रश्नों को उठाती ही नहीं बल्कि अपने साथ एक नई कहानी हेतु प्रेरित करती है। इस एक पेग में पाठकों को सराबोर करने की पूर्ण क्षमता है यह मैं विश्वास के साथ कह सकती हूँ।

पुनः पूनम जी को बधाई वे इस साहित्य उत्सव में शीघ्र ही दूसरे पेग को लेकर पाठकों के बीच उपस्थित होंगी इसी कामना के साथ।

समीक्षक: डॉ. लता अग्रवाल
73 यश विला, भवानी धाम फेस – 1
नरेला शंकरी भोपाल – 462041
मो – 9926481878