यादों की गलियों से वादियों तक (यात्रा वृत्तांत)

- उषा छाबड़ा

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी कई वर्षों से सपरिवार कोलकाता जाने का कार्यक्रम बन रहा था किन्तु किन्हीं कारणों से संभव नहीं हो पा रहा था। बच्चे बड़े हो गए थे और मेरा बहुत मन था कि उन्हें मैं कोलकाता, अपने जन्मस्थान, जहाँ मैं पली, बड़ी हुई, जहां मैंने दसवीं तक पढाई की, वह स्थान उन्हें दिखाऊँ। वहाँ की गलियाँ जैसे मुझे बार-बार आमंत्रण दे रही थीं। वहाँ रहने वाले हमारे रिश्तेदार भी सप्रेम कई बार हमें वहाँ आने का न्योता दे चुके थे। सिर्फ कोलकाता से ही नहीं, असम के गुवाहाटी में रहने वाली मित्र एवं उसके परिवार वालों से भी यह बराबर आग्रह हो रहा था कि हम वहाँ भी अवश्य आएँ।

आखिरकार यह संभव हो ही गया। टिकटें करा ली गईं - कोलकाता, गुवाहाटी, शिलॉंग और चेरापूंजी की। यानि कि आठ दिनों में हम तीन राज्यों के शहरों से रूबरू होने वाले थे। कई तरह के कर्यक्रम बने और जी यह तय हो गया कि हम सब कोलकाता की ओर 4 जून को रवाना होंगे। मेरे साथ-साथ मेरे परिवार के सभी सदस्य बहुत उत्सुक थे। आजकल तो इंटरनेट का जमाना है और बुकिंग इत्यादि तो उसी से हो जाती है। हम सब की छुट्टियां शुरू हुईं और हम कपड़े अटैची में डालने एवं बाजार जाने में व्यस्त हो गए। हम सब का उत्साह तो बढ़ा ही हुआ था और आए दिन इंडिगो और गो एयर वालों के नोटिफिकेशन्स ने उसपर चार चाँद लगा दिए थे।

आखिर वह दिन आ गया और हम सब चल पड़े आनंद के शहर (सिटी ऑफ़ जॉय) कोलकाता की ओर। यहाँ हम ढाई दिन के लिए थे और हमें कई जगहें देखनी थीं। सभी रिश्तेदारों से भी मिलना था और बच्चों को यहाँ को यहाँ के खानपान और संस्कृति से भी रूबरू कराना था। हम यहाँ के प्रसिद्ध कालीघाट में काली माता के दर्शन के साथ-साथ बेलूरमठ, दक्षिणेश्वर, विक्टोरिया मेमोरियल, हावड़ा पुल, फूलवालों का बाज़ार, साइंस सिटी, मदर टेरेसा के निर्मल हृदय आदि स्थानों पर भी गए। बच्चों को यह शहर बहुत पसंद आया क्योंकि अभी भी यह शहर अपनी संस्कृति को समेटे हुए है। वहाँ पुरातन के साथ नवीन का मिश्रण बहुत ही लाजवाब है। शहर के लोगों का खान- पान, बोल-चाल, रहन-सहन बहुत ही सहज है। कृत्रिमता उसे छू नहीं पाई है। बच्चों से अधिक तो मैं खुश थी अपनी उन पुरानी गलियों, अपने आवासीय स्थानों, अपने विद्यालय, अपनी पुरानी सहेलियों आदि के बारे में बताने में! बच्चे मुझे कह रह थे कि मुझमें अधिक स्फूर्ति आ गई थी और थकान का तो कोई नामोनिशान ही नहीं था। मैं अत्यंत खुश थी, अपने नानी घर, अपने चाचाजी के घर, सभी अपनों से मिलकर। चूँकि मुझे बांग्ला (बंगाल की भाषा) का ज्ञान है इसलिए मैं बड़ी ही आसानी से आस-पास सब लोगों से बातचीत कर पा रही थी। एक अलग ही सुकून मिला था अपनों के बीच। हुगली नदी में जहाज से संध्या वेला में सैर करने का आनंद ही कुछ और था। बच्चों ने धीरे-धीरे चलती हुई ट्राम भी देखी, पीली एम्बेसडर टैक्सी के सफ़र का भी लुत्फ़ उठाया। गर्मी के कारण पसीने छूट रहे थे लेकिन कुल मिला कर ये ढाई दिन बहुत ही आत्मसंतुष्टि से भरे दिन रहे। 23 बाद वहाँ जाने का एक अलग अनुभव था।

अब हमारा अगला पड़ाव गुवाहाटी था। हमारी उड़ान छोटी ही थी और हम पहुँच गए गुवाहाटी। यह शहर हम वापसी में देखना चाहते थे क्योंकि मेरे मित्रजन शनिवार और रविवार के दिन हम सब के साथ पूरी तरह बिताना चाहते थे। अतः हमने रात को होटल में आराम किया और सुबह रवाना हुए शिलॉंग की ओर। शिलॉंग मेघालय की राजधानी है। मेघालय यानि मेघों का घर। गुवाहाटी से शिलॉंग का सफर लाजवाब था। सड़क बहुत ही अच्छी थी, मौसम भी सुहाना था और हम सब साथ थे। सड़क के दोनों ओर प्रकृति के सूंदर नज़ारे हमें लुभा रहे थे। डेढ़ घंटे के बाद आया उमियम लेक। बस हम सब उतर गए और चले उसी ओर। बहुत ही शांत और सुंदर जगह, निर्मल, स्वच्छ जल चारों ओर, और साथ ही शांति। पीछे ऊँचे पहाड़ और हम सब झील के किनारे बैठकर प्रकृति की छटा निहार रहे थे। मेरा छोटा बेटा तो उस झील की सुंदरता को कैमरे में कैद करने की बेतहाशा कोशिश कर रह था। हम वहाँ लगभग दो घंटे बैठे। दिल्ली जैसे  भीड़-भाड़ वाले शहर की भागम-भाग से दूर यह सूंदर झील कितना सुखद अहसास दे रही थी। हम सबने खूब जी भरकर इस सुंदर स्थान की तसवीरें लीं, वहां मोटरबोट में बैठे। वहाँ से उठकर चलने का मन नहीं कर रहा था, फिर यही सोच कर मन बनाया कि वापसी में अवश्य ही एक बार फिर यहाँ आएँगे। अब हम आधे घंटे में शिलॉंग पहुँच गए। होटल में सामान रखा और निकल पड़े शहर देखने। यह शहर पहाड़ी पर बसा है अतः सड़क ऊपर-नीचे है, कभी हम कभी धीरे-धीरे ऊँचाई पर चढ़ रहे थे तो कभी ढलान पर थे। पुलिस बाजार वहाँ का प्रमुख बाज़ार है, जहाँ बहुत ही भीड़ रहती है। मौसम अच्छा था। पैदल घूमने में आनंद आ रहा था, लेकिन भीड़-भाड़ काफी थी। वाहन द्वारा एक जगह से दूसरी जगह जाना मुश्किल था। सडकों पर भारी जाम था। वहीं देखा कि वहाँ की खासी महिलाएँ काफी स्फूर्ति से इधर-उधर जा रहीं थीं। शायद पहाड़ों पर उतरते -चढ़ते रहने से इन मोटापा नहीं चढ़ता। खासी महिलाओं ने पारम्परिक वेशभूषा जैनसम पहनी थी जो कि देखने में साड़ी से थोड़ी भिन्न है परन्तु बहुत सुन्दर दिखती है। हमने वहाँ पहाड़ी पर एक अच्छे होटल में भोजन किया। वहाँ पोर्क यानि सूअर के मांस का काफी प्रचलन है।

अगले दिन हम चेरापूंजी की ओर निकल पड़े। चेरापूंजी एक समय सबसे ज्यादा वृष्टि के लिए जाना जाता था। चेरापूंजी का रास्ता वर्णनातीत है। ठंडी, सुहावनी हवा के झोंके और साथ ही दोनों ओर पहाड़ों के सुंदर नज़ारे! एक भी क्षण के लिए आँखों को विराम न देने की जैसी स्थिति थी। बार-बार गाड़ी रुकवा कर दृश्य को कैमरे में कैद कर लेने को आतुर मन! कितनी हरियाली है वहाँ, एक सुखद अहसास कि अभी भी यह स्थान हम लोगों की पहुँच से दूर है, तभी हम इसका आनंद उठा पा रहे हैं! यहाँ के पहाड़ों पर बहुत ऊँचे पेड़ नहीं हैं पर पहाड़ों में खूब हरियाली दिखती है। लेकिन अब स्थिति बिगड़ रही है। प्रकृति कितना देती है, हम अपने ही लालच के कारण अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने पर उतारू हैं। कई स्थानों पर कटे हुए पहाड़ भी दिखे, परन्तु कुल मिलकर बेहद ही दर्शनीय स्थल। थोड़ी थोड़ी दूर पर ही झरने बहते दिखाई देते हैं, सात बहनों वाला झरना (Seven Sisters falls) एवं नोहकलिकाई झरना (Nohkalikai falls) बहुत ही सुंदर नज़ारा प्रस्तुत करते हैं। ठंडी हवा और अचानक से बादलों का नीचे आ जाना, अपने आप में एक अहसास है। दो मिनट पहले तक जो झरने साफ़ दिखाई दे रहे थे, वे पलक झपकते ही बादलों की आगोश में थे। कितना अद्भुत है सब कुछ!

कुछ नीचे आने पर हम गए वहाँ की मौसमाई (Mawsmai) गुफाओं में जो कि चूना पत्थर (limestone) से बनी थीं। थोड़ा अंदर जाते ही अँधेरा था, स्टैलैक्टाइट्स और स्टैलैग्माइट्स गुफाएँ विभिन्न प्रकार के बड़े -बड़े पत्थरों से बनी हुई थीं। प्राकृतिक गुफाएँ देखकर हम रोमांच से भर उठे थे। पैरों में जल स्पर्श कर रहा था, कई जगह गुफा बहुत संकरी भी थीं। फिर हम धीरे-धीरे बढ़ते हुए बाहर निकल आये। ऐसा लग रहा था मानो ये गुफाएँ कह रही हों कि जीवन में भी इसी तरह उतार-चढ़ाव आते हैं, विभिन्न प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं और फिर उन्हें पार करते हुए हम अपनी मंज़िल पर पहुँच ही जाते हैं।


वापसी करते हुए यहाँ की एलीफैंट फाल्स देखने के लिए जैसे ही उतरे, बहुत तेज़ बारिश होने लगी। दूर से ही झरने की बहुत तेज़ आवाज़ आ रही थी अतः बारिश में गाड़ी से उतर कर झरना देखने का निर्णय लिया। गनीमत थी कि वहाँ छतरियाँ किराए पर मिल रही थीं। छतरियाँ पकड़े हमने बरसात में इस झरने का आनंद लिया और यह सोचते हुए वापिस चल दिए कि पता नहीं क्यों झरने, झील, नदी मनुष्य को क्यों इतना आकर्षित करते हैं!


अब अगले दिन बारी थी शिलौंग देखने की। बादल गरज रहे थे। जैसे ही हम चर्च (Cathedral Catholic Church) की ओर बढ़े बारिश की कुछ बूँदें टपकने लगीं। हम अंदर चले गए। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी इसलिए वहाँ काफी देर तक बैठना पड़ा। चर्च के अंदर बिलकुल शांति थी। बहुत बड़ा चर्च था, बहुत ही सुंदर। वहाँ रखी बाइबल भी पढ़ी और उसमें भी वही पाया जो हमारे धर्मग्रंथों का भी सार है, मनुष्य से प्रेम करो, सबको बराबर समझो!


बारिश अब हलकी हो चली थी और हमने टैक्सी कर ली। वाहन से हम तितलियों के संग्रहालय पहुँचे। एक ही बड़े से कमरे में इतनी सारी सुंदर एवं रंगबिरंगी तितलियों का अनूठा संग्रह किया गया था। छोटी -छोटी तितलियों से लेकर एक से एक विशालकाय तितलियाँ! इन्हें संजो कर रखने में कड़ी मेहनत की गयी थी। वाकई आने वाली पीढ़ी इससे अवश्य लाभान्वित होगी। बारिश बीच - बीच में रूक रही थी। अब हम बढ़ चले मेघालय संग्रहालय की ओर जहाँ वहां की सांस्कृतिक विरासत को सुंदर ढंग से पेश किया गया था। वहाँ की पोशाक, वहाँ का रहन -सहन, वहाँ के वाद्ययंत्र, वहाँ के व्यवसाय, वहाँ के त्यौहार आदि का सुंदर चित्रण था। मेघालय के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा। बाद में हम हैदरी पार्क देखने गए, अभी इस सुंदर पार्क में थोड़ा ही घूमे थे कि तेज़ बारिश होने लगी, हम दौड़ते हुए बाहर आ गए। यह पार्क थोड़े समय के लिए ही देखा लेकिन वहाँ की सुंदरता मन में छाप छोड़ गयी। तैरते हुए हंस एवं सरोवर में खिले लाल कमलों की बात ही कुछ और थी।

समय कम बचा था और अब हमें गुवाहाटी लौटना था। हम वापसी कर रहे थे। खुशनुमा मौसम था। बारिश अभी भी हो रही थी। शिलौंग छोड़ते हुए यह बात मन को अवश्य भा रही थी कि प्रकृति ने क्या क्या छटा बिखेर रखी है और उसका खजाना अथाह है, कभी न ख़त्म होने वाला। आवश्यकता है इसे बनाए रखने की, इसे संजोय रखने की। रास्ते में उमियम झील फिर आई और हमने अपनी गाड़ी रोक दी। हम सब उतर गए फिर उस नज़ारे को देखने। बारिश के कारण उसमें अधिक पानी हो गया था और वह बहुत ही खूबसूरत दिख रही थी। वहां खासी जाति के लोग मिर्च के पकौड़े, पत्तागोभी के पकौड़े, मैगी, खट्टे फल आदि बेच रहे थे. बारिश में गर्म पकौड़ों को खाते हुए उमियम झील को देखना बहुत ही अलग था। अब हम फिर चल पड़े, अपने अंतिम पड़ाव की ओर, गुवाहाटी!

शाम के लगभग सात बज रहे थे और फिर भी इतना सफर करने के बाद भी थकावट का अहसास नहीं था क्योंकि मन में उत्सुकता थी, उस मित्र को मिलने की, उसके परिवार को मिलने की, 27 वर्षों बाद फिर से उस शहर को देखने की जहाँ मैंने अपने जिंदगी के सुंदर पांच वर्ष बिताए थे। हमारे स्वागत को तैयार खड़ी थी मेरी मित्र और उसका परिवार। कितना अलग लग रह था यह क्षण। विश्वास ही नहीं हो रहा था! हम सबके चेहरे ख़ुशी से भर उठे थे। इतने वर्षों बाद भी जैसे कि हमारे रिश्ते वैसे ही थे। सब मिल बैठ कर बातें करने लगे। जाने कितनी बातें मन में हम सब समेटे हुए थे।

अगले दिन हम सब पबितोरा वन्य जीव अभ्यारण्य की ओर चले। हालांकि इस मौसम में यह बंद रहता है फिर भी हम सब खुशकिस्मत थे थे कि हम एक सींग वाले गेंडे देख पाए जिसके लिए असम प्रसिद्ध है। कुछ अन्य पशु भी वहाँ थे लेकिन अधिक नहीं। वापसी में हम ब्रह्मपुत्र नदी की और बढ़े। वहाँ जहाज़ द्वारा नदी की सैर की। साथ साथ कुछ गायक भी जहाज़ पर गीत गा रहे थे। शाम हो रही थी, सूरज ढल रहा है, मित्रगण थे और एक से एक सुरीले गीत! बस आनंद का माहौल था। अगले दिन सुबह हम अपने पुराने कॉलेज देखने चला दिए, जहाँ मैंने दसवीं के बाद पढ़ाई की थी - हैंडिक गर्ल्स कॉलेज एवं कॉटन कॉलेज। दोनों पास -पास ही थे। वहाँ कदम रहते ही पुराने दिन याद आ गए। पुरानी यादें, कहाँ हमारी कक्षा लगती थी, कहाँ बैठकर हम खूब बातें किया करते थे। अब तो कई चीजें बदल भी गई थीं लेकिन अच्छा महसूस हो रहा था अपनी कक्षाओं को देखकर, कैसे इन कक्षाओं ने मेरे व्यक्तित्व को आकार दिया, कैसे मैंने यहाँ पढाई की। बहुत ही संतुष्टि का आभास। फिर हम उस इलाके की ओर गए जहाँ मेरा घर था। हम वहाँ किराए के मकान में रहते थे। इस इलाके में पहुँचकर मकान खोजना मुश्किल हो रहा था। कई नई दुकानें और इमारतें बन गई थीं। गुवाहाटी में बिताए वे पाँच वर्ष जाने कैसे यादों से निकलकर वहाँ सामने दिखाई दे रहे थे। आख़िरकार घर पहचान में आ ही गया। वहाँ हमारी मकान मालकिन की बिटिया से मुलाकात हुई जिनसे मैं घंटों बातें किया करती थी। मुझे देखकर वह बहुत प्रसन्न हुईं। पहले तो पहचान नहीं पाईं और जब पहचाना तो बातों का सिलसिला ही चल पड़ा। एक अजीब अहसास था। इतने वर्षों बाद उस घर में जाना।

हमारे पास समय कम था। अब हम होटल पहुँचकर उड़ान की तैयारी में जुट गए। हम सब ने उनसे विदा ली, यही कहकर अब जल्द ही अवश्य मिलेंगे। अब हम अपने सफर का अंत कर रहे थे। उड़ान का समय हो चला था। हमारे मित्र हमें हवाईअड्डे पर छोड़ने भी आये थे। वहाँ जाने पर उनसे एक अलग ही रिश्ता बन गया था। वह असमिया परिवार है ले किन मित्रता कब भाषायी बंधनों में बंध पाई है। ये रिश्ते अटूट होते हैं और ताउम्र उनकी बातें होती रहती हैं।

हवाईजहाज़ ने उड़ान भरी दिल्ली की ओर, और मैं खिड़की से बाहर झाँक रही थी, आँखों में नमी थी और बाहर बादल भी बूँदें बरसा रहे थे।

2 comments :

  1. सुन्दर और सजीव वर्णन मैं फिर से पूर्वोत्तर प्रवास मे खो गई

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  2. आपका हार्दिक धन्यवाद , बीना जी।

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