अंतिम चरण - कहानी

कादम्बरी मेहरा
कादम्बरी मेहरा 

करुणा के नए घर के सामनेवाली पटड़ी पर सुबह शाम अपने कुत्ते को टहलाती वह बूढ़ी स्त्री अपनी उम्र से कहीं अधिक चुस्त नज़र आती थी।  सामने 30 नंबर में रहती थी।  करुणा उसे रोज़ देखती थी। नज़रें चार होने पर वह हलके से मुस्कुरा देती ।

         नए घर के सामने ड्राइव में रोड़ी बिछी थी  जिसमे गहरे जमे डन्डिलायन करुणा का सरदर्द बन गए ।  वह रोज़ क्यारियां -आदि खोदती  ताकि  समर में फूल लगा सके।  अगस्त में छुट्टियां आने पर वह गृहप्रवेश कराएगी।  अभी वसंत में अगर बगीचा ठीक कर लिया तो तब तक खूब फूल रहा होगा।  हफ्ते बाद 32 नंबर की महिला ने आकर उसका अभिवादन किया और वीडकिलर  की एक स्प्रे भेंट की डैन्डलायन को मारने के लिए। कहा कि  रोड़ी वाली ड्राइव को खोदा नहीं जा सकता। अपना नाम उसने रूथ  बतलाया।  अन्य पड़ोसियों का भी संक्षिप्त परिचय दिया।  30 नंबर की वृद्धा का  नाम वीरा पियर्स था। वही इस पूरे मोहल्ले की सबसे पुरानी सदस्य है।  आस पास के सभी मकान एक एक करके उसके पिता ने बनाये थे और बेचे थे। वह एक नामी आर्किटेक्ट थे। वीरा पियर्स उनकी एकलौती वारिस है।  करुणा को याद आया  कि  उसका घर भी   'ए पियर्स हाउस' कहलाता था।  यह  मकान  इतने मज़बूत बने थे कि आजतक, 100 वर्षों के बाद भी इनकी पूछ पूछ थी।  वीरा के दूसरी तरफ फ्रांसिस रहती थी। उसका पति चार साल पहले मर गया था अतः वह अब अपने बेटे के सहारे जी रही थी जो पास ही कहीं रहता था।  तीनो सखियाँ एक दूसरे की देख भाल कर लेती थी।  रूथ इन मे सबसे छोटी थी उम्र में।  उसका पति एंडी भी सहायता कर देता था।

          एक सुबह जब उसने अपना दरवाज़ा खोला तो करीब बीस गमले फूलों और सदाबहार झाड़ियों के उसका स्वागत कर रहे थे।  चमेली और बोगनबेलिया,सुगन्धित गुलाब और कनेर। उनपर एक सजीला कार्ड टंगा था जिसमे लिखा था 'एक सुन्दर और मेहनती स्त्री के लिए। इस रोड पर  तुम्हारा स्वागत है। वीरा पियर्स'

       इतना सम्मान! करुणा नाच उठी।
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       उसने दालचीनी डालकर केक बनाया और उसपर काजू, बादाम, पिश्ते, अखरोट आदि से रंगोली सजाई।  शाम को चार बजे वह वीरा को धन्यवाद  कहने गयी।  रूथ से उसकी समृद्धि की कहानियाँ सुनकर वह खासी आक्रान्त थी,मगर वीरा का व्यवहार एकदम सरल व स्नेहसिक्त था।  सजावट के अतुलनीय भण्डार के साथ वह अकेली रहती थी।  बस  उसका कुत्ता फ्रिस्की ही उसका साथी व संरक्षक था। करुणा के बच्चों व पति का विवरण सुनकर  वह अत्यंत प्रसन्न हो गयी।  बोली कि तुम जैसों के लिए इस देश के दरवाज़े हमेशा खुले रहेंगे।  नया खून ही एक देश को स्वस्थ रखता है।  रोज़ आने का निमंत्रण भी दिया।

        वीरा अस्सी पार कर चुकी थी। एक परिचारिका उसकी सफाई और भोजन बनाने के लिए सुबह शाम आती थी।  शाम को रूथ अक्सर गरम भोजन  बना लती थी अन्यथा वह रेडि मेड भोजन गर्म करके खा लेती थी। करुणा इन स्त्रियों में रम गयी। निरंतर गपशप,राजनीतिक बहस,किताबों के आदान प्रदान,बगीचे की समस्याएँ आदि सबमे करुणा का मन लगने लगा। भारतीय स्त्रियों की आपसी छीछालेदर, छूछे फैशन, गहने कपडे, बहू बेटी, ननद भाभी से यह बिलकुल भिन्न समाज था। न किसी में गुमान था न अन्तर्हित आक्रोश। रूथ का काम था जगतभर की खबर रखना और वीरा अपने लम्बे जीवन के अनुभव सुनाती।  भारत के बारे में दोनों का ज्ञान न के बराबर था।  इतिहास में उन्हें कलकत्ता के ब्लैक होल की कथा के बारे में  पता था  बस। करुणा सुनकर हंस पड़ी। वह दोनों यह भूल जाती थीं कि करुणा विदेशिन है।  अंग्रेजों के अंतरंग जीवन की सही जानकारी करुणा को यहीं से मिलती और वह देखती कि रिश्तों में, धर्म में, आपसी व्यवहार आदि में कोई अंतर नहीं था।

         वीरा दोनों महायुद्धों के समय को लांघ चुकी थी। वह अक्सर बताती कैसे कैसे कष्ट लंदन वासियों पर आये थे। अपने परिवार को जर्मनी की  बमबारी से सुरक्षित रखने के लिए उसके पिता ने अकेले हाथों से अपने सेब के बगीचे में सुरंग खोदी और ज़मीन के अंदर दस फुट नीचे दो पक्के कमरों का निर्माण किया। साथ ही रसोई और गुसलखाना भी बनाया। इस छद्म भू गृह का दरवाज़ा दो विशाल पेड़ों की जड़ों में था। करुणा ने समझा कोई परी कथा सुन रही है।  मगर वीरा ने उसे उस भूगृह की सैर करवाई। घर अभी भी साफ़ सुथरा, लीपा पोता,बिजली पानी से लैस था।  ऊपर से देखने पर वहां न कोई दरवाज़ा था न रोशनदान। कितना उद्यमी व कारीगर इंसान रहा होगा वीरा का पिता।  एक समय बमबारी हो रही थी तो ३० व्यक्ति इसमें छुपे थे जिसमे दो मास का बच्चा भी था।  उनके  भोजन की व्यवस्था भी वीरा के माँ और बाप ने की तीन दिन तक।

       करुणा वीरा के लिए सूप बनाकर ले गयी एक दिन तो वीरा ने चखते ही चम्मच नीचे रख दिया।  करुणा ने कारण पूछा तो वह शर्मा गयी और खेद के साथ बताया कि वह पुराने ज़माने की है अतः प्याज और लहसुन से परहेज़ करती है। इतवार को,चर्च जाते समय वह नहा धोकर शुद्ध मुख से  प्रार्थना सभा में जाती थी।  झूठे मुंह की प्रार्थना भगवान को नहीं लगती। करुणा इस बात को सुनकर हैरान रह गयी।  उसने बताया कि भारत में भी ऐसा ही चलन है। वीरा कहने लगी की द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद  सब वर्जनाएं खत्म हो गईं।  उसके समय बेटियों पर पिता का सख्त नियंत्रण होता था। पिता माता की इज़्ज़त को बनाये रखना उनका धर्म था। अंगूठी पहनने के बाद ही कोई लड़की अपने मंगेतर के साथ घर से बाहर जा सकती थी।  प्रथम  विश्व युद्ध में इतने युवा पुरुष मारे गए कि  सब मान्यताएं ढह गईं।

       उसकी बड़ी बहन ने एक स्कॉटलैंड के आर्मी अफसर से शादी कर ली तो उसके पिता ने अपने हाथों उसका कन्यादान नहीं किया और शादी की रस्मे उसके रिश्ते के चाचा ने करवाईं । वीरा के पिता अंग्रेज थे।  स्कॉटलैंड से आये दामाद को स्वीकार नहीं  किया और  उन दोनों को कानूनी फारखती दे दी।  करुणा को लगा यह भारत की जाति व्यवस्था को तोड़ने के जैसा ही अपराध रहा होगा। उसकी सहेली ने वर्षों पूर्व, लखनऊ में, पड़ोस के, गैर ज़ात के  लड़के से शादी कर ली थी तो उसे भी इसी प्रकार निष्कासित कर दिया गया था।  वीरा की बहन और उसका पति  निराश होकर  ऑस्ट्रेलिया पलायन कर गए और कोई सम्बन्ध नहीं रखा।  दूसरी बहन नर्स बन गयी ताकि युद्ध के घायलों की सेवा कर सके। बहुत बाद में उसने अपने ही एक मरीज़ से शादी कर ली जो अपनी एक बाँह खो चुका था।  उसके बच्चे बाल हैं। उसकी पोती मेलेनी वीरा की उत्तराधिकारिणी है।  मेलेनी का नाम ही सुनकर वीरा पिघल जाती थी।

        रूथ ने चुपके से करुणा को बताया कि मेलेनी को कैंसर हो गया है।  वीरा से यह बात छुपाई गयी थी।  ले दे के वीरा के  जीवन में मेलेनी ही आस  का और आँखों का तारा थी। क्रिसमस के बाद एक दिन बर्फ गिरी तो फ्रिस्की ठण्ड खा गया।  सैकड़ों पाउंड्स के इलाज भी उसे न बचा सके। रूथ वीरा के सभी हिसाब किताब रखती थी। चुपके से करुणा  से कहा कि इतने में तो दो कुत्ते आ जाते।  पर वीरा अपने दस वर्ष के संरक्षक व मित्र को बिना इलाज क्यों छोड़ देती। उसके निधन के बाद वीरा कई  हफ़्तों तक गुमसुम पडी रही।  बैटरसी डॉग्स होम में उसके नाम से 500 पौंड की राशि जमा करवाई लावारिस कुत्तों की देखभाल के लिए। रूथ अलबत्ता मुँह बनाती रही। पर वीरा भावनाओं की गुलाम थी। उसके प्रियजन गिने चुने थे और एक एक करके उसे छोड़े जा रहे थे।  

        कुत्ते के बाद उसका लगाव अपने गुलाब के पौधों से था जो उसके पिता ने लगवाये थे।  आजकल जो माली था उसके दादा ने अपने हाथों से रोपे  थे। नया वर्ष भी एक चौथाई बीत गया।  अप्रैल में जब नई कलियाँ आने लगी  और बगीचा पीले फूलों   से भर गया तब वीरा में जान आई।  करुणा के  देखते देखते आठ वर्ष बीत गए।  वीरा अब ऊपर नहीं चढ़ पाती थी।  रूथ जबरदस्ती उसे सीढ़ियां चढ़ाती।  धीरे धीरे वह कमजोरी के कारण काँपने लगी  तो उसने आग्रह करना बंद कर दिया। उधर मेलेनी  को  कैंसर  का दुबारा आघात हुआ। बीमारी फ़ैल कर रीढ़ की हड्डी में उतर  गयी। डाक्टरों ने जवाब दे दिया।  किसी की हिम्मत नहीं पड़  रही थी वीरा को बताने की।  एंडी ने चुपचाप एक दिन टैक्सी मंगवाई और वह वीरा को मेलेनी से मिलवाने ले गया।   रूथ ने रास्ते भर नहीं बताया की वह कहाँ जा रहे थे।  वीरा मिलकर बेहद खुश हुई। मगर वापस आने के चार दिन बाद मेलेनी सदा के लिए विदा हो गयी।  एंडी  और रूथ उसे फ्यूनरल में भी लेकर गए।  वीरा रो नहीं पाई।  बुढ़ापे में सब कुछ सूख जाता है।  

       बहुत मुश्किल से वकील ने उसको अपनी वसीयत बदलने के लिए राजी किया।  वीरा की जो बहन नर्स थी उसके पोते बहुत दूर किसी अन्य शहर  में रहते थे मगर वंशवृक्ष में उन्हीं का स्थान उत्तराधिकार के लिए निश्चित किया गया।  वीरा फिर न  संभल पाई।  उम्र की ढलान शुरू हो चुकी थी।  वीरा के पाँव ढुलमुलाने लगे।  कभी फ्लू, कभी पेचिश,कभी चक्कर।  डा पटेल उसे देखने घर आ जाते थे।  उनका नाम भी हंसमुख था और स्वभाव भी।  वीरा  कहती अगर तुम पहले आ जाते तो मैं अपने पिता की परवाह ना करती और तुमसे शादी कर लेती।  डा० पटेल कहते, तुम जब जवान थीं मैं अपने अगले जनम के होने का इन्तजार करता किसी जानवर की जून में  जंगल में भटक रहा था। वीरा और रूथ चौरासी लाख योनियों का विवरण सुनकर  ठहाके लगातीं। डा० पटेल ने उसे गरम खाना खाने की सलाह दी मगर तिरान्नबे वर्ष की वृद्धा क्या खाना बनाती।  एक नई परिचारिका लगा ली। वह  रेड़ी मेड मील गरम करके सामने रख देती।  वीरा खाने पीने के मामले में अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ पाती थी।  स्वाद ग्रंथियों को अच्छे दिनों के व्यंजनों की चाट पड़ी हुई थी जबकि पाचन संस्थान उन्हें स्वीकार नहीं करता था।  करुणा अक्सर क्रूटोन डालकर गरम सूप खिला आती।

       परिचारिका सिमोन काफी परच गयी थी।  अक्सर रात को उसे वहीँ ठहरना पड़ता।  उसकी सात बरस की बेटी वहीँ सोने आ  जाती।  सुबह उसे स्कूल छोड़ने के बाद ही वह वीरा की सेवा करती।  समय से वेतन,इनाम उपहार आदि सब वीरा दिल खोलकर देती।  बच्ची को भी।  मगर भली करने का  ज़माना नहीं रहा।  एक दिन बच्ची कहने लगी कि जब वीरा अपनी कबर में जायेगी यह घर उसका हो जाएगा क्योंकि बच्चों को पुलिस घर से नहीं निकाल सकती।  वीरा घबरा गयी।ऊपर से सहज बनी रहकर   उसने पूछा कि किसने बताया यह राज़। तो बच्ची ने कहा उसके पिता ने।  वीरा का मन खट्टा हो गया सिमोन की ओर से।  रूथ ने बहुत समझाया कि यह सब कोरी कल्पना है। लगी बंधी नौकरानी को निकालना बुद्धिमत्ता ना होगी मगर वी रा के दिल में डर बैठ गया।  क्या हो अगर वह उसे ज़हर दे दे? या उसकी दवाइयाँ गड़बड़ कर दे। या बाथ  में नहलाते समय डुबा दे? या उसका गला कस दे? ज़िद्दी बच्चे की तरह वह दलील पर दलील देती रही।  हारकर सिमोन  को निकाल देना पड़ा। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस में  रजिस्टर्ड एजेंसी की नर्स बुला ली गयी। मगर बूढ़ियों की सेवा करना सबको नहीं सुहाता।  आये दिन नई सूरत,नया नाम,नया स्वभाव।  वीरा ने परिस्थिति  से समझौता तो कर लिया मगर अब वक्त काटने की बात रह गयी थी बस।

       कोई युवा उम्र का व्यक्ति उसके जीवन में नहीं बचा था।  रूथ  स्वयं अस्सी पार कर चुकी थी हालांकि उसकी कार्य क्षमता  पचास वर्ष की स्त्रियों से  भी अधिक थी।  एंडी को मधुमेह के रोग ने अक्षम कर दिया था।  उसे ह्रदय रोग हो गया था अतः रूथ  सारा दिन वीरा और एंडी के बीच फिरकी सी घूमती। दोनों चिड़चिड़े,दोनों असहाय,दोनों पकी आदतों के। '' आदताँ   पड़  जादताँ , निभें शरीरां नाल '' ।  उधर करुणा का परिवार  पोते दोतों की किलकारियों से गूँज रहा था। करुणा उनमे मगन रहने लगी।  फिर भी हफ्ते में दो तीन बार वीरा से मिलने आ जाती।

      एक दिन नर्स से वीरा नाखुश थी।  वह बोस्निया से आई थी।  अंग्रेजी कम समझती थी।  समस्या यह थी कि वीरा को नया  तकिया चाहिए था।  रूथ  ने पॉलिएस्टर का नरम सा तकिया ला दिया था मगर वीरा को नहीं भाया।  उसका पुराना  बत्तख के परों का तकिया  उसकी नरम खाल को चुभ रहा था। कोई समझ नहीं पा रहा था।  करुणा ने देखा वीरा का सर निरंतर लेटे  रहने से लगभग गंजा हो गया था। गंजी चाँद की नरम खाल छिली छिली सी हो गयी थी।  परों की अति नाज़ुक हड्डियां मोती के दानो की तरह उसके सर को चुभती थीं।  करुणा ने अपने एक शनील के कुर्ते को काटकर उसका गिलाफ सिला  और तकिये पर चढ़ा दिया। मोटे शनील के  गुदगुदे  कलेवर में सर को आराम मिल गया।  करुणा ने पाया कि तकिये के नीचे अनेक छोटी मोटी  वस्तुएं रखी थीं।  बहुत मनुहार से उसने वीरा को मनाया कि उन्हें एक बैग में रख ले और बैग अपने हाथ के पासवाली  मेज पर। वीरा मानी तो मगर एक पुराना पत्र नहीं छोड़ा।
 रूथ ने वीरा की चोरी से उसे उस पत्र की बात बताई।

         वीरा सब बहनों में छोटी व पिता की दुलारी थी।  उसका पडोसी फिलिप बचपन से उसका हमजोली था।  बाप भी समझता  था कि यह मित्रता एक दिन परवान चढ़ेगी और दोनों का ब्याह होगा।  मगर फिलिप को विश्व युद्ध में अन्य युवकों की तरह जाना पड़ा। उसकी सेना की टुकड़ी मारी गयी।   फिलिप का कुछ पता नहीं चला।  न उसका शव मिला न वह युद्ध बंदियों में मिला।  हर बार उसे सूचित किया जाता कि खोज जारी है।  वीरा ने उसकी राह देखते देखते उम्र गुजार दी।  यह पत्र युद्ध के  पचास वर्ष बाद आया था और इसमे लिखा था कि सरकार की ओर से खोज स्थगित कर दी गयी है। वीरा के  आंसू पोंछनेवाले सब लोग संसार से जा चुके थे।  जब फिलिप का  अगला जन्मदिन आया तब वीरा ने  एक प्रार्थना सभा का आयोजन किया।  अपनी स्पीच में वीरा ने कांपती आवाज़ में कहा की वह फिलिप का जन्मदिन आजीवन मनाती रहेगी क्योंकि वह कभी मरा ही  नहीं।  इसमें  उसका चित्र भी रखा था।  वीरा उसे तकिये के नीचे ही रखती थी।

         ना मन में आस थी ना तन में शक्ति।  वीरा के शरीर की सभी सुरक्षा ग्रन्थियां साथ छोड़ रही थीं।  वीरा को शिंगल्स हो  गए।  संक्रमण के डर से  वीरा ने करुणा को आने से मना कर दिया क्योंकि करुणा के घर बच्चे थे।  डॉ पटेल ने उसे दर्द  मारक दवाएं दीं। . दवाएं क्योंकि नशीली थीं वीरा के दिमाग पर उनका नकारात्मक असर हुआ।  रात तो क्या,वह दिन में भी बार बार डर कर चौंक जाती थी।  अकेली होने पर चीखने लगती।  रात को उसे भूत दिखाई देते।  पूरी रौशनी में सोती जिससे नर्स को परेशानी होती।  विलो  की डांडियां हिलतीं तो उसे लगता सांप लहरा रहे हैं।  हवा की सांय सांय होती  तो वह चिल्लाती कि गुंडे लड़के हंस रहे हैं।  वर्षा की टिपटिप को वह समझती कोई दरवाज़ा थपथपा रहा है।  उसके शोर से कई बार पुलिस को बुलाना भी हो गया।  पुलिस पेट्रोल ने उसे एक अलार्म बटन गले में पहना दिया जिससे वह तीन घरों में सूचना भेज सकती थी,पहला रूथ  को,दूसरा करुणा को और तीसरा पुलिस को।  वीरा कई बार यह बटन दबा चुकी थी।  रूथ को एंडी  के साथ अपने सालाना हॉलिडे पर जाना पड़ा तो करुणा रात भर उसके पास बैठी।   सुबह चार बजे उसके सो जाने पर अपने घर गयी।  डॉ पटेल ने बताया की दवा बंद नहीं की जा सकती थी।  फिर भी तीन महीने हो चले थे अतः डोज़ हलकी कर दी गयी।

         शिंगल्स पूरी तरह ठीक होने में छै महीने लग गए मगर तब तक वीरा के खून में इतनी ड्रग आ गयी कि खून का चाप बढ़  गया।  कमजोरी बहुत होने लगी मगर यादों का पिटारा बूढी की खीर की तरह बढ़ता ही जाता था।  वीरा कहानियाँ सुना सुना के हंसती।  पर वर्तमान की छोटी छोटी बातें भूल  जाती।  जाने कैसे उसे अपना नीला पैजामा याद आ गया  . बिना कुछ पहने तौलिये में बैठी रही कि वही पहनूंगी।  बड़ी मुश्किल से उसे ढूँढा गया। एलास्टिक खराब हो चुका था।  करुणा को बुलाया गया।   करुणा ने उसमे नीले रिबन  से नाड़ा डालकर समस्या का समाधान किया।  नए ज़माने की नर्स ने नाड़ा डालते पहली बार देखा।  वीरा साफ़ सुथरी रहती। नाखून रंगवाती। चार बाल बचे थे उन्हें ढंग से कटवाती।  पैसा उसके बैंक में सैकड़ों की दर से घट  रहा  था।  एंडी को अस्पताल जाना पड़ा। उसके पैर में घाव हो गया था जिसके ठीक होने में संदेह था।  वीरा का आत्मबल तोड़ने में यह हादसा एक और कड़ी बना।

         पूरे हफ्ते करुणा की दोनों पोतियाँ उसके पास रही।  स्कूल  का चक्कर,समय से खिलाना पिलाना सुलाना आदि कामो में  वह व्यस्त रही। शनि वार  को जाकर देखा तो पैरों तले धरती खिसक गयी।  वीरा की गर्दन एक तरफ लटकी हुई थी। कपडे अस्त व्यस्त थे। कोई गरम कपड़ा भी नहीं पहने  थी। जुबां एक ओर टेढ़ी लटक रही थी और मुंह से लार टपक रही थी।  करुणा उसे लिटाने के लिए आगे बढ़ी तो नयी नर्स ने कहा कि अगर मैं तुम्हारी जगह होती तो स्ट्रोक के मरीज़ को हाथ ना लगाती।  देखती नहीं उसे स्ट्रोक हुआ है।  करुणा ने कहा कि ऐसी हालत में एम्बुलेंस क्यों न बुलाई।  नर्स का उत्तर सपाट था। बुलाई थी मगर एम्बुलेंस को और भी जरूरी काम होंगे बजाय कि सत्तानबे वर्ष की बूढ़ा को आराम से लिटाने के।  करुणा ने फोन करना  चाहा  तो वह सख्ती से बोली कि तुम क्या लगती हो इसकी। ड्यूटी पर मैं हूँ।  कानूनी फ़र्ज़ मेरा है। .  मैंने पूरा कर दिया।  अब वह लोग  अपना समय लेकर आ जाएंगे।  ऐसे मरीज़ को हिलाना मुझे या तुम्हें अनुमत नहीं है सो मेरी मानो तो तुम जाओ।  ये न सुन सकती है न समझ सकती है।

         करुणा आंसू भरी आँखें लिए घर लौट आई।  पूरा वीकेंड गुजर गया। सोमवार को जब रूथ आई उसने दुबारा एम्बुलेंस को फोन किया तब वीरा को अस्पताल में शिफ्ट किया गया।  शुरू शुरू में रूथ  अक्सर उसे देखने जाती रही मगर अस्पताल में वह  सुरक्षित थी अतः महीने बाद यह संपर्क केवल  फोन पर खबर ले लेने भर का रह गया।  करुणा को पता चला तो वह स्वयं  देखने गयी। वीरा निर्विकार पडी थी। न हिल सकती थी न सुन सकती थी। मुंह और नाक में नालियां लगी थीं।  कभी उनसे दवाएं चढ़ाई जातीं तो कभी भोजन पानी।  उस दिन वह सो गयी थी।  करुणा कुछ देर बैठकर वापिस आ गयी।  महीने  बाद  फिर गयी तो वीरा के पैर सीधे करने की कोशिश की जा रही थी मगर इतने दिन एक ही पोज़ में पड़े पड़े उनमे हरकत ही नहीं बची  थी।  उसकी  नज़रों में कोई पहचान नहीं थी।  ड्यूटी की नर्स करुणा से बोली क्या तुम इसकी बेटी हो।

करुणा ने हंसकर वापिस पूछा क्या मैं बेटी जैसी लगती हूँ।  नर्स ने कहा तो फिर तुम्हीं एक क्यूँ आती हो बार बार इसे देखने।   इसका और कोई कहाँ है।

         करुणा ने संक्षेप में बताया।   जिसकी कभी शादी नहीं हुई उसका बाल बच्चा भी कैसे होता। नर्स पच्चीस साल की युवती  थी। आश्चर्य से आँखें फैलाकर बोली बच्चे के लिए शादी की क्या आवश्यकता है। मुझे देखो,मैं इस देश में सिएरा लीओन से अकेली काम करने आई हूँ मगर मैंने तो अपने बॉय  फ्रेंड से एक बच्चा बना लिया। मर्दों का क्या,कभी कहीं चले भी जा सकते हैं मगर मेरा बच्चा जीवन भर मेरे पास रहेगा और बुढ़ापे में मैं इसकी तरह लावारिस नहीं मरूंगी। अभी तो कोई इसे चम्मच से  सूप भी नहीं पिलाने आता। अब देखो यह बैठ भी जाती है तो नाली से ही खाना पेट में जाता है।  इसकी भोजन को निगलने की शक्ति भी जाती रही।  

         करुणा ने कहा इस समाज की मान्यताएं ऐसी नहीं थीं कि बिना शादी के माँ बन जाती।  नर्स बोली कि कितना गलत  समाज है।  इंसान को एक  संरक्षक आजीवन चाहिए जो उसका अपना खून हो।

         करुणा ने सोचा शायद यही ठीक कह  रही है!  काश इसका कोई होता!
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