आदमी - दो कविताएँ

अनुपमा तिवाड़ी
- अनुपमा तिवाड़ी

आदमी - 1

आदमी बँटा है
हिन्दू-मुसलमान में
हिन्दू बँटा है
सवर्ण-दलितों में
सवर्ण बँटा है
ब्राह्मण-वैश्य में
ब्राह्मण बँटा है
आदि गौड़ गुर्जर गौड़ में
आदि गौड़ बँटा है
राजस्थानी-गढ़वाली में
ये सभी ऊपर से आदमी
और अन्दर कितना टुकड़ा-टुकड़ा
इतना टुकड़ा कि आदमी ही ख़त्म हो गया है
रह गया है
बस टुकड़ा!

आदमी - 2

वह देख रहा था
आदमी को,
सही जगह पर पूँछ हिलाते हुए,
और मन ही मन
हीनभावना का शिकार हो रहा था।

काश! उसके भी पूँछ होती
तो उसके भी शरीर का संतुलन बन गया होता.
यूँ तो पूँछ का बीज
उसके नर्म मिट्टी से बने शरीर में था या नहीं,
उसे खबर नहीं।

लेकिन उसे इतना पता है कि
मौसम की शुरूआती गर्म हवाओं ने कुछ ऐसा रंग दिखाया
कि उसके शरीर में पूँछ का बीज होता तो
इन हवाओं के चलते कहाँ अंकुआ पाता?

विज्ञान कहता है
पूँछ,
शरीर का संतुलन बनाने के काम आती है
उसे अब समझ में आ रहा है
कि उसका शरीर इतना लड़खड़ाता क्यों है?