कुसुम जोशी की कवितायें

पीली आभा से भरी एक सांझ

कुसुम जोशी
जब पतझर के मौसम में
राह पटी थी  पत्तों से,
उसमें चलने की
किरचे किरचे होती आवाजे से
टूटती  निशब्दता,
और आकाश की ढ़लान में
ढ़लने को आतुर,
पीली आभा का सूरज
 पीलाभ समन्दर की सांझ में
क्षीण होते हौसलों से
निहारता ठूँठ हुये वृक्षों को,
पर
हर सुबह  जागता अद्भुत रुप में
अहसास भरता
गिरे पत्तों के जख्मों से भी
फूटती हैं नयी कोंपलें।


खुली हवा में

बात खुली हवा में
सांस लेने की है
पर इसके लिये सार्थक
जमीन की तलाश
हर एक के लिये
अलग अलग अर्थों में
सीमाओं में बंधी होती है,

खिड़की को खोलना
निकल आना नंगें पांव
अंतहीन संड़कों पे
और बनाना एक नई राह,
शब्दों के सहारे लड़ती हुई एक आवाज को
कई आवाजों का सहारा देना,

या फिर
खुली हवा में सांस लेना
एक सहज , सरल
विश्वास भरे जीवन में
जहां सब बांटते हों अपनी खुशियां
एक दूसरे के लिये,
जहां वजूद के प्रश्न नही होते
न अहं शब्द की सार्थकता,
यहां होती है एक नदी
जो अनगिनत मोड़ो को पार करती
खामोशी से समाहित होती है सागर में।


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