सारांश: फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष - तोताराम सनाढ्य

परतंत्र भारत के एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के सम्पादित अंश

तोताराम सनाढ्य (1876-1947)
प्रिय देशबंधु!

मैं वास्तव में उन महानुभावों का अत्यंत कृतज्ञ हूँ, जिन्होंने मेरी इस क्षुद्र पुस्तक को अपना कर मेरे प्रयत्न को सफल किया है। जिन समाचार-पत्रों के संपादकों ने मुझे इस कार्य में सहायता दी है, उनका मैं आजन्म ऋणी रहूँगा। मैं उन्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने उनकी सहायता का दुरूपयोग नहीं किया है। यह उन्हीं की कृपा का फल था कि मैं चार सौ से अधिक प्रतियाँ हरिद्वार, कुंभ, लखनऊ साहित्य सम्मेलन तथा मद्रास कांग्रेस के उत्सव पर बिना मूल्य वितरण कर सका, और उन्हीं की मदद के कारण मेरी तुच्छ पुस्तक को आशातीत सफलता प्राप्त हुई। जो थोड़ा सा काम मैं इस विषय में अपनी तुच्छातितुच्छ बुद्धि के अनुसार करता हूँ, उसके लिए मुझे प्रशंसात्मक शब्दों तथा धन्यवादों की आवश्यकता नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करना मेरा कर्तव्य ही है।

यदि हो सका तो शीघ्र ही मैं अपनी दूसरी पुस्तक ले कर आपकी सेवा में उपस्थित होऊँगा।

विनीत
तोताराम सनाढ्य


काले रंग से घृणा

स्टीमरों पर काले रंग के कारण हम लोगों को अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। प्रथम तो यह कि बैठने के लिए हम लोगों को बहुत ही बुरा स्थान मिलता है। यूरोपियन लोगों की कोठरी की ओर तो जाने के लिए भी आज्ञा नहीं है। चाहे हम पूरा किराया देने के लिए उद्यत हो पर हमें तो भी अच्छी जगह बैठने के लिए भी नहीं मिलती। एक बार मैं एण्डी केपा नामक स्टीमर पर चढ़ कर सुवा से लतौका गया। स्टीमर में मुझे वहाँ बिठाया गया जहाँ सुअर इत्यादि जानवर भी बिठाये जाते हैं। कई कारणों से मुझे ज्वर आ गया था। रात्रि को पानी बरसने लगा और मेरे पास केवल एक ही कम्बल था। सब कपड़े भीग गए थे और जाड़े के मारे मैं थरथरा रहा था। मैंने बहुत प्रार्थना की कि मुझे एक अच्छी कोठरी मिल जाय, मैं उसका पूरा-पूरा भाड़ा दे दूँगा, पर कुछ सुनवाई न हुई। लाचार होकर मुझे वहीं पड़े रहकर और भीगना पड़ा। यह बर्ताव मेरे जैसे अशिक्षित व अल्प-शिक्षित भारतवासियों के साथ ही नहीं किया जाता, बल्कि बड़े-बड़े सुशिक्षित भारतवासियों के साथ भी किया जाता है। कितने ही बंदरगाहों पर तीसरे दर्जे तक के गोरे योंही निकाल दिए जाते हैं और दूसरे दर्जेवाले भारतवासियों के मोज़े, पाजामे इत्यादि सब कपड़े उतारे जाते हैं और निःसंक्रमक किए जाते हैं।

फिजी में सी. एस. आर. नामक एक बड़ी कंपनी है जो खाँड का व्यापार करती है। वह हम लोगों के गन्ने मोल लेती है। जिस मनुष्य का गन्ना वहाँ जाता है उसे एक रसीद दी जाती है। सप्ताह में एक दिन इस रसीद से गन्नेवालों को रुपया मिलता है। कंपनी के गोरे अफसर हम लोगों के हाथों से जब रसीद लेते हैं तो पहले दूर से ही उसे लोहे के चिमटे से पकड़ते हैं और फिर उसे जलती हुई गंधक का धुआँ देते हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि ऐसा क्यों करते हो, तो यही कहते हैं कि तुम लोग काला आदमी है। तुम्हारे हाथ की छुई हुई रसीदों से हमको बीमारी हो जाने का डर है, इसलिए हम इन रसीदों का रोग दूर करते हैं।

एक बार मैं अपने एक मित्र के साथ एक अंग्रेज बैरिस्टर के कार्यालय में गया। वहाँ एक भारतवासी अपने इजहार लिखा रहा था। बैरिस्टर साहब ने अपनी मेम साहब से कहा कि रुमाल से अपने मुँह और नाक बंद कर लो, नहीं तो इस काले आदमी के मुँह से निकलने वाली हवा से तुमको रोग हो जायगा। यद्यपि यह आदमी मेम साहब से बहुत दूर पर खड़ा हुआ था, पर तब भी श्वेतांग बैरिस्टर साहब ने ऐसा कह ही दिया। पाठक! ये वे ही बैरिस्टर साहब हैं जो कि हमारे भाइयों की बदौलत ही हजारों पौंड प्रतिवर्ष कमाते हैं।

कंपनियों के कार्यालय के बरामदों तक हम लोग नहीं जाने पाते। यदि भूल से चले भी गए तो धक्का मार कर धकेल दिए जाते हैं।

उपर्युक्त प्रकार के कितने ही दुख हमें काले रंग के कारण हर रोज सहने पड़ते हैं। हम लोग, जो अपने को ब्रिटिश राज्य की प्रजा समझते हैं, जब अपने घर भारतवर्ष से बाहर निकलते हैं, तो यह बर्ताव हमारे साथ किया जाता है तब हमारी आँखे खुल जाती हैं।


सौदागरों के अत्यचार

फिजी के अंग्रेज सौदागर हम भारतवासियों की भलाई कभी नहीं चाहते। पहले तो कितने ही हमारे भाई पाँच वर्ष तक कठिन परिश्रम करते-करते ही यमलोक को चले जाते हैं। यदि कोई परमेश्वर की कृपा से पाँच वर्ष तक काम करके दासता से स्वतंत्र हो जाते हैं और खेती काम करना चाहते हैं तो यूरोपियन सौदागर उनके काम में अनेक बाधाएँ डाल देते हैं! गन्ने की खेती में गोरों का माल 14 शिलिंग प्रति टन के हिसाब से लिया जाता है, पर हम लोगों का माल चाहे वह गोरों के माल से अच्छा ही हो, 9 शिलिंग फी टन से अधिक पर नहीं बिकता। कितने ही भारतवासी फिजी में केले का व्यापार करते हैं। बहुत-सा केला वहाँ से आस्ट्रेलिया भेजा जाता है। आस्ट्रेलिया में जा कर तो हम लोग व्यापार कर ही नहीं सकते। ये यूरोपियन सौदागर इस लिए केले के जिस संदूक का दाम आस्ट्रेलिया में 14 शिलिंग लेते हैं उसी को हम लोगों से दो या तीन शिलिंग में खरीद लेते हैं। मक्का के जिस बोरे के लिए वे हमें दस शिलिंग से अधिक नहीं देते उसे स्वयं 18 शिलिंग में बेचते हैं। हम लोगों को हार कर उन्हें माल बेचना पड़ता है, न बेचें तो क्या करें?


200 भारतवासियों को धोखा दिया गया!

फिजी में बाईनर साहब एक पुराना प्लैंटर हैं। उसने 800 एकड़ भूमि पट्टे पर ले ली। उस भूमि में बहुत-सा जंगल था, साहब ने सोचा की इस जंगल को यदि अपने व्यय से कटवाएँगे तो 1000 पौंड से कम खर्च नहीं पड़ेगा, इसलिए यदि किसी तरह भोले-भाले भारतवासियों को धोखा देने से काम चल जाय तो ठीक है। यही विचार कर उसने कोई 200 भारतवासियों को बुलाया और कहा, हमारे पास 800 एकड़ भूमि है, जिसको जितनी भूमि की आवश्यकता हो, हम से ले सकता है। इस जमीन को साफ कर लो और इसे जोतो या बोया करो। इस प्रकार चिकनी-चुपड़ी बातें कह कर उसने कुल भूमि उन भारतवसियों में बाँट दी और उनको एक-एक कागज पर लिख दिया कि इस भूमि को तुम 5 या 10 वर्ष तक काम में लाना और एक पौंड प्रति एकड़ के हिसाब से दाम देना। उन बेचारों ने बड़े परिश्रम से और अपने पास के पौंड खर्च करके उस जंगल को काटकर ठीक किया और उसमे एक वर्ष खेती की। दूसरी वर्ष के प्रारंभ होते ही बाईनर साहब ने उन सब भारतवासियों को वहाँ से निकाल दिया और जमीन छीन ली। उन बेचारों बहुत कहा-सुनी की पर सब व्यर्थ!

सम्पादकीय नोट: तोताराम सनाढ्य की पुस्तक 'फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष' में प्रस्तुत अकाट्य प्रमाणों की सहायता से ही अनुबंधित दासत्व व्यवस्था को अन्यायपूर्ण और अमानवीय सिद्ध किया जा सका और अंततः 1 जनवरी 1920 को यह अत्याचारी प्रथा समाप्त कर दी गयी।

1 comment :

  1. बेहद रोचक जानकारी आगे के अंक भी प्रकासित करे

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