मुआवजा - लघुकथा

राधेश्याम भारतीय

- राधेश्याम भारतीय

गाँव में आंधी और ओला-वृष्टि के कारण नष्ट हुई फसल के बदले मुआवजा राशि बाँटने एक अधिकारी आया। बारी-बारी से किसान आ रहे थे और अपनी मुआवजा राशि लेते जा रहे थे। जब सारी राशि बंट चुकी तो रामधन खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर कहने लगा, “साब जी, हमें भी कुछ मुआवजा दे दीजिए!”

“क्या तुम्हारी भी फसल नष्ट हुई है?”

“नहीं साब जी! हमारे पास तो जमीन ही नहीं है।”

“तो तुम्हें मुआवजा किस बात का?” अधिकारी ने सहज भाव से कहा।

“साब जी, किसान की फसल होती थी... हम गरीब उसे काटते थे और साल भर भूखे पेट का इलाज हो जाता था। अब फसल तबाह हो गई तो बताइए हम क्या काटेंगे... और काटेंगे नहीं तो खायेंगे क्या?”

“तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा... जाओ अपने घर।” इस बार अधिकारी कुछ क्रोधित स्वर में बोला।

रामधन माथा पकडे़ वहीं बैठ गया।