प्रवास के दर्द की अनूठी कहानी - बसरा की गलियाँ

- समीक्षक: संगम वर्मा

पुस्तक: बसरा की गलियाँ 
लेखक: अजय शर्मा 
पृष्ठ 144  (सजिल्द)
दूसरा संस्करण, 2011  
के के पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली 
ISBN: 9788178441061

बसरा की गलियाँ पंजाब के उदीयमान उपन्यासकार अजय शर्मा द्वारा लिखित है। विवेच्य उपन्यास में नायक लोकल से ग्लोबल की यात्रा करता विभिन्न स्थितियों से गुजरता प्रवास के दर्द को रेखांकित करता है। इसके साथ उपन्यास विदेशी ध्ररती और विदेशी पात्रों के बीच जीने के लिए संघर्ण तथा जीवन में बची उष्मा को तलाशने की जद्दोजहद तथा जीवन जीने की तीव्र आकांक्षा है। उपन्यास में पात्र भूख, अभाव, घृणा, संवेदनशीलता और अमानवीयता से लड़ते हुए भी जीवन में प्रेम प्राप्त करने के लिए भटकते हैं।1

विवेच्य उपन्यास स्पष्ट करता है कि पंजाबी युवकों का अपनी जन्मभूमि से विच्छेद कर विदेशों में जाकर धन कमाने की बढ़ती लालसा जिस कारण बेगाने देश में जाकर प्रवास भोगना कई बार उन युवकों के लिए क़ैद जैसी ज़िन्दगी जीने की विवशता मात्र बन जाती है। इतना ही नहीं, फिर वापिस अपने वतन लौटने की छटपटाहट भी उतनी ही बढ़ने लगती है जितनी बाहर जाने की कभी उत्सुकता थी, परन्तु वापिस वतन परतना इतना आसान नहीं होता। इसी जीवन त्रासदी को वाणी देता है- अजय शर्मा का बसरा की गलियाँ उपन्यास। अफसाने का प्रथम भाग एक प्रवासी हिन्दू भारतीय का दूसरे धर्म की लड़की से प्रेम करना और प्रेम की परिणति भोगना है जो उसके भविष्य का काला अध्याय निर्धरित करती है।

डॉ. संगम वर्मा
प्रस्तुत उपन्यास का नायक पंजाब से विस्थापित होकर ट्रांस्लेटर की हैसियत से इराक जा पहुँचता है तथा वहां मुस्लिम युवती बुशरा की आंखों का शिकार बनकर, उसके प्रेमपाश में बंध, उससे हमबिस्तर हो जाता है। हमबिस्तर होने का परिणाम भी मिलता है, बुशरा से जबरन निकाह। वो भी इराकी समाज के धार्मिक क़ानून की संकीर्णता के कारण इस्लाम धर्म अपनाने की कठोर शर्त पर। उसे गौ मांस खाकर तथा सुन्नत जैसी कष्टदायक मुस्लिम रस्म ख़तना को सहने पर विवश होकर यानि अपना संपूर्ण अस्तित्व खो देने को ही नायक बाध्य हो जाता है। एक-एक करके यह रस्में कैसे उसके अस्तित्व का समापन करती है, उसका वर्णन निम्नलिखित है -मैंने अपनी हार स्वीकार कर ली। मुक्ति का एक मार्ग था आत्महत्या। लेकिन मैं उसके बिल्कुल खिलाफ़ था... सारी बातें सोचकर मैंने हथियार डाल दिए थे और गौ माँस हलक में उतार लिया था।2 बेगाने देश में मिली यह यातना केवल नाम बदलने और गौ माँस खाने तक सीमित नहीं होती, अपितु उससे भी गहरा आघात आकाश को देती है। बुशरा की माँ ने कहा केवल नाम बदलने से कोई आदमी हमारी बिरादरी में शरीक नहीं हो जाता। इसके लिए सबसे जरूरी है तुम्हारा खतना।3 दरअसल, आकाश का खतना करवाने के लिए बुशरा की माँ पर दबाव डाला जाता है - जिस काजी ने निकाह करवाया उसका अटल फैसला था कि खतना जरूर होगा और वह फैसला काजी ने सरेआम लोगों के बीच लेते हुए कहा था कि एक काफ़िर को अपनी बिरादरी में शामिल करने के लिए खतना बहुत जरूरी है।4

उसका नाम आकाश से सलीम रखकर, गौ माँस-भक्षण करवाकर, सुन्नत करके उसे पूरा मुसलमान बनाया जाता है। अपने देश, परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से कोसों दूर स्वंय को अकेला पाकर आकाश/सलीम कहता है- बेगाने देश का एहसास आज और भी गहरा हो गया था।5 आकाश का ज़बरदस्ती खतना यहां इराकी समाज की धार्मिक संकीर्णता को दर्शाता है, वहीं प्रवास की स्थिति हमें क्या कुछ करने को मज़बूर कर सकती है इस ओर भी संकेत मिलता है। अपना अस्तित्व खो कर आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए उसे कह रहा था कि यह रात मेरे लिए कयामत की रात से कम नहीं... आज एक दुनिया ही लुट गई थी। शादी से पहले मेरा नाम आकाश था परंतु शादी के तुरंत बाद बदल कर सलीम रख दिया गया। मेरे सामने ही मेरा पासपोर्ट फाड़कर अग्नि की भेंट चढ़ा दिया गया था। मैं आज के दिन को कैसे भूल सकता हूँ? आज ही मैं एक हिंदू से मुसलमान बना गया था। यही नहीं, मेरे अपने मुझसे सदा के लिए दूर हो गए थे। शायद जीते-जी उनको कभी न मिल पाऊँ...।6

प्रवासी नायक के जीवन की त्रासदी यही विराम नहीं लेती, बल्कि इराक-अमेरिका के युद्ध दौरान फौज में जाकर फौजी बनकर फिर परिस्थितियों के चक्र में फंसा आकाश/सलीम अमेरिका जा पहुँचता है और अमेरिकी फौज द्वारा फिर से उसका धर्म परिवर्तन कर दिया जाता है। उस स्मिथ से क्रिश्यिचन बना दिया जाता है। आकाश से सलीम बना उपन्यास का नायक इराकी फौजी से-अमेरिका का जंगी कैदी भी बन जाता है। इराक वासियों की विवशता हे कि सद्दाम जैसे निरकुंश राष्ट्रपति की युद्ध नीति का संताप समूह जनता को भोगना पड़ता है। युद्ध के विनाश से विदेशों में आए पापर्टक तथा श्रमिकों पर क्या बीतती है वह तो कैम्पों में रहने वाले इस संताप को अच्छी तरह जानते हैं।7 नायक उस घड़ी को कोसता है जिसने उसे उसका घर, देश ही नहीं छुड़वाया बल्कि उससे उसका नाम, पहचान, धर्म सब छुड़वा दिया ... फिर जो नाम, पहचान, धर्म बसरा में मिला था वह फिर छिन जाता है तथा पुनः विस्थापन। उपन्यास का कथानायक न भारत का हो पाया, न बसरा का, न अमरीका का ...।8 इस सारी स्थितियों से गुजरते हुए एक ओर नायक अपने वतन, अपने परिवार, दोस्तों के साथ बिताए विगत जीवन की स्मृतियों में लीन मिलता है तों दूसरी ओर उसके माध्यम से भूमंडलीकरण के दौर से गुजरते आज मानव जीवन जिन जटिलताओं से दो-चार हो रहा है, उसकी महाकाव्यात्मक अभिव्यक्ति है।

लेखक ने नायक के द्वारा एजेंटों के हाथों लूटे जाने की पोल भी खोली है। अपनी पहचान खोकर अतीत में खोया नायक सोचता है कि उसने और उसके दोस्त नरेश ने इराक आने के लिए एजेंट के पास कितने चक्कर लगाए थे। एजेंट के अनेसार नायक को इराक में एक अस्पताल में ट्रांस्लेटर का काम करना था और नरेश के बारे एजेंट का कहना था कि वह इलेक्ट्रिकल विभाग में कार्य करेगा तथा दोनों की सैलरी एक सौ बीस दीनार-एक सौ बीस दीनार माहवार होगी। इस सब काम के लिए एजेंट ने मोटी रकम भी वसूली थी और एजेंट की रकम की इंतजाम नायक की माँ की चूड़ियां बनिये के पास दुगने सूद पर गिरवी रख कर की गई थी। इतना कुछ करके जैसे-तैसे वे दोनों इराक पहुँचे थे। परन्तु यहां आकर नरेश के साथ जो बीता, वे नायक के शब्दों में-मैंने तो अस्पताल में ड्यूटी ज्वाइन कर ली थी। मगर हमारे बैच में जितने भी हिंद-पाक के इंजीनियर थे, उन्हें आते ही एयरपोर्ट के टर्मिनल पर शीशे साफ करने के लिए लगा दिया गया... उनके हाथ में बड़े-बड़े कागज़ थमा दिए गए। गोरों ने कहा, ‘हल्का सा पानी का छींटा देकर बाद में सूखे कागज उस पर रखने हैं ताकि शीशे साफ हो सकें। उसने यह भी कहा था कि सब अपना-अपना काम करेंगे। अगर आपने बातें की तो आपको पैक कर दिया जाएगा।9 इसी कारण नरेश एक दिन में विदेश में उदास हो जाता है यहां आने की सारी खुशी मायूसी में बदल जाती है। चूँकि उसे कदापि भी स्वीकार नहीं कि इतनी पढ़ाई के बाद विदेशों में जाकर शीशे साफ करना, यही होता है प्रवास का दर्द।

ऐसी स्थिति में जब अपने पहले ही दूर हो तब प्रवास की चुभन और भी गहरी हो जाती है। नरेश को समझाने के लिए एक रिटायर फौजी जो कैंप में ट्राला चलाने का काम करता है, बोला, अरे मेरे भाई, यह बात तो तुम्हें यहाँ आने से पहले सोचनी चाहिए थी। अब आ ही गए हो तो चिंता किस बात की? जब पाँव में घुँघरू ही बाँध लिए तो नाचने में गुरेज क्यों?10 लेकिन नरेश नहीं माना और वापिस भारत लौट आया। यहां लेखक ने स्पष्ट किया है कि एजेंटों के दिखाए झूठे सपनों को सच मानकर युवा दीनार कमाने के लिए विदेश पहुँच तो जाते हैं। लेकिन बेगाने देश में आकर जब पढ़ाई की योग्यता अनुरूप नौकरी नहीं मिलती, तब कुछ नरेश जैसे युवक समझौता न करके वापिस लौटने में ही अपनी भलाई समझते हैं। जबकि वह जानते है कि विदेश आने के लिए उन्होंने धन का कितना व्यय किया था और संघर्ष भी। लेकिन आकाश जैसे कुछ ऐसे युवक भी हाते है जो स्वयं को परिस्थितियों के हवाले छोड़ कर, वहीं रहते हैं और आजीवन भर की दासता तोल ले लेते है तथा फिर धर्म परिवर्तन की त्रासदी से गुजरते हुए, अपने वापिस वतन आने के सारे मार्ग खुद बंद कर लेते है। नायक अपनी स्थिति को अपने बॉस को बताता कहता है- कैसे भूलूं सर! क्या यह दुःख भूलने वाला है? आप जानते हैं मैं इस रेगिस्तान में उस ऊँट की तरह हो गया हूँ, जिस सारी जिन्दगी यही का भार ढोना है।11

विवेच्य उपन्यास में प्रवासी जीवन जीने वालों द्वारा संपूर्ण जीवन प्रवास भोगते हुए, विदेशी ध्ररती पर कमाने के बाद भी खाली के खाली वतन लौटकर फिर नौकरी की चिंता में भटकने की व्यथा प्रति गहन चिंतन भी मिलता है- कई बुजुर्ग लोग तो बताते थे कि उनका तो पूरा जीवन ही विदेशी धरती पर बीता है। कभी इराक, कभी दुबई, कभी बहरीन तो कभी किसी अन्य देश में। इसके बावजूद... जितने भी वर्ष वे लोग विदेश में रहे, कभी पैसा जोड़ नहीं सके। हिंदुस्तान लौटने पर छोटी-मोटी नौकरी करने को मन नहीं करता। अगर करो तो उससे अपना ही खर्च पूरा नहीं होता तो परिवार को क्या खिलाना है?12

दूसरी ओर, इराक में हर समय जंग के कारण होती हाहाकार और बमबारी का मंजर देख हरेक प्रवासी का मन अपने वतन लौटने को करता परन्तु ऐसा लगता है कि दीनारों की चमक ने जैसे सबके मन की आवाज़ को दबा दिया हो। उपन्यास में नायक खुद ऐसी स्थिति को बयान करता कहता है- कई बार मन हुआ, मैं वापस लौट जाऊँ... शुरू-शुरू में मैंने सोचा भी था कि कुछ ही महीनों बाद पैसा पूरा करके वापस चला जाऊँगा। लेकिन कुछ महीनों बाद दीनारों की चमक ने वापस जाने से रोक दिया। वैसे भी कुछ महीनों में इराक-ईरान जंग और शेलिंग के हम आदी हो गए थे... और दीनार की चमक के नीचे बमबारी की आवाज दब कर रह गई है, जो लोगों को सुनाई तो देती है लेकिन वे सुनना नहीं चाहते।13 परन्तु प्रवास की परिस्थितियों को झेलता अंत में आकाश/सलीम/स्मिथ ज़िन्दगी से थक-हार कर अपनी फौजी साथिन एलाइजा से अपनी टांग पर गोली मरवाकर आखि़र अपने वतन लौटता है तो भी वह खुद को अनजान परिस्थितियों में पाता है। दरअसल, एक बार जड़ें जब उखड़ जाती है तो वहीं दुबारा पेड़ चाहे किसी तरह फल-फूल भी जाए लेकिन इंसान? क्योंकि दोनों में अंतर तो है ही। वतन आकर बेचैनी से मुक्ति हो कर शांति पाने के लिए वह अध्यात्म की शरण में हरिद्वार भी जाता हैऔर वहां की ध्वनि में लीन होकर अतीत से छुटकारा पाने का प्रयास करता है। गोपाल शर्मा लिखते हैं- उपन्यासकार का लक्ष्य नायक की भूमिका में इतना मजबूत है कि आदमी जीवन भर लुड़कता रहता है-विदेशी मुद्रा की अंधी दौड़ से विमुख स्वदेश की ध्रती पर कुशल लौटकर आ जाना भी आज के भयावह संसार में गनीमत है।14

अस्तु, प्रस्तुत उपन्यास कई प्रश्नों, कई जिज्ञासाओं के साथ कई परिस्थितियों के प्रति उत्सुकता भी जगाता है। लेखन की लेखनी से उपजा यह उपन्यास केवल प्रवास के दर्द को ही नहीं व्यक्त करता अपितु यह लेखक की भीतरी छटपटाहट को भी वाणी देता है। दीनारों की चमक में प्रवास भोगती युवा पीढ़ी किस कद्र वहाँ क़ैद में अपना अस्तित्व लुटाकर तथा युद्ध की विनाशक स्थितियों को झेलती जीवन जीने के लिए अभिशप्त होती है, इसकी सशक्त अभिव्यक्ति करता है - बसरा की गलियाँ।
संदर्भ-सूची
1 डॉ0 अजय शर्मा का कथा-संसार, संपादक हरमहेन्द्र सिंह बेदी, सुधा जितेन्द्र, साहित्य सिलसिला प्रकाशन, 2010, पृ॰ 226
2 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, के. के. पब्लिकशन्स, नई दिल्ली, 2011, पृ॰ 10
3 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ 11
4 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 119
5 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 12
6 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 6
7 डॉ0 अजय शर्मा का कथा-संसार, पृ0 138
8 डॉ0 अजय शर्मा का कथा-संसार, पृ0 20
9 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 24
10 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 24
11 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 30
12 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 25
13 बसरा की गलियाँ - अजय शर्मा, पृ0 20
14 डॉ0 अजय शर्मा का कथा-संसार, पृ0 139