ग़ज़ल - शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

शाहिद मिर्ज़ा
फ़रेब तेरे तबस्सुम से यूँ भी खा बैठे
हम अपने चेहरे पे इक ताज़गी सजा बैठे

तुम्हारी बज़्म से निकले तवाफ़ की मानिंद
जहां से उठ के चले थे वहीं पे आ बैठे

झलक दिखा के वो महफ़िल में कर गए तन्हा
ज़हे-नसीब कई ख़्वाब पास आ बैठे

ये अंजुमन में खमोशी से ऐसा लगता है
तुम ही को सोच रहे हैं ग़ज़ल सरा बैठे

तुम्हें भुलाने की कोशिश में ये भी याद नहीं
भुलाना चाहा था क्या और क्या भुला बैठे

ये शौक़ रुसवा न कर दे कहीं उन्हें शाहिद
सुना है वो मेरे अशआर गुनगुना बैठे।