हिंदी ग़ज़ल - राकेश जोशी

डॉ. राकेश जोशी

ग़ज़ल - 1

अगर लिखना मना है तो कलम का कारखाना क्यों
अगर पढ़ना मना है तो यहाँ कागज़ बनाना क्यों

शहर की भीड़ से हटकर नई दुनिया बसाने को
यहाँ तक आ गए हैं तो यहाँ से लौट जाना क्यों

वहाँ लेकर ही क्यों आया जहाँ फिसलन ही फिसलन है
ये जनता है, नहीं समझी, तू राजा है तू माना क्यों

कई बरसों से इस पर ही बहस ज़ारी है संसद में
जो भेजा एक रूपया था, तो पहुँचा एक आना क्यों

तुम्हें गर आसमां की सैर करनी थी तो कर लेते
कहीं पर बाढ़-आँधी का ही हरदम यूं बहाना क्यों

अगर जंगल को फिर से एक दिन जंगल बनाना था
तो फिर जंगल में ही रहते, बदल डाला ठिकाना क्यों

ग़ज़ल - 2

कोई दस्तूर ज़माने का निराला क्यों हो
ये अँधेरों का शहर है तो उजाला क्यों हो

ये सफ़र है तो तुम्हें भी तो कहीं रहना था
इक मेरे पाँव के ही नाम पे छाला क्यों हो

वो जहाँ भूख से मरते हैं हज़ारों-लाखों
तो वहाँ हाथ में तेरे भी निवाला क्यों हो

आसमां भी तो किसी रोज़ ज़मीं को थामे
इस ज़मीं ने ही उसे रोज़ सँभाला क्यों हो

ये धुँआ आज जो निकले तो रुके फिर न कभी
कारख़ानों के लिए सिर्फ़ ये ताला क्यों हो

ये किसी रोज़ उगे हम सभी लोगों के लिए
ये तो सूरज है, ज़रा देर भी काला क्यों हो

उसको गूंगों ने चढ़ाया है यहाँ सूली पे
उनको लगता है कोई बोलने वाला क्यों हो

ग़ज़ल - 3

इन ग़रीबों ने कभी भी घर नहीं देखे
आपने भी तो कभी पत्थर नहीं देखे

ख़ूब बंजर आँख के सपने रहे हैं
झील-दरिया पर कभी बंज़र नहीं देखे

पुल बनाना अब यहाँ मुमक़िन नहीं, जब
आदमी ने आज तक बंदर नहीं देखे

पेड़, नदियां और पर्वत खूब देखे हैं मगर
आज तक चिड़िया ने अपने पर नहीं देखे

खिड़कियों से झाँक ली रंगीन दुनिया आपने
दर्द लेकिन झाँककर अंदर नहीं देखे

शब्द का मतलब वो समझे किस तरह उसने
शब्द काग़ज़ पर कभी लिखकर नहीं देखे

राख से, चिंगारियों से डर गए तुम
है ये अच्छा आग के मंज़र नहीं देखे

ग़ज़ल - 4

घना है क्यों ये कोहरा, घुटा जाता है दम क्यों
ये मौसम आज इतना, हुआ है बेरहम क्यों

तुम्हारा जो नहीं था, तुम्हारा वो नहीं है
जिसे पाया नहीं था, उसे खोने का ग़म क्यों

ज़मीं और आसमां भी अगर बाँटे गए हैं
किसी को ख़ूब ज़्यादा, किसी को ख़ूब कम क्यों

उदासी का सफ़र है, कई सदियों से ज़ारी
हुई है आँख फिर ये, अचानक आज नम क्यों

अदालत है तुम्हारी, तुम्हारा न्याय भी है
अगर निष्पक्ष हो तुम, गए हैं सब सहम क्यों

तुम्हें राजा बनाकर, तुम्हारी कुर्सियों को
हमीं ने दी है ताक़त, हमीं पर फिर सितम क्यों