दो ग़ज़लें - सीमा गुप्ता

सीमा गुप्ता

ग़ज़ल - 1

प्यार का दर्द भी काम आएगा दवा बनकर,
आप आ जाएँ अगर काश मसीहा बनकर।

तुम मिरे साथ जो होते तो बहारें होतीं,
चीखते फिरते न सहराओं की सदा बनकर।

मैंने हसरत से निगाहों को उठा रक्खा है,
तुम नज़र आओ तो महताब की ज़िया बनकर।

मैं तुझे दिल में बुरा कहना अगर चाहूँ भी,
लफ़्ज़ होंठों पे चले आएँगे दुआ बनकर।

मैं किसी शाख़ पे करती हूँ नशेमन तामीर,
तुम भी गुलशन में रहो ख़ुश्बु-ओ-सबा बनकर।

मुन्तज़िर बैठी हूँ इक उम्र से तश्ना सीमा,
सहने-दिल पे वो न बरसा कभी घटा बनकर।

ग़ज़ल - 2

मुसलसल आह भरती जा रही हूँ
दुआएँ रोज़ करती जा रही हूँ

ख़फा हो कर ख़ुशी से जी रहा है
मै जिस पे रोज़ मरती जा रही हूँ

खुद अपनी जात पे इलज़ाम दे कर
ना जाने क्यों बिखरती जा रही हूँ

वहाँ  दरया रवाँ है रेत का बस
जहाँ से मैं  गुज़रती जा रही हूँ

बहुत है हौसला उल्फ़त में मुझको
मगर दुनिया से डरती जा रही हूँ

किनारे पर खड़ी हूँ या के मैं भी
समंदर में उतरती जा रही हूँ

ग़ज़ल का आइना है रूबरू अब
ख्यालों में संवरती जा रही हूँ।