कविताएँ - तेजस्वी सक्सेना

तेजस्वी सक्सेना

माँ

क्यों लोग चले जाते हैं बादलों से परे?
क्यों धुआँ सा उठता है यूँ चांद के तले
मैं हाथ सेंकता हूं चराग़ों की लौ में
जो रौशन हैं किएमेरे बिखरे पलों को।

कुछ ताले हैं लगे उन बंद दरवाज़ों पर 
जिन्हें खोलने की हिम्मत नही होती कभी अब
और चाबियाँ हैं रखी किन्ही कोनों में 
किसी धूल ख़ाते आले या संदूकची में
जो जंग खाती हैंइंतज़ार में पसरी पड़ी सी।

मैं आज भी ढूँढता हूँ नूर उन चेहरों का
जो महताब की रौशनी मेें भिगोते थे 
वो बचपन के दिन।

कभी शिकवा ना करतेकभी मांगा नहीं कुछ
इक चोगा थे डालेमेरे नंगे वजूद पर 
बचाते थपेड़ो सेवक़्त की धूल से 
ग़ुरबतों सेऔर तानों से 
ज़माने ने जो हमें गिन गिन के मारे 

वो कहते रहेहम सुनते रहे 
उम्मीद भरे दिल में
उस मखमली दुपट्टे की
जिसका सिरा हम पकड़ते थे 
कभी सोतेकभी उठते 

आज मैला कुचैला वो आँचल पड़ा है 
सलवटों से भरासूख़े पत्ते सा गिरा है 
पर छूने में नहीं वो एहसास--मोहब्बत  
मुक्कमल जो थी कभी माँ की बदौलत।




वेदना

विषमताओं की तपिश में तपती,
सभ्यसामाजिक खोखले दरों से,
झाँकती हुई धुंधली सी,सिमटी
तेरी ये वंदनीय वेदना है निखरी। 

लालायित स्पृहाओं की निकृष्टता में,
या कुचली गई संवेदनाओ में,
उन आशाओं में, आकांक्षाओं में,
जो तेरी तृष्णा का उपहास बनाते
तू ना झुकी, ना डिगी है पथ से।

अग्रणी बनी है, काल अनंत से। 
तू ही है धारा वैतरणी की।
तू है ऋता चेतन हृदय की।

क्यों ना कचोटती उस कापुरुष को,
जो चिन्हित करे तेरी अस्मिता को
पर वो क्या समझे तेरी अजेयता?
जो मलिन करे स्वरूप महिषासुर मर्दिनी का।

जो अबाध्य है,वह बांधते हैं,
असीमितता को ललकारते हैं। 

तू ना समझी जाएगी उन बुद्धिजीवीयों से,
ना सिमट पाएगी सीमित मानसिकता से,
जो ना जाने तेरी विविधता, तेरा स्वरूप, तेरी विशालता। 
तू है प्रचंड अग्नि शिखा,तू है सुप्रतिम सहिष्णुता।

ना बंध सके, ना छुप सके
क्योंकि तू विभा है ज्ञान की। 
विरोध कर, बढ़ चल तू आगे, छोड़ चिंता जगत की!
पीछे चलेगा सहर्ष काल, क्योंकि तू है वेदी ब्रह्मा की।


वृक्ष

जीवन के अति दुर्गम और सुगम पथों मे,
पथरीली चट्टानो या श्वेत शिखर में
पतझड़ के झड़ते पर्णो की रंज प्रभा में या,
ऋतु वसंत मे हिचकोले खाती लतिकाओं मे
वृक्ष खड़ा है ताने अपनी सुगठित काया
वर्षा की बूंदे जब मोती बन जाती,
पड़े प्रफुल्लित सी, अकुचाई टप टप करके,
कोंपल फूटे मानों कोई तान छिड़ा हो,
जैसे किसी मधुरिमा का कोकिल गान छिड़ा हो
नवयौवन की प्रतिभा का आभास किसे है
एक पथिक जो भटके राह अपनी
या, पंछी जो सुस्ताएँ
ये चित्रकार की आशा का प्रक्षेपण है,
एक कवि की परिकल्पना भासने को

जो हृदय की अगणित शाखाओं को कला से बांधे
फिर जाए भटके बिसरे, इनकी छाया में
भरने को अधूरे रंग अपनी कृतियों में।

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