पिघलता मोम (लघुकथा)

कुणाल शर्मा

- कुणाल शर्मा

"सुनो, जाकर बाहर से चुन्नू को बुला लाओ जी। कल बाबूजी का मैथ्स का पेपर पर सारा दिन गली के बच्चों के साथ खेलता है" पत्नी ने दूसरी बार टीवी से मेरा ध्यान खींचते हुए कहा।

"ओके" एक लम्बी सांस छोड़ते हुए मैंने कहा और अनमने मन से  उठकर बाहर गेट के पास आ गया। बाहर आकर मैं चुन्नू को हाँक लगाने वाला ही था कि गली के दूसरे छोर से हाथ में अपना बैट थामे वह घर की ओर ही बढ़ रहा था।

इससे पहले मैं उसे हल्की-फुल्की डाँट लगता वह गुस्से भरे अंदाज में बोला, "गंदे से शानू और धीर को कभी अपना बैट नहीं दूंगा, उनके साथ कभी नहीं खेलूंगा।"

गेट से होकर वह कमरे में दाखिल हो गया।

"शानू और धीर को तो अपने बर्थ डे पर भी नहीं बुलाऊंगा, सब से कुट्टी है मेरी" उसने अपना गुस्सा फिर से उड़ेला।

हमें समझते कतई देर नहीं लगी कि अपने दोस्तों से लड़-झगड़कर कर आया है।

"अच्छा चुन्नू , पहले ये दूध पी लो। फिर अपने पेपर की तैयारी शुरू कर दो" पत्नी ने दूध का कप उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।

चुन्नू ने दूध पीकर कप टेबल पर टिका दिया। होंठों के कोर पर लगे दूध को कमीज की आस्तीन से साफ कर वह पढ़ने बैठ गया। अभी मुश्किल से उसने एक दो पन्नें ही पलटे थे कि  कुछ सोचकर किताब को बेड पर रख दिया ओर अपना बैट उठा लिया।

"अब क्या हुआ?" मैंने खीझते हुए पूछा।

"पापा, कुछ नहीं। बस, दो मिनट में आया।"

"क्यों, कहाँ जा रहे हो?" मैंने आवाज पर जोर डालते हुए पूछा।"

"पापा, शानू और धीर के पास खेलने को बैट नहीं है, बस उन्हें देकर अभी आया" कहकर वह दौड़ता हुआ गेट से बाहर निकल गया।

2 comments :

  1. बाल मन की निष्कपट कोमलता को सहज ही दर्शाती सुन्दर कथा... सादर कुनाल भाई.

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है।

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।