सुधेश की काव्य रचनाएँ

सुधेश

एक गजल 

इक्कीसवीं सदी है इक्कीसवीं सदी है
अब नेकियों पै जीती हर रोज़ ही बदी  है।
             इस का न कोई चश्मा न गंगोत्री कहीं पर
             बहती ही जा रही यह वक़्त की नदी है।
पलकें बिछा के बैठे हम उन के रास्ते में
आँखों में गुज़रा जो पल जैसे इक सदी है।
             कैसे मैं आजकल  की दुनिया में सफल होता
             मेरी ख़ुदी के ऊपर अब मेरी बेख़ुदी है।
गांधी न बुद्ध गौतम न रिषभ का ज़माना
अब तो ख़ुदा से ऊँची इन्सान की ख़ुदी  है।


शताब्दी किस ने देखी है

हर दिन शुरु होता है
सुबह की ताज़गी
गुनगुनी धूप से
रोटी के राग के साथ
बीत जाता है
उदास शाम के धुँधलके में।
    दिन बदलता है सप्ताह में
    जो शुरु होता है
    नए संकल्प के साथ
    हर काम लेकिन टलता है
    अगले सप्ताह के लिए।
देखते देखते
सप्ताह बदल जाता है महीने में
जो शुरु होता है नए जोश के साथ
ख़त्म होता है
रोज़ कम होने वाले मासिक वेतन सा।
    बारह महीनों बाद
    आता है नया वर्ष
     जो शुरु होता है ढेरों बधाइयों
    नई योजनाओं के साथ
    जो रह जाती बन पंचवर्षीय योजना
    सिर्फ काग़ज़ पर।
वर्षों बाद
शताब्दी किस ने देखी है
बस आदमी रोज़ जीता है
रात को मरता है।