कविताएँ - रेणु मिश्रा

डा. रेणु मिश्रा (पूर्व प्रवक्ता रसायन शास्त्र), दिल्ली

दरिया 

मेरे घर के बगल में एक दरिया था
जिसमें सूरज रोज़ नहाया करता था
खिलते थे कई कँवल उसमें,
भौरों का गुंजन हुआ करता था
आते थे कई पंछी वहाँ
किरणों का नृत्य हुआ करता था
ख्वाहिशें कई जगतीं थीं वहाँ
एक जगा ख्वाब सोया करता था
वहाँ जल शांत था बहुत
मन का कोलाहल सुना करता था
मैं उसे देख खुश होती थी बहुत
वो मुझे देख तरंगित हुआ करता था
मेरे घर के बगल में एक दरिया था
जिसमें सूरज रोज़ नहाया करता था


कभी कभी

सोचती हूँ मैं कभी कभी
मेरे उन कठिन क्षणों में
जब चलना मुहाल था
जब जीना दुश्वार था
जब मैंने तुम्हें पुकारा था
क्या तुम आए थे ?
बहुत मुमकिन है
तुम आए हो

और मैंने जाना न हो
तुमने मेरा हाथ थामा हो
भँवर पार कराया हो
और मैंने तुम्हें
पहचाना ही न हो
तुमने कभी जताया भी तो नहीं
कभी पुकारा भी तो नहीं
अपनी उपस्थिति दिखाई भी तो नहीं
और बहुत मुमकिन है
कि तुम आए ही ना हो
मुझे तुम्हारे आने का भ्रम हुआ हो
मैंने तुम्हें कई बार पुकारा
तुम्हें हर पल याद किया
क्या ये मुमकिन है कि
तुम्हें भी मेरा इंतज़ार हो
तुमने भी मुझे पुकारा हो
तुम भी मेरे लिए बेकार हो
पर शायद ऐसा नहीं है
क्योंकि मैं जानती हूँ
तुम्हारी इच्छा पूरी करने को
ये संसार कटिबद्ध है
यह तुम्ही से संचालित है
और तुमसे ही प्रतिबद्ध है
तुम्हारी एक आवाज पर
रूह यह शरीर छोड़ देगी
तुमसे मिलने को दौड़ पड़ेगी
तो क्यों तुमने मुझे बिसराया है
क्यों नहीं गले लगाया है
सोचती हूँ मैं कभी कभी!

हो सकता था

यह हिज़्र का मौसम कभी बदल भी सकता था
उस राह से चलकर, तू मुझे मिल भी सकता था
तू चलता रहा वहीं जिसकी मंजिल नहीं थी मैं,
मुझतक पहुँचने को, तू मंजिल बदल भी सकता था

पहुँची नहीं आवाज़ तुझ तक मेरी कभी,
खुद मुझे आवाज, तू कभी दे भी सकता था
माना कि बीता हुआ पल आता नहीं कभी,
पर इक निगाह से अपनी, तू मंज़र बदल भी  सकता था
तेरी महफिल है गुलज़ार सभी सितारों से जहाँ के,
मुझ गुमनाम का भी नाम, तू ज़ुबाँ से ले भी सकता था

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