कवयित्री वत्सला राधाकिसुन का साक्षात्कार

- साक्षात्कारकर्ता: सत्यवीर सिंह
व्याख्याता (हिंदी), ला.ब.शा. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोटपूतली (जयपुर)
वत्सला राधाकिसुन 

मॉरिशस अफ्रीका का एक ऐसा छोटा सा देश है जिसके कण-कण में भारतीयता और हिंदी जबान रच-बस रही है। यहाँ ईसाई, हिंदू और मुस्लिम धर्मावलम्बी निवास करते हैं। मारिशस में हिंदुओं के जो भारतीय मूल के निवासी हिंदुओं की बहुत बड़ी तादाद है। यह जनसंख्या मूल रूप से भोजपुरी बोलती है। आज मारिशस में क्रियोल, हिंदी, फ्रेंच और अंग्रेजी बोलने वालों की संख्या काफी है। इसी मॉरिशस की सुश्री वत्सला राधकिसुन एक ऐसी कवयित्री, लेखिका हैं जो कि मूल रूप से अंग्रेजी में लेखन करती है पर साथ-साथ हिंदी और फ्रेंच में भी लिखती हैं। कवयित्री वत्सला बहुमुखी एवं बहुभाषी हैं। आपके पूर्वजों का संबंध भारत से रहा है। इन्हीं सबको दृष्टिगत रखते हुए कवयित्री वत्सला का डॉ. सत्यवीर सिंह द्वारा लिया गया साक्षात्कार हैं। जिसमें मॉरिशस जिसे हम ‘लघु भारत’ कहते हैं, के संबंध में कुछ अनछुए पहलुओं पर वत्सला जी प्रकाश डालती हैं।


डॉ. सत्यवीर - वत्सला जी अपने जीवन पर थोड़ा प्रकाश डालिए।
सुश्री वत्सला - मेरा नाम वत्सला डी. राधाकिसुन है। मेरे पिता का नाम श्री राजमन राधाकिसुन तथा माता का नाम कृष्णा कुमारी राधाकिसुन है। मेरे दो भाई और हम दो बहनें हैं। चारों में सबसे छोटी मैं हूँ। मेरा जन्म 1977 में मारिशस में रोज हील के क्युरपीप में हुआ है। मैं एक एम.बी.ए. ग्रेजुएट हूँ। मैं स्वरोजगारशुदा (Self employed) हूँ। साथ ही लेखन करती हूँ। कविता और गद्य लेखन मेरा प्रिय क्षेत्र है। इस नाते आप मुझे लेखिका या कवयित्री कह सकते हैं।

डॉ. सत्यवीर सिंह
डॉ. सत्यवीर - आपके वंशज भारतीय मूल के हैं, आप मॉरिशस में जन्मी, पली, बढ़ी। आपको कैसा महसूस होता है?
सुश्री वत्सला - यह प्रश्‍न आप्रवासी पर ज्यादा लागू होता है। मॉरिशस में रहने वाले भारतीय मूल के, जिनको आप कह रहे हैं, वे एन.आर.आई नहीं हैं। मेरे पूर्वज 1834 में मारिशस आए। उस समय मारिशस एक ब्रिटिश उपनिवेशन था। उसके बाद जो यहां जन्मा मॉरिशीयन कहलाता है। मॉरिशस मेरी मातृभूमि है। मैं खुश हूँ कि मेरा जन्म यहाँ हुआ क्योंकि मॉरिशस में सभी धर्म के लोग आपस में मिलजुलकर रहते हैं। यहाँ पर जाति - पाँति के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है। स्त्री और पुरुष को भी समानता की दृष्टि से देखा जाता है। मारिशस में जाति व्यवस्था नहीं हैं, हाँ धर्म व्यवस्था अवश्य है। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लोग निवास करते हैं। तीनों धर्मो के लोगों में आपसी तनाव, कट्टरता बिलकुल नहीं

डॉ. सत्यवीर - क्या आप कभी भारत आई हैं?
सुश्री वत्सला - मैं कभी भारत नहीं आयी हूँ। हाँ भविष्य में भारत आने की मेरी प्रबल इच्छा हैं। मैं भारत अवश्य आऊँगी।

डॉ. सत्यवीर - मॉरिशस में महिलाओं के प्रति लोगों की मानसिकता कैसी हैं?
सुश्री वत्सला - मारिशस एक खुला देश है। यहाँ पुरुषों की मानसिकता बिलकुल स्वच्छ और खुली है। महिलाओं के प्रति समानता के विचार रखते हैं - पुरुष। यहाँ स्त्री-पुरुष में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं हैं। मारिशस पर पश्‍चिमी मानसिकता अधिक हावी है। भारतीय मूल के हिंदुओ में भी स्त्री को लेकर किसी प्रकार का दोयम दर्जे का व्यवहार नहीं। मारिशस में ‘वर्क कल्चर’ है। सब अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और उसका निर्वहण करते हैं।

डॉ. सत्यवीर - मॉरिशस में भारतीय मूल के बहुत लोग वास करते हैं। क्या हम मॉरिशस को ‘लघु भारत’ कह सकते हैं।
सुश्री वत्सला - जी हाँ। मॉरिशस को अक्सर ‘लघु भारत’ कहते हैं क्योंकि यहाँ पर भारतीय संस्कृति को मॉरिशीयन हिंदुओं ने अनेक पीढ़ियों तक संभाल कर रखा हैं।

डॉ. सत्यवीर - आपके पिता मॉरिशस में हिंदी अध्यापक रहे। आपके परिवार में हिंदी, भोजपुरी का वातावरण रहा। लेकिन आपने अलग रास्ता चयन किया, अंग्रेजी का। क्यों और कैसे?
सुश्री वत्सला - मॉरिशस में अंग्रेजी और फ्रेंच सीखना स्कूलों में अनिवार्य हैं। हिन्दी मॉरिशस हिन्दुओं के लिए पूर्वजों की भाषा है। यहाँ पर हर भाषा का स्तर एक समान है। मेरे माता-पिता ने सदा मुझे अनेक भाषाओं को सीखने और पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। लेखन कार्य के लिए मैंने अंग्रेजी चुना क्योंकि मेरे विचार ज्यादा उस भाषा में आते हैं। परन्तु मैं हिंदी और अन्य भाषाओं को भी बहुत पसंद करती हूँ। और उन में रुचि रखती हूँ। भोजपुरी तो हमारी मातृभाषा है। इसी से हिंदी मेरी मातृभाषा के समान है। अंग्रेजी मेरे लिए जीविकोपार्जन की भाषा है। अब मैं अंग्रेजी लिखती हूँ, पर हिंदी में भी कविताएं लिखती हूँ।

डॉ. सत्यवीर - आप कितनी भाषाओं में लेखन करती हैं
सुश्री वत्सला - मैं चार भाषाओं में लेखन करती हँ - अंग्रेजी, हिन्दी, क्रीयोल और फ्रेंच।

डॉ. सत्यवीर - मॉरिशस में आप हिंदी की स्थिति के बारे में क्या कहना चाहती हैं।
सुश्री वत्सला - मॉरिशस में हिन्दी की स्थिति बहुत ही श्रेष्ठ है। आजादी के पूर्व से ही यहाँ हिन्दी को बचाने एवं संभालने के लिए बहुत संघर्ष हुआ है। आज यह कह सकते हैं कि मॉरिशस में हिन्दी का जो संघर्ष हुआ वह 100 प्रतिशत सफल हुआ। हिन्दी मॉरिशस के प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों और महाविद्यालय में पढ़ायी जाती है। हिन्दी का स्तर अन्य भाषाओं की तुलना में श्रेष्ठ हैं।

डॉ. सत्यवीर - आपके प्रेरणा स्त्रोत कौन-कौन हैं
सुश्री वत्सला - सबसे पहले मेरे प्रेरणा स्त्रोत निराकार ईश्‍वर, ओउम् हैं। फिर मुझे अपनी स्वर्गीया माता जी से काफी प्रेरणा मिली। स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के वैदिक विचार, गौतम बुद्ध के विचार आधुनिक वैदिक धर्म प्रचारकों जैसे स्वामी विवेकानंद परिव्राजक जी के प्रवचन एवं आचार्य प्रवर अरूणकुमार आर्यवीर जी के गाए हुए भजन भी मेरे प्रेरणा के स्त्रोत हैं, इन सब के अलावा मेरे जो भी अन्य परिवार और मित्र या सहेलियाँ हैं, सभी मेरे लिए प्रेरणादायक हैं।

डॉ. सत्यवीर - आप साहित्य लेखन में किसी प्रेरणा से आयी या वह कौनसी परिस्थितियाँ रही, जिनसे आपने साहित्य का रास्ता तय किया?
सुश्री वत्सला - मेरी माता जी हिन्दी की अध्यापिका थी, मुझे बचपन से कविताएँ और कहानियाँ पढ़ाती और सुनाती थी। उन्हीं की प्रेरणा से मैं साहित्य लेखन में आई। 14 साल की आयु में मुझे किशोर अवस्था की समस्याएँ काफी दुखी कर देती थी। तब से मैंने अपने विचारों को एकांत में काव्य के रूप में लिखना आरंभ किया। उसके पश्‍चात्, जीवन के सुखों और दुखों को साहित्यिक रचना के रूप में लिखने की आदत पड़ गयी। साहित्य मेरी दुनिया बन गयी - एक ऐसी दुनिया जहाँ मैं पूर्ण रूप से स्वतंत्र महसूस करती रही हूँ।

डॉ. सत्यवीर - मॉरिशस में साहित्य एवं साहित्यकारों के प्रति लोगों तथा सरकार का दृष्टिकोण कैसा है?
सुश्री वत्सला - सरकार का दृष्टिकोण ठीक है। धीरे-धीरे प्रगति कर रहे हैं। यहाँ अनेक पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। साथ ही अनेक हिंदी संस्थाएँ हैं, जो हिंदी के प्रचार-प्रसार अध्यापन के लिए कटिबद्ध हैं। यहाँ हिंदुओं की मूलभाषा हिंदी है। प्राथमिक कक्षाओं में हिंदी पढ़ी पढ़ाई जाती है। एक बहुत बड़ा समुदाय हिंदी बोलता और समझता है। हिंदी पर अनेक शोध कार्य निरंतर किए जा रहे हैं।

डॉ. सत्यवीर - हिंदी के विकास में, मॉरिशस सरकार के प्रयासों पर प्रकाश डालिए।
सुश्री वत्सला - मॉरिशस सरकार शिक्षा के क्षेत्र में हर स्तर पर हिन्दी की पढ़ाई पर प्रोत्साहन देती हैं। हिन्दी नाटक और गान के भी अक्सर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हिंदी के विकास में सहकारी प्रयास तो निरंतर किये जा रहे हैं, साथ ही सरकारी प्रयास भी बराबर किये जा रहे हैं। यहाँ हिंदी का सम्मान हमारी संस्कृति, संस्कारों, रीति-रिवाजों के सम्मान की तरह हैं।

डॉ. सत्यवीर - आपकी अब तक प्रकाशित रचनाओं के नाम बताएं, जैसे कविता संकलन, कहानी आदि ...
सुश्री वत्सला - मेरे द्वारा लिखे कतिपय अंग्रेजी की कविता संग्रह When Solitude Speaks (Poetry Book) 2013, For Love I’llk Fight (Short) Story)  सेतु - बहुभाषी पत्रिका, The Golden Philosophy (Short Story) Different Truths Magazine, Embracing Freedom (Single Poem) Immagine and Poesia anthology)
हिन्दी की कविताएँ- मन, ओउम आदि - आर्योदय पत्रिका (मॉरिशस), वत्सला राधाकिसुन की दो कविताएँ - सेतु पत्रिका (भारत/पिट्सबर्ग)

डॉ. सत्यवीर - आप प्रबंधन में अध्ययन किया और आपका व्यवसाय भी उसी के अनुकूल है। फिर साहित्य में आपकी रुचि कैसे बनी, उन कारणों को बताएं।
सुश्री वत्सला - हिन्दी के शिक्षक होने के नाते मेरे माता-पिता को साहित्य में रुचि थी। तो घर पर सदा साहित्य का माहौल रहा। हमारे पारिवारिक मित्र लेखक, आलोचक और अन्य साहित्य संबंधी लोग रहे। हमारे परिवार में हम सभी साहित्य प्रेमी हैं।

डॉ. सत्यवीर - आप युवा काल से ही साहित्य सृजन में लीन हैं। आपको साहित्य लेखन में कोई परेशानी आई।
सुश्री वत्सला - युवा काल से ही साहित्य, संगीत मेरा प्रिय और रुचिकर क्षेत्र रहा है। भले ही मैंने प्रबंधन क्षेत्र में पढ़ाई की और उसी क्षेत्र में कार्य भी कर रही हूँ। मुझे साहित्य सृजन में कभी किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। कविता लिखना मेरे लिए बहुत आसान हैं।

डॉ. सत्यवीर - भाषा और साहित्य के संबंध में आपके विचार जानना चाहते हैं।
सुश्री वत्सला - भाषा भाव और विचारों को व्यक्त करने का माध्यम हैं। साहित्य हमें आदर्श इंसान बनाता है। मनुष्य इस से सदैव जुड़ा हुआ है और रहेगा। साहित्य हमारे जीवन का जरूरी अंग हैं। साहित्य ही है, जो मनुष्य को मानवीय गुणों से परिपूर्ण करता है। साहित्य हमें सदैव सद्मार्ग प्रदान करता है। भटकन और टूटन से बचाता है। एक उच्च आदर्श समाज के लिए साहित्य एवं साहित्यकारों का सदैव सम्मान होना चाहिए।

डॉ. सत्यवीर - आपके वंशज भारतीय मूल के हैं। क्या आपने उस यात्रा पर लिखने की सोची है?
सुश्री वत्सला - जी हाँ। मेरी एक कविता है। 'Voice of the Indian Labourer' यह कविता मॉरिशीयन हिंदुओं के पूर्वजों के लिए हैं। मेरी तमन्ना है कि मै अपने पूर्वजों की उस यात्रा पर बहुत बड़ा कार्य करूँ। यदा-कदा उस पर थोड़ा, बहुत कुछ लिख लेती हूँं। भारत और भारतवासियों पर मुझे बहुत गर्व हैं।

डॉ. सत्यवीर - आपकी भविष्य की योजनाएँ?
सुश्री वत्सला - जब तक ईश्‍वर की कृपा से प्रेरणा मिलेगी तब तक मैं कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास आदि लिखती रहूँगी। लेखन कार्य के द्वारा नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक सत्य को सामने लाने का प्रयास करूंगी। फिर जीवन में धीर-धीरे पूर्ण वैराग्य की ओर बढ़ना चाहती हूँ और एक उच्च कोटि के साधक का जीवन जीना चाहूँगी। इसके द्वारा मोक्ष या निर्वाण की तैयारी हो सकेगी और किसी जन्म के पश्‍चात् मोक्ष प्राप्ति हो जाएगी।