भारतीय नवजागरण एवं स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में संघर्षशील महिलाएँ

- डॉ. आरती स्मित


आरती स्मित
हमारा देश भारत आज़ादी के 68 वर्ष पूरे कर चुका। बहुत कुछ बदला इन दिनों, किंतु क्या इस बदलाव की उम्मीद लिए लाखों नर- नारी और अबोध किंतु सचेत बाल मंडली चेतना का शंख फूँक रहे थे? आज स्वतंत्रता का मूल्य और उसके मायने बदल गए हैं। आज़ादी काँच की प्लेट में पड़ी बासी रोटी की तरह हो गई, जिसे पानी में डुबोकर गरीब जनता चुभला-चुभलाकर खा रही है। सामाजिक और राष्ट्रीय क्रांति में आहूत जनमानस की आत्माएँ आज चीत्कार कर रही हैं। उनके त्याग और बलिदान का क्या यही श्रेय दे रहे हैं कि हमें उनके नाम तक मालूम नहीं! कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व को छोड़कर सब अतीत के धुंधलके में खो गए। इतिहास ने उन्हें याद रखने की जहमत नहीं उठाई, ना ही आज़ाद भारत के पुरोधाओं ने उनकी खबर ली। विशेषकर वे आत्मबली सशक्त स्त्रियाँ, जिन्होंने ना केवल खुद को, वरन् अपनी संतानों और पतियों को भी इस वेदी में झोंक दिया। क्या था उनका सपना? क्या सोचा होगा उन्होंने कि आज़ाद भारत का सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षिक स्वरूप इतना विद्रूप और आंतरिक जटिलताओं से भरा होगा? शायद नहीं! सोचने की ना ज़रूरत थी ना क्षमता, ना प्रसिद्धि और ऐश्वर्य की भूख! बस पिल पड़ीं अन्याय के खिलाफ़! बन गईं जलती मशाल!

आदिम सभ्यता की ओर ना जाते हुए और ना ही स्त्री की वैयक्तिक मुक्ति की बात करती हुई, मैं सीधे -सीधे हमारे देश की उन महानायिकाओं की ओर पुन: ध्यानाकर्षित करना चाहती हूँ, जिन्होंने देश और समाज में चेतना जगाने के लिए स्वयं को वाणी और प्रज्ज्वलित मशाल बनाया। ऐसी नेत्रियों और सेनानियों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है, सबका उल्लेख संभव नहीं, फिर भी श्रद्धांजलिस्वरूप एक छोटी सी कोशिश कर रही हूँ, उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकटकर।

बात 1857 के युद्ध से शुरू करूँ तो सर्वप्रथम झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और उनकी स्त्री सेना के शौर्य की बात आती है ; उनकी हमशक्ल झलकारी बाई की बात आती है, जिसने रानी के कपड़े पहनकर अंग्रेज़ों को चकमा दिया और रानी को क़िले से बाहर सुरक्षित जाने का अवसर दिया और स्वयं खेत रही। वीर हवलदार गुरुबख्श सिंह की दिलेरी और स्वामिभक्ति ने लक्ष्मीबाई के हाथ में फिर से झाँसी की बागडोर दी। और अपनी अपूर्व सैन्य- संगठन -शक्ति, गोसे खाँ एवं अन्य सहायक राजाओं का साथ पाकर रानी अंतिम साँस तक लड़ती रहीं और अंतत: वीरगति को प्राप्त हुईं।

मध्यकाल से जागरणकाल तक का इतिहास इस बात का साक्षी है कि राज्य की, देश की स्वतंत्रता का प्रश्न जब- जब उठा, स्त्री अस्मिता जब- जब चुनौतियों से घिरी, स्त्री पुरूष के साथ मिलकर तो कभी उनकी अनुपस्थिति में स्वयं अपने सिर यह ज़िम्मेदारी लेकर शत्रुओं को ललकारने से भी पीछे नहीं हटीं। रानी दुर्गावती, माता जीजाबाई, पन्ना धाई, वीरमती, देवलदेवी, पद्मिनी, रानी भवानी, ताराबाई, हाड़ी रानी व अन्यान्य ना जाने कितने ऐसे नाम हैं, जिन्होंने देश की और अस्मिता की रक्षा के लिए अपने-आपको मिटा दिया।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महिला नेत्रियों में रानी लक्ष्मीबाई, बेग़म हज़रत महल, रानी तपस्विनी, रानी तुलसीपुर, रानी रामगढ़, नृत्यांगना अजीजन, ज़ीनतमहल, नाना की पालिता पुत्री मैना, जिसे अंग्रेज़ों ने ज़िंदा जला दिया था, फिरोजशाह की पत्नी जमानी बेग़म एवं अन्यान्य इतिहास के पन्नों से बेदखल गुमनाम स्त्रियों ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा बुलंद किया। वे जीवन के अंतिम पल तक संघर्षरत रहीं, शहीद हुईं, देश से बाहर निर्वासित जीवन जीने का निर्णय लिया, लेकिन झुकी नहीं; अंग्रेज़ों के समक्ष घुटने नहीं टेके।

1857 के इस बड़े संगठित विद्रोह के पूर्व भी जगह- जगह विदेशी शासकों के साथ जो युद्ध ठने, उनमें देवी चौधरानी, रानी शिरोमणि, कित्तूर की रानी चेनम्मा जैसी वीरांगनाएँ और उनका शौर्य व युद्ध-कौशल भी इतिहास की धरोहर है। इससे पूर्व 1781-82 में महेशपुर राज की रानी सर्वेश्वरी देवी ने पहाड़िया जनजाति को संगठित कर अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया था। अंग्रेज़ों ने इन मूलनिवासियों में फूट डालने के लिए पहले 'ज़मीन तुम्हारी मालिक तुम' की तर्ज़ पर ज़मीन का कुछ हिस्सा बतौर तोहफा देने का प्रपंच रचा, जो मान गए वे ठीक रहे, जो रानी के साथ एकजुट हो रहे, उन्हें मरवा दिया गया, रानी भी नज़रबंद कर दी गईं। लंबे समय तक इस नज़रबंदी में रहते हुए भी वे पहाड़िया सरदारों की क्रांति की प्रेरणा-स्रोत बनी रहीं। इसीप्रकार रानी चेनम्मा की स्मृति में आज भी दक्षिण में 23 अक्तूबर का दिन 'महिला दिवस' के रूप में मनाया जाता है।

बीसवीं सदी ने उन्नीसवीं सदी की लौ को धरोहर के रूप में अपनाया और क्रांति की ज्योत प्रदीप्त रही। कस्तूरबा गाँधी का साथ ना होता तो मोहनदास महात्मा गाँधी ना होते। उन्होंने हमेशा पति का मार्ग सुगम किया। 1904 ई. में गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में एक आश्रम खोला और कस्तूरबा ने स्वयं को आश्रमवासियों की सेवा में समर्पित कर दिया। दक्षिण अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्षरत गाँधीजी का साथ देती हुई वे भी जेल गईं। 1906 ई. में पति के साथ उन्होंने भी ब्रह्मचर्य और आजीवन देशसेवा का व्रत लिया। 1915 ई. में अहमदाबाद में स्थित आश्रम में आए हरिजन परिवार को पहले तो उन्होंने अस्वीकारा, किंतु बाद में ना सिर्फ अपनाया,बल्कि लक्ष्मी नामक हरिजन बालिका को दत्तक पुत्री के रूप में स्वीकारा। चंपारण की पदयात्रा से लेकर सत्याग्रह आंदोलन की ज्वाला उद्दीप्त रखने हेतु घूम-घूमकर भारतवासियों को जगाने और जेल की कष्टप्रद यातना सहती हुई देश पर न्योछावर हो अमर हो गईं।

भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने अपनी अंग्रेज़ी कविता से अंग्रेज़ों को अपनी अंग्रेज़ी कविता से अंग्रेज़ों को चमत्कृत कर दिया। विदेशों में अपनी रचनाओं के कारण प्रसिद्धि-प्राप्त सरोजिनी स्वदेश लौटने पर यहाँ की दुर्दशा देखकर ऐसी विचलित हुईं कि काव्यक्षेत्र से राजनीति और समाजसेवा में समर्पित हो गईं। देशवासियों की निरक्षरता ही उनकी बदतर स्थिति का मूल कारण है, यह उन्होंने समझ लिया था, फिर शुरू हुआ ब्रिटिश सत्ता पर उनका आघात-प्रतिघात। 1920 ई. में पहली जेल-यात्रा हुई। सुशिक्षित एवं चैतन्य सरोजिनी 1925 ई. में भारतीय कांग्रेस की अध्यक्षा चुनी गईं। वे 'भारतीय महिला कांग्रेस की भी अध्यक्षा हुईं। सत्याग्रह आंदोलन में गाँधीजी एवं अन्य प्रमुख नेताओं के जेल जाने पर उन्होंने आंदोलन की बागडोर संभाली, नेतृत्व का दायित्व लिया, जेल गईं ; 'राउंड टेबल कान्फ्रेंस' में भाग लेने के लिए महात्मा गाँधी के साथ लंदन गईं। वहाँ से यूरोप,अमरीका,अफ्रीका आदि अनेक देशों की यात्रा करती हुई ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की। स्वदेश लौटने पर रोलेक्ट तथा आर्म्स एक्ट का विरोध किया।आज़ादी के पश्चात् उत्तरप्रदेश की राज्यपाल बनीं। इस पद का भार उठानेवाली वो देश की प्रथम महिला थीं। हालाँकि लंबे संघर्ष ने उनके हिस्से सुकून के पल बहुत कम दिए और साँसों ने साथ छोड़ दिया किंतु वे आज भी हमारे गौरव का प्रतीक बनी हमारे अंतस में जीवित हैं।
उन्नीसवीं सदी राष्ट्रीय आंदोलन का ही नहीं, सामाजिक एवं शैक्षिक आंदोलनों से भरा इतिहास सुनाती है और हमें झकझोरती है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हम अचेतना में क्यों जी रहे हैं? रमाबाई रानाडे पति महादेव गोविंद रानाडे को शिक्षक के रूप में पाकर धन्य हो गई। उस संकीर्ण रूढ़िग्रस्त पारिवारिक एवं सामाजिक वातावरण में वे थकी -रुकी नहीं। न केवल मराठी, वरन् अंग्रेज़ी में भी विद्वता का प्रमाण उन्होंने बंबई के तत्कालीन गवर्नर के समक्ष अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह भाषण देकर दिया, जिसमें उन्होंने भारतीय लड़कियों के लिए विद्यालय खोलने का प्रस्ताव रखा। हैजे से मृत्यु को प्राप्त पति की जीवनगाथा अपने एकांतवास के दौरान लिखी जो मराठी में प्रकाशित हुई। पति के विचारों को मूर्त रूप देने के लिए वे समाज में व्याप्त प्रत्यक्ष-परोक्ष समस्याओं से जुड़ीं ; विधवाओं को उनकी दुर्दयनीय दशा से उबारने के लिए नर्सिंग ट्रेनिंग सेंटर खोले, बाद में सेवा सदन की स्थापना की। यहाँ महिलाएँ हर तरह से प्रशिक्षित की जातीं। धीरे- धीरे इस सदन की शाखाएँ फैलती गईं। यहाँ से कई पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ हुआ। पुस्तकालयों की स्थापना की गई। स्त्री-शिक्षा का प्रचार-प्रसार बढ़ा। स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्षत: शामिल ना होकर भी वे जुड़ी रहीं। महिला क़ैदियों से जेल जाकर मिलना, उन्हें तसल्ली देना उनके काम का एक अंग था। 1925 ई. में यह नेत्री भी विदा हो गई।

बलिदानियों की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण नाम है कमला नेहरू का। स्वतंत्रता संग्राम में पति जवाहरलाल के साथ कदम-दर-कदम चलनेवाली कमला ने विदेशी वस्त्रों को त्याग ना केवल खद्दर धारण किया, वरन् दुकानों पर जा-जाकर पिकेटिंग की, विदेशी सामानों की होली जलाई, महिलाओं का संगठन बनाया और कांग्रेस को मजबूती दी। गाँवों में घूम-घूमकर देशवासियों में देशभक्ति की अलख जगाई; प्रमुख नेताओं के जेल जाने पर उनके अधूरे काम को पूरा करने का दायित्व लेतीं, सभाएँ आयोजित करतीं और सरकार के प्रति विद्रोह के स्वर बुलंद करतीं। हालाँकि इस संघर्ष ने उन्हें तपेदिक की स्थिति में डाल दिया, जिसके कारण जेनेवा के सेनीटोरियम में उन्हें दो वर्ष रहना पड़ा, किंतु स्वदेश लौटते ही फिर सक्रिय हो गईं। सत्याग्रह चालू रखतीं हुई जेल गईं। भाषण देना, स्वयंसेवक संगठित करना, आंदोलन को प्रखर बनाए रखना उनके प्रमुख काम थे। श्रीलंका से वापसी के बाद जो अस्वस्थ हुईं, फिर उठ ना सकीं, लेकिन मरते दम तक ब्रिटिश सरकार की शर्तों पर पति जवाहर से मिलना स्वीकार नहीं किया और देह छोड़ दिया।

संयुक्त राष्ट्रसंघ की प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का गौरव भारतीय महिला स्वतंत्रता सेनानी विजयलक्ष्मी ने पाया। वे विश्व की पहली महिला हुईं जिन्होंने इस सम्मान को प्राप्त किया। 9 अप्रैल 1916 को रोलेट-एक्ट के विरोध में ज़बर्दस्त सत्याग्रह छिड़ा। इस सत्याग्रह में परिवार के साथ विजयलक्ष्मी ने भी खद्दर धारण किया। विवाह के पश्चात् नमक सत्याग्रह और स्वदेशी आंदोलन की गूँज ने उन्हें मैदान में उतारा। उन्होंने महिला संगठन बनाया और अपने दल के साथ मिलकर विदेशी सामानों की होली जलाई। मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के बाद वे गिरफ़्तार कर ली गईं और एक वर्ष की कड़ी सज़ा भुगतती रहीं। लखनऊ जेल से वापसी के बाद सन् 1935 ई. में कॉँग्रेस ने इलाहाबाद म्युनिसिपल बोर्ड के चुनाव में उन्हें खड़ा किया, जहाँ विजयी होने के उपरांत उन्होंने बड़े काम किए। उत्तरप्रदेश में स्वशासन की व्यवस्था होने पर प्रांत के निर्वाचित मुख्यमंत्री श्री गोविंद वल्लभ पंत ने उन्हें स्वास्थ्य मंत्री पद के लिए चुना और उन्होंने यह दायित्व सहर्ष स्वीकारा। इससे पहले भारत में किसी महिला को ऐसा दायित्व नहीं सौंपा गया था। लंदन में भी इस निर्णय पर आश्चर्य प्रकट किया गया। 3 सितंबर 1939 ई. में विश्वयुद्धकाल में ब्रिटिश वायसराय द्वारा भारत को युद्धरत देश घोषित करने के विरोध में कॉँग्रेस के अन्य नेताओ सहित विजयालक्ष्मी ने अपना त्यागपत्र दे दिया। इसी समय वे अखिल भारतीय महिला संघ की अध्यक्ष चुनी गईं। सन् 1942 में 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' के बुलंद नारों के बीच 10 माह का जेल-प्रवास किया। 1944 में पति की मृत्यु से शोक संतप्त होती हुई भी वे कर्तव्य-पथ से डिगी नहीं। अकाल के समय कलकत्ता जाकर पीड़ितों की सेवा की, अमरीका में, संयुक्त राष्ट्रसंघ की बैठक में अपने व्याख्यान द्वारा भारत की दशा की ओर सबका ध्यान खींचा।

इन्हीं दिनों इंगलैंड के चुनाव में लेबर पार्टी जीती। उसके नेता श्री एटली ने कॉँग्रेस पार्टी को अस्थायी सरकार गठित करने को कहा। 23 अक्तूबर 1946 में वे न्यूयॉर्क में होनेवाली संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल बैठक में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में गईं। जुलाई 1947 में वे भारत की राजदूत बनाकर रूस भेजी गईं। आज़ादी के बाद देश ने इन्हें राज्यसभा की शोभा बनाया और इनकी कर्मठता ने विश्व के समक्ष इन्हें निरंतर भारत का प्रतिनिधि बनाकर प्रस्तुत किया।फिर 15 सितंबर 1953 का वह शुभ दिन आया जब इस विदुषी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अध्यक्ष पद पर आसीन होकर भारतीय महिलाओं को उनकी सबलता व गरिमा का एहसास कराया। जबतक साँस रही, वे देश के विकास के लिए कर्मरत रहीं।

विदेश से शिक्षा प्राप्त कर लौटी राजकुमारी अमृत कौर महात्मा गाँधी के संपर्क में आने के उपरांत स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुईं। वेशभूषा के साथ ही विदेश से आगत मानसिकता को भी त्यागा और आजीवन गाँधीजी के बताए मार्ग पर चलने की कोशिश करती रहीं। बापू की निजी सचिव रहीं और देश-भ्रमण कर भारतीय महिलाओं की तात्कालिक सामाजिक स्थिति से आहत हो उठीं। तब लॉर्ड लोथीयन जाँच कमेटी के समक्ष स्त्री शिक्षा की अनिवार्यता को लेकर भारतीय महिलाओं की वकालत की।स्वदेश आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने घूम-घूमकर चरखे का प्रचार किया। 1942 ई. में अस्थायी सरकार गठित होने पर स्वास्थ्य बोर्ड की सदस्य हुईं, किंतु सरकार की दमन नीति के विरुद्ध अन्य प्रमुख साथियों के साथ त्यागपत्र दे दिया। स्वतंत्र भारत में स्वास्थ्य सचिव चयनित होने पर इस क्षेत्र में उन्होंने बहुत काम किए। पेरिस में विश्व स्वास्थ्य संगठन की अध्यक्ष चुने जाने पर उन्होंने सभी देशों का ध्यान स्वदेश की गरीबी की ओर खींचा क्योंकि देशवासियों के लिए भरपेट भोजन के बिना दवा की बात उनके लिए बेमानी थी। वे आजीवन देश और समाज के उत्थान के लिए कर्मरत रहीं।

उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री और देश की पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी ने अपने उग्र विचारों और कट्टर सिद्धांतों के कारण राजनीति के क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी। सन् 1934 में भूकंप-पीड़ितों की सेवा के लिए कॉग्रेस की स्वयंसेविका के रूप में बिहार आईं। यहीं उनकी मुलाक़ात और मित्रता आचार्य कृपलानी से हुई जो आगे चलकर वैवाहिक संबंध में परिणत हुआ। सन् 1936 में अखिल भारतीय कॉँग्रेस कमेटी की महिला विभाग की मंत्री चुनी गईं। वे गाँधीजी की निकटस्थ थीं और उनके विचारों से प्रभावित भी। आंदोलन में सक्रियता और जेलयातना के बावजूद उनमें अपूर्व संगठन -शक्ति थी, जिसके बल पर उन्होंने सदैव सफल नेतृत्व किया और समाज को नई दिशा दी।

यशोधर्मा दासप्पा मैसूर राज्य की प्रथम महिला थीं जो मंत्रिमंडल की सदस्या बनीं। स्वतंत्रता संग्राम में खुलकर हिस्सा लिया। सन् 1942 के आंदोलन में स्वयंसेविकाओं का दल बनाया और आंदोलन को गति दी। लंबे समय तक बार-बार, कई बार जेल की कड़ी यातना सही। बापू के आमंत्रण पर आश्रम आकर कुछ दिन रहीं और बहुत कुछ सीखा। वे हरिजनों के हितार्थ लड़ती रहीं; स्वयंप्रभा नामक हरिजन बच्ची को गोद लिया और पाला। माँ कस्तूरबा की मृत्यु के उपरांत उनके नाम पर ट्रस्ट, अस्पताल, विश्वविद्यालय खुलवाया। सन् 1956 में मैसूर राज्य कॉँग्रेस कमेटी की अध्यक्ष बनीं। गाँव-गाँव जाकर लोगों की पीड़ा सुनी और उबारने का काम किया। वे मसूर राज्य के समाज कल्याण बोर्ड की सदस्या रहीं और 'भारत सेवक समाज' का गठन किया।

बापू के आह्वान का असर ऐसा रहा कि भारतीय महिलाएँ सामूहिक रूप में सीधे-सीधे स्वतंत्रता संग्राम में उतरीं। बंबई में सैंकड़ों स्त्रियाँ नमक कानून तोड़ने के लिए समुद्र-तट पर पहुँच गईं। प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के पश्चात् सरोजिनी नायडू, कमलदेवी चट्टोपाध्याय, कमला नेहरू, विजयालक्ष्मी प्रभृत नेत्रियों का बल बनकर हजारों स्त्रियाँ उनके साथ खड़ी हो गईं। उन्होंने गुप्तचर का काम किया, ग़ैर कानूनी साहित्य वितरित किया, वन सत्याग्रह में भागीदारी दी, शराब और विदेशी वस्तुओं का ना सिर्फ वहिष्कार किया, वरन् पिकेटिंग कर ऐसी दुकानें बंद करवाने में सफल हुईं। घर का रसोईकक्ष गुप्त साहित्य का भंडार बना। वे जेल गईं, लाठियाँ खाईं; बच्चों को बेसहारा छोड़ दिया। कहीं-कहीं समूचा परिवार जेल में बंद कर दिया गया, इनमें प्रसूत माताएँ और गर्भवती स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उनकी निर्भीकता का प्रमाण यह रहा कि वे ब्रिटिश अदालत के जज के पास भी नमक बेचने पहुँच गईं। बाल व किशोरमंडलियों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। 12 वर्षीया इंदिरा ने छह हज़ार बच्चों की वानर सेना का नेतृत्व किया था पूरे देश में स्त्रियों व बच्चों के संगठनों के द्वारा सिद्ध कार्यों ने एक बार ब्रिटिश सरकार को हिला दिया। 1930 के आंदोलन में लगभग 17000 स्त्रियाँ जेल गईं। जेल में तिल भर भी जगह ना बचने पर उन्हें गिरफ़्तार कर बाहर जंगलों में छोड़ दिया गया।नृशंस तरीके अपनाए गए, असह्य तकलीफ़ें दी गईं किंतु इन अशिक्षित आम महिलाओं ने अपने विशिष्ट आत्मबल का परिचय दिया। अंग्रेज़ विस्मित थे। महात्मा गाँधी ने लिखा था-- 'भारतीय नारियों का यह साहसिक कार्य इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा। '

श्रीमती कमला चटोपाध्याय ने एक स्थान पर लिखा है --- "जेलों में केवल तीन मास से छोटे बच्चों को माताओं के साथ जेल में रहने दिया जाता था। टैक्स ना अदा करनेवाले क्षेत्रों की महिलाओं को इसकी भी इजाज़त नहीं थी, इसलिए बच्चे घर पर ही अनाथ छोड़ने पड़े। इन बच्चों को मदद देने वाले भी राजद्रोही माने गए।" पुरुषों की भागीदारी ने घर का आर्थिक संतुलन बिगाड़ा तो महिलाओं की भागीदारी ने परिवार का संतुलन। बच्चे घर होते हुए भी बेघर थे। जेलों में अधिकांश को 'सी' श्रेणी में नरकयातना के साथ रखा गया, मगर इन औसत दिखनेवाली स्त्रियों ने माफी माँग कर घर जाना स्वीकार नहीं किया। जेल की तंग कोठरियों में जिन बच्चों ने जन्म लिया, वे हास्यास्पद स्थिति में होने पर भी 'विजय', 'जेल की शहज़ादी' आदि नामों से पुकारे गए। एक महिला, जिसके बच्चे ने जेल की कालकोठरी में ही दम तोड़ दिया, वह अपनी पीड़ा भूलकर, शोक मनाने के बदले उस बच्चे को संभालने में लग गई, जिसकी माँ टायफाइड से पीड़ित थी। इन गुमनाम भारतीय स्त्रियों ने मानवता का ऐसा अनूठा दृष्टांत प्रस्तुत किया कि जेल अधिकारी भौचक्क रह गए। वर्ण-भेद, वर्ग-भेद, पर्दा-प्रथा आदि कुरीतियाँ जेल-जीवन में स्वयं समाप्त हो गईं।

1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से कम ना थी। हजारों जेल गईं। नेहरुजी की माता स्वरूपरानी ने भी महिला साथियों के साथ लाठियाँ खाईं। किशोरियों को महज नारा लगाने के जुर्म में दो वर्ष जेल की कड़ी सज़ा दी गई।अत्याचार सहती इन सामान्य से भी अतिसामान्य दिखनेवाली अशिक्षित नारियों ने जिस मानसिक परिपक्वता का परिचय दिया, वह आज भी हमें सोचने पर विवश करता है कि यदि स्त्रियाँ वाकई अबला हैं तो सबलता की क्या परिभाषा है और उसे किस तरह प्रमाणित किया जा सकता है? सन् 1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन' सबसे उग्र आंदोलन था। प्रमुख नेत्रियों के जेल जाने पर उनकी जगह कुछ नई नेत्रियों ने लीं,शेष ने उनके साथ मिलकर ना केवल जेल की यातना सही, बल्कि पारिवारिक, सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शोषण भी। आज़ादी के बाद भारत विभाजन के कारण भड़के सांप्रदायिक दंगों ने स्त्रियों को हर तरह से लूटा। आज़ादी की कीमत इन महिलाओं ने अधिक चुकाई।

सन् 1930-32 के आसपास ही बंगाल में कुछ साहसी नवयुवतियाँ क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अपने ढंग से देश को स्वतंत्र कराने के लिए सक्रिय थीं।17 वर्षीया कुमारी प्रीतिलता यूरोपियन क्लब पर हमले में शहीद हो गईं। बरसती गोलियों के बीच में से निकाल जानेवाली बेथुने कॉलेज की छात्रा व प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन की साथिन कल्पना दत्त, कुमिल्ला में ज़िला मजिस्ट्रेट पर गोली चलानेवाली दो कमसिन --- सुनीति चौधरी और शांति घोष, कलकत्ता में एक कॉलेज के दीक्षांत समारोह में गवर्नर स्टेन ले जैक्सन पर गोली दागनेवाली छात्रा वीना दास ; लेवांग घुड़दौड़ के मैदान में गवर्नर सर जॉन एंडरसन पर गोलियाँ बरसानेवाली टोली में शामिल 20 वर्षीया नवयुवती उज्ज्वला मजूमदार,अंग्रेज़ों की नींद उड़ानेवाली 17 वर्षीया नगारानी गिड़ालू तथा क्रांतिकारियों की हर संभव मदद करनेवाली दुर्गा भाभी, सुशीला दीदी, स्वतंत्रता की बलिवेदी पर अपने सभी बेटों को आहूत कर यह विलाप करनेवाली माँ मंदाल साह कि ईश्वर ने उसे एक और बेटा क्यों नहीं दिया,जिसे वह देश पर न्योछावर कर पाती। इसीप्रकार, दस वर्षीय बालक अशफाक़ उल्ला के द्वारा क्रांतिकारियों को मदद पहुँचानेवाली और बेटे को परोक्ष रूप से इस क्रांति के लिए तैयार करनेवाली वीर माता, घर की चौखट को स्वतंत्रता संग्राम का मंदिर बनानेवाली, पति प्रेमचंद को हठपूर्वक स्वयं जेल जानेवाली शिवरानी देवी, लेखनी को हथियार बनानेवाली सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा व अन्यान्य, जिन्होंने जेल को अपना घर माना या आज़ादी के लिए जीवन समर्पित कर दिया, इनमें से अधिकांश को आजीवन काले पानी की सज़ा मिली थी। सन् 1937 में कॉग्रेस मंत्रिमंडल के गठन के पश्चात् कुछ रिहा हुईं और कुछ आज़ादी के बाद।

सन् 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन के समय भी मेदिनी की शहीद मातंगना हाज़रा, वारंगावाड़ी की शहीद 16 वर्षीया किशोरी कनकलता और छपरा ज़िले की रामस्वरूप देवी सदृश बलिदानी महिलाओं ने स्वतंत्रता के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ कर दिया, कई गुमनाम हस्ताक्षर भर रहीं। हिंसक और अहिंसक तरीके से लड़नेवाली इन सभी महिलाओं की संयुक्त प्रेरणा मैडम भीकाजी कामा विदेशों में नारी चेतना जगानेवाली भारत की प्रथम महिला क्रांतिकारी और राष्ट्रीय ध्वज निर्मात्री हैं।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास मैदान में खुलकर उतरनेवाली महिला स्वतंत्रता सेनानियों के अतिरिक्त अनेक जूझारू महिला संपादकों की अमूल्य देन के उल्लेख के बिना चर्चा पूरी न होगी। कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बड़ी बहन स्वर्ण कुमारी देवी बंगाल की प्रसिद्ध लेखिका ही नहीं, भारत की पहली महिला उपन्यासकार और पहली सफल भारतीय महिला संपादक भी थीं। उन्होंने अनेक विधाओं में कुल 27 ग्रंथों की रचना की। शरतचंद्र की पहली कहानी प्रकाशित करनेवाली प्रसिद्ध बंगला पत्रिका 'भारती' में लगातार लिखती रहीं और आगे चलकर 'भारती' का संपादन-कार्य संभाला था। देशबंधु चित्तरंजन दास की गिरफ़्तारी के बाद उनकी पत्नी वासंती देवी ने एक ओर स्वदेशी आंदोलन चलाया, दूसरी ओर देशबंधु के पत्र 'बंगलार कथा' का संपादन-संचालन भी किया। बंगाल की 'दीपावली संघ' की संचालिका सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी महिला लीला राय ने अपने पति श्री अनिल राय की गिरफ़्तारी के बाद उनके क्रांति -संगठन 'श्री संघ' का कार्य भी संभाला और साथ ही अपनी पत्रिका 'जयश्री' का संचालन-सम्पादन भी किया। इस पत्रिका में व्यक्त उनके जोशीले विचारों के कारण उनकी गिरफ़्तारी भी संभव है, यह जानते हुए भी वे निर्भीकतापूर्वक सक्रिय रहीं। अंतत: बंगाल अध्यादेश के तहत 1931 ई. से 1937 ई. तक सात वर्ष के लिए उन्हें सज़ा सुनाई गई। पत्रिका को उनकी सहयोगिनियों ने चलाया और जेल भी गईं। पत्रिका बंद होती, फिर प्रकाशित होती। कोई भी दमन नीति लीला राय को पत्रिका निकालने और उसके माध्यम से देशवासियों को जगाने से रोक ना सकी।

सन् 1935 से 37 में प्रांतीय शासन के दौरान अधिकतर क्रांतिकारी युवतियाँ जेल से रिहा कर दी गई थीं। तब भी जिन क्रांतिकारी महिलाओं को समय-पूर्व नहीं छोड़ा गया, उनमें लीला राय भी एक थीं जो छूटने के बाद भी सन् 1942 में फिर जेल गईं। क्रांतिकारी वीना दास की बड़ी बहन कल्याणी देवी ने भी क्रांतिकारी युवतियों को प्रेरणा देने तथा महिला राजकर्मियों को प्रशिक्षित करने के लिए 'मंदिरा' नामक पत्रिका का सम्पादन-संचालन किया। इस पत्रिका को माध्यम बनाकर उन्होंने प्रतिबंधित छत्र संघ को पुनर्जीवित किया। उनके जेल जाने से पत्रिका बंद हो गई। क्रांति- प्रशिक्षण के लिए बंगाल के कोने-कोने में स्थापित कितनी ही संस्थाओं और उनके द्वारा प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं से तो कई महिलाएँ जुड़ी थीं और एक के जेल जाने पर दूसरी, फिर तीसरी महिला सहयोगिनी के द्वारा कार्य होते रहते।

मेरठ की उर्मिला देवी ने सन् 1930 के नमक आंदोलन के तुरंत बाद स्थानीय सत्याग्रह समिति में तीन हज़ार महिलाओं को संगठित किया और 47 सभाओं में भाषण देने के बाद गिरफ़्तार हुईं। घर पर दो छोटे बच्चे अकेले रह गए।जेल में अस्वस्थ रहीं, इसके बावजूद जेल से छूटते ही उन्होंने 'जन्मभूमि' नामक दैनिक पत्र का प्रकाशन -संपादनकिया। अपने उग्र अग्रलेखों के कारण 1941 में वे दोबारा गिरफ़्तार हुईं; बीमारी के कारण छूटीं, लेकिन सन् 42 की उन्मादी लहर में फिर जेल पहुँच गईं।स्थिति बिगड़ जाने पर मुक्त की गईं, किंतु कुछ ही दिनों में चल बसीं। श्रीमती सुभद्रा जोशी ने 1942 में भूमिगत रहते हुए गुप्त रूप से 'हमारा संग्राम' नामक पत्र निकाला जो स्वतंत्रता का संदेश सुना भारतीय जनमानस में नई चेतना जगाता था। सुभद्रा जी ने पुलिस की दृष्टि से बचे रहने के लिए हरिजन बस्ती में अपना प्रेस खोला लेकिन सन् 44 में आंदोलन का नेतृत्व करती हुई गिरफ़्तार कर ली गईं, फिर घर के साथ साथ प्रेस पर भी ताला पड़ गया। सन् 1942 में ही 'भारत छोड़ो' आंदोलन के दौरान बंबई से भूमिगत रेडियो का प्रसारण करनेवाली उषा मेहता को रेडियो सहित पकड़े जाने पर चार वर्ष की सज़ा हुई।
राष्ट्रप्रेम की प्रतिमूर्ति कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान राष्ट्रीय चेतना की कवयित्री रही। सन् 1921 में गाँधी जी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वे प्रथम महिला थीं। उन्होंने ना केवल अपनी लेखनी को इस संग्राम का मशाल बनाया, अपितु स्वयं भी आंदोलन में सक्रिय रहीं और कई बार जेल यात्राएँ भी की। अनेक बार जेल यातनाएँ भोगने के बाद उन अनुभवों को उन्होंने अपनी कहानियों का आधार बनाया। राष्ट्रीय गीत तो उनकी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

'जाग तुझको जाना दूर' और दीप मेरे जल अकंपित, चीर अचंचल' जैसे उद्बोधन गीत रचती-गाती महादेवी वर्मा बापू के विचारों से प्रभावित रहीं, किंतु अन्याय राजनीतिक हो या सामाजिक, वे शांतचित्त नहीं रह सकती थीं। देशवासियों को झकझोरने हेतु उन्होने लिखा, 'अमरता उसमें मनाती मरण त्योहार' 'दुख प्रति निर्वाण उन्माद/ये अमरता नापते पद/ बांध देंगे अंक संसृति से तिमिर में स्वर्ण-बेला'। सन् 1943 में जब बंगाल अकाल की आग में जल रहा था ; सारा देश अकाल की हृदय-विदारक घटना को लेकर स्तब्ध था, तब साथी रचनाकारों को महादेवी वर्मा का उद्बोधन था कि 'यदि इस अवसर पर उनकी लेखनी अकाल पर नहीं चली तो उनका भष्म हो जाना ही श्रेयस्कर होगा। ' इसीप्रकार, देश पर जब आपातकाल थोपा गया, सेंसरशिप लागू हुई,अभिव्यक्ति प्रतिबंधित हुई,तब खतरा मोल लेते हुए आपातकाल का विरोध करनेवालों में महादेवी अग्रणी थीं। उन्होंने कहा था---' जिस तरह घटाटोप अंधकार को एक अकेला दीपक चुनौती देता है, अकेली आवाज़ भी विरोध में उठे तो उसकी सार्थकता होगी।' अंतिम सांस तक निर्भीक और कर्मठ रहनेवाली महादेवी समाज के निम्नतर वर्ग की समस्याओं और भावनाओं से जुड़ी रहीं और उन्हें उजागर करती रहीं। महादेवी का रचनाकर्म भारतीय स्वाधीनता की चेतना से निर्मित हुआ।उनके गीतों में सामाजिक, राजनीतिक नवजागरण के संदर्भ संश्लिष्ट सूक्ष्म, जटिल और कम मुखर है, लेकिन गद्य में उनकी सामाजिकता का विस्तार चकित करनेवाला है। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर सामाजिक कार्यों की ओर उन्मुख महादेवी ने प्राचार्या पद ग्रहण करने के उपरांत 'चाँद' का नि: शुल्क संपादन किया। अपने गद्य-लेखन के माध्यम से उन्होंने अपनी क्रांतिकारी सामाजिकता के विस्तार का परिचय दिया। समाज के प्रति उनका दृष्टिकोण और उनका अर्थशास्त्र निश्चय ही हमारी चेतना को झकझोरता है। महादेवी का कथन यहाँ प्रासंगिक है--- "अन्याय के प्रति मैं स्वभाव से असहिष्णु हूँ। अत: इन निबंधों में उग्रता की गंध स्वाभाविक है। परंतु ध्वंस के लिए ध्वंस सिद्धान्त में मेरा विश्वास कभी नहीं रहा।"

भारत देश की आज़ादी और समाज के पिछड़ेपन से स्त्री चेतना को जगाने के लिए जिन विदेशी ललनाओं ने अपना जीवन समर्पित किया, उनमें उन्नीसवीं सदी के आठवें दशक में भारत में थियोसोफिकल सोसाइटी की नींव रखनेवाली विदेशी महिला सुश्री ब्लावत्स्की का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता रहेगा। सुश्री ब्लावत्स्की का यह विश्वास था कि विश्व का कल्याण अंतत: भारतीय अध्यात्म के ज्ञान से ही होगा। उन्होंने अपने इस विचार से भारतवासियों को अवगत कराना अपना कर्तव्य समझा। विश्व भर का भ्रमण करके औरविभिन्न धर्मों के दर्शन और सिद्धांतों का अध्ययन करनेवाली इस महिला ने भारतीय मनीसियों के विचारों को विकीरित किया।
थियोसोफिकल सोसाइटी का आगे चलकर नेतृत्व संभालने वाली श्रीमती एनी बेसेंट आयरिश महिला होती हुई भी
भारत के लिए पूर्ण समर्पित रहीं। यहाँ रहकर नारी जागृति एवं प्रगति का दायित्व उठाया। उन्होंने मार्ग्रेट नोबल (भगिनी निवेदिता) एवं मार्ग्रेट कजिंस के साथ मिलकर 'होमरूल लीग' की स्थापना की और कॉँग्रेस में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया। 1917 के कलकत्ता अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कॉँग्रेस का अध्यक्ष पद प्राप्त कर देश के राजनीतिक जीवन में महिलाओं का स्थान निर्धारित किया। उनकी ही अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पास कर कॉँग्रेस ने माँग की कि महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर मताधिकार दिया जाए और उनकी क्षमताओं का परीक्षण किया जाए। भारतीय राजनीति और महिला सुधार कार्यक्रमों पर श्रीमती एनी बेसेंट का प्रभाव काफी समय तक बना रहा। इसका एकमात्र कारण भारत के प्रति उनका पूर्ण और निष्काम समर्पण था। सन् 1973 में 'कॉमन विल ' नामक साप्ताहिक पत्र निकाला और कुछ समय बाद प्रसिद्ध दैनिक पत्र 'मद्रास स्टैंडर्ड' खरीद कर उसे न्यू इंडिया के नाम से चलाया। इन पत्रों के माध्यम से वैचारिक स्वतंत्रता तथा मुद्रण स्वतंत्रता के लिए कड़ा संघर्ष किया। प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने पर उन्होंने लिखा - "इंगलैंड जब इस समय संकटग्रस्त है, भारत को अवसर का लाभ लेकर अपनी माँगें सामने लानी चाहिए।" उनकी होमरूल लीग भी यही काम करती थी।अंग्रेजों की दमन -नीति के खिलाफ़ तथा भारतीयों की स्वतंत्रता के पक्ष में लिखने के कारण उन्होंने जुर्माना भी भरा, जेल भी गईं, फिर भी कदम रुके नहीं। महिला प्रिंटिंग प्रेस चलाने के साथ ही 'डेली होराल्ड' पत्र भी चलाया। उनके पत्रों में नियमित प्रकट किए गए विचार 'वेकअप इंडिया', 'इंडिया ए नेशन', 'फ्यूचर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स ' आदि कृतियों में संकलित हैं। राजनीति, समाज सुधार, नारी जागरण, अध्यात्म, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम --- समस्त क्षेत्रों में उनका योगदान इतना महत्वपूर्ण है कि अबतक कोई महिला संपादन की उस ऊँचाई को छू न पाई। महिलाओं को मताधिकार दिलाने का कार्य विशेष उल्लेखनीय है।

बीसवीं सदी के प्रारंभ में स्वामी विवेकानंद की शिष्या मार्ग्रेट नोबल ने मिशन की प्रेरणा से बंगाल को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और शिक्षा को माध्यम बनाकर भारतीय स्त्रियों में जागरूकता लाने का संकल्प लिया। यह शिक्षा कोरी किताबी नहीं, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जागरण की शिक्षा थी। भगिनी निवेदिता ने अपनी पुस्तक 'फुटफाल्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री' के माध्यम से भारतीयों को अपनी संस्कृति पर अभिमान करना सिखाया।

महात्मा गाँधी की एक अनुयायिनी मिस मेडलीन स्लेड, जो बाद में मीरा बेन के नाम से प्रसिद्ध हुईं, ने स्वयं को भारत के लिए समर्पित कर दिया। सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय वे दो बार जेल गईं। 1931 ई. में गोलमेज़ सम्मेलन के समय वे महात्मा गाँधी के साथ थीं। 1942 ई. में वे फिर गिरफ़्तार होकर गाँधी जी के साथ आगा खाँ महल में लंबे समय तक रहीं। सन् 1944 में उन्होंने गाँधी जी की पद्धति पर अपना एक अलग आश्रम खोल लिया।
सन् 1917 में ही मद्रास में ही श्रीमती मार्ग्रेट कजिंस ने अखिल भारतीय स्तर पर एक महिला संगठन ' इंडियन वुमेन एसोसिएशन की स्थापना की। उस समय की महिलाओं की सारी राजनीतिक गतिविधियाँ इस संगठन के द्वारा ही संचालित हुई। इन्होंने आंदोलन से आगे बढ़कर 'अखिल भारतीय महिला संघ' और अखिल भारतीय महिला परिषद' की पत्रिकाओं 'स्त्री मंडल' और 'रोशनी' का संपादन किया।

1917 ई. में ही श्रीमती सरोजिनी नायडू के नेतृत्व में महिलाओं का एक शिष्ट मंडल श्री मांटेग्यू, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया, से मिला और महिलाओं के लिए मताधिकार की माँग की। सन् 1926 में पहली बार स्त्रियों ने चुनाव में हिस्सा लिया, किंतु आम चुनाव के बाद 1927 में कुछ ही महिलाएँ विधान परिषद तक का अपना सफर तय कर पाईं। सन् 1927 में 'अखिल भारतीय महिला सम्मेलन' नामक एक राजनीतिक संगठन की स्थापना हुई। सन् बाल विवाह अधिनियम का पास होना महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार में एक नए मोड़ का सूचक था। इसके पूर्व 1829 ई. में सती प्रथा की कानूनन समाप्ति, 1856 में विधवा विवाह को मान्यता दिलाई जा चुकी थी और ये दोनों कानून स्त्री को सामाजिक अन्याय से मुक्ति दिलाने हेतु महत्वपूर्ण थे। इसीप्रकार, स्त्री शिक्षा से संबद्ध आंदोलन महत्वपूर्ण था। स्त्री शिक्षा उन्नत करने हेतु उन्नीसवीं सदी के मध्य में पहला महिला कॉलेज 'बेथुने कॉलेज' कलकत्ता में स्थापित हुआ। 1870 और 1880 ई. के बीच पहली महिला स्नातक कॉलेज से निकली; 1883 में पहली बार कोई महिला डॉक्टरी पढ़ाने विदेश गई। 1892 में एक अन्य महिला कानून की पढ़ाई करने ऑक्सफोर्ड गई। शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी और सुधारक सावित्री फूले, रमाबाई रानाडे, सरलादेवी, लेडी अबला बोस और श्रीमती पी. के. रे के नाम प्रमुख हैं।

वर्तमान समय में, जबकि आज़ादी के 65 वर्ष के बाद भी महिला अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए, पिछड़े समाज के प्रति न्याय के लिए, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के लिए संघर्षरत है, अफसोस है कि अब सत्ता के मायने बादल चुके हैं,राजनीतिक सरगर्मी नए अर्थों से संदर्भित है,समस्याएँ विकट रूप में प्रकट हैं, मगर आम नागरिक स्वहित की रक्षा और जीवनयापन में स्वयं कॉ शुतुरमुर्ग बनाए हुए है। पूंजीपति मिनी अमेरिका बनाने में लगे हुए हैं। नेतागण दलगत और जातिगत स्वार्थों और विवादों से ऊपर उठकर सोचने की स्थिति में नहीं, जिनका ध्यान जाता है, उन्हें या तो खरीद लिया जाता है या दफन कर दिया जाता है। मेधा पाटेकर या अरुंधति राय की बात करें, आई पी एस किरण बेदी के साथ मिलकर तिहाड़ जेल को तिहाड़ आश्रम में परिणत में जुटी, वहाँ के क़ैदियों की मृतप्राय संवेदनाओं को कुरेद-कुरेद कर जगाने, उन्हें अपनी ओर से सुविधाएं उपलब्ध करा कर मनोभावों को कविता का/ विचारों का रूप दिलाने और उन रचनाओं को पुस्तकाकार देनेवाली सरोज वशिष्ठ की बात करें जिन्होंने तिहाड़ के अतिरिक्त मंडी,कांडा और कैथू जेल के लिए भी इतना ही काम किया, जेल के अंदर बाईस पुस्तकालय खुलवाए, जेल के अंदर कै साहित्यिक, सांस्कृतिक आयोजन करवाए जिनमें जेल के अंदर और बाहर के व्यक्तित्व को एक साथ एक मंच पर ला खड़ा किया, जिन्होंने बताया कि 'अंधेरे में धकेले गए ये सभी लोग खूंखार नहीं होते, कई क़ैदी परिवार और समाज की गंदी राजनीति के शिकार हैं' और आज भी (84 वर्ष की आयु में) जेल के अंदर और बाहर के समाज के हितार्थ स्वयं को मोमबत्ती सी जलाती, तन गलाती और रोशनी वितरित करती हुई कहती हैं, ' मैं मरूँगी नहीं, मैं मर ही नहीं सकती, मैं तो ज़िंदा रहूँगी हमेशा इनके बीच/ तुम्हारे बीच' या पिछले 14 वर्षों से असम राइफल्स द्वारा अपने निरीह ग्रामीण भाइयों की हत्या और बहनों -माताओं के बलात्कार के जघन्य कांड के लिए सरकार से गुहार लगाती, अनशन पर बैठी मणिपुर की ही नहीं, पूरे भारतवर्ष की स्त्री जाति की गौरव इरोम चानू शर्मिला की, जिनपर आत्महत्या का अभियोग लगाकर जिस नृशंस तरीके से भोजन शरीर में पहुँचाया जाता रहा है, वह सौ बार आत्महत्या की पीड़ा से भी बढ़कर है। सरकार सेना की उस टुकड़ी के खिलाफ कुछ करने को तैयार नहीं, फिर भी न्याय के लिए अपनी एक-एक साँस को दाँव पर लगानेवाली इरोम इक्कीसवीं सदी की नायिका है।

बड़े अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है आज सुशिक्षित स्त्रियों का रक्त देश, समाज और संस्कृति से संबद्ध देखी- अनदेखी समस्याओं और शाश्वत मूल्य के विघटन पर नहीं उबलता, उबलता भी है तो अपने परिवार और बिरादरी के द्वारा दबा दिया जाता है। तथाकथित उच्चवर्गीय और उच्चवर्णी स्त्रियाँ घर के संस्कार, मर्यादा और परिवार के लाभ- हानि का दस्तावेज़ बनी नज़र आती हैं। मध्यमवर्ग रूढ़ियों की मज़बूत जकड़न से आज भी आज़ाद नहीं, हाँ लिबासों में स्वतंत्रता अवश्य दिखती है। अब रही निम्नवर्णी व निम्नवर्गीय अशिक्षित स्त्रियों की बात तो उनकी चेतना आज भी लगभग वहीं दफ़न है,जहाँ हजारों वर्षों पहले उसे दफनाया गया था। आज की स्त्री पैदा होते ही दैहिक और मानसिक शोषण की अगली शिकार नज़र आने लगती है। नतीजा, सुरक्षा के नाम पर या तो उसकी उड़ान प्रतिबंधित होती है या अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था से उसका मन खुद को खूबसूरत, मूल्यवान पिंजड़े में क़ैद ही महसूस करता है। मुट्ठी भर जिन महिलाओं ने व्यक्तिगत स्तर पर स्वयं को समाज में प्रतिष्ठित भी किया है उससे समाज में कोई व्यापक असर नहीं दिखता। आज भी सानिया, सायना या आशापूर्णा बनाने की हिम्मत आम पिता नहीं कर पाता क्योंकि हमारे स्वतंत्र भारत में दस महीने से लेकर बासठ वर्ष की स्त्री देह को नोच-नोच कर खाने वाले भूखे भेड़ियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है और समय के साथ बदलती सरकार और उच्चतम न्यायालय इरोम जैसी स्त्री के संघर्ष का तो परोक्ष दमन कर सकती है, लेकिन न्याय के नाम पर केस लंबित रख इन भूखे भेड़ियों का मनोबल बढ़ाती रहती है। अब बलात्कार और उसके बाद हत्या की खबर विचलित तो करती है, मगर स्त्रियों को एकजुट होकर उसके खिलाफ सड़क पर नहीं उतारती, उनके द्वारा 'जैसे को तैसा' का सबक सीखने की छूट नहीं देती, आज हर गली मुहल्ले में 'गुलाब गैंग' जैसे स्त्री संगठन की आवश्यकता महसूस तो की जा रही है लेकिन उसका हिस्सा बनने का साहस या फुर्सत किसी को नहीं, कारण वही--- सरकार ऐसी संगठनों का ही दमन करेगी उन पशुतर सजीवों का नहीं। भयावह प्रश्न है कि आज तथाकथित स्वतंत्र और विकासोन्मुख भारत में ---- अपने ही देश, समाज और घर में आतंक का स्याह गहराता क्यों जा रहा है? कब समाप्त होगा संघर्ष? कब स्वच्छंद साँस लेगी स्त्री? कब खुलकर अपने पंख फैलाएगी वह? और कब तक एक कल्पना, एक सुनीता, एक बछेंद्री, एक सानिया, सायना और आशापूर्णा को पाकर हम खुश होते रहेंगे? जबकि भारत की इस माटी में असंख्य नगीने हैं जो या तो अनदेखी अंधकोठरी में सुरक्षित हैं या धूल- धूसरित। अब तो देश दामिनी, दीपिका और सोनी सूरी की पीड़ा से उबरे, अब तो नर्सरी की बच्ची को विद्यालय भेजते समय उसकी माँ निश्चिंतता की साँस ले, अब तो घर और समाज स्त्री को देह से हटकर मस्तिष्क और हृदय स्वीकारे। यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना उचित होगा कि उन्नति या प्रगति यदि दैहिक या मानसिक शोषण के एवज में मिल रही है तो ऐसी स्त्रियों की सबलता उनकी दुर्बलता की द्योतक है। क्या स्वतंत्र भारत की माटी में स्वतंत्र और निर्भीक साँसें पा सकेंगी परोक्षत: संघर्षशील स्त्रियाँ!

('फूल सी कोमल वज्र सी कठोर' संकलन में पूर्व प्रकाशित)

आभार:
भारत की नारियाँ
औरत: कल आज और कल - आशरानी व्होरा
श्रृंखला की कड़ियाँ -- महादेवी वर्मा
अन्य पत्र - पत्रिकाएँ
साक्षात्कार / अनौपचारिक संवाद

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