विद्या किसी की बपौती नहीं है : डॉ. जगदीश प्रसाद सेमवाल

महर्षि वाल्मीकि पुरस्कार, संस्कृत शिरोमणि पुरस्कार जैसे अनेकों पुरस्कार से सम्मानित, पंजाब विश्वविद्यालय से सम्बद्ध विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान होशियारपुर (पंजाब) के प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त, लगभग 30 ग्रन्थों के प्रणेता डॉ. जगदीश प्रसाद सेमवाल से प्रस्तुत है लखनऊ विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग के डॉ.अरुण कुमार निषाद से बातचीत के कुछ अंश -  

प्रश्न-1. प्रायः लोग कहते  हैं संस्कृत एक मृत भाषा है, उनके लिए क्या सन्देश है?

उत्तर- संस्कृत मृतभाषा नहीं है। संस्कृत के प्रति भारत भर में अपार श्रद्धा है, जो संस्कृत पढ़े  हैं, उनकी संस्कृत के प्रति जितनी श्रद्धा है, इससे भी अधिक उनकी संस्कृत के प्रति श्रद्धा है जो संस्कृत नहीं पढ़े हैं।

प्रश्न-2. आप अपने आप को कवि मानते हैं या गद्यकार?

उत्तर- मैं तो स्वयं को कुछ भी नहीं मानता हूँ, न तो कवि न ही गद्यकार, बाणभट्ट के बाद पण्डित अम्बिकादत्त व्यास जैसा आज कोई गद्यकार दिखाई नहीं दे रहा है, तथा वाल्मीकि और कालिदास जैसे रचनाकार भी नहीं दिखाई दे रहे हैं। अपनी तुकबन्दियों के आधार पर यदि मैं स्वयं को कवि मान बैठूँ तो मुझसे बड़ा मूर्ख कौन होगा।


प्रश्न-3. अधिकांश रचनाकार सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं? क्या इससे साहित्य समृद्ध हो रहा है?

उत्तर- समय के अनुरूप सोशल मीडिया में साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में भी सहायक है। कई बार से बहुत अच्छी-अच्छी बातें भी देखने को मिलती हैं। यदि इससे सामान्य जन भी प्रेरणा लेगा तो साहित्य की श्रीवृद्धि भी होगी।

प्रश्न-4. लेखन विरासत में मिला था या संयोग था कलम थामना?

उत्तर- हमारे पाठ्यक्रम में महर्षि वाल्मीकि की मूल रामायण निर्धारित थी। उसका पाठ करते रहने से लिखने की प्रेरणा हुई। यह न तो विरासत में मिली और न तो संयोग से।

प्रश्न-5. आपके अन्दर लिखने-पढ़ने के संस्कार कैसे पैदा हुए?

उत्तर- यह तो माता-पिता का आशीर्वाद और पूज्य गुरुजनों की कृपा है। वस्तुतः हमारे परिवार में पुरुष वर्ग बहुत पहले से ही लिखने पढ़ने वाले थे। वह कविता तो नहीं करते थे, किन्तु  ज्योतिष और कर्मकाण्ड के अच्छे विद्वान थे। इसका ज्ञान इस बात से भी होता है, कि हमारे घर में एक हस्तलिखित पुस्तक 332 साल पुरानी है। यह ‘ग्रहलाघव’ नामक एक ज्योतिष के ग्रन्थ की भास्वती (संस्कृत टीका)  है। इस ग्रन्थ का कागज भी हैण्डमेड है। महर्षि वाल्मीकि ,महाकवि कालिदास और भर्तृहरि की रचनाओं को पढ़ते रहने से कविता में अधिक रूचि पैदा हो गई।

प्रश्न-6. व्यस्त शेड्यूल में रचना करने के लिए किस तरह समय निकालते  हैं?

उत्तर- रचनाकार का जब मुख्य उद्देश रचना करना हो, तो आप उठते-बैठते चलते-फिरते रचना के विषय में ही सोचता है, इसलिए उसका समय मिल ही जाता है।

प्रश्न-7. आप कविता गेयता को कविता का अनिवार्य अंग मानते हैं या नहीं?

उत्तर- गेयता कविता का एक गुण तो है, किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सभी कविताएँ गाई जाएँ, यह भेद वेद से लेकर आजतक की कविता में सबके लिए दर्शनीय है, यदि सभी कविताएँ गेय ही होती तो ऋग्वेद अलग ना होता। केवल सामवेद ही होता। वस्तुतः कविता कोमल भावों की शब्दाकृति है। भाव  ही प्रधान है।

प्रश्न-8. आप लोगों को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

उत्तर- मैं समझता हूँ कि कोई भी विद्या बपौती नहीं होती। यदि कोई भी इस दिशा में परिश्रम करता है तो वही विद्यावान हो जाता है। इसलिए नए लोगों को भी इस दिशा में एकाग्रता के साथ परिश्रम करना चाहिए।

प्रश्न-9. आगे की क्या योजना है?

उत्तर- संप्रति रचना के अलावा पाणिनीय व्याकरण का एक कोश बनाना चाहता हूँ। इससे अध्येताओं को अधिक सुविधा हो सके।

प्रश्न-10. अभी तक आपने कुल कितनी भाषाओं में रचनाएँ की हैं?

उत्तर- मैं आरम्भ में संस्कृत के छन्द में गढ़वाली भाषा में एक चिट्ठी जैसी रचना की थी, बाद में उसका हिन्दी में भी संस्कृत छन्दों में ही काव्यानुवाद किया था और फिर संस्कृत के अनुष्टुप छन्द में संस्कृत काव्यानुवाद किया था। किन्तु उक्त रचना प्रकाशित नहीं है। हिन्दी में हंसबाला नामक एक रचना भी संस्कृत छन्दों में है। यह भी प्रकाशित नहीं है। इसके अतिरिक्त एक रचना हिन्दी में और भी की थी ‘अनधिगता’, किन्तु इनमे कोई भी प्रकाशित नहीं है। संस्कृत में अधिकाँश रचनाएँ प्रकाशित हैं।

प्रश्न- 11. आप संस्कृत के उत्थान के लिए युवावर्ग को क्या सन्देश देना चाहते हैं?
  
उत्तर- संस्कृत का उत्थान करने के लिए शिक्षाशास्त्रियों को चाहिए कि वह व्यास और वाल्मीकि की रचनाओं के अंश पाठ्यक्रम में अवश्य रखें। इससे छात्रों की प्रतिभा का विकास होगा और वे हमारे शास्त्रों को समझने की क्षमता वाले होंगे।

प्रश्न-12. रचनाकार का अपनी जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है? आप क्या कहते हैं?

उत्तर- जमीन से जुड़े रहना तो सबके लिए आवश्यक है। वस्तुतः इसके लिए यत्न करने की आवश्यकता भी नहीं है। क्योंकि यह स्वाभाविक हैं। पाणिनीय व्याकरण के 'स्थाने$न्तरतम:' (अष्टाध्यायी 1/1/50) पर महर्षि पतंजलि ने स्थान से जुड़े रहने को बड़े विस्तार से स्वाभाविक सिद्ध किया है।

प्रश्न-13. आपकी इच्छा क्या है?

उत्तर- मैं किसी भी पढ़ने की इच्छा रखने वाले को पढ़ाना चाहता हूँ, जिससे आगे वह भी किसी को पढ़ावें।

प्रश्न-14. आज संस्कृत के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां हैं? उनके समाधान के लिए क्या उपाय किये जा सकते हैं?

उत्तर- संस्कृत को पाठ्यक्रम से हटाया जा रहा है। इस पर ध्यान देना चाहिए। संस्कृत विषय पाठ्यक्रमों में प्रथम तो अनिवार्य रूप से अथवा वैकल्पिक रूप से रखना चाहिए। साक्षात्कार में संस्कृत को वरीयता देंगे तो अपने आप सब संस्कृत पढ़ेंगे।

प्रश्न-15. विदेशों में संस्कृत की क्या स्थति है? कहाँ-कहाँ कार्य हो रहे हैं?

उत्तर- विदेशों में अब संस्कृत के प्रति विद्वानों का रुझान बढ़ रहा है। बहुत से देशों के विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभागों में संस्कृत की पढ़ाई की जाती है।

प्रश्न-16. यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ते तो क्या करते?

उत्तर- यदि मैं संस्कृत न पढ़ता तो कुल परम्परा के अनुसार ज्योतिष और कर्मकाण्ड तो पढ़ता ही और वही करता जो हमारे पिता और पितामह आज ने किया।

प्रश्न-17. संस्कृत के पाठ्यक्रमों एवं परीक्षा प्रणाली में क्या-क्या सुधार किये जायें?

उत्तर- यहाँ पहले भी कहा जा चुका है, संस्कृत के पाठ्यक्रम में ऋषियों के ग्रन्थों को अधिक महत्व देना चाहिए परीक्षाएँ केवल लिखित नहीं मौखिक भी होनी चाहिए।

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