स्नेह लता गोस्वामी की कविताएँ

स्नेह लता गोस्वामी
रौशनी का इंतजार

मेरा पूरा शहर कोहरे का कम्बल लपेटे सो रहा है
हर रोज़
सूरज के डूबने से पहले ही छिप जाता है
अँधेरे किसी कोने में
क्योंकि किसी दहशत गर्द का मुखौटा लगाये
घूम रहा है कोई अनपहचाना  अनजाना  सा  डर
जिसका चेहरा ढका है काले  कपड़े से
हाथों में बारूद -हथ गोले जैसा कुछ नहीं
है तो किसी बाइक पर लटका  एक टिफ़िन
जिसमें बम जैसा कुछ है
या नहीं भी हो सकता
पर दहशत पक्का पक्का है
विश्वास हम कहीं  दूर दफन कर आये है
क्योंकि इस कोहरे ढके अँधेरे में जब
हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता
कोई सही चेहरा दिखाई नहीं देता
सभी चेहरों के नयन नक्श गायब हैं
आस्था दम तोड़ने  लगती है
बचपन सहम जाता है
भीतर का  विश्वास खुदबखुद आत्महत्या कर लेता है
इसलिए
आज कल मेरे शहर में
चारों ओर  झिलमिलाती नियोन लाइटों के बावजूद
अँधेरे ही अँधेरे है
मेरा पूरा शहर अँधेरे में लिपटा
रौशनी की इंतजार में दुबका पड़ा है

स्वप्न भंग

एक दिन अचानक दर्पण के सामने खुद को देख
खुद से ही शर्मा गयी थी मैं
उसी दिन पापा की आंखों में दिखाई दिए थे संशय बीज
उसी दिन दिखा था माँ की आँखों में एक डर
और उसी दिन कोई स्वप्न परी रात सपने में आई थी मिलने
और एक सपना पलने लगा था मन के जंगल में
उस सपने ने नींद उडा ली थी आँखों से
तन मन की सुध बुध खो गयी थी
मर्यादा के बंध टूट टूट जाते थे
कोई वेगवती नदी अपने तट बंध तोड कर समा जाना चाहती हो
आगोश में सागर की
एक दिन कोई सागर सचमुच आ पहुंचा था
दहलीज पर
बड़ा नही था न ही गहराई थी उसमें
पर मनभावन था
शायद  मुझे लगा था ऐसा
मंगल ध्वनि और शहनाई के सुर उभरे थे
यज्ञ कुंड की धूर्म महक थी
हाथ थाम कर चल दी थी मैं
स्वप्न लोक की कोई परी थी
आँचल में  थे दूब धान
चिर सुख सौभाग्य कामना साथ बंधी थी
कुछ दिन बीते
देखा आँचल कुछ गीला है
बंधा हुआ बंधन ढीला है
मेरे आँचल में आंसू है
सुबह सुबह है
सारा आलम मेरे संग भीगा-भीगा है