नीलम सक्सेना चंद्रा की कविताएँ

नीलम सक्सेना चंद्रा 

पतंग  

कुछ रंगीन कागजों को काटकर
झाड़ू की पीछे वाली लकड़ी से
उसमें तान कसी गयी
और बाँध दी गयी उसमें
एक डोर
और कहलाने लगी मैं पतंग-
कितना सीधा साधा सा था जन्म मेरा!

एक बालक ने
चकरी में माजा डाला
और मुझे उससे बांधकर
कुछ झटके दिए...
मैंने कुछ नखरे दिखाए
कुछ बल खाए
और फिर मैं उड़ने लगी
ऊपर...ऊपर...और ऊपर...

जब मैं बहुत ऊपर पहुँच गयी
तो छोटा छोटा सा लगने लगा मुझे जहाँ...
कभी मैं आसमान में तैरती
कभी मैं अम्बर में गोते खाती
मुझे लगने लगा कि मैं हूँ
सर्व शक्तिमान...
और लगने लगी मुझे दुनिया,
तुच्छ, नगण्य, उपेक्षनीय और अर्थहीन...

और फिर
अचानक एक नन्ही सी चिड़िया ने
मुझपर झपट्टा मारा
और चोंच से कर दिया मुझपर
एक घाव...

मैं तिलमिलाई
दर्द से तड्पी
चीखी चिल्लाई
पर कहाँ था कोई मुझे बचाने वाला?
जितनी ख़ुशी से ऊंचाइयों को मैंने छुआ था
उतने ही वेदना से
मैं गिर गयी
भूमि पर
और बन गयी
तुच्छ, नगण्य, उपेक्षनीय और अर्थहीन...

इंसान भी जब बुलंदियों की चोटी पर पहुँच जाता है
तो अक्सर समझने लगता है बाकियों को
तुच्छ, नगण्य, उपेक्षनीय और अर्थहीन...
और उसका भी पतन वैसे ही होता है
जैसे वो हो कोई कटी पतंग...

औरत 

ऐ मौला!
क्यों बनाया तूने मुझे
बारिश की बूंद?
न आने में रज़ा पूछी जाती,
न मंजिल पर मेरा कोई इख़्तियार;
मेरी किस्मत में है
सिर्फ़ मिल जाना अपने मुक़द्दर से!

‘गर मैं गुल पर गिर जाती हूँ,
तो कहलाती हूँ पाकीज़ा;
यदि नाली में मेरी क़िस्मत मुझे ले जाती,
तो मैं भी गन्दी हो जाती हूँ;
यदि नदी से मैं मिल जाती हूँ,
मैं खुशरंग हो बहती हूँ,
यदि समंदर में हो मेरा मुक़द्दर
तो मैं भी खारी हो जाती हूँ!

ऐ मौला!
नहीं बनना है मुझे बारिश की बूंद
मुझे तो तू हवा बना दे,
अपने दम पर बहने दे मुझे!

ज़िंदगी का अलाव   

ऐसा तो नहीं है
कि मेरी ज़िंदगी का अलाव
हरदम ही यूँ एक सा जलता रहेगा!
कभी यह दहकेगा,
कभी यह भभकेगा,
कभी इसके अन्दर की आग
कम भी होगी,
शायद कभी
यह बुझकर राख हो जाए
और फिर सुलगे ही ना!

सुनो,
चिंगारी ख़त्म होने का
अब ज़रा भी डर नहीं लगता,
आखिर मैंने अपना जीवन
खूब जिया है!

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