अनुवाद: भारतीय कविता

संतोष अलेक्‍स
प्रस्तुति व अनुवाद: संतोष अलेक्‍स

कवि, आलोचक एवं बहुभाषी अनुवादक, दो दशकों से (हिंदी, मलयालम, अंग्रेजी, तमिल एवं तेलुगु) पाँच भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं। कविता, अनुवाद एवं आलोचना सहित 29 किताबें प्रकाशित। इनके अनुवाद व पुस्तक विश्‍वविदयालयों के पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं। पंडित नारायण देव पुरस्‍कार, द्विवागीश पुरस्‍कार, प्रथम सृजनलोक सम्‍मान, तलशेरी राघवन स्‍मृति कविता पुरस्‍कार एवं साहित्‍य रत्‍न पुरस्‍कार से सम्‍मानित। अंग्रेजी पत्रिकाओं के संपादक मंडल के सदस्‍य, तथा कोचीन में मात्स्यिकी विभाग में हिंदी अधिकारी।

श्रीनिवासाचार्य दर्भाशयनम (तेलुगु)

1961 में जन्‍म। छह कविता संग्रह प्रकाशित। तेलुगु विश्‍वविदयालय के साहित्‍य पुरस्‍कार से सम्‍मानित। हैदराबाद में आंध्रबैंक में वरिष्‍ठ प्रबंधक के रूप में कार्यरत।


के बारे में

कभी कभार मैं
आदिकालीन बातों के बारे में लिखता हूँ
उदाहरण के लिए: मिटटी के बारे में

कभी कभार मैं
समकालीन मुददों पर लिखता हूँ
उदाहरण के लिए: मिटटी के बारे में

कभी कभार मैं
भविष्‍य की गतिविधियों के बारे में लिखता हूँ
उदाहरण के लिए: मिटटी के बारे में

किसी भी चीज पर लिखूँ
वह उस मूल तत्‍व के बारे में होता है
जो मनुष्‍य की जिंदगी है
और उसे बनाए रखती है


पाठ

मुझे कोई भी विषय सिखाओ
अंग्रेजी व तेलुगु
इतिहास या दर्शनशास्‍त्र

मुझे कहीं भी सिखाओ
पेड़ की छांव में
या वातालुमूल कमरे में
आप जैसे चाहिए वैसे सिखाओ
शब्‍दों के सहारे या चित्रों के सहारे

मुझे किसी भी समय में
दिन में या रात में
मुझे किसी भी तरीके से सिखाओ
संक्षेप में या विस्‍तार से

आप जैसे चाहें मुझे कहीं भी
किसी भी तरीके से
किसी भी समय में सिखाओ
लेकिन मुझे ऐसी चीजें न सिखाओ
जिससे जिंदगी के प्रति प्‍यार न हो
उत्‍साह और दया न हो
भविष्य के प्रति आशा न हो


शाश्‍वत

अच्‍छी बात है
आपने पूछा
क्‍या कविता आनेवाले युगों में
सफल रहेगी?

पहले यह बताओ
क्‍या मनुष्‍य आनेवाले युगों तक
जिंदा रहेगा?


खेती

कब तक तुम
खेतों के बारे में कविताएँ लिखोगे

जब तक किसान खेती करेगा
और मनुष्‍य अनाज पर
निर्भर रहेगा



वाहिद ए बी डी (तेलुगु) 

समाजशास्त्रीय सूफी: फैज अहमद फैज लाइफ एंड पोएट्री नामक किताब काफी चर्चित रही। एक काव्‍य संग्रह एवं एक गजल संग्रह प्रकाशित। मकदून मोहिउददीन पर एक किताब शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली है। तेलुगु मे गजल, रूबाई एवं कंदम प्रोसोडी विधाओं पर कविताएँ लिखी हैं। 

बाजार

शरीर फूलों का एक बगीचा है
घाव छोटे और बड़े हैं
राजनीतिक दया की मक्खियों की गुनगुनाहट
सुनाई देती है
फोड़े से बदबू आ रही है
जिंदगी इतनी भयानक है तो
मृत्‍यु के बारे में चिंता कैसी

धूल का क्‍या आवास
हवा जहां ले जाती है उधर निकल जाती है

उगलता जीभ, आग के जीभों को भड़काता है
रोता है 
न न प्‍यार से नहीं मरना

बगुला विश्‍वास को बेचता है
मछली पानी के लिए तैरती है
हे मनुष्‍य जब तुम्‍हारा मुख्‍य काम
धंधे में बदल जाता है
तुम्‍हारा भाव और दया पुतला सा बन जाता है
जाओ अपनी आंसुओं को बेचो
एक बार तुम बेचने लगो तो
रहस्‍य की आखिर क्‍या बात है

बच्‍चों की नाभि नाड़ी बेचो
मोह को अविश्‍वसनीयता पर भेजो

यदि तलवार की धार से
आँखे बंद हो जाती हैं तो
इसे थकान मत समझना
मेरी ऑंखों का कीचड़ जल्‍दी कम नहीं होता

क्‍या तुम्‍हें लगता है कि
मस्जिद के कबूतर शांति सम्‍मेलन करेंगे
मिनार का नींव धरती की गहराई जताता है
अब भूचाल का डर नहीं है



कवि याकूब (तेलुगु)

पहला काव्‍य संग्रह 'प्रवाहिंचिना ज्ञानपाकम' 1992 में प्रकाशित जो काफी लोकप्रिय रहा। अब तक 10 किताबें प्रकाशित, जिसमें 3 काव्‍य संग्रह एवं 7 आलोचना की किताबें हैं। कविताओं का अनुवाद कई भारतीय भाषाओं में हुआ है। काव्‍य संगमम कविता संगठन दवारा देश के कवियों से चर्चा एवं काव्‍य पाठ का आयोजन कर रहे हैं। इसमाइल साहित्‍य पुरस्‍कार सहित कई पुरस्‍कार प्राप्‍त। वर्तमान में अनवर अलूम कॉलेज में तेलुगु प्रोफेसर के रूप में कार्यरत।


हमें बोलना है

हाँ
हमें बोलना है
बोलने की इच्‍छा अपने आप में एक खुलासा है
भाषणों में तथ्‍य और बुनावट
पहचान से परे हैं

वास्‍तव में
दया या कुटिलता क्‍या है
अच्‍छा और बुरा क्‍या है
ये इन्द्रियगोचर हैं
शब्‍दों के बीच हमें बोलना है
प्‍यारा मुस्‍कान सा जिदगी को प्रण दें
बिना छेड़ छाड़ किए गए पानी की बूंदों सा
माँ का प्‍यार भरा चुबन सा

हथकड़ी लगे शब्‍दों को मुक्‍त कर
हमें निर्भय होकर बोलना है
हाँ, यही समय है बोलने का
सालों तक इस क्षण का उत्‍सुकता से इंतजार किया
केवल मेरे लिए ही नहीं
हम सबके लिए यह महत्‍वपूर्ण क्षण है
समय आ गया है सीमाओं को तोडने का
आओ प्‍यारे
हमें निर्भय होकर बोलना है


सृष्टि

हम क्‍यों लिखते हैं?
खुद से लड़ते हुए
लालसा के लिए
नाराजगी से तंग आकर 
अनुदार बन
हम अपने ही बारे में क्‍यों लिखते है?

हमारे भीतर
लोकोत्‍तर पीड़ा को समाने
समझने एवं अनुभव करने
हमारे भीतर छिपे अनदेखे पीड़ा को
समझने के लिए
हम लिखते हैं

जब हम जिंदगी को
भिन्‍न, स्‍वाभाविक और साफ
तरीके से देखते हैं
एक तीव्र अनुभव
हमें छुवन को भी अनुभव कराती है
ऐेसे में
हम कैसे नहीं लिखेंगे?


अनकहे शब्‍द

हर मोड़ पर हम
अनकहे रह गए
कुछ अगली मुलाकात में ही सही
हम दिल खोलकर बात करें
हर बार
कुछ अनकहा रह जाता है
आप कैसे हो? … अच्‍छा हूं
यूँ ही संवाद, बीच में खामोशी है
जो समय नष्ट करता है

क्‍या आपको यकीन है
हम जो कहना चाहते थे वह कह दिया
हमारे गले में आवाज अटक गई
और हम एक दूसरे की आंखों में
भविष्‍य की तस्‍वीर खींच रहे थे

क्‍या दूसरों को जताने
हमने खुद को कैद कर लिया?
क्‍या हम अपनी मुलाकात में
दिल खोलकर बात करें

क्‍या तुम अपनी काली पलकों 
व रूठे चेहरे के बारे में
कभी बात की
क्‍या हम इतने हिम्‍मत रखते हैं कि
सपने में ही सही अपने को
सही तरह प्रस्‍तुत करें

हमारे भीतर के शब्‍द
हमारा मजाक उड़ा रहे हैं  

क्‍या प्‍यार करने पर ही सही
हम दिल खोलकर बात कर पाएंगे?


विनिता विजयन (मलयालम)

युवा मलयालम कवयित्री। केरल के चेरतला में जन्‍म। चर्चित पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। जाल पत्रिकाओं में आलोचना स्‍तंभ संभालती है। संप्रति: महिला कवयित्रियों पर शोध कार्य कर रही है।


रेल की पटरियाँ: एक लड़की है

अनचाही बातें व गंदी नालियाँ
उस पर उंगलियाँ उठा रही है
एक साथ
घंटी की आवाज व
उद्घोषणा के बीच
वह किसी भी वक्‍त
गुजरनेवाले रफ़्तार को
ठंड से बचाती है
आग से ज्‍यादा वह
धूप खा रही है
रेल की पटरियां एक लड़की है…….
पक्‍का

मैं न रहूँगी तो बस इतना ही

दर्द के अंगारे में
दर्द के बिना
चावल व सब्‍जी पक रही हैं
रसोई में

खामोशी ने जाल तैयार कर ली
चारों ओर

केंचुए के पास तक
झाडू नहीं पहुंचती
पत्‍थर जिस पर कपड़ा
साफ किया जाता है ठंडा है

कांस के फूल को
गुलाब ने चुंबित की
गमले में दोनों ने
पानी का सपना देखा
मैं न रहूँगी तो बस इतना ही

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