मालक्ष्मी बरठाकुर की कविताएँ

मालक्ष्मी बरठाकुर

- मालक्ष्मी बरठाकुर


1. नाकामी

लोग कहते है, खूबसूरत हूँ मैं!
आँखें बोलती हैं मेरी!
मेरी मुस्कराहट बयान करती है
खुशहाली मेरी!
मुझे भी लगा शायद यह सच है
सच कहते है लोग!
भरोसा सा हो गया था मुझे उन पर
मेरी आँखें और मुस्कराहट पर
मुस्कराहट ने तो खूब साथ निभाया
पर मेरी आँखों ने मुझे धोखा दे दिया!
ग़मों को छिपाने का हुनर नहीं आता उन्हें
निर्वाक ही बयान कर जाते है
जिंदगी के अनकहे फसानें
जिनको हम बनाना चाहते थे कभी
मुहब्बत भरे अफसानें!

किसी ने कहा मुझे, चश्मा लगा लो ।
मैंने भी सोचा और उसी पर अमल किया
कि छिप जाये आँखें मेरी
खुल न जाये सारे कच्चे चिट्ठे
और दब जाये दिल के तमाम दर्द
ताउम्र के लिए ।

पर यहाँ भी मुझे मायूसी ही मिली
मेरी तमाम जद ओ जिहाद
नाकाम साबित हूई
चश्मे के नीचे से भी खूब दिखी
आँखों के इर्द गिर्द जमी
सभी काले घेरे!
इस बार मैंने कहा,
"ये तो काजल है! फैल गई है!"
पर कमबख्त आँखें ये मेरी
धोखा दे गईं फिर से!
छलक पड़ीं!
और मैं मौन रह गयी ।


2. मैं औरत, मेरा नाम है संघर्ष

मैं औरत, मेरा नाम है संघर्ष
पहला संघर्ष माँ की कोख से
ईश्वर से नहीं, नहीं दुनियाँ से
संघर्ष मेरा, मेरे ही पिता से!
तर्क थें बहुत दुनियाँ का, पिता का
बेटी नहीं, बेटा चाहिए
बोझ नहीं, बूढ़ापे के लिए कंधा चाहिए!

दुनियाँ में आई, फिर से संघर्ष
जीने का सलीका सिखना है
औरत बनने की कवायद शूरू होना है
"तू तो बनेगी औरत!
तुझे पढाई-लिखाई की क्या है जरुरत!
सिख तू चूल्हा-चौका और बर्तन-पौछा!
ससुराल में है माँ का नाम रखना!"
कहा पिता ने माँ का नाम लेके
हाय! वो भी तो है एक औरत!
संघर्ष पर संघर्ष!
पीढियों से चली आ रही है ये कमबख्त संघर्ष!

भाई को मिला हर वो सहूलियत
जिसकी थी मुझे भी जरुरत
मुझे न मिला लाड़ पिता का
न मिला घी-मक्खन-मलाई दूध का
सूखी रोती, बासी सब्जी
पानी पीती स्कूल जाती
पढाई में जब अव्वल आती
न खुशी थी, न थी मिठाई
न था पिता का हाथ सर पे
न थी मुस्कान माँ की होठों पे!

कहानी मेरी आगे बढ़ती
बीच में कुछ खास था नहीं
वक्त आई मेरी बिदाई की
बिदाई नहीं बोझ था उतारना
बला तले, सुकून की साँस था लेना!
पिता का माथा शिकन भरा था
माँ की आँखें बेबस धूंधला था!

आँखें पिता की चुभते थे मुझे
बाजार में बिकना था मुझे!
पर वो ऐसा बाजार था
जिसमें जो भी बिकता
उसी को ही अपना दाम भी देना पड़ता!
मेरा भाव था बहुत ही सस्ता
पर जो मुझे खरीदता, उसका दाम था मँहगा!

"गौरी, घरेलू, सुशील, कमाऊ"
'ओपन-माइंडेड' और क्या क्या कहूँ!
कसौटी पर कसौटी
मांग पर मांग
रोज बाजार में नुमाइश होती
खरीद्दार बढते, में थक जाती
किसी को अपने भाव नहीं भाते
तो किसी को में नहीं भाती!

एक दिन आ ही गयी वो 'शुभ दिन'!
बिक गयी मैं बाजार में उस दिन!
पिता का चेहरा खुशी से खिल उठा
माँ को भी चैन की सांस लेते देखा ।
किसी ने भी मुझे पूछा नहीं
"लाड़ो! तू खुश तो है ना?
तेरे भी कुछ सपने होंगे
सतरंगी नहीं पर कुछ तो रंग होंगे!"
पर नहीं! मैं थी जैसे सामान राशन का!
दिन बीतेंगे तो सड़ने का जो डर था!

बारी थी अब मेरी बिदाई की
दुल्हन बनी मैं आज खुब जो सजी थी!
आँखों में हया, चेहरे पर नूर
दिखना था मुझे जन्नत का हूर!
पर यहाँ भी मैं दिखी धुंधली
मेरी सुंदरता दिखी अधूरी!
कम रोशन था चेहरा मेरा
मेरे साथ जानेवाला सामान जो था
महंगा और चमकिला!

पिता को आज मैंने देखा करीब से
पर ये क्या!!
जिन आँखों में रोज दिखता था
घृणा और क्रोध
आज उन्हीं आँखों में साफ दिख रहा था
नमी और पितृत्वबोध!

जुबान उनका आज शब्दहीन था
आखों को ही जैसे कुछ कहना था!
"बिटिया, मुझे तू माफ़ करना
ये है समाज की प्रथा
और यही है मेरी व्यथा!
मैं था और मैं हूँ लाचार
पर तुम न बनना!
अपनी बेटी को खुब पढाना
औरत बनाने की भट्टी पर उसे न झोकना कभी
शुरु न हो फिर संघर्ष दूजा एक और कभी!
पहले वो एक इंसान बने
इंसान समझे उसे सभी!
तुम्हारी कहानी मैंने लिखी
एक लाचार, बेबस पिता ने लिखी
समाज की बेडियों को मैं न तोड़ पाया
तुम्हारी माँ का जीवन भी संघर्ष बनाया!
तुम्हारी बेटी हो किरण एक नयी सुबह का
मिसाल बने वो न बने वो पीड़िता!
'औरत' हो पर वो एक नई आवाज़ हो
संघर्ष का दूसरा नाम कभी फिर औरत न हो
औरत का दूसरा नाम कभी फिर संघर्ष न हो!

लिपटना था मुझे पिता से
मेरी बिदाई थी रोना था मुझे!
छूट गयी है मुझसे पीहर
देख लो मुझे सब लोग आज जी भरकर
पर मुझे आज रोना न आया
एक नयी आस साथ में खड़ा जो पाया!
मेरी दोली आगे बढी थी
मेरे चेहरे पर एक मुस्कान सजी थी
सामान साथ का पीछे छूटा था
मेरे खरीद्दार नहीं वो 'हमकद़म' मेरा था!
क्योंकि
उसने सामान नहीं, सिर्फ मुझे ही चुना था!


3. भूख

कौन हूँ मैं?
क्या नाम है मेरा?
मैं नहीं जानती
कोई बुलाता "ऐ लड़की!"
तो कोई कहता, मैं हूँ एक गंदगी!
कौन हूँ मैं?
क्या नाम है मेरा?
मैं नहीं जानती ।

मंदिर के पास जो बूढ़े पीपल का पेड़ है
उसके नीचे एक टूटे-फूटे कूड़ेदान है बरसों से
वही घर है मेरा
वहीं सोती हूँ,
जो मिले वहीं से उठाकर खाती हूँ
पागल बुढ़िया कहती है
वहीं मिली थी मैं
रात के अंधेरे में कोई छोड़ गया था मुझे
अपने चादर की सफेदी को
बनाये रखने के लिए
और दिन के उजाले में
वही मैं बन गयी
समाज के लिए, मानवता के लिए
गंदगी!
पागल बुढ़िया क्या क्या कहती रहती है!

बाकी सब तो ठीक है
पर भूख बहुत लगती है मुझे
दिन भर भूखी रहती हूँ मैं
कूड़ेदान में पूरे दिन
बहुत सारे खुशबूदार खाना फेंका जाता हैं
पर कोई मुझे उसके पास जाने ही नहीं देते!
क्यों न जाऊँ मैं?
घर है मेरा वह, हक है मेरा!
जन्म से रही हूँ , आसरा है मेरा
पर कोई नहीं समझता...!
पहले मंदिर के बूढ़े बाबा
प्यार से कुछ दे ही जाते थे मुझे
और मेरी भूख मिट ही जाती थी
एक वक्त की!
पर अब जो नये बाबा आये है
उन्होंने बीड़ा उठाया है
समाज से गंदगी मिटाने का!
इसलिए मुझे अब कुछ नहीं मिलता...!

ये भूख भी बड़ी अजीब होती है!
किसी के लिये कुछ तो किसी और के लिए
इसका कुछ और ही मायने होते है!
मैं दो दिन भी भूखी रहूँ तब भी
मेरी भूख पानी पीने से मिट ही जाती है
पर जिस्म की भूख का क्या?
रात के अंधेरे में मिटाते मिटाते
लोगों को फिर रात में ही
इसी कूड़ेदान के पास आना पड़ता है
अपने अपच को फेंकने के लिए!

लोग कहते हैं, गंदगी हूँ मैं!
नाजायज हूँ मैं!
क्या मैं सच में नाजायज हूँ?
नहीं!
नाजायज तो वह भूख है
जिसे मिटाने के बाद लोगों को इसी
बदबूदार कूड़ेदान के पास आना पड़ता है
रात के अंधेरे में!
जिसके पास से गुजरने के लिए भी
दिन के उजाले में वे कतराते हैं!
कौन हूँ मैं?
मैं नहीं जानती!
पर नाजायज नहीं हूँ
नाजायज तो वह भूख है ...!

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