काव्य रचनाएँ - गोरख प्रसाद मस्ताना

डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना
- गोरख प्रसाद मस्ताना

1.कल ही तो डाकिया आया था 
एक मोटा सा लिफाफा 
दे गया / या एक उम्मीद 
बूढी आँखों में चमक आई 
सांसो में सूरज की अंगडाई
मानो मिली हो आशा की गरमाई
हृदय के तंतु झंकृत हुए 
उपकृत हुए 
आशंका  के बादल घनेरे  होने लगे
कहीं कागज़ पर कोरे आश्वासन तो नहीं 
चिंता गहरायी 
फटी चादरों के पैबंद की तरह 
कैसे कटेगी जाड़े की तपिश
गरमी की सिहरन
बरसात की कुहरन 
कौन समझेगा वृद्ध सजर 
की वेदना 
जो कल भी असहाय /
आज भी असिंचित 
हरीतिमा विहीन तना 
ठूंठ / पुस्फिं 
किन्तु
छाँव बाँटने की लालसा 
आज भी जड़ों से कटी नहीं हैं 
परमार्थ की भावना बंटीं नहीं है 
नदी की भावना बंटी नहीं है 
खुलेगा अभिलाषाओं का लिफाफा 
का पते हाथों से 
मानो खोली गयी हो विश्वास का गठ्ठर 
अचानक ह्रदय की वेदना
फफक पड़ी 
यह क्या इस बार भी 
मात्र ... के दो शब्द 
जो सुनते सुनते थक गये हैं कान 
काँपने लगे हैं पांव
सहारों ने छोड़े हाथ
और चश्मे ने 
आँख 
और अंतत:
वह टूट गया 
टूटते विश्वास की भांति
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2. . क्या आज भी है ?
किसी दावत समारोह के बाद 
कूड़े पर फेंके गए जूठे पत्तलों के लिए
आपस में झगड़ते मेहतर 
कुत्तों से भी बदतर
बेहाल / फटेहाल जीवन 
जी लेने भर की मजबूरी 
क्या आज भी है 
तन पर चिथड़ों से सजी 
नारी 
पेट ढकती है तो पीठ उघार
गरीबी की मार /
इतनी कठोर 
की पत्थर का कलेजा भी काँप जाए 
क्या आज भी है 
वो लड़की, जिसकी 
जवानी की बोली लगाते 
नहीं अघाते 
लोग 
और वासना की भूख मिटाने के बाद 
काट देते हैं बोटी बोटी देह 
नृशंसमर गया आदमी 
मिट गया स्नेह 
क्या आज भी है 
ऐसे बच्चे 
जिनके हाथों में छालें 
और आँखों में अश्रु का घरौंदा है 
ओठो पर भूख की भट्टी है 
अभाव की आग है 
वेदना की विरासत है 
क्या आज भी है 
अगर है तो इनका 
जीवित रहना भी है एक रहस्य 
जिसका भेद वही खोल सकता है 
जो भुक्तभोगी है 
या 
निष्काम योगी है
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3.  विजेता 
अभावों के पहाड़ 
वेदना का सागर 
उपेक्षा की लहरें 
प्रताड़ना के गागर 
सब चकनाचूर 
काफूर 
मेरे साहस के सूरज ने सभी को 
किया ध्वस्त,
पस्त 
धुँध की चादर पर ज्यों पछिया 
का वार 
फाड़ देती है क्षितिज के उस पार तक 
निराशा को 
उम्मीदों की निगलनेवाली 
परिभाषा को 
मैं कदापि हतोत्साह नहीं होता 
जैसे सूरज नहीं सोता 
नहीं हारता घने कुहरे से 
असित मेघों से 
समय की जंजीर 
रोक नहीं सकती मेरे रास्ता 
बाँध नहीं सकती मेरे उत्साह को 
जीवन तरंग को जैसे 
हवा नहीं बाँध सकती 
धुप के सात रंगों को 
मेरे अंतर के सूरज ने 
व्रत ले रखा है 
अँधेरे को बेधने का 
निराशा को छेड़ने का 
आँख आंसू के तिजोरी है 
आदमी की कमजोरी है 
लेकिन जिसने इसे साध लिया 
हृदय में बाँध लिया 
वही विजेता है। 
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