कविताएँ - अर्चना तिवारी

अर्चना तिवारी

सुप्त परिंदा

एक सुप्त परिंदे ने
दी आज फिर दस्तक....
जशन मनाने वालों आज़ादी का
मुझे भी तो आज़ादी का स्वाद चखाओ
आज़ाद एक परिंदा गुजरा वहाँ से कह गया
तुम खुद भी तो उड़ने को अपना पंख फैलाओ...
गाहे बगाहे जागते हो
मांगते हो जीने की आज़ादी
तुम्हें किसका है इंतज़ार,
कि कौन करेगा तुम्हारा बेहतर संसार?
किसको फुरसत, जो सुने तुम्हारी
सबको है खुशियाँ बहुत प्यारी
रुक के क्यों महसूस करे
कोई पीड़ा तुम्हारी
तुम हो और सिर्फ तुम हो
अपने हालात के जिम्मेदार
मत चीखो मत पुकारो कि
मत करो कोई बहिष्कार
पंख खोलो खुद का और
बस हो जाओ उड़ने को तैयार
आसमान तुम्हारा है ये धरती तुम्हारी
तुम हो बाशिंदे यहाँ के, न तुम घबराओ
उड़ने की चाहत करो और
बस उड़ने में जुट जाओ!

शहीद

कब तलक़ करेंगे वीरों को
उनकी शहादत पर हम नमन?
कब तक शहीद होते रहेंगे ये वीर
कब तक माँ बहायेगी आँखों के नीर?
और हम देशवासी और नेतागण
यूँ ही कब तक गाते रहेंगे
'सबसे न्यारा हमारा चमन
सबसे प्यारा हमारा वतन'
हर बार कुछ कविताएँ
लिख जाती हैं
हर बार कुछ घड़ियाली
आसूँ बहा दिए जाते है
कुछ रुपए बाँट दिए जाते हैं
दो पुष्प श्रद्धा के चढ़ा दिए जाते हैं
चलो मान ले तहे दिल से भी उनके
शुक्रगुज़ार हैं, हम सब देशवासी
तो भी ये नाकाफ़ी है
जब तलक़ दुश्मन को
हमारी तरफ से जरा सी भी माफ़ी है
ये उस शहीद की शान
में बेहद गुस्ताखी है
ये उस शहीद के परिवार
के लिए नाइंसाफी है
जब तलक़ दुष्मन को
हमारी तरफ से जरा सी भी माफ़ी है
जिस देश की इज़्ज़त की
खातिर वो जान गँवा देतें हैं
हम क्यों बार बार दुश्मन के
सामने हो नतमस्तक उनके हाथों
उस इज़्ज़त को नुचवाँ देते हैं
अब बहुत हुआ की

अब रोको ये शहादत
सीना तान के करें, हम नमन
तिलक करें उनके माथे पे
जो युद्ध विजेता बन
ये वीर सामने आये
शहीदों के लिए सिर झुका नमन करना
और उनको भावभीनी अंतिम विदाई
देना बहुत हुआ
अब खुद से नज़रें न मिला पाते हैं हम
किसी की जान की कीमत पे
चैन और सुकून पाते हैं हम
अब रोको इस शहादत को
कि माँ के आँसू
अब नही बहाना है
वीरगाथा शहीदों का
अब हमे नही गाना है
नही देना अब और
श्रद्धांजलि वीरों को
उनके साथ जीत का जश्न मनाना है
उनके साथ मिल
हमे शांति का पैगाम फैलाना है
हर खुशियाँ मनाना है
उनके साथ जीवन बिताना है
उनके साथ जीवन बिताना है

             
मुस्कुराहट

मुस्कुरा के जो सुनो
कर्कश बोली में भी
शहद घुल जाता है
वरना तने हुए चेहरे को
तो अमृतवाणी भी
जहर लग जाता है
मुस्कुरा के जो देखो ,

हर नज़ारा हसीन नज़र आता है
वरना गीली आँखों
से तो आईने में
अपना चेहरा भी
धुन्धला नज़र आता है
मुस्कुरा के जो बोल दो,
कलियाँ खिल जाती है,
दुखों को भगाती हैं
वरना क्रोधित मन को
तो अपना हसीं जहाँ भी
शमशान नज़र आता है
मुस्कुरा के जो चलो तो
राहों में फूल खिल जाते हैं
वरना फूल भरी राहें
भी चुभन दे जाती है
मुस्कुरा के जो
जियो दो पल भी
वो जीना कहलाता है
वरना ताउम्र जीना भी
तन्हा हो जाता है
मुस्कुराओ की मुस्कुराहट से
हर कोई खिंचा चला आता है
कि ये बेगानों को अपना
दुश्मनों को दोस्त बनाता है
मुस्कुराओ की मुस्कुराहट
से हर कोई खिंचा चला आता है

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