दो कविताएँ- अनिता चंद

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अनिता चंद

- अनिता चंद

ज़िंदगी

समुन्दर की रेत सी हर पल खिसकती है ज़िन्दगी!
कुछ अहसासों तले, कुछ अरमानों तले,
यूँ ही गुदगुदाती है,
संभल जाए तो जन्नत है,
बिखर जाए तो जैसे जहन्नुम है ज़िन्दगी!
जीवन की गहराइयों को मापना है मुश्किल
स्वर्ण सी चमकीली तो कभी,
सूर्य अस्त सी नज़र आती है ज़िन्दगी,
लहरों की फितरत है पैरों को छू जाना
न संभालें तो पैरों तले बनके रेत
यूँ ही खसक जाती है ज़िन्दगी,
बेज़ुबान पत्थर
ठोकर लगी पत्थर से, तो होश है आया,
क्या ये मैं ही हूँ, या है ये मेरा साया,
मुड़कर जो देखा तो आसपास कुछ भी न नज़र आया,
फिर छूँकर देखा अपने को, तब कुछ यक़ीन सा हो पाया,
हाँ ये तो मैं ही हूँ! ये ही सत्य है,

अरे, तो क्या अभी तक मैं बेहोश था?
नहीं बेहोश नहीं था,
फिर खोजा अपने में तो, अपनी आँखों पर मैंने,
मोह-माया की पट्टी को बँधा पाया,
बेज़ुबान पत्थर !
जो बीच सड़क में पड़ा है,
रोज़ ये सब मन की आँखों से देखता और सोचता,
कैसे लोग अपनी आँखों पे पट्टी बांधे घूमते हैं,
फिर मुस्कुराता, अरे मुझे क्या, मैं तो हूँ कठोर,
सह लेता हूँ इनकी ठोकरों को मगर,!
शक्तिहीन तो वो इन्सान हैं,
जो अपनी बात बोल सकते हैं, पर फिर भी सहन करते हैं,
कमज़ोर बनके, यूँ जीवन जीना न होगी कोई ख़ुद्दारी,
अपने को साया समझकर सारा जीवन-बिता देना तो है नादानी,
मेरा-तेरा करके जीवन तो गुज़र जाएगा,
ये कोई महानता नहीं, ये तो विवशता,
लालच है और है ये एक बेचारी,
पत्थर ने अपनी सुन्दरता कठोरता में ही पाई है,
मगर मानव की सुंदरता,
मोम से मुलायम दिल में ही समाई है !

स्पर्श माँ की कल्पना का

संजोया था जो कल्पना में, उसका स्पर्श जब पाया मैंने,
कल्पनाओं से बातें करने लगी मैं,
हर राज़ को साँझा करके तुमसे
अब ख़ुद से स्नेह करने लगी मैं,
ये साँसे मेरी हैं, इसमें कल्पनाएँ तेरी है,
हर क्षण स्पर्श के एहसास के सपने बुनने लगी मैं,
दिन सप्ताह में, सप्ताह महीनों में बीतते-बिताते,
अपनी पलकों में सपनों की उड़ान भरने लगी मैं,
क्या होगा? कैसा होगा?
हर पल ये ख़्याल रखते-रखते,
जिसने ये अवसर दिया, उस परमात्मा का
दिल ही दिल में शुक्रिया अदा करने लगी मैं,
समय आया जब तुझसे मिलने का,
तो उस क्षण की वेदना के एहसास से ही डरने लगी मैं,
बचा रखा था तुम्हें कठिनाइयों से, पाँचो तत्वों

धरती, आकाश, वायु ,जल, अग्नि से अभी तक,
माँ, मोह छोड़ इन तत्वों से रुबरू तुमको अब कराना है
इन तत्वों के साथ तुम्हें अपना अस्तित्व भी तो बनाना है
ये बात न कोई समझ पाता है,
ऐसा नहीं ये वेदना बस मुझको ही है
तुमने भी तो, अपनी पीड़ा का !
मुझसे अलग होने पर, रो-रोकर एहसास कराया है
वो दिन आख़िरी और पहला था मातृत्व के लिए,
जब तुम रोए, जन्म लेने में, और तुम्हारे रोने को
आनंदित होकर, हर्षोल्लास से गले लगाया मैंने,
उस अनमोल पल दुआ निकली हृदय से,
जीवन में कोई कष्ट न छू पाए तुमको,ये सोचकर
सुखद भावनाओं में स्वाँस भरने लगी मैं,
ये फ़रिश्ता है, या धड़कन है मेरी,
ये सोच में हर्षोंल्लास से प्रसन्नमुग्ध रहने लगी मैं,
ख़ुद से स्नेह करती थी अब तक,
पर अब! तुमसे प्यार करने लगी मैं,
स्पर्श मेरी कल्पना का सपनों में संजोया था मैंने
तुमको पाकर हाथों में अपने सुखद स्पर्श ममता का,
ख़ुद को सम्पूर्ण समझने लगी मैं !

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