बाऊ की आसनी - कहानी

- गिरिजेश राव



(1)
गिरिजेश राव
बाऊ की कुर्सी को आसनी कहने के पीछे कोई भाषिक दुराग्रह नहीं अपितु वह व्यावहारिकता है जिसे कुर्सी जैसे षण्ढ* शब्द के साथ उन्हें जोड़ना अपराध सा लगता है। गंगा जी के किनारे भ्रमण की स्वेद भरी कोई साँझ थी जब बाऊ ने उसे खरीदा था। बढ़ई को गाँव लौटने की शीघ्रता थी और विश्वविद्यालय में पढ़ने गये विद्यार्थी बाऊ की गाँठ में केवल दो रुपये थे। निर्धनता के साथ महत्त्वाकांक्षा का संयोग उपजाऊ ही हो, आवश्यक नहीं किंतु उस साँझ बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद बाऊ के सिर था। ढेर सारी मिन्नत-मोलाई का परिणाम यह रहा कि डेढ़ रुपये में पणन-उठाई पक्की हुई। बाऊ ने बढ़ई के हाथ पैसे रखे तो उसने चार आने और माँग लिये। बाऊ को बोलने का अवसर न देते हुये उसने बस इतना कहा कि देवता के लिये है, देना हो तो दो या अपनी राह पकड़ो। बाऊ ने वे चार आने भी उसके हाथ पर धर दिये और आसनी को सिर पर उठा लिया। बूढ़े बढ़ई ने दोनों हाथ उठा उन्हें आशीर्वाद दिया था, सुखी रहो। यदा कदा जब सिर उठा और रुख को कोरा कर बाऊ कहते कि स्वयं शिव ही थे तो किसी को भी उनकी बात पर शंका करने का कोई कारण नहीं दिखता।

आसनी की गढ़न में न तो कोई अनोखा तक्षण कर्म था और न ही स्नेहक घर्षित दीप्ति। उसकी विशिष्टता उसकी साधारणता, आकार, अनुपात और निर्माण हेतु भिन्न भिन्न लकड़ियों के चयन में थी। स्थापत्य शिक्षा के पश्चात ही मैं समझ पाया कि देवताओं पर प्रायिकता के सिद्धांत नहीं लगते और असम्बद्ध से लगने वाले कई कारक वास्तव में एक बहुत ही तनु तंतु से जुड़े होते हैं जो हमें दिखता नहीं, कभी कभी चमक कर आभास भर दे जाता है। वह आसनी बाऊ के लिये ही बनी थी।

इतनी भारी थी कि उसे सिर पर उठाये लङ्का पहुँचते पहुँचते बाऊ का नरखा* और धोती दोनों भीग गये थे। उस पर कोई पेण्ट पॉलिश न तब थी और न कभी हुई। उसकी लकड़ियों को ले कर आम, खैर, नीम, साखू, जामुन, पाकड़, सहजन, अर्जुन आदि आदि जाने कितने अनुमान थे। कोई कोई तो दबे स्वर पीपल भी बता देते! किंतु आसनी की दीर्घायु को लाख प्रयास करने पर भी कोई किसी लकड़ी विशेष से जोड़ नहीं पाया।

उसके पायों का गेहुँआ रंग दिन बीतने के साथ साथ ताम्बई होता गया तो पीछे का सहारा पञ्जर सँवरान से क्रमश: उजास उसी गति से हुआ जिस गति से बाऊ के केश सित* हुये। बैठने की मचान पटरे से नहीं बल्कि सटा कर रखी सत्रह पट्टियों से बनी थी। वर्ष भीगते भीगते हर पट्टी ने अपने अपने भूदृश्य रच लिये थे, आकार ले लिये थे जिनकी पड़ताल मैं अपनी किशोर वय तक करता रहा। बाहें सीधी थीं जिन्हें देख आजानुबाहुता सा भ्रम होता। पञ्जर का वक्रीय झुकाव और मचान की पीछे की ओर की ढलान का तालमेल बाऊ की लम्बी देह के साथ ऐसा व्यवस्थित होता कि लगता जैसे दर्जी देह नाप कर कपड़े सिलता है वैसे ही बढ़ई ने देह नाप कर आसनी बनाई थी।

भारी होने के कारण प्राय: बारिशों में  भीगने के लिये आसनी बाहर ही पड़ी रह जाती। अन्य ऋतुओं में भी ऐसा होता। शीत, घाम, बतास, पानी; इन सबने बाऊ और आसनी को एकसार पौढ़ा किया। जिस आयु में कल्पनायें उड़ान भरने लगती हैं, अपनी उस आयु में बहुधा खेत में बीज पैरते लम्बे डग भरते बाऊ को देख कई बार मुझे ऐसा लगता कि आसनी भी चल पाती तो ऐसे ही करती।

जाड़े की प्रात में जब आसनी नन्हीं नन्हीं ओस बूँदों से भूषित जाने कितने आकाश दिखाती तो मैं साँझ को साइकिल चला कर गाँव से टाउन लौटे बाऊ के माथे के स्वेदबिन्दुओं को उनमें पाता। समय की सीमाओं को व्यर्थ करती आसनी से ओस बूँदों को पोंछ देता और निहारता कि आर्द्रता कौन से भाग में कितनी और कैसे पैठी है। दरारों में रह गई ओस से घोहे में भरे पनवट पानी का आभास होता और मेंड़ रखाते बाऊ के लिये जाने कितने भाव उभर आते।

परुवा* के दिन माई बैलों की सेवा टकसार सजावट कर के सरसो के तेल में हल्दी मिलाती और आसनी की घँसाई* कर देती। उसकी मानूँ तो आसनी की दीर्घजीविता उस घँसाई के कारण ही थी।          

मुझे बकइयाँ* से आगे खड़े होना और चलना भी आसनी ने ही सिखाया, ऐसा माई कहती रहती थी। वैसा विवरण तो नहीं दे पाऊँगा लेकिन उसके कहे अनुसार पुनर्वसु नक्षत्र की कोई तिजहर थी। आकाश डीह पर के पोखरे के पानी सा साफ था और पीपल की झिलमिल छाँव में आसनी पर बैठे बाऊ कुछ पढ़ रहे थे। साउन* तेल दे कर गयी थी और माई हाथ में सन गये तेल से आसनी के पाये घँस रही थी। पहले कउवे बोले, फिर कोइलर और मैं आसनी का एक पाया पकड़ खड़ा हो गया। माई ने बाऊ को चिकोटी काटी – देखिये, देखिये किंतु जब तक बाऊ अपनी विश्राम बैठक मुद्रा की पढ़ाई से ध्यान हटा देखते तब तक मैं  पुन: भुँइया बकइयाँ लेता मिट्टी पीटने में लग चुका था। माई ने बाऊ को कोसा, उनकी पढ़ाई को कोसा और आसनी पर दुलार भरी दृष्टि डाल भीतर मिट्ठा लाने चली गई, ऐसा बाऊ ने बताया। हम तीनों ने अपने खेत में उपजी ईंख से बना मिट्ठा खा कर उस क्षण को मनाया।

उठ कर खड़े होने और चलना सीखने में जाने कितनी बार मैंने बाऊ की आसनी की परिक्रमा  की, गिरा, मुँह फुड़वाया। जिस दिन चल कर उतरने को हुआ उस दिन ओसारे के कोर पर रखी आसनी लुढ़की और सीढ़ियों पर गिरती पड़ती मेरे ऊपर आ गिरी किन्तु मुझे अपने बीच ले बचा भी गयी। बाऊ उस घटना को बड़े उत्साह से बताते मानो आसनी परिवार की कोई सजीव सदस्य हो!

मुझे उस दिन की ठीक ठीक स्मृति है जब आसनी के एक पाँव में एक नन्हा सा काला कीड़ा लगा दिखा और माई आतंक में  बाऊ को हाथ पकड़ दिखाने खींच लाई। वह पहली बार था जब मैंने दोनों को एक दूसरे का हाथ पकड़े देखा था। दूसरी और अंतिम बार तब देख पाया जब दोनों वृद्ध गङ्गा आरती देखने को सब कुछ भूल एक दूसरे का हाथ पकड़े बच्चों  की तरह घाट की ओर भाग चले थे।

बाऊ ने कीड़े द्वारा बनाये छोटे से छेद को चुपचाप देखा, भीतर से पानदान ले कर आये और उसमें से कत्था चूना निकाल, मिला कर उससे छेद मूँद दिये – निश्चिंत रहो, कुछ नहीं होगा। माई ने डाढ़ा लागो* बोलते हुये ताना दिया कि कत्थे चूने ने इनके दाँत कतर दिये, कीड़े मरेंगे उससे! महीनों पश्चात आश्चर्यचकित होने की बारी हम दोनों की थी जब बाऊ ने पूछा – कहाँ गया वह कीड़ा? सच में आसनी उस आक्रमण से मुक्त हो चुकी थी।

केवल धोती बाँधे बाऊ जब आसनी पर दोनों पाँव ऊपर ले एक दूसरे पर चढ़ा त्रिभुज मुद्रा में तनिक तिरछे हो बैठते तो आसनी अपना अस्तित्त्व तज उनसे एकाकार हो जाती। रक्त तिलक, लहरदार मूँछें, उपवीत, रुद्राक्ष माला के साथ गौर वर्ण बाऊ पुरुष सूक्त के पुरुष की तरह दिखते। यदि बाहर बैठे होते तो लगता कि जैसे सारा आकाश उनका मुँह जोह रहा हो! मुझे नहीं पता कि उन्हें अपने इस प्रभाव का पता था भी किंतु यह अवश्य पता है कि उस मुद्रा के प्रभाव ने कई ऐतिहासिक निर्णय सहज ही सम्पन्न कर दिये। उन निर्णयों में टाउन का किराये का भवन छोड़ अपना निजी निर्माण का निर्णय था, नर्मदा के विवाह का केवल दस मिनट में तय-तड़ाबा था, डीह की साझा भूमि का समूची पट्टी में बँटवारा था, पुरानी बारी को काटने के निर्णय पर स्थगन था ... इन सबमें सबसे महत्त्वपूर्ण वे निर्णय थे जिनमें उन्होंने हमारे नन्हे से गाँव के समस्त नवजातों के समय समय पर नामकरण किये थे। धीरे धीरे लोग यह मान बैठे थे कि नाम तो बाऊ ही रखेंगे। वह रखना भूल जाते तो लोग ‘बनारसी बिद्वान’ से भीतर ही भीतर कोहना जाते और स्त्रियाँ माई से उलाहना देतीं ताकि माई उन्हें नामकरण को प्रेरित कर सके। बाऊ ने भी कैसे कैसे नाम रखे – मदालसा, देवयानी, नचिकेता, नन्दिनी, विद्याधर, अपर्णा, ऐसे नाम जो समय की दृष्टि से अनूठे थे और सगे सम्बन्धियों को चमत्कृत कर देते।



(2)
नये घर में ले जाते समय एक दुर्घटना हुई। आसनी का एक पाँव वहीं से टूट गया जहाँ कभी कत्था चूना लगाया गया था। अगले दिन बाऊ चौकी पर बैठे थे और माई भुँइया। वह बैठक मेरे जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण बैठक थी क्योंकि बाऊ ने उस दुर्घटना का सम्बन्ध किशोरावस्था के मेरे पहले विपरीतलिंगी ‘प्रेम’ से जोड़ दिया था। मैं रहस्य के उद्घाटन पर भौंचक्का तो था किंतु यह मानने को तैयार नहीं था कि पुराना स्थान छूटने से लड़की का ‘साथ’ छूटने के दु:ख में दु:खी मैंने आसनी लदवाने में कोई ढिलाई की थी। बात बढ़ गई। चूँकि बाऊ अपने आसनी पर आसीन नहीं थे इसलिये वह अपनी विराट आभा से वञ्चित थे। मैं बीस पड़ा और बाप से जीवन का पहला झापड़ खा कर शांत हुआ। वैसे मैं आज तक यह समझ नहीं पाया कि उन्हें मेरे प्रेम से दु:ख हुआ था या आसनी के पाँव टूटने से।

मेरी मरम्मत के पश्चात बाऊ ने आसनी की मरम्मत का निर्णय लिया जिसमें माई ने अपनी सहमति दी। अगले दिन शिवलोचन बढ़ई बुलाये गये। दोमुँही कीलें बना कर उन्होंने टूटे पाँव को पुन: जोड़ दिया, साथ में  इस बात की गारण्टी भी दी कि भले आसनी का पुर्जा पुर्जा ढीला हो जाये, वह पाँव दुबारा नहीं टूटेगा। बाऊ ने पाँच रजिया काला नमक चावल, डेढ़ सेर अरहर दाल, उतना ही आलू और गुड़ का सीधा अपने हाथों से उनके गमछे में बाँधा, हाथ में दो रुपये थमाये और दस डेग साथ चल कर उन्हें बिदा किये।

अनुराधा नक्षत्र की उस तिजहर बाऊ ने आसनी पर आकाश तले अपनी मुद्रा जमाई और मेघस्वर में दूर के पुराने सम्बन्ध को नया करने हेतु मेरा विवाह ‘कुमारी स्वाति’ के साथ ‘भविष्य हेतु तय’ कर देने का निर्णय सुना दिया। सबको मानना ही था। इस प्रकार आसनी ने विवाह पूर्व मेरे प्रेम की किसी भी सम्भावना को सदा सदा के लिये डुबो दिया।

उपयुक्त समय पर स्वाति कुमारी ने ढेर सारे आधुनिक फर्निचर के साथ ‘देवी’ बन कर हमारे घर पदार्पण किया। सुहागरात में मैंने उन्हें जो पहला पाठ पढ़ाया, वह आसनी का ही था कि कहीं अभिमान में कुछ ऐसा वैसा न कह बैठें जो ‘घातक’ सिद्ध हो। स्वाति की समझ शाश्वती हुई और घर में ‘आदर्श बहू’ संज्ञा का प्रकाश हुआ।



(3)
समय उड़ चला। सेवानिवृत्त होने के पश्चात टाउन के भवन में ताला जड़ कर बाऊ माई स्थायी रूप से गाँव आ गये और मैं अपने परिवार के साथ नगर-नगर घूमने लगा। छुट्टियों में कुछ दिनों के लिये हमलोग गाँव जाते तो बाऊ हमें पा कर यही कहते कि मरुस्थल में उद्यान उग आये हैं। विराट पुरुष की काया अब सूखने लगी थी। पूछने पर दोनों यही कहते कि बेटा, ढलान है, देह अब वैसी ही थोड़े रहेगी। उनके स्वर के पीछे की करुणा का मैं आभास पा लेता लेकिन कर भी क्या सकता था। हर वर्ष दोनों के पूरे चेक अप कराता किंतु कोई विशेष समस्या नहीं निकलती।

वह दशहरे का दिन था, तिजहर ही थी। मैंने देखा कि माई कटोरी में तेल लिये बाऊ की ओर जा रही थी। बाऊ आसनी पर ही थे किंतु दोनो पाँव नीचे भूमि पर थे, आसनी के पाँव पता नहीं चल रहे थे। मेरे मन में छन्न सी हुई और मैंने माई के हाथ से कटोरी ले ली। मालिश करने को धोती ऊपर किया और सन्न रह गया। बाऊ के पैर जैसे गलन में थे। ऐसा एक दिन में तो नहीं हुआ होगा!

समय रीतता रहता है और एक दिन धपाक से सच सामने कर देता है जिसे हम अप्रत्याशित कहते हैं। सम्भवत: जानते हुये भी अनजान बने रहते हैं या जानना चाहते ही नहीं  हैं। मैं दोनों पर बिगड़ा कि बताया क्यों नहीं और यह उत्तर पा कर वैसे ही शांत हो गया जैसे झाग बैठ गयी हो कि बेटा! हर बरस तुम चेक तो कराते ही रहते हो, यह बस ऐसे ही है।

बाऊ के पाँवों की मालिश करते लगा कि उनका रंग गाढ़ा होता आसनी के पायों की तरह ही हो गया है। बचे हुये तेल को जब आसनी के पायों में घँसने लगा तो पाया कि बाऊ के पाँवों और उनमें कोई अंतर ही नहीं था! आँखों पर पट्टी बँधी होती तो बाऊ के पाँव होते या आसनी के पाये, मैं अंतर नहीं कर पाता। बाऊ चौकी पर लेटने को उठे तो मैंने देखा आसनी की बाँहें भी उनके बाँहों सी ही ... नहीं, बाऊ की बाहें आसनी जैसी हो चुकी थीं। उनकी सँवराई भी वैसी ही थी। पीछे की सहारा पट्टियाँ झक्क सफेद हो चली थीं जैसे किसी ने रंग दिया हो। लेट चुके बाऊ का अस्तित्त्व ज्यों लुप्त हो गया था और मेरे सामने आसनी उनके रूप में थी - सिर का पता नहीं, वक्ष की अस्थियाँ चमकती हुईं, हाथ पाँव बस लकड़ी लकड़ी जैसे किसी वटवृक्ष का सब कुछ सोख लिया गया हो और बचा रह गया हो, मात्र पञ्जर।

उस रात मेरे भीतर जैसे बुढ़ापे ने पहली बार पैठ बनाई। प्रश्न, प्रश्न, प्रश्न। उन दोनों के पास सबके उत्तर थे - शांत रस में भीगे, वत्सल, स्नेहिल और ऐसे जैसे सब स्वीकार किये बैठे हों। उस रात उनकी छाँव के निर्वेद को मैंने अनुभव किया और बहुत रोया कि इतने विलम्ब से क्यों? क्यों भला?

दीपावली के दिन बाऊ दिवंगत हो गये। एक दिन पहले तक उनसे फोन पर बातें हुई थीं, स्वर वैसा ही था, न कोई थकान, न कोई ढलान। सब ठीक है बेटा, आज भी धूसी का खेत घूम आया हूँ। बस ऐसे ही मन किया तो चला गया था, कोई विशेष बात नहीं थी। तुम्हारी माई भी साथ गई थी ... उस समय भी मुझे कुछ नहीं कौंधा था।

जाने कितने अक्षांश लाँघ कर मैं पहुँचा। आँखों में जैसे अकाल पड़ गया था जबकि स्वाति की बूँदें सारी राह झरती रहीं। मृत शरीर भुँइया* थी। क्षण भर को मुझे लगा जैसे आसनी को ही सीधा कर लेटा दिया गया था और तिरोहित हो गया। आगे सब कुछ यंत्रवत सम्पन्न हुआ। बरखी भी कर दी गई, माई हम लोगों के साथ आई और महीने भर पश्चात गाँव लौट गयी, "मुझे सौंप गये हैं बेटा, पुरखों की धरती बुला रही है। मैं नहीं रुक सकती।"



(4)
ठीक ठीक कितने महीने बीते, गिनती नहीं पता। माई का फोन आया कि बेटा, आ जाओ, कुछ काम है। गाँव पहुँचते पहुँचते रात हो गयी। बिहाने उठा तो देखा कि आसनी रात भर की ओस से भीगी रखी है। कहाँ रखी है? मुझे तब चमका कि जिसकी छाँव उसे लगा बाऊ बैठते, वह शमी गाछ सूख चुका है और आसनी की ठठरियों का रंग वैसा ही दिख रहा है जैसे सूखी डालें। मैं भाग कर निकट पहुँचा। एकाध डालों को तोड़ कर देखा कि सम्भवत: कुछ बच गया हो, चटकनों ने बता दिया कि कुछ भी शेष न था। भीतर जाने कैसा बवण्डर उठा कि मैंने एक डाल को पकड़ कर जोर से झटका दिया, वह हाथ में आ गयी। काँटों से घायल हो हाथ रक्तरञ्जित हो उठे।

माई धिक्कारने लगी, "का हो पूता?" मैंने मुँह फेर लिया तो वही निर्वेदी स्नेहिल स्वर पीछे से आया, "जाने वाले चले जाते हैं, सूख गया है कटवा दो। कप्तानगञ्ज की नर्सरी से नया पौध आन दो। वहीं रोप दूँगी। आज अच्छा दिन भी है।"

नर्सरी वाले ने ग्राफ्टिंग वाले पौधे दिखाने आरम्भ किये तो मैं भड़क गया, ऐसे टेढ़े मेढ़े मुझे नहीं चाहिये। मुझे बीजू चाहिये, सीधा, सुन्दर, आजानुबाहु, बाऊ जैसा। वह मुझे घूरने लगा तो मैंने क्षमा माँगी और उसके संकेतित स्थान की ओर बढ़ चला कि जाओ सीधा शमी मिल सके तो ढूँढ़ लो। आधा घण्टा लगाने पर एक मिल ही गया – सीधा, तना जैसे आकाश छूने को विकल हो रहा हो।

ले कर लौटा तो बाइक से उतरते ही सामने एक ओर आसनी दिखी और दूसरी ओर भुँइया बैठा बंसराज डोम। माई ने स्पष्ट किया कि नये पौधे की बँसवट बाड़ बनाने को बुलाया है। मैं कभी आसनी को देख रहा था तो कभी बंसराज को - माई तुम्हें कुछ नहीं पता।

... श्मशान है। सिर से ले कर पाँव तक जैसे स्वेद के पनाले बह रहे हैं। सूखी आँखों की लाज उन्होंने बचा ली है।  यही बंसराज सामने खड़ा है – मुखाग्नि के लिये सुलगता गोंइठा लिये। दच्छिना बताओ यजमान, बिना उसके बाऊ को देने को आग नहीं मिलेगी। मुझे मिट्टी चाहिये, खेत दो।

भीतर हाहाकार है - तुम्हें खेत दे दूँ, उनका भाग दे दूँ? भाग यहाँ से नीच! मुझे नहीं पता कि उसे किसने मनाया है। ले लो आग। एक चिंगारी छटक हाथ को जला गयी है। चटकती दहकती अग्नि में बाऊ लीन हो रहे हैं – लकड़ियाँ ही लकड़ियाँ हैं। बंसराज कहाँ गया? आओ, तुम्हें भी...

माई की पुकार से मेरी तन्द्रा टूटी और मैंने पुन: बंसराज को निहारा। दीन हीन मलिन। मन ही मन स्वयं को धिक्कारा - इससे कैसा क्रोध? बावले हो तुम।

मेरी दीठ आसनी पर पड़ी, सिर-विहीन नहीं चाहिये। वे लहराती मूँछें कहाँ चली गईं? बाऊ, आप कहाँ?

भीतर जाने कितने बन्ध तोड़ता स्वर निकला, "बंसराज! ले जाओ यह आसनी। मेरी ओर से यही दक्षिणा है।"

मैंने माई की ओर देखा, वह वैसे ही शांत थी, "ले जा, साँझ को घेरा ले आना।"

बंसराज ने सूखा शमी काटा, आसनी को उल्टा कर बड़े ही व्यवस्थित ढंग से उस पर सारी लकड़ियाँ जमाईं और मुझसे हाथ लगाने को बोला तो माई ने बरज दिया। उसने स्वयं सहारा दे उठवाया।

तिजहर को शमी की पौध रोपते माई ने कहा,”पुनर्वसु नक्षत्र है बेटा! इसी में तुमने डेग भरे थे। यह तुम्हारे लिये काँटों भरा नहीं, छाँव भरा होगा। प्रस्थान में इसकी पत्तियाँ शुभ होती हैं।“ कहते हुये माई ने एक छोटी सी पत्ती तोड़ अपने आँचल गँठिया ली।

प्रात:काल की किरणें माई के ललाट की बूढ़ी रेखाओं में आर्द्र हुई चमक रही थीं, जैसे निरभ्र आकाश के नीचे खेत के घोहों में निथरा पानी हो। माई को दिन उगे तक सोये मैंने कभी नहीं देखा था, पुकारा, "माई! माई! कोई उत्तर न पा उसे हिलाया तो सिर एक ओर लुढ़क गया। शिव ने, बाबा विश्वनाथ ने सीता को राम के पास बुला लिया था।"

भीतर कहीं चौंध हुई, "आसनी किसी और लकड़ी से नहीं, शमी की लकड़ी से बनी थी। कहाँ मिला होगा वैसा सीधा, बरियार, आकाश से बातें करता परुष शमी? उत्तर न पा कर भीतर का सूखा टूट पड़ा। मेरी आँखों से आँसू बह चले।"

*कुछ शब्दार्थ

षण्ढ = पौरुषहीन; नरखा = अंगरखा; बकइयाँ = (बच्चों का) घुटनों के बल चलना; सित = श्वेत; परुवा = ग्रामीण भारत का एक पर्व जिस दिन कृषक बैलों की कृतज्ञता से पूजा कर उन्हें कार्य से अवकाश देते हैं; घँसाई = मालिश;  साउन = साहुन, तेल व्यवसाई 'साहू' की स्त्री; भुँइया = भूमि पर, धराशायी; डाढ़ा लागो = भोजपुरी स्त्रियाँ कोसती हैं जिसका अर्थ दहन से है। डाढ़ सूखी डाल है। चूल्हे में लगाइये, चिता में लगाइये या किसी के घर में ठेल दीजिये।

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