रामेश्वर सिंह की कविताएँ

रामेश्वर सिंह

1- प्रयास भगीरथ का

मानव, मानवता
उसका मूल्य
झकझोर कर रख दिया है हमने

तीव्र झंझावात में
तेल के दीप का मूल्य क्या!

दानवी झंझावात और दैविक दीप
कोई इस दीप को कैसे बचाए

किन्तु आज मुट्ठी भर लोग
दैविक दीप जलाएं है
जाने कितनी कठिनाई
कितने प्रयत्नो से
इसे जलाये रखे है

प्रयास ही तो है ये
प्रभु के संसार को
प्रकाशित करने का

प्रयास भगीरथ का।


2- गर्मी की रुत तुम फिर आना

वो  कहते हैं न
जब कोई जाये
याद उसकी खूब सताए
अब गर्मी की रुत याद आये

गर्मी की रुत
सुन्दर सुबह
यूनिवर्सिटी में दूर दूर  तक फैले
हरे भरे  पेड़ों के बीच जाती
ठंडी सड़क पर सुबह की सैर
बस यूँ ही बे सिरपैर बतियाना

गर्मी की रुत
तुम फिर आना

लम्बी गरम  दुपहर
अपने घरों में दुबक
पलंग पर नहीं, ठंडे फर्श पर
अलसाये हुए लेट जाना
अरमानों के साथ रेलगाड़ी-रेलगाड़ी खेलना
फिर
चन्दामामा, नंदन, चम्पक की कहानियों
और
किताब के पन्नो की सोंधी सोंधी खुश्बू
में खो जाना

गर्मी की रुत
तुम फिर आना

मस्ती और शरारत से भरी
गर्मी की लम्बी छुटियाँ
गांव में भरी दुपहर
किसी बड़े से
बरगद  के नीचे
ताश खेलते लोगों के बीच
यूँ ही निठल्ले बैठ जाना

गर्मी की रुत,
तुम फिर आना

सुहानी शाम
बगीचे में टहलना
पानी की बौछार से पौधों को नहलाना
हरी हरी घास पर नंगे पांव चलना
मिस्सी रोटी नमकीन छाछ के साथ खाने को
माँ का आवाज  लगाना

गर्मी की रुत
तुम फिर आना

ठंडी मदमाती रात
रात होते ही छत पर चढ़ जाना
और ठंडी हवा के झोंको के बीच
टिमटिमाते तारों  के रहस्यों में खो जाना
ख्यालों के  यान पर बैठ
साबू के साथ
मंगल की उबड़ खाबड़  ज़मीन पर उतरना,
उन पर चलते रहना
दूर तक, देर तक टहलना
और फिर अंत में
किसी टीले पर चढ़ जाना  

गर्मी की रुत
तुम फिर आना


3- नदी हूँ मैं तुम्हारी

हल्का सा झुकीं
तुम्हारे बाल लहराये
लब पास आए,
मिले और भीग गए

मेरी कमी महसूस की तुमने!
प्यार करती हो आज भी मुझसे!
कहोगी फिर अलविदा मुझे!

बरसों पहले
कहा था अलविदा
दोनो के दिलो ने एक दूसरे को
जब एक ही डोर पकड़े
पतंग उड़ा रहे थे
हम

पतंग काले बादलों में
कलाबाजी कर रही थी
ऊपर आती नीचे जाती

अचानक तेज तूफान आया
तुम्हारे हाथ कांपे
मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ना चाहा

पतंग छूट गई

दूर तक देखते रहे
दोनों
दूर क्षितिज में ओझल होते
हमारे अरमानो और सपनो की पतंग

पतंग हिचकोले खाती
दूर चली जा रही थी

बूंदा बंदी शुरू हो गयी
पतंग भी नम हुई और
हमारी आँखे झरना

पतंग को कहा हमने अलविदा
और फिर
एक दूसरे को

आज तुम लौट आयी हो
मेरी बाँहों में हो

हल्का सा झुकीं
तुम्हारे बाल लहराये
लब पास आए,
मिले और भीग गए

मेरी कमी महसूस की तुमने
प्यार करती हो आज भी मुझसे
कहोगी फिर अलविदा मुझे

अपने आँचल को
उँगलियों में लपेटती
तुम्हारी उँगलियों में कंपन हुआ
सहमी सी रहती हो हमेशा,
आँखे पोखर बन गई तुम्हारी
पानी बह निकला
तुम्हारे गालों पर
जहाँ मेरे होठों ने
प्रेम वितान सजाये है
तुम्हारी आँखों का पानी
उन वितानों को झर झर भिगोने लगा

तुम कहने लगी
नदी हूं मैं तुम्हारी
तुम्हारे दिल के पर्वत और घाटियों में बहती हूं
तुम्हारे अंदर मेरा अस्तित्व सदा निहित है ।

नहीं, तुम्हारी कमी महसूस नहीं की मैंने
क्योंकि मैं गई ही कब थी
मैं तो दूर जंगलो से
पतंग ढूंढ़ लायी हूँ अपनी
देखो

प्यार करती हो अब भी
पूछा तुमने
अब भी ।
अब भी क्यूँ पूछा
सदा ही जो
अब भी तो हुआ ही

अलविदा तो मैंने तब भी नहीं कहा था
तुमने मैं शाश्वत हूँ

तुम मौन हुई
देखने लगी मेरी आँखों में
अपना प्यार

मैंने बाँहों में लिया तुम्हे
हल्का सा मैं झुका
होंठो से तुम्हारी प्रेम सिक्त बिंदी को चूमा
लब पास आए
और भीग गए !

हम
एकाकार हुए और
परमसुख में लीन हुए

झमाझम पानी बरसने लगा।


4- तुम ही तो हो

घाटी की गीली हवाओं
तुम मुझे छोड़ आओ
एकांत जंगल के
उस अकेले मकान में

यहाँ की दीवारों पर
लिखे पन्नें उसकी
याद के झोकों से
पलटते जाते है,
शब्दों के अंदर लिखे
शब्द ढूंढने है

यहाँ पेड़ से लिपटी बेल
समर्पित सुंदरी सी
समय के कई मिल पत्थर
तय कर चुकी

मेरी कलम,
मेरी स्याही की दवात
जिसमे घुले है एहसास मेरे
देते जाना

हाँ, मेज भी जिस पर
कलम से छीटें गिर जाते थे

कुर्सी नहीं चाहिए मुझे
सीढ़ियों पर बैठना मुझे अच्छा लगता है

ज़िन्दगी की डायरी के पन्ने
यहाँ भी लिखने है

ये पन्ने नहीं
लम्हें है,
उस एहसास के
जो रह रह कर
भिगोते है मेरे मन को

बर्फ़ से ढके पहाड़ो पर से
अब मै उतर चलूँ

तप्त मन को शीतल करती नदी
तुम ऐसे ही प्रमत्त बहती रहना
मै आता हूँ फिर
हवाओं के अगले किसी
वापसी बहाव के संग

दूर तक साड़ी का पल्लू
लहराती खामोश वादी
फिर मिलूंगा तुम्हे
यूँ कब बिछुड़ता हूँ तुमसे
मेरे मन में लेटी हुई ख़ामोशी
तुम ही तो हो।
                                                                                                                                      सेतु, जुलाई 2017

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