कुछ कह रहा संपादक भी

दीपक मशाल 
साथियों,

अभी बीते माह की बात है कि मेरा एक साथी जो यहाँ कुछ महीने पहले ही अमेरिका आया, यहाँ के एक शहर से दूसरे शहर अपनी कार से जा रहा था। सुबह का घर से निकला था, तीन-चार घंटे लगातार कार चलाते रहने से जब पीठ अकड़ने लगी तो रास्ते में पड़ने वाले एक रेस्त्रां की पार्किंग में कार खड़ी की और कुछ नाश्ता वगैरह किया। लौटकर आया और कार में बैठने लगा तो पीछे से एक स्थानीय व्यक्ति आकर उससे उसकी नागरिकता के बारे में पूछने लगा और जब उसने जाना कि भारतीय है तो कहने लगा कि वह भारतीयों को बहुत पसंद करता है। अगले एक-दो मिनट इधर-उधर की बातें करता रहा फिर उसने मित्र से पूछा कि ''मेरा मोबाइल काम नहीं कर रहा क्या आपके फोन से दो मिनट के लिए अपने घर पर बात कर सकता हूँ?" चूंकि वीरान इलाका था और मित्र ने

अमेरिकियों के 'लगभग हर जान के हाथ में गन' वाली बात सुन रखी थी सो कुछ सशंकित भी था, उससे न ना कहते बने ना ही हाँ। इसी बीच वह अजनबी बोला कि "आप बेशक लाउडस्पीकर पर लगा लीजिये". इस तरह फोन लगाकर मित्र ने उसकी बात करा दी, दूसरी ओर कोई महिला थी जो बराबर डांटे जा रहा थी और वह व्यक्ति "हाँ रास्ते में हूँ, दो घंटे में पहुँचता हूँ", कहे जा रहा था। खैर बात पूरी हुई और उस शख्स ने अब अपनी जेब में हाथ डाला तो मित्र सहम गया। पर जेब से उसने वॉलेट निकालकर मित्र के सामने ही उसमें से करेंसी निकाली और गिनी। बीस-बीस डॉलर के नोट थे, उन कुछ सोचा और बोला कि उसके पास धन तो है पर 16-17 डॉलर्स कम हैं और कार खराब हो चुकी है उसे किराये पर कार लेनी होगी, आप कुछ मदद कर दीजिये।

मित्र ने बताया कि उसके पास भी करेंसी नहीं, सिर्फ कार्ड है तो अजनबी ने ऊंची आवाज़ में वॉलेट दिखाने के लिए कहा। संयोग से अजनबी को वॉलेट में पचास डॉलर का एक नोट दिख गया और वह जिद करने लगा। मजबूरी में दोस्त ने इस वादे पर नोट दिया कि बाकी के ३३ डॉलर्स वह अजनबी उसे तुरंत देगा। पर उसके हाथ में पचास डॉलर्स आते ही उसने अपनी जेब के हवाले किया और आगे बढ़ने लगा, मित्र ने कहा भी कि उसे अगले शहर पहुँचने में अभी तीन घंटे और लगेंगे और उसे खुद धन की जरूरत पड़ सकती है लेकिन बंदा "ओके.. ओके" करके आगे बढ़ता रहा। बहुत गिगियाने पर अंत में अपनी जेब से छह-सात डॉलर निकाले और उसको देते हुए बोला कि वह अब इससे ज्यादा नहीं दे सकता, जैसे कि मदद की आवश्यकता उस अजनबी को नहीं बल्कि मित्र को हो। कहते हैं कि भागते भूत की लंगोटी भी बहुत होती है, तो यही सोच वह मित्र चुपचाप बचे-खुचे पैसे हाथ में लेकर कार स्टार्ट कर निकल पड़ा और फिर गंतव्य पर पहुंचकर ही रुका।

आप सोच रहें होंगे कि इस घटना का उल्लेख यहाँ करने की क्या जरूरत पड़ गई!! पर मुझे लगता है कि हम सभी हर रोज इसी तरह लूटे जा रहे हैं बस जिनसे हम लुट रहे हैं वे लुटेरे अधिक व्यवस्थित और अनुशासित हैं, शायद इतने कि हम अकेले उनका प्रतिरोध कर भी नहीं सकते।

खैर इससे अधिक बात करके शायद मैं आपके अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर बैठूंगा और इसलिए विषय को यहीं अल्पविराम देते हैं।

दूसरी बात यह कि बार-बार यह मन में आता है कि हम भारतीय सबसे दिशाहीन संवेदनशील प्रजाति हैं तो आखिर क्यों हैं? यह हमारे लिए जीवनदायी है या घातक!! अब देखिये कि अक्सर हम तय ही नहीं कर पाते कि किस मुद्दे को कितने आंसू देने हैं या किस पर कितनी हाय-तौबा मचानी है। जहाँ एक ओर हम जंगली जानवरों के ठिकानों पर मानव के अतिक्रमण के लिए रोते हैं तो वहीं उन जानवरों द्वारा इंसानों या उनके पालतू पशुओं को निशाना बनाये जाने पर भी नारे लगा लेते हैं। आतंक के सरगनाओं, माओवादियों या उग्रवादियों के मानवाधिकारों लिए भी हमारी झोली में दुःख होता है और सैनिकों, पुलिस या अन्य जवानों की शहादत पर उनके परिवारों के लिए भी आंसू आरक्षित रहते हैं। एक सर्वसम्पन्न और सिर्फ नाम मात्र के लिए दलित व्यक्ति के लिए भी हम समर्थन जता लेते हैं और एक क़ानून तोड़ने के आरोपी बुजुर्ग  नेता के लिए भी सहानुभूति रख लेते हैं। असली-नकली अपराधी या किसान के बारे में पूरी तरह जाने बिना छाती पीट लेते हैं और कभी-कभी गोलियों से छलनी सिपाही के लिए भी। करुण-क्रंदन हमारी दिनचर्या का स्थाईभाव बनकर रह गया है, दरअसल हमारी 'जो मरा सो महान हुआ' वाली नीति है वह आजीवन हमें भ्रमित किये रहती है। इस सबके लिए मीडिया और हम बराबर के जिम्मेदार हैं, अपने यहाँ आमजन जो मीडिया गुरु नहीं होता तो वह अफवाहगुरु तो होता ही है। उस पर तकनीकि के इस युग ने तमाम सोशलसाइट और एप्प रूपी उस्तरे ऐसे लोगों के हाथ थमा दिए हैं जो यदा-कदा विज्ञानियों को प्रमाणित करते ही रहते हैं कि 'देख लीजिये, हम ही हैं जिनसे होमो सेपियंस की उत्पत्ति हुई'।

चलते-चलते एक और बहुत जरूरी बात कि सूरज के एक फेरे पहले धरती इसी कोण पर रही होगी जब सेतु का प्रथम अंक आपके सामने आया था, अब पहली सालगिरह पर यह खुशी आपके साथ साझा कर रहा हूँ। इस दौरान कई छोटी-बड़ी उपलब्धियां थीं जो आपके भरोसे और सहयोग के सहारे इस रास्ते चली आईं। यह सच छुपा नहीं है कि आपके बिना यह सब संभव नहीं था, इसलिए बधाई के प्रथम पात्र आप ही हैं। इसके अतिरिक्त जिस निष्ठा और समर्पण से प्रधान सम्पादक अनुराग शर्मा भाई ने सेतु को नए आयाम दिए वह निश्चित ही सराहनीय है। एकबार पुनः सेतु के पाठकों, लेखकों, चित्रकारों, कलाकारों का अभिवादन करता हूँ। विश्वास है कि आगे भी आपकी इस पत्रिका को आपका स्नेह और सहयोग बना रहेगा।

आपका ही-

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