भक्तिकालीन साहित्य का हिंदी आलोचना में मूल्यांकन

प्रोफेसर (डॉ.) हरदीप सिंह

- हरदीप सिंह


शोध सारांश
प्रस्तुत शोध पत्र इस बात की पड़ताल करता है कि हिंदी आलोचना में भक्ति काव्य का मूल्यांकन किस रूप में किया गया है? और विभिन्न आलोचकों के भक्ति काव्य की इस आलोचना के आधार क्या है? भक्तिकाव्य संबंधी कौन से निष्कर्ष सामने आए हैं? इन प्रश्नों का उत्तर इस आलेख में दिया गया है। लगभग तीन शताब्दियों में रचित भक्तिकाव्य की व्यापकता और सुदीर्घ लोकप्रियता के कारण हिंदी आलोचना का सर्वाधिक प्रिय विषय रहा है। इसके कालजयी मूल्य और साहित्यिक तत्त्व आलोचकों को आकर्षित करते रहे हैं।

बीज शब्द  – भक्ति काव्य

शोध विस्तार 

भक्तिकाव्य के स्वरूप को समझने के आरम्भिक प्रयासों में भक्त कवियों, और टीकाकारों की उक्तियाँ उल्लेखनीय हैं। ग्रियर्सन जैसे इतिहासकारों के उल्लेख भी इसे समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। भक्तिकाल के आरंभिक विवेचन में भक्तमाल, चौरासी वैष्णव की वार्ता, तथा दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता प्रमुख हैं। इनमे भक्ति विवरण के साथ उनका सारगर्भित मुल्यांकन ही मिलता है। नारायण प्रकाश दीक्षित ( 1961) ने कबीर के विषय में नाभादास के निम्नलिखित प्रसिद्ध छप्पय का उदहारण दिया है:
भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम कर गयौ।
जोग, जग्य, ब्रत, दान, भजन, बिनु तुच्छ दिखायो। ।
हिन्दू, तुरक प्रमान, रमैनी शब्दी साखी।
पक्षपात नहीं बचन, सबही के हित की भाखी। ।
आरूढ़ दसा हे जगत पर, मुख देखि नाहिन भनी।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट दरसनी। ।

यहाँ कबीर ने भक्ति से विमुख धर्म को अधर्म कहा है। भक्ति के बिना योग, यज्ञ, व्रत, और दान आदि को तुच्छ बताया है। हिन्दू और तुर्क में भेद करने के बजाए पक्षपात रहित रहने और सर्व का हित करने वाली अपनी साखी, सबद और रमैनी के रूप में अपना भाव व्यक्त किया। चाहे कोई कितना भी बड़ा हो उन्होंने किसी की मुंहदेखी नहीं कही। वर्णाश्रम और षट्दर्शन की मर्यादा नहीं रखी। इस तरह नाभादास ने कबीर की महत्वपूर्ण विशेषताओं को सफलतापूर्वक ढंग से चिन्हित किया है। भक्तमाल में अष्टछाप के प्रमुख कवियों सूरदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास आदि का भी वर्णन किया गया है। इसी तरह वार्ता साहित्य में भी भक्तिकाल के कवियों के जीवन संस्मरण और विश्लेष्ण मिलता है। इनके अलावा उस काल की जनश्रुतियों और लोककथाओं के माध्यम से भी हमे इस कल के रचनाकारों के बारे में जानकारी मिलती है।

हिंदी साहित्य के इतिहास में सबसे पहले जार्ज ग्रियर्सन ने भक्ति काव्य के गहरे प्रभाव को अपने इतिहास में रेखांकित करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (1987) लिखते हैं, “हम अपने को एक ऐसे धार्मिक आन्दोलन के सामने पाते हैं, जो उन सब आंदोलनों से कहीं अधिक विशाल है जिन्हें भारतवर्ष ने कभी देखा है। यहाँ तक कि बौद्ध धर्म के आंदोलन से भी अधिक विशाल है क्योंकि उसका प्रभाव आज भी वर्तमान है। उस युग में धर्म ज्ञान का नहीं बल्कि भावावेश का विषय हो गया था।” उन्होंने भक्ति आन्दोलन की तुलना यूरोप के रिनेसां से की है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी मानते हैं कि ग्रियर्सन ने रामचरितमानस का मूल्यांकन करते हुए लिखा है, “राजमहल से झोंपड़ी तक, यह ग्रन्थ प्रत्येक हाथ में है और हिन्दू समाज के छोटे बड़े, धनी-निर्धन, बालक-वृद्ध चाहे जो हों, प्रत्येक वर्ग द्वारा समान रूप से पढ़ा-सुना और समझा जाता है।” (पृष्ठ 52) उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक दृष्टि के साथ-साथ साहित्यिक दृष्टि से भी मानस का महत्त्व रेखांकित किया है। तुलसी के चरित्र निर्माण की परिभाषा बताते हुए ग्रियर्सन (1961) ने लिखा है, “तुलसी के खल पात्र भी केवल कालिमा से पुती तस्वीरें नहीं हैं। प्रत्येक की अपनी चरित्रगत विशिष्टता है, और इनमे से कोई ऐसा नहीं है, जिसमें दोष की कमी को पूरा करने वाला कोई गुण न हो।”(पृष्ठ 141 )

इसके पश्चात मिस्र बन्धुओं ने ‘हिंदी नवरत्न’ में तीन भक्त कवियों कबीर, सूर और तुलसी को शामिल कर भक्ति काव्य का महत्त्व बताया। हिंदी नवरत्न के अलावा मिश्र बंधु विनोद में भक्तिकाल के कवियों का समग्र परिचय दिया है। हालाँकि उन्होंने इन कवियों का वस्तुनिष्ठ मूल्याङ्कन नहीं किया। उनका सारा विवेचन प्रशंसात्मक है। वे कविता के महत्त्व के कारणों का परिचय देने के बजाय उस पर दाद देते हुए प्रतीत होते हैं। (विश्वनाथ त्रिपाठी,1995/पृष्ठ 32-33)

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भक्ति काव्य का मूल्यांकन करते हुए इसकी प्रवृत्तियों और महत्त्व को उजागर किया है। उन्होंने तत्कालीन राजनितिक, सामाजिक तथा धार्मिक परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला है। अपने ग्रन्थ ‘गोस्वामी तुलसीदास’ में उन्होंने भक्तिकाव्य में तुलसी को श्रेष्ठ कवि के रूप में स्थापित किया है। उन्होंने जायसी ग्रन्थावली का सम्पादन करते हुए उसकी एक लम्बी भूमिका लिखी। इसके साथ ही उन्होंने सूरदास के भ्रमरगीत सार का सम्पादन करते हुए उसकी एक सारगर्भित भूमिका लिखी। इससे इन दोनों महाकवियों का महत्त्व प्रतिपादित हुआ। ‘चिंतामणि’ निबंध संग्रह में भी भक्ति काव्य के अनेक पक्ष उजागर हुए हैं। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ नामक अपनी पुस्तक में उन्होंने भक्ति काव्य का कारण बताते हुए पहली बार भक्ति काव्य का उसके समय और समाज के साथ संबंध को दर्शया है। भक्ति काव्य के उदय के राजनितिक कारण के रूप में इस्लाम के आगमन से पराजित हिन्दू जाति की निराशा से मुक्ति के रूप में देखा है। वे लिखते हैं, “देश इ मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देव मन्दिर गिराए जाते थे, देव मूर्तियाँ तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। ... अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की भक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?” (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ 39 ) उन्होंने दिखाया कि राजनितिक हालात के साथ साथ धार्मिक परिस्थिति भी भक्ति काव्य की ज़मीन तैयार कर चुकी थी। इन्हीं स्थितयों में दक्षिण से आई भक्ति को उत्तर भारत में फैलने का अवसर मिला।

शुक्ल जी ने भक्ति काव्य का वर्गीकरण करके उसके मुल्यांकन को सहज और बोधगम्य बना दिया। पहले उन्होंने भक्ति काव्य को दो वर्गों में बांटा – निर्गुण और सगुण। निर्गुण के पुनः दो भाग किए- ज्ञानाश्रयी और प्रेमाश्रयी। सगुण भक्ति के भी दो भाग किए – रामभक्ति शाखा और कृष्ण भक्ति शाखा।

शुक्ल जी ने भक्ति काव्य में राम काव्य को सर्व श्रेष्ठ स्थान दिया है। उन्होंने भक्ति के तीन अंग माने हैं – धर्म,कर्म और विज्ञान माने हैं। राम काव्य इस लिए सर्व श्रेष्ठ है क्योंकि उसमें ये तीनों अंगों का पूर्ण विकास मिलता है। इस प्रतिमान पर उन्हें निर्गुण भक्ति काव्य सीमित महत्त्व का लगा। उन्होंने निर्गुण काव्य को कर्म से दूर कर देने वाला माना। उन्हें संत काव्य केवल ज्ञान पर और सूफी काव्य केवल प्रेम पर बल देता हुआ प्रतीत हुआ। संत काव्य में मौजूद प्रेम तत्त्व को उन्होंने सूफी प्रभाव से आया हुआ माना। उन्होंने लिखा है कि “कबीर तथा अन्य निर्गुणपंथी संतों के द्वारा अन्तस्साधना में रागात्मिका ‘भक्ति’ और ‘ज्ञान’ का योग तो हुआ, पर कर्म की दशा वही रही जो नाथपंथियों के यहाँ थी। इन संतों के ईश्वर ज्ञानस्वरूप और प्रेमस्वरूप ही रहे, धर्म स्वरूप नहीं हो पाए।” (हिंदी साहित्य का इतिहास,पृष्ठ 42) लेकिन आचार्य शुक्ल कबीर के काव्य को निम्नवर्ग को अत्मदीनता से उबारने वाला भी मानते हैं। वे लिखते हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बड़े भाग को संभाला जो नाथ पंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्तिरस से शून्य और शुष्क पड़ता जा रहा था। उनके द्वारा यह बहुत ही आवश्यक कार्य हुआ। इसके साथ ही मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव का भाव जगाया और भक्ति के ऊंचे से ऊंचे सोपान की ओर बढ़ने के लिए बढ़ावा दिया।” (हिंदी साहित्य का इतिहास,पृष्ठ 42)

निर्गुण काव्य की ज्ञानाश्रयी शाखा की ही तरह प्रेममार्गी शाखा भी साहित्यिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शुक्ल जी ने उसे प्रेम के माध्यम से हिन्दू-मुसलमानों के बीच अलगाव को मिटाने वाला बताया। उनकी सामासिक सांस्कृति के निर्माण में भूमिका बनाने के रूप में शुक्ल जी ने देखा। वे लिखते हैं, “कुतुबन, जायसी आदि इन प्रेम कहानी के कवियों ने प्रेम का शुद्ध मार्ग दिखाते हुए, उन सामान्य जीवन दशाओं को सामने रखा जिनका मनुष्य मात्र के हृदय पर एक सा प्रभाव दिखाई पड़ता है। हिन्दू हृदय और मुसलमान हृदय आमने सामने करके अजनबीपन मिटाने वालों में इन्हीं का नाम लेना पड़ेगा।”।” (हिंदी साहित्य का इतिहास,पृष्ठ 91-92 ) जायसी को तुलसी और सूर के समकक्ष स्थान देना उनके सूफी काव्य के महत्त्व को पहचानने का प्रमाण है। शुक्ल से पहले मिश्र बन्धुओं ने जायसी को नवरत्नों में स्थान नहीं दिया था। वे बड़े कवि के रूप में सबसे पहले शुक्ल जी द्वारा ही पहचाने गए।

शुक्ल जी सगुण काव्य को निर्गुण की तुलना में जनता का ज्यादा हित करने वाला मानते हैं। कृष्ण काव्य ने भक्ति के निराले आनंदलोक की सृष्टि की। उस लोक में सांसारिक विधि-निषेध, दुःख-कष्ट, ज़रा-व्याधि नहीं है। वह सिद्धावस्था का काव्य है। वह यौवन और सौन्दर्य का वसनामुक्त आनंदलोक रचने के कारण श्रेष्ठ है। सूरदास इसके प्रतिनिधि रचनाकार हैं। वे तुलसी जैसे सर्वांगपूर्ण रचनाकार तो नहीं, मगर अपने क्षेत्र में अद्वितीय हैं। आचार्य शुक्ल लिखते हैं, “यद्यपि तुलसी के समान सूर का काव्य क्षेत्र इतना व्यापक नहीं है कि उसमें जीवन की भिन्न-भिन्न दशा का समावेश हो, पर जिस परिमित पुण्य भूमि में उनकी वाणी में संचरण किया, उसका कोई कोना अछूता न छूटा। श्रृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुंची, वहाँ तक और किसी कवि की नहीं।

 ... बाल चेष्टा के स्वाभाविक मनोहर चित्रों का इतना बड़ा भंडार और कहीं नहीं।” (हिंदी साहित्य का इतिहास,पृष्ठ 91-92 ) आचार्य शुक्ल जी तुलसी को सर्व श्रेष्ठ मानने पर भी सूरदास को नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा में सबसे बढ़कर बताते हैं। रामकाव्य को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ कहा है। वह धर्म, कर्म और ज्ञान – तीनों को साथ लेकर चलने वाला है। उसमें विराट समन्वय और लोकमंगल की भावना अन्तर्निहित है। तुलसी का काव्य उनका चरम उत्कर्ष है। शुक्ल जी ने विषय और शिल्प दोनों ही स्तरों पर तुलसी काव्य की सर्वांगपूर्णता दिखाई है। तुलसी की कथ्यगत संपूर्णता का उल्लेख कर उनकी सर्वश्रेष्ठता घोषित करते हुए शुक्ल जी लिखते हैं, “भारतीय जनता का प्रतिनिधि कवि यदि किसी को कह सकते हैं, तो इन्हीं महानुभाव को। और कवि जीवन के कोई एक पक्ष लेकर चले हैं। जैसे वीर काल के कवि उत्साह को, भक्तिकाल के दूसरे कवि प्रेम और ज्ञान को, अलंकार काल के कवि दाम्पत्य प्रणय या श्रृंगार को। पर इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों और व्यवहारों तक है।” (वही, पृष्ठ 114)

आचार्य शुक्ल के अनुसार रचना शैली की दृष्टि से भी तुलसी सर्व श्रेष्ठ हैं। उन्होंने मध्यकाल के हिंदी प्रदेशों की सभी काव्य-भाषाओँ में और सभी शैलियों में श्रेष्ठ रचनाएँ की हैं। वे लिखते हैं कि “काव्य-भाषा के दो रूप और रचना की पांच मुख्य शैलियाँ साहित्य क्षेत्र में गोस्वामी जी को मिलीं। तुलसीदास जी के रचना-विधान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपनी सर्वतोन्मुखी प्रतिभा के बल से सबके सौंदर्य की पराकाष्ठा अपनी दिव्य वाणी में दिखा कर साहित्य के क्षेत्र में प्रथम पद के अधिकारी हुए।” (वही, पृष्ठ 91)

भक्ति काव्य का मूल्यांकन करने के लिए आचार्य शुक्ल ने अपने नए प्रतिमान विकसित किए। ये प्रतिमान रामचरितमानस सहित तुलसी काव्य से ही निर्मित हुए थे। इस केन्द्रीय दृष्टि के कारण उन्हें अनेक सफलताएँ मिलीं, लेकिन निर्गुण काव्य के मूल्यांकन में थोड़ी चूक हो गई, जिसे बाद के आलोचकों ने दुरुस्त किया।

डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल 

डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल ने अपने शोध प्रबंध में निर्गुण भक्ति संबंधी शुक्ल जी की स्थापनाओं का खंडन किया और उसका महत्त्व स्थापित किया। शुक्ल जी ने लिखा था कि निर्गुण संत जनता को कर्म क्षेत्र से हटाने में लगे थे। बड़थ्वाल जी ने संतों को कृषि और व्यवसाय से जुड़ा हुआ बताया। उन्होंने निर्गुण काव्य को समाज को दुरुस्त करने वाले काव्य के रूप में देखा न कि तोड़ने वाले काव्य के रूप में। ‘संत’ शीर्षक लेख में वे लिखते हैं, “समाज की श्रृंखला को संत तोड़ना नहीं चाहता। समाज में प्रचलित अन्यायों और बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने में वह बेशक नहीं हिचकता। विशेषकर ऐसे अवसर पर जब युग की आवश्यकताओं को देखते हुए सामाजिक नियम अधूरे और निकम्मे पद जाते हैं, उस समय वह समाज के नियमों को आवश्यकता के अनुकूल ढालने में सहायता करता है। किन्तु वह समाज को विश्रंखल करना बिलकुल नहीं चाहता।”

बड़थ्वाल ने निर्गुण और सगुण को बिलकुल अलग रख कर देखने को गलत बताया। निर्गुण काव्य को श्रम के सौन्दर्य से पूर्ण और समाज की जाति और धर्म के भेद को मिटाने वाले काव्य के रूप में देखना उनके मुल्यांकन की खासियत है।

इसी तरह आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने संत काव्य और विशेषतः कबीर और दादू की रचनाओं का महत्त्व स्थापित किया।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी 

भक्तिकाव्य की निर्गुण शाखा का महत्त्व स्थापित करने का श्रेय आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को ही जाता है। उन्होंने कबीर की रचनाओं को अपने आलोचनात्मक प्रतिमानों का आधार बनाया। उनकी तीन पुस्तकें – मध्यकाल की धर्म साधना, कबीर, और हिंदी साहित्य की भूमिका भक्तिकाव्य संबंधी उनके मूल्यांकन को समझने के लिए बहुत उपयोगी हैं। इनका सार उन्होंने अपने छात्रोपयोगी पुस्तक ‘हिंदी सहित्य का उद्भव और विकास’ में संगृहीत कर दिया है। भारत की धर्म और काव्य परंपरा का गहन अन्वेषण कर उन्होंने साबित कर दिया कि कबीर किसी विदेशी धर्म-दर्शन को अपना कर नहीं चले थे, बल्कि उनकी काव्य परंपरा का मूल भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में है। उन्होंने दिखाया कि निर्गुण काव्य परंपरा सगुण की तुलना में अधिक प्राचीन और व्यापक भारतीय परंपरा है। परंपरा को गहराई से देख पाने के कारण ही उन्होंने भक्ति काव्य को इस्लाम के आगमन की प्रतिक्रिया में पराजित हिन्दू जाति की देन माने जाने का प्रतिवाद किया। उसका महत्त्व घोषित करते हुए हजारीप्रसाद द्विवेदी(1987/ पृष्ठ 15-16) ने लिखा है कि, “मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं रहा, लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।” भक्ति काव्य को शास्त्रों की दृष्टि के बजाए लोक चिंता के दृष्टिकोण से देखते हुए द्विवेदी जी ने लिखा, “मतों, आचार्यों, संप्रदायों, और दार्शनिक चिंताओं के मानदंड से लोक चिंता को नहीं मापना चाहता, बल्कि लोक चिंता का सापेक्ष में उन्हें देखने की सिफारिश कर रहा हूँ।” (पृष्ठ,20) भक्ति काव्य के सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों के संबंध की पड़ताल करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि संत काव्य सामाजिक स्थितियों के कारण आम जनता में पैदा होने वाले असंतोष को स्वर देने वाला काव्य है। हजारीप्रसाद द्विवेदी (1961) का मत हैं, “मध्यकाल का संत साहित्य प्रधान रूप से धार्मिक साहित्य है, परन्तु उसका धार्मिक रूप साधारण जनता के लिए लिखा गया है। इस विषय में तो किसी को मतभेद नहीं होगा कि इस साहित्य में तत्कालीन राजनितिक परिस्थितियों की आलोचना की गई है। दीर्घकाल से प्रचलित धार्मिक विश्वासों, सामाजिक और वैयक्तिक आचरणों के मान तथा विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा स्वीकृत सिद्धांतों पर या तो आक्रमण किया गया या उसके संबंध में संदेह प्रकट किया गया है। यह उन विभिन्न संतों के असंतोष का फल था जो उन्हें सामाजिक परिस्थितयों के कारण अनुभूत हो रहा था।” (पृष्ठ 84)

निर्गुण साहित्य के साथ ही आचार्य द्विवेदी जी ने सगुण भक्ति काव्य को भी परंपरा से जोड़ कर देखा। सगुण-निर्गुण में से किसी एक की श्रेष्ठता का प्रतिपादन करने के बजाए उन्होंने दोनों की विशेषताओं का सहृदयता से उद्घाटन किया। उन्होंने दोनों के समान सूत्रों की तलाश की जिनमे प्रेम, भक्ति और लोक-मंगल की कामना को चिन्हित करते हुए लिखा, “इस सम्पूर्ण साहित्य के मूल में यह है कि भक्त का भगवान् के साथ एक व्यक्तिगत संबंध है। भगवान या ईश्वर इन भक्तों की दृष्टि में कोई कोई शक्ति या सत्ता मात्र नहीं है, बल्कि एक सर्व शक्तिवान व्यक्ति है, जो कृपा कर सकता है, प्रेम कर सकता है, उद्धार कर सकता है, अवतार ले सकता है। निर्गुण मत के भक्त हों या सगुण मत के, भगवान के साथ उन्होंने कोई-न-कोई अपना व्यक्तिगत संबंध पाया है।” (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल: नई दिल्ली, 1987, पृष्ठ 85) यहाँ पर मैनेजर पाण्डेय के प्रश्न को लेना समीचीन होगा, वे लिखते हैं “विवाद की बात यह है कि सूर और तुलसी ने निर्गुण का खंडन किया है कि नहीं? वैसे तो कृष्ण की सगुण लीला के गायक सूरदास की कविता में आदि से अंत तक प्रेम के उल्लास से भरपूर जीवन के उत्सव का सर्वव्यापी संगीत है जिसमें तन्मयता से हटकर किसी वाद-विवाद के लिए कोई जगह नहीं है, फिर भी सूर ने ‘भ्रमरगीत’ के उद्धव गोपी संवाद में ज्ञान बनाम भक्ति और निर्गुण बनाम सगुण के लिए अवसर निकाल ही लिया है।” (मेनेजर पाण्डेय, 2012, पृष्ठ 18) आगे लिखते हैं, “तुलसीदास उन सबकी आलोचना करते हैं जो वेद पूरण का विरोध करते हैं और श्रुतिसम्मत तथा पुराण पोषित भक्ति पथ से अलग चलने की कोशिश करते हैं। इसके साथ ही तुलसीदास निर्गुण पंथियों की कड़ी आलोचना के बाद दार्शनिक स्तर पर निर्गुण सगुण के बीच एकता स्थापित करते हैं।” लौकिक संबंध द्वारा अलौकिक प्रेम की चाह भक्ति काव्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे भक्ति काव्य की मुक्ति की आकांक्षा को आधुनिक आकांक्षा से अलग मानते हुए लिखते हैं, “जिस प्रकार एक आधुनिक रचनाकार अपने इर्द-गिर्द की परिस्थिति में कुछ असुन्दर देखता है तो उसे सुंदर शोभन में परिवर्तित करने के लिए व्याकुल हो उठता है। भक्ति साहित्य में भी इस प्रकार की व्याकुलता प्रचुर मात्रा में है, पर वह आधुनिक इस लिए नहीं है, क्योंकि उसका लक्ष्य परलोक में मनुष्य को मुक्त करना है।” (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी,1970, पृष्ठ 18-19 ) आचार्य द्विवेदी का भक्ति काव्य का मूल्यांकन उसके साहित्यिक और कलात्मक मूल्यों को भी उद्घाटित करता है। वह भक्तिकाव्य को हिंदी साहित्य में अधिक लोकतांत्रिक, बहुसंस्कृतिवादी और मानवीय मूल्यों को अनुप्राणित करने वाला स्थपित करते हैं।

स्वतान्त्रोत्तर अलोचना में भक्ति काव्य 

स्वतंत्रता के बाद की हिंदी आलोचना परम्परा से प्राप्त स्थापनाओं को लेकर आगे बढ़ी। इस दौर में भक्ति काव्य के मूल्यांकन की नई दृष्टि मुख्यतः पगतिशील आलोचकों की रचनाओं से मिलती है। मुक्तिबोध वर्गीय चेतना के आधार पर भक्ति काव्य का मुल्यांकन करने वाले पहले आलोचक हैं। उन्होंने भक्तिकाव्य का मूल्यांकन करने के लिए उस दौर की गतिशील सामाजिक-सांस्कृतिक शक्तियों से बनने वाले इतिहास के बीच रखकर देखने का प्रस्ताव दिया है। वे सामाजिक संघर्ष को केंद्र में रख कर कुछ नए निष्कर्ष तक पहुंचे हैं। उन्होंने निर्गुण संतों की वाणियों को सर्वाधिक आधुनिक और प्रगतिशील बताया है। वे भक्ति आन्दोलन के पतन का कारण सगुण मत के द्वारा निर्गुण की पराजय के रूप में देखते हैं। यह उन्हें उच्च वर्णीय ब्राह्मण केन्द्रित व्यवस्था द्वारा निम्नवर्गीय क्रांतिकारी चेतना की पराजय लगी है। वे तुलसी की साहित्यिक प्रतिभा के भी कायल हैं, किंतु उनकी विचारधारा को प्रतिगामी मानते हैं। उनके लेखन से भक्ति काव्य की सामाजिक दाय को समझने की एक नई दृष्टि मिलती है।

रामविलास शर्मा ने भक्ति काव्य को मानवीय दृष्टि के अलावा जातीय और राष्ट्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बताया है। वे लिखते हैं, “काव्य और संगीत के इस समन्वय से इन कवियों ने एक ओर समाज सुधार के आंदोलन को व्यापक रूप दिया तो दूसरी ओर हिंदी प्रदेश के जनपदों का अलगाव दूर करते हुए जातीय एकता स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।” (रामविलास शर्मा, भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, किताब घर: दिल्ली, 1999, पृष्ठ 188) भक्ति काव्य के मूल्यांकन के संबंध में उनकी मुख्य रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं – ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिंदी आलोचना’, ‘हिंदी जाति का साहित्य’, और ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’। ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ के प्रथम खंड में भक्ति की परम्परा को रेखांकित किया गया है। दूसरे खंड में भक्ति आंदोलन के विभिन्न पहलुओं का विवेचन किया गया है। जिसमे वे भक्ति को भागवत और आलवारों से पीछे ऋग्वेद तक ले जाते हैं। वे पाश्चात्य विद्वानों के ईसाईयत के प्रभाव से भक्ति के उत्पन्न होने की धारणा को गलत सिद्ध करते हैं। वे भक्ति को निर्गुण और सगुण को एक सूत्र से जोड़ने वाला मानते हैं। उन्होंने कबीर की जातिगत विरोधी असमानता को योगियों के प्रभाव से हट के भक्ति से उत्पन्न मानते हैं। यह भक्ति तुलसीदास सहित सभी भक्त कवियों को जाति-पाति विरोधी बना देती हैं। उन्होंने भक्ति को सांस्कृतिक- सामाजिक के अलावा अखिल भारतीय एवं वैश्विक संदर्भ में रखकर देखा है।

भक्ति काव्य के मुल्यांकन की दृष्टि से नामवर सिंह की ‘दूसरी परम्परा की खोज’ शीर्षक की पुस्तक भी उल्लेखनीय है। इसमें कबीर के लोकधर्म और अस्वीकार के साहस के सहारे दूसरी परम्परा की परिकल्पना की गई है। इसके अतिरिक्त कबीर, सूर, जायसी, मीरा, तुलसी आदि के भक्ति काव्य पर लिखी अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं, जो भक्ति काव्य के मुल्यांकन में कुछ न कुछ जोड़ती हैं। भक्ति काव्य का मुल्यांकन करने वालों में विजयदेव नारायण साही, परशुराम चतुर्वेदी, देवीशंकर अवस्थी, विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ धर्मवीर, उदयभानु सिंह, रामस्वरूप चतुर्वेदी, और डॉ हरदीप सिंह का नाम उल्लेखनीय है। हरदीप सिंह का शोध प्रबंध ‘रत्नहरि के राम काव्य का समीक्षात्मक अध्ययन’ न केवल रत्नहरि को तुलसी के समकक्ष स्थापित करता है बल्कि हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की परंपरा को रीतिकाल तक पल्लवित और पुष्पित करने के साथ साथ फलवित भी करता है। रत्नहरि की ख्याति इतनी अधिक थी कि महाराजा रणजीत सिंह उन्हें निमंत्रण दिए बिना रह नहीं सके जिसे भक्त रत्नहरि ने विनम्रता से मना कर दिया। इसका कारण यह था कि भक्त रत्नहरि सच्चे भक्त थे और नाम-मान-शान की इच्छा की उन्हें अविद्या थी। वे भक्त और केवल विशुद्ध भक्त थे। रत्नहरि के ‘राम ललाम गीत’ के रिकार्ड भी बनने लगे थे जिसे आम जन भक्ति भाव में विभोर होकर और तन्मय होकर सुनते थे।

लेकिन हिंदी के विद्वान मैनेजर पांडेय समकालीन आलोचकों की भक्ति काल की अनदेखी से संतुष्ट नहीं हैं। मैनेजर पांडेय (2012 / पृष्ठ 15) लिखते हैं कि, “उस कविता के प्रति आज की आलोचना उदास ही अधिक है। आखिर क्यों? इस प्रवृत्ति के पीछे संकीर्ण समकालीनता का आग्रह है, भक्ति काव्य संबंधी अज्ञान है या परंपरा के प्रति उदासीनता। जो भी हो, यह स्थिति चिंताजनक है। भक्तिकाव्य से आज की आलोचना की उदासीनता के कारण भक्तिकाव्य का भले ही कुछ न बिगड़ा हो, लेकिन समकालीन आलोचना जरूर प्रभावित हुई है। भक्तिकाव्य से आज की आलोचना की दूरी देखकर मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि यदि आचार्य रामचंद्र शुक्ल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी भी आलोचना की आज वाली समकालीनता के शिकार होते तो हिंदी आलोचना कहाँ और कैसी होती।” मैनेजर पांडेय ने इस बात का सही नोटिस लिया है क्योंकि आज का तथाकथित समकालीन आलोचक आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता, उत्तर औपनिवेशिकता के कंटीले जंगल में इस कदर फंस चुका है जिसमे मानवता और मानवीय मूल्य गायब हैं। इसी लिए आज हिंसक भीड़तंत्र जब चाहे उन्मादित होकर आगजनी, लूट, और कत्लेआम करने की मानसिकता की रोगी है ; यह बात हम प्रतिदिन टीवी, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया में देखते हैं।

निष्कर्ष

निष्कर्ष रूप में यह सामने आता है कि भक्तिकाव्य का मूल्यांकन अनेक दृष्टियों से सामने आता है। भक्ति को उसके समय के सामजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और जातीय स्थितियों के साथ समझा गया है। आर्थिक परिवेश, वर्ग संरचना, जाति-व्यवस्था, धार्मिक स्थिति के साथ ही उसे भारत की बहु-सांस्कृतिक, बहु-भाषिक, एवं साहित्यिक परम्परा से जोड़कर भी समझा गया है। हिंदी आलोचना भक्ति काव्य का साहित्यिक ही नहीं सामाजिक, सांस्कृतिक, जातीय, राष्ट्रीय और सार्वभौमिक महत्व को उजागर करने में सफल रही है। भक्ति काव्य के दो प्रमुख रूप हैं, एक धर्म और भक्ति का रूप है, दूसरा साहित्य, संस्कृति और कला का रूप है। इसी लिए कुछ आलोचक भक्ति काल को हिंदी साहित्य के स्वर्णयुग के नाम से याद करते हैं।

संदर्भ
  • ग्रियर्सन, जार्ज(1961), दि मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान,, अनुवाद किशोरीलाल गुप्त, हिंदी साहित्य का नया इतिहास, हिंदी प्रचारक पुस्तकालय: वाराणसी.
  • त्रिपाठी, विश्वनाथ प्रसाद (1995), हिंदी आलोचना, राजकमल: नई दिल्ली, 1995,
  • पांडेय, मैनेजर(2012), भक्तिकाव्य और हिंदी आलोचना, अनभै सांचा(से), वाणी: नई दिल्ली
  • प्रकाश नारायण दीक्षित (सं) (सन 1961), नाभादास कृत भक्तमाल: एक अध्ययन, साहित्य भवन: इलाहबाद
  • द्विवेदी, आचार्य हजारीप्रसाद (1987) हिंदी साहित्य की भूमिका, राजकमल: नई दिल्ली,
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चलभाष +91 94177 17910; ईमेल bkhardeep@yahoo.com)

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