वत्सला राधाकिसुन की दो कवितायें

हे मानव


वत्सला राधाकिसुन 
जाति-पाति, ऊँच-नीच, भेद-भाव,
हे मानव!
तोड़ दो तुम ये बेड़ियाँ सारी,
अंधे, अहम्, अज्ञानी की

सुनलो तुम ब्रह्म की अनंत पुकार,
जुड़ जाओ तुम बेहिचक उसके साथ

मन में होगा सदा शीतलता का एहसास,
वाणी में करेगी सदैव मधुरता वास,
तन न रहेगा कभी विचलीत इन्द्रियों का दास
हे मानव!
रचयिता से जुड़कर
हो अटूट तुम्हारा आत्मबल,
हृदय में भर जाए प्रेमभाव निश्छल,
भाईचारे का सूत्र बन जाए प्रबल,
और दिव्य हो तुम्हारा जीवन हर पल।


पवित्र बालक

आर्य गुरुकुल में है
एक बालक प्यारा,
उसके कमल नैनों में
झलकती है दिव्यता,
जब वह मधुर स्वर में
करता है मंत्रोचारण,
तो निसंदेह वह लगता है
ब्रह्म की आँखों का तारा
शीश झुकाकर वह करता है
सभी आचार्यों  एवं  बड़ों
को प्रणाम,
हर जीव-जन्तु का भी वह करता है
संमान
न ज्यादा हँसता है,
न ज्यादा रोता है,
न ज्यादा बोलता है,
अंतरमुख होकर
अटलयोगियों जैसा
वह चिंतन करता है
उसके आचरण में है
न कोई छल-कपट,
न कोई उदंडता,
पवित्र है वह बालक,
गुरुकुल और समाज की
वह शान है।