शान्ति - कहानी

मनमोहन भाटिया

पागल, पागल, पागल की आवाज के साथ कुछ बच्चे शोर मचाते हुए भाग रहे थे, उनके पीछे एक महिला अभद्र गालियाँ बकती हुई पीछा कर रही थी। उस महिला ने एक पत्थर उठा कर उन आगे भागते हुए बच्चों की ओर फेंका। निशाना गलत साबित हुआ, वह पत्थर किसी बच्चे को नही लगा। महिला अधेड़ थी, इसलिए बच्चों की रफ्तार का मुकाबला नही कर सकी। हाँफते हुए एक मकान के दरवाजे का सहारा लेकर खडी हो गई। विमल टेम्पों में बैठा उस महिला का चेहरा नही देख सका। उसने पत्नी वृन्दा से सिर्फ इतना कहा, “कहाँ मकान ले लिया? यहाँ तो पागल भी रहते हैं और बच्चे भी शरारती हैं। जरा संभल के रहना होगा।”
“क्या कर सकते हैं। अब मकान खरीद लिया है, रहने आ गए है। मकान तो अपनी मर्जी का सोच समझ कर खरीद सकते है, लेकिन पड़ोसी कैसे मिलेंगे, इसकी गारंटी कोई नही दे सकता है। आज अच्छा है, कल कोई खराब पड़ोसी भी हो सकता है। मैं और आप कुछ नही कर सकते हैं।” वृन्दा ने एक गहरी साँस लेकर कहा।

कुछ दिन बाद शाम के समय विमल आफिस से घर वापिस आ रहा था। गली में प्रवेश करते अचानक विमल को अपनी बाईक में ब्रेक लगानी पडी, क्योंकि एक अधेड महिला अचानक से एक मकान से भागती हुई आई, बाईक को देख कर घबराहट में जमीन पर गिर पडी। अचानक ब्रेक लगाने के कारण बाईक का बैलेंस बिगड गया। विमल भी औधें मुँह गिर गया। उस महिला ने अंट शंट दो चार गालियां बकी, फिर फुर्ती से गली से बाहर भाग गई। यह घटना क्रम इतनी तेजी से हुआ कि विमल उस महिला का चेहरा नही देख सका। गली के दो युवकों ने विमल को सहारा देकर उठाया। विमल ने अपने जिस्म का मुआइना किया। सडक की रगड़ लगने से उसकी जैकेट, स्वेटर, पेंट फट गई थी। घुटने, हाथों पर खरोंचों ने अच्छा खासा नक्शा बना डाला था। मोटे गर्म कपड़ों के कारण चोट थोडी कम लगी। एक युवक ने बाईक को स्टेंड पर लगाया। दूसरे युवक ने विमल के हुलिए को देख कर कहा, “भाई साहब ज्यादा चोट लगती है, फौरन डाक्टर के पास जाकर टिटनेस का इंजेक्शन लगवा कर दवाई लीजिए।” 'साली पागल' कह कर उसने भी उस महिला को दो-चार गंदी गालियाँ बक दी। तभी एक बुजुर्ग उस मकान से निकले, जहाँ से वह महिला भागती हुई उसकी बाईक के सामने गिर पड़ी थी। उन बुजुर्ग ने दोनों हाथ जोड कर विमल से माफी मांगी। “पागल है, बेचारी, माफ कर दो। आपको चोट लगी है, मैं आपको डाक्टर के पास ले चलता हूँ।”

“किस-किस को डाक्टर के पास ले जाऔगे। साली पागल को पागलखाने में भेजो।” कह कर उस युवक ने फिर से माँ बहन की चार-पाँच गालियाँ बक दीं। बुजुर्ग की आँखों में आँसू छलक आए। डाक्टर का क्लिनिक पास में था। जख्मों पर दवा लगवाते विमल ने उन बुजुर्ग से पूछा। “कौन थी वो?”

“मेरी बेटी।”

“लोग उसे पागल कह रहे थे, क्या यह बात सच है?”

“हाँ बेटे, पागलखाने भी रखा था उसे, कभी कभी पागलपन के दौरे पडते है, इस उम्र में देखा और सहा नहीं जाता। लोग सरे आम गालियाँ बकते हैं, तो वह भी पलट के जवाब देती है।” कह कर बुजुर्ग चुप हो गए। विमल ने कुछ और अधिक जानना चाहा, लेकिन बुजुर्ग चुप रहे तो चुप्पी देख कर विमल ने अधिक जानना उचित नही समझा।

दवा लेकर विमल घर पहुँचा तो लंगडाते पति को देखकर वृन्दा सन्न रह गई, “क्या हुआ?”

“बाईक के आगे एक महिला अचानक से आ गई, ब्रेक लगाई तो बैलेंस बिगड गया, गिर पडा, थोडी चोट लग गई। लोग कह रहे थे, वह पागल है, हमारी गली में रहती है, मुझे तो मालूम नही, क्या तुम्हे कुछ मालूम है?” विमल ने वृन्दा से पूछा।

पड़ोस कैसा है, आमतौर पर मर्दो को अधिक फर्क नही पड़ता। पूरा दिन तो आफिस में कामकाज में बीत जाता है। गृहणियों को हमेशा आसपडोस से वास्ता रहता है। इसलिए उनकी ख्वाहिश एक अच्छे पडोस की जरूर रहती है। नए मकान में शिफ्ट हुए विमल और वृन्दा को दो महीने हो गए। आफिस आते जाते दो चार बार गली के बाशिन्दो की बात उसके कानों मे पड जाती कि साली पागल है, पूरी पागल। अपने बच्चों को उससे दूर ही रखो। कोई भरोसा नही उसका। कोई पत्थर मार कर कभी सिर तोड दे। पता नही पागलखाने वालों ने कैसे छोड दिया उसको। विमल इन दो महीनों में यह नही जान सका कि वह पागल महिला कौन है। कभी फुरसत ही नही मिली और आज रास्ते में वह महिला टकराई तो चोट खा बैठा। आज उसने जब पत्नी वृन्दा से पूछा कि क्या वह गली में रहने वाली पागल महिला को जानती है?

“सुना तो है, कि वो पागल है, पर मेरा दिल नही मानता उसे पागल।” वृन्दा के मुख से यह बात सुन कर विमल हैरान हो गया।

“इसका मतलब है, कि तुम उसको जानती हो?”

“हाँ, उसको जानती हूँ।अक्सर वह हमारे घर आती है।”

“क्या कह रही हो तुम वृन्दा? एक पागल औरत का हमारे घर आना जाना है, यह बात तुम हँस कर कह रही हो?” विमल की परेशानी बढ़ती जा रही थी।

“परेशान होने की कोई जरूरत नही है, मेरा यकीन करो। जब तुम उससे मिलोगे, तब दाँतों तले उंगली दबा लोगे। लोहा मान लोगे उसकी काबलियत का।”

विमल समझ नही सका कि जब सब उसे पागल कहते है, उसका पिता भी उसको पागल कह रहा था, उसके मुँह से गंदी गालियों की बौछार खुद उसने सुनी। उसकी पत्नी वृन्दा ने उसे अकलमंद घोषित कर दिया। पत्नी की बात सुन कर उस महिला से मिलने की तमन्ना विमल को तीव्र हो गई। वह घड़ी इस घटना के तीसरे दिन ही आ गई। दो दिन से विमल को बुखार हो रखा है। सर्दियों के दिन सूरज देव रुष्ट हो कर न जाने कहाँ छुपे हुए हैं, किसी को नहीं मालूम है। हर आदमी परेशान है, ढूँढने भी कहाँ जाए? सर्द हवाओं के बीच शरीर में झरझुरी सी होती रहती है। गर्म कपडों को लाद कर सींकिया पहलवान भी दारासिंह से कम नही लगता है। दस बारह किलो वजन बढ जाता है, गर्म कपडों में शरीर को छुपा कर।

एक तो बुखार, ऊपर से जाडा, सूर्य देव का प्रकोप, विमल दो दिनों से रजाई से बाहर ही नही निकल सका। पसीने से लथपथ विमल की नींद सुबह चार बजे खुली। बुखार उतरने के पश्चात शरीर एकदम निचुडा हुआ, गला प्यास से सूखा हुआ। कमरे में नाईट लैंप का नीला मध्यम प्रकाश सर्दियों की डरावनी भयानक रात में सूकून देने में सक्षम था। जाडे के मौसम में रजाई हटा कर घड़ी में समय देखा। फिर मन ही मन कहा, अभी तो चार बजे हैं। सर्दियों की रात, एकदम शून्य सी रात, चारों ओर सन्नाटा, घड़ी की टिकटिक सन्नाटे में कह रही थी, समय तुम्हारे साथ है। रात की शान्त शून्य सी रात में भी घड़ी की आवाज सिर्फ यही बतलाती है, समय सच्चा साथी है, जो हर समय साथ रहता है, बाकी कोई सुध नही लेता। जीवनसंगिनी भी घोड़े बेच कर खर्राटे भरती हुई चैन से सो रही है। उसे पति के स्वास्थ्य की चिंता है, दो दिन से तीमारदारी कर रही है। रात को अचानक नींद खुलने पर समय तो साथ है, पत्नी को दो घड़ी चैन लेने का अधिकार है इसलिए उसको उठाना उचित नही है। प्यास बुझाने के लिए पानी वह स्वयं ही गिलास में भर कर पी लेता है। प्यास को शान्त करने के पश्चात रजाई ओढ़ कर करवट बदली। समय पर वार करती हुई पत्नी वृन्दा नींद से जागी और विमल से पूछा, “कुछ चाहिए?”

“प्यास लग रही थी।” विमल ने कहा।

रजाई हटाकर वृन्दा ने कहा, “अभी पानी पिलाती हूँ।”

“मैंने पानी पी लिया है।” विमल ने घीरे से कहा।

“मुझे जगाया होता, तबीयत ठीक नही है, दो दिन से आँख भी नही खोल सके। पहलवान बनने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

वृन्दा की बात सुन कर विमल हँस दिया। विमल की खिलखिलाहट से वृन्दा भी मुसकुरा उठी। “शुक्र है, होठों पर हँसी आई। अच्छी तबीयत के लक्षण हैं।”

“हाँ, बुखार इस समय नदारद लग रहा है।” विमल ने वृन्दा की ओर मुख करके कहा।

“बिलकुल छूमंतर होना चाहिए बुखार को। लेकिन आप अब जाग कर बातों में अपनी शक्ति व्यर्थ न करे। आराम करके पूरे स्वस्थ हो जाईए। यदि नींद नही आ रही है, तब भी लेट कर पूरा आराम कीजिए।” कह कर वृन्दा ने नाईट लैंप को बुझा दिया। नीला प्रकाश कालिमा में बदल गया। थोडी देर तक विमल अंधेरे में घड़ी की टिकटिक सुनता रहा। फिर नींद के आगोश में कैद हो गया। रात को काफी देर तक जागने और बुखार की कमजोरी के कारण विमल सुबह देर तक सोता रहा। वृन्दा ने आठ बजे विमल के माथे पर हाथ रखा। विमल शान्त एक छोटे बालक की भांति सो रहा था। माथे पर हाथ से स्पर्श से उसने आंखे खोली। एक हल्की सी मुस्कुराहट के साथ विमल ने वृन्दा को देखा।

“कैसी तबीयत है अब?” वृन्दा ने रजाई को ठीक करते हुए पूछा।

“आज बहुत अच्छा लग रहा है।” विमल ने धीरे से मुस्कुरा कर कहा।

“दो दिनों से उठे नही हो। ब्रश कर लो, तब तक चाय बनाती हूँ। थोडा बिस्तर से बाहर निकलो। देखो आज तो सूर्य देव भी प्रसन्न मुद्रा में सुबह सुबह प्रकट हुए है।” कह कर वृन्दा ने खिडकी का परदा हटाया।

बिस्तर में लेटे हुए ही विमल ने नजरे खिडकी से बाहर दौडाते हुए सामने की इमारत पर टिकाई। सूरज की लालिमा से इमारत उज्जवल हो कर नहाई हुई प्रतीत हो रही थी। उठ कर बाथरूम जाकर फ्रेश हुआ तब तक वृन्दा चाय बना कर ले आई। चाय की चुस्कियों के बीच समाचारपत्र पढने लगा। विमल को चाय देकर वृन्दा नहाने चली गई। एक घन्टे बाद सूर्य देव ने अपने प्रकाश से सभी जीव जन्तुऔं के बदन में चुस्ती फुर्ती भर दी। सभी मकानों की बालकोनी में या फिर घर के आंगन में सूर्य देव के ताप से सर्दी का सामाना करने के लिए कमर कस कर ऐसी तैयारी में जुटे हुए थे, मानों किसी युद्ध में जाना हो। सर्दी को दूर भगाना किसी युद्ध से कम नही है। दो दिनों बाद आज विमल को भी बुखार से आजादी मिली थी। दस बजे डाक्टर से दवा लेने के बाद विमल घर वापिस आकर बरामदे में बैठ कर धूप सेंकने लगा। वृन्दा डाक्टर के क्लिनिक से मार्किट में रसोई का सामान खरीदने के लिए रूक गई। विमल समाचारपत्र पढ रहा था तभी कालबैल की आवाज सुनकर विमल ने दरवाजे की ओर देखा। गेट पर एक महिला खडी थी। साँवला सा रंग, औसत कद, साधारण सी साड़ी और शॉल पहने उस महिला ने विमल से पूछा, भाई साहिब, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?

अंदर आने के प्रश्न पर विमल ने महिला को पहचानने का प्रयत्न किया लेकिन असफल रहा। “मैंने आपको पहचाना नही?” विमल ने कुर्सी पर बैठे बैठे कहा।

हालांकि विमल ने उस महिला को नही पहचाना था फिर भी स्वयं गेट खोल कर अंदर आ गई और विमल के सामने रखी कुर्सी पर बैठ गई। विमल उसके इस बेबाक अंदाज से हैरान हो गया। विमल के कुछ कहने से पहले ही उस महिला ने अपना परिचय दिया। “मैं शान्ति हूँ, भाई साहिब गली में दूसरा मकान जो है वहाँ मैं रहती हूँ। आते जाते मैं आपको देखती हूँ लेकिन आश्चर्य की बात है कि आपने मुझे नही पहचाना। वृन्दा भाभी तो मुझे जानती हैं। मैं उनसे मिलने आई हूँ।”

“वृन्दा अभी मार्किट में है थोडी देर में आएगी।” विमल कह कर मन ही मन सोचने लगा, औरतों की नजर काफी तेज होती है, कोई बच नही सकता। उसने आज तक शान्ति को नही देखा। खैर देखा भी कैसे होगा। अभी दो महीने पहले ही तो इस मकान में आए है। सुबह सुबह जल्दी आफिस जाना, रात को घर वापिस आना। यही दिनचर्या है विमल की। पडोस में कौन रहता है, विमल को मालूम नही। उसके दिल दिमाग में यह बात भी नही आ सकती थी कि यह महिला वही है, जो उसकी बाईक के आगे गिरी थी, लोग उसे पागल कह रहे थे क्योंकि वह उसका चेहरा नही देख सका था। विमल सोच ही रहा था कि शान्ति ने मौन तोड कर कहा। “भाई साहिब, क्या मैं समाचारपत्र पढ सकती हूँ?”

“हाँ हाँ, अवश्य।” विमल ने हिन्दी का समाचारपत्र आगे बढाया। शान्ति समाचारपत्र पढने लगी। विमल की नजरें समाचारपत्र में थी लेकिन सोच कहीं ओर शान्ति की तरफ। आखिर कौन है, वह? वृन्दा भी घर पर नही है। आज पहली बार एक अजनबी महिला से मिला। उसे झेंप हो रही थी, लेकिन वह अजनबी महिला शान्ति मजे में समाचारपत्र पढ़ रही है, जैसे घर विमल का नही, बल्कि शान्ति का हो, और विमल उससे मिलने आया हो। हिन्दी का समाचारपत्र पढ़ने के बाद शान्ति नें अंग्रेजी का समाचारपत्र मांग कर पढा। विमल को शान्ति एक आफत लग रही थी। उससे कैसे पीछा छुड़ाया जाए, अभी वह इस उधेडबुन में था कि वृन्दा मार्किट से वापिस आ गई। वृन्दा को देखकर शान्ति मुस्कुरा कर बोली “हाए भाभी।” वृन्दा ने भी कहा “हाए शान्ति कब आई। तबीयत ठीक है न।”

“बिल्कुल ठीक है। मगर यह क्या भाई साहब को बीमार बना दिया” शान्ति ने अपनेपन से कहा।

वृन्दा ने हंसते हुए जवाब दिया, “तू भी शान्ति पागलों जैसी बाते करती है। क्या मैंने अपने पति को बीमार किया है? तू खुद देख रही है कितनी ठंड है। ठंड लग गई है।”

“हाँ भाभी, ठंड तो बहुत है, उसी कारण मैं भी तीन दिन बिस्तर पर पड़ी रही।” शान्ति इतना कह कर वृन्दा के पीछे अंदर कमरे में चली गई और विमल ने चैन की सांस ली कि खैर है, वृन्दा शान्ति को जानती है वरना वृन्दा नाराज हो कर विमल पर ही बरसती कि बिना जान पहचान के किसी को घर में बिठा लिया, अगर किसी गैंग की सदस्या होती, कुछ ऊँच नीच हो जाती तो कौन जिम्मेवार होता। उधर शान्ति, वृन्दा आपस में बाते कर रही थी और इधर विमल कुछ देर तक समाचारपत्र पढ़ कर कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गया। बीमारी के बाद थकान के कारण विमल की आँख लग गई।

दोपहर को खाने के समय विमल ने वृन्दा से शान्ति के बारे में पूछा। वृन्दा ने बताया “इससे तुम मिलना चाहते थे और मेरी गैरहाजिरी में मिल ही लिए।”

“मैं समझा ही नही, कि क्या कहना चाहती हो तुम।”

“यह शान्ति वही पागल औरत है जिसका तुम पूछा करते थे और मैं कहा करती थी कि वह एक अक्लमंद है। उसको पागल कहने वाले खुद पागल हैं।” वृन्दा की बात सुन कर विमल इतना ही कह सका। “हां वह पागल नही है। तुम और क्या जानती हो उसके बारे में।”

वृन्दा ने शान्ति के बारे में बताना शुरू किया। शान्ति सामने वाली कतार के दूसरे मकान में अपने माता पिता के साथ रहती है। पढी लिखी महिला का जीवन एक दुख भरी कहानी है। विवाहित शान्ति अपने पति और बच्चों से दूर अपने मायके रहती है। वृन्दा की नजर में शान्ति में कोई कमी या खोट नजर नही आता है फिर भी ससुराल और पति ने घर से निकाल दिया। शान्ति के दो बच्चे हैं, दोनों लड़के। और दो बच्चों की माँ शान्ति को पागल घोषित करके मायके बिठा दिया गया है।

“बातों से तो पागल नही लगती है। अंग्रेजी का समाचारपत्र पढ रही थी। उसके व्यवहार, बातचीत के तरीके से हर व्यक्ति उसे सयाना ही कहेगा।” विमल की समझ से परे था कि लोग उसे पागल क्यों कहते है? यह विषय ही कुछ ऐसा है। इतनी जल्दी कैसे किसी नतीजे पर पहुँचा जा सकता है। किसी की कोई भी बात सच मान कर विश्वास करना ही पडता है। समय बीतने पर किसी व्यक्ति के साथ रहने पर ही उसकी असलियत पता चलती है। विमल ने इसी तर्क पर शान्ति के बारे में सोचना बंद कर टेलीविजन के चैनल बदलना शुरू कर दिया। उसे पक्का यकीन हो गया कि वृन्दा ने शान्ति को सही परखा है। दो दिनों पश्चात बीमारी से छुटकारा पाकर अपने रूटीन के कार्यों में व्यस्त हो गया, वोही दिनचर्या, सुबह जल्दी आफिस जाना, रात को देर से घर वापिस आना। आफिस से एक सप्ताह की छुट्टी पर सारा पेंडिंग काम निबटाने के साथ नया काम भी साथ साथ पूरा करने के चक्कर में रोज रात को आफिस में बैठ कर काम करने पर वृन्दा ने एक दिन बोल ही दिया, “अधिक काम के बोझ में फिर तबीयत बिगाड लोगे। काम तो कभी समाप्त नही होंगे।”

“क्या किया जाए श्रीमति जी आदमी को मशीन समझ कर काम करवाया जाता है आफिसों में।”

“मशीन भी तो खराब हो जाती है?”

“नई मशीन खरीद लो। यही नुख्सा अपनाया जाता है। मनुष्य की कोई औकात नही है। मशीन से भी खराब हैसियत है। काम में जरा सी देरी हुई नही, फौरन आर्डर हो जाते है, निकालो सालों को, नई भरती करलो।”

विमल के इस तर्क पर वृन्दा चुप होकर रसोई के कार्यों में जुट गई।

लगभग बीस दिनों के बाद विमल का काम रूटीन पर आया। शनिवार के हाफडे पर ठीक दोपहर के दो बजे विमल ने ब्रीफकेस उठाया, घर की ओर रवानगी की। जैसे ही गली में प्रवेश किया, शान्ति अपने घर के दरवाजे पर खडी थी। विमल को देखकर मुसकुरा कर बोली। “भाई साहब नमस्ते।” शिष्टाचार के कारण विमल कुछ पल के लिए रूक कर शान्ति के नमस्ते का जवाब दिया। शान्ति और विमल का वार्तालाप दस मिन्टों तक चलता रहा। आफिस और फिर सुबह के समाचारपत्र की सुर्खियों के बाद टीवी सीरियल पर बातें हो गई। दस मिन्ट बाद कुछ झेंप कर शान्ति बोली। “अंदर आईये, भाई साहब, मैं भी कितनी पागल हूँ, कि आप आफिस से थके आए हैं, आपको बैठने को भी नही कहा।”

“नहीं शान्ति, बहुत दिनों बाद आज दोपहर का भोजन वृन्दा के साथ करने का मौका मिला है, रुकूंगा नही।” कह कर विमल ने घर की ओर प्रस्थान किया।
“ओके बाय, भाई साहब।” कह कर शान्ति भी घर के अंदर चली गई।

घर के दरवाजे पर वृन्दा विमल का इंतजार कर रही थी, हँसते हुए बोली। “सहेली से गपशप कर आए।”

थोड़ा झिझकते हुए विमल हैरानी से बोला, “सहेली? कौन सहेली? सीधा आफिस से आ रहा हूँ।”

“मैं तो यहाँ दरवाजे पर इंतजार करते हुए दस मिनट से शान्ति के साथ होता मधुर वार्तालाप देख रही थी, अफसोस है कि बातें सुन नही सकी।”

“और शान्ति, उसने तो पकड़ ही लिया, शिष्टाचारवश वार्तालाप हो गया।”

“ठीक है मैं कुछ कह थोड़े रही हूँ, अंदर चलो। कितने समय बाद आज मौका मिला है साथ साथ खाना खाने का, समय व्यर्थ गँवाना नहीं है।” कह कर वृन्दा ने विमल के हाथ से ब्रीफकेस लिया। हाथ मुँह धोकर विमल ने खाना खाते हुए वृन्दा से पूछा। “आखिर क्या बात है कि शान्ति को पागल कहते है, आज दस मिन्ट के वार्तालाप में वह मुझे समझदार, अकलमंद लगी। हर विषय पर बात कर सकती है। राजनीति, खेलकूद, सिनेमा, टीवी, कोई विषय नहीं छोड़ा उसने। फर्राटेदार अंग्रेजी भी बोलती है। लोग पागल क्यों कहते हैं, उसको?”

खाना खाने के बाद सर्दी की धूप सेंकते हुए वृन्दा ने कहा। “शान्ति मेरे पास हर रोज आती है, जो उसके बारे में तुम्हारी राय है, ठीक वही राय में रखती हूँ उसके बारे में। कई बार जब उसका मन विचलित होता है तो अपना दुखडा सुनाती है। उसकी बातों में सच्चाई है। शान्ति नाम उसका अवश्य है, लेकिन दुनिया ने उसका जीवन अशान्त बना रखा है। शान्ति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा कालेज से अंग्रेजी में एमए किया है। एक तो अमीर माँ-बाप की संतान और फिर उस समय लड़कियां नौकरी में कम ही जाती थी। कमसे कम अमीर घराने की लडकियों का तो नौकरी करने का कोई मतलब ही नही होता था। एक संपन्न घराने में विवाह हो गया। पूरी गृहस्थन बन गई शान्ति। लेकिन नियती को कुछ और मंजूर था। तीसरे बच्चे की डिलीवरी के समय शान्ति का स्वास्थ्य बिगड गया, नौबत यहां तक आ गई कि माँ या बच्चे में से कोई एक बच सकता था। डाक्टरों के प्रयास से शान्ति तो बच गई, लेकिन बच्चे को बचाया नही जा सका। दो साल तक शान्ति बिस्तर के हवाले थी। छोटे बच्चों के लालन पालन के साथ शान्ति का बिस्तर पर पडा शरीर ससुराल के साथ पति को भी एक बोझ लगने लगा। ससुराल वालों ने शान्ति को मायके भेज दिया। शारीरिक रूप में असमर्थ शान्ति ने पति को दूसरे विवाह की अनुमति इस आधार पर दी कि कम से कम उसके बच्चों का लालन पालन सही हो सकेगा। छोटे बच्चे अपनी माँ को भूलकर सौतेली माँ को अपना समझने लगे।

अपने बच्चों से मिलने की आशा ने शान्ति को नया जीवनदान दिया। प्रबल इच्छा शक्ति के कारण बिस्तर से उठ कर अपने पैरों पर खडी हो गई, लेकिन लम्बी बीमारी ने उसका यौवन खींच लिया था। एक थके हुए शरीर को पति ने स्वीकार नही किया। बच्चों को यह कह कर दूर कर दिया कि वह तो पागल है। बच्चों के नाजुक मन पर एक ऐसी छाप छोडी कि बच्चे शान्ति के कंकाल जैसे शरीर को देखकर सहम जाते। पति एक असहाय, लाचार, टूटे फूटे शरीर, अस्वस्थ पत्नी से पीछा छुडाना चाहता था, यदि बच्चे उसके साथ घुलमिल जाते तो दूसरा विवाह मुश्किल था। उससे छुटकारा पाने के लिए पागलखाने में डाल दिया। पति और बच्चों से जुदाई जब भी शान्ति याद करती तो बेतहाशा रोने लगती। अपने अंदर की अग्नि को शांत करने के लिए चिल्लाने लगती। उसके माँ-बाप यही समझते कि शान्ति सचमुच में पागल हो गई है। उसको पागलखाने भी रखा गया। बिजली के झटके भी लगाए जाते। वह बच्चों की जुदाई में रोती रहती और दुनिया उसे पागल कहती। उसका दर्द कोई नही समझ सका। आखिर थक कर शांत हो गई तो पागलखाने से छुट्टी मिल गई। तबसे वह अपने बूढे माँ-बाप के संग रह रही है। किसी ने उसकी वेदना नही समझी। अकेले में जब तड़पती, तो सभी उसे पागल समझते। मुझे तो लगता है कि जो शान्ति को पागल समझता है वह खुद सबसे बडा पागल है। एक अस्वस्थ स्त्री को पागल बनाकर छुटकारा पाना सबसे बडी मूर्खता है लेकिन हर व्यक्ति सिर्फ अपना स्वार्थ ही देखता है। दूसरा जाए चाहे भाड़ में। वह पागल नहींं थी। एकान्त में बातों को याद करके रोया करती। उसका रोना सबको पागलपन लगता। बच्चे छेड़ते तो उसे गुस्सा आ जाता। वह क्या कोई भी एैसे मौके पर अपना आपा खो देगा। इसमें शान्ति का कोई कसूर नहीं। विमल और वृन्दा की नजरों में शान्ति एक आम इंसान थी। पडोसी, गली में हर व्यक्ति यहाँ तक कि उस खुद के माँ-बाप भी पागल ही कहते। हर कोई उन्हे सलाह देता कि शान्ति से दूर रहें। क्यों एक पागल के साथ दोस्ती, नजदीकियाँ बना रहे हो? लेकिन उनका दिल नही मानता था। शान्ति उनके घर का एक हिस्सा बन गई थी। विमल के साथ समाचारपत्र पढते हुए सामायिक विषयों पर चर्चा करती शान्ति विमल को एक दार्शनिक प्रतीत होने लगी।

रविवार को विमल घर के आंगन में बैठकर गमलों में लगे पौधौं की देखभाल कर रहा था। शान्ति तभी आई। मिट्टी से सटे कपडों में विमल को देखकर वह हँस दी। “भाईसाहब आप कभी खाली नही बैठते। रविवार को छुट्टी का दिन है। आप पौधों की देखभाल में जुट गए।”

“शान्ति पौधौं में भी जान होती है। बिना देखभाल के मुरझा जाएगें। देखो यह तुलसी का पौधा है, तुलसी में औषधीय गुण हैं। यह गुलाब के पौधे।” इतना सुन कर शान्ति बोल उठी, “गुलाब की महक ही अलग है। तभी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अपनी अचकन में गुलाब का फूल लगाते थे।”

वृन्दा दोनों की बाते सुन रही थी, उसने शान्ति को संबोधित करते हुए कहा, “नेहरू जी, तुम्हारे भैया कभी कभी तो फँसते है घर के कामकाज में हाथ बाँटने के लिए। उनको काम करने दे और तू अंदर रसोई में आकर मेरा हाथ बँटा।” इतना सुनते ही शान्ति खिलखिलाते हुए लंबे डग भरते हुए वृन्दा के साथ रसोई में जुट गई।

जैसे जैसे समय बीतता गया। शान्ति की विमल, वृन्दा के साथ घनिष्ठता बढती गई। शाम को जब विमल आफिस से घर पहुँचता तो अक्सर वृन्दा के साथ शान्ति भी घर के दरवाजे पर स्वागत के लिए मिलती।

रविवार की दोपहर विमल और वृन्दा शापिंग करके घर वापिस आ रहे थे। शान्ति के घर शोर सुन कर दोनों के कदम ठिठके। शान्ति दिवारों से सिर पटक पटक कर कह रही थी, मुझे जाने दो, सिर से खून बह रहा था। उसके बुजुर्ग माँ बाप उसे संभालने में असफल थे। विमल और वृन्दा ने शान्ति को पकड़ा। विमल और वृन्दा को देखकर शान्ति को कुछ हौसला हुआ कि वे दोनों उसकी बात समझेगें। उसका उग्र शान्त हुआ। सबसे पहले नर्सिंगहोम ले जाकर पट्टी करवाई। वृन्दा ने शान्ति के गालों पर हल्की चपत लगा कर कहा, “पागल क्यों बन रही है, मुझसे कह क्या चाहती है?”

“दीदी मेरे बेटे की शादी है। मैं उसको आर्शीवाद देना चाहती हूँ। एक खुशी का मौका है, मैं भी नाचना चाहती हूँ, जश्न मनाना चाहती हूँ, मुझे सब रोक रहे है।”

वृन्दा ने हैरानी से शान्ति के माता पिता से पूछा, “आप इसको पुत्र विवाह से क्यों दूर रख रहें हैं?”

रोते रोते शान्ति के पिता ने कहा, “मैं क्यों रोकूंगा इसको? इसके पुत्र विवाह की खबर हमें मालूम थी, हमने इससे यह बात इस कारण छुपाई कि इसकी ससुराल ने सारे संबंध तोड रखे है। पति ने त्याग रखा है। बच्चे इसको पहचानते नही। क्या करेगी विवाह में जाकर। दो दिन पहले हमारे घर रिश्तेदार आए और इसके सामने विवाह की बात की। यह पागल ससुराल अपने पति और पुत्र से मिलने चली गई। पति ने दुत्कार दिया और बच्चे पहचानते नही। ससुराल वालों ने धक्के मार कर बाहर कर दिया, तभी से पगला गई है।”

“मैं पागल नही हूँ, दीदी, दुनिया पागल है। मैं जानती हूँ, दीदी आप मेरी सहायता जरूर करेंगी। मुझे मेरे बच्चे से मिलना है।”

“हाँ मैं तुझे लेकर जाऊंगी, लेकिन एक शर्त पर, तू पगलाएगी नहीं।” वृन्दा की बात सुन कर विमल हैरान हो गया कि वृन्दा ने क्या सोच समझ कर शान्ति से वायदा किया।

“हाँ हाँ दीदी, आप जैसा कहेंगी, मैं वैसा ही करूंगी।” शान्ति खुशियों से झूमने लगी।

नर्सिंगहोम से बाहर आकर विमल ने वृन्दा से कहा, “यह क्या वायदा शान्ति से किया तुमने?”

“काम मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नही है। हमें इसके पति से मिलना होगा। एक असहाय महिला को पल भर की झूठी खुशी ही सही, पूरा संसार पा लेगी वह। वह पागल नही है। स्वार्थ के कारण पागल घोषित की हुई है। शरीर से लाचार चुप कर के सब दुख सहती रही। एक छोटे बच्चे की तरह अपनी जिद पूरी करना चाहती है तो क्या बुराई है, कोई नही?” यह सोच कर अगली सुबह विमल, वृन्दा शान्ति की ससुराल पहुँचे। विवाह के शुभ उत्सव पर सभी परिवार जन विवाह संबंधित कार्यों में व्यस्त थे। शान्ति के पति घर पर नही थे, इस कारण लगभग दो घंटे उन दोनों को इंतजार करना पडा। इंतजार के बाद जब शान्ति के पति से मुलाकात हुई तो उलटे वह बिगड कर बोला। “क्या अंटशंट बक रहो हो। शक्ल से तो पढे लिखे सभ्य लगते हो, लेकिन शान्ति तो पागल है, तुम दोनों तो महापागल हो, निकल जाओ, अभी यहाँ से, मुझे कोई बात नही करनी तुम दोनों से। मंगल कार्यों में विघ्न डालने वालों की कोई कमी नही होती। किसी की खुशियाँ सहन नही कर सकता कोई।” इतना कह कर शान्ति के पति ने क्रोधित होकर कहा, “फौरन निकल जाओ वरना पुलिस को बुलाना पड़ेगा।”

जितना क्रोध शान्ति के पति को था, उतने ही शान्त विमल, वृन्दा थे। विमल ने आराम से अपनी जेब से मोबाइल फोन निकाल कर शान्ति के पति की ओर बढाया। “यह लीजिए फोन, बड़े शौक से पुलिस को बुलाइये।”

“पुरानी कहावत है, क्रोध में मति मारी जाती है। झट से 100 नम्बर डायल कर शान्ति के पति ने पुलिस को बुलाया। थोड़ी देर बाद पीसीआर की वैन ने दस्तक दी। पुलिस के सामने उसने विमल, वृन्दा को बहुत बुरा भला कहा। झगड़े में पुलिस का काम सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना होता है, अतः दोनों को थाने चलने को कहा, तब विमल ने कहा, “आप एकतरफा बात सुन रहे है। मैं चुप हूँ, इसका यह अर्थ नही कि मैं दोषी हूँ। जो दोषी है वही होहल्ला मचा रहा है। मैं थाने चलने को तैयार हूँ, वहाँ रिपोर्ट लिखवानी है कि एक पत्नी के होते हुए इन जनाब ने दूसरी शादी की। अभी तक पहली पत्नी से तलाक भी नही हुआ है, उसको घर से बेघर किया है, उसी के बेटे की शादी है, जिसमे माँ को शामिल नही करने के लिये आपको बुलवाया है। चलो थाने, बंद कीजिए इन महाशय को लॉकअप में।” विमल ने सारा किस्सा पुलिस के सामने बयान किया। इतना सुनते ही पुलिस को मसाला मिल गया और शान्ति के पति को घेरना शुरू किया, तो वह पुलिस से सौदेबाजी करने लगा। विवाह के शुभ अवसर पर झगड़ा। पुलिस थाने की नौबत से निपटाने के लिए वहाँ उपस्थित रिश्तेदार बीच बचाव में कूदे। विमल का एक ही लक्ष्य था कि शान्ति विवाह में सम्मलित होकर अपने पुत्र को एक बार गले लगा कर आशीर्वाद दे। अपनी इज्जत बचाने, कोर्ट थाने के चक्कर से बचने के लिए शान्ति के पति ने विमल की बात मान कर शान्ति को विवाह में शामिल होने की अनुमति दी। पुलिस के जाने के बाद शान्ति ने विवाह के समारोह में प्रवेश किया। शान्ति आज कितनी खुश थी, यह सिर्फ शान्ति ही जानती थी। उसकी खुशी का अंदाजा विमल, वृन्दा को था। एक मरियल से शरीर में विशेष उत्साह का संचार उत्पन्न हुआ। नाचती गाती शान्ति ने विवाह में पुत्र, पुत्रवधु को गले लगा कर आर्शिवाद दिया। वृन्दा के पैर छूकर रो पढी। पैरों से लिपट कर बस यही कहती रही, “दीदी मेरा सपना आपने पूरा किया है, मैं आपकी ऋणी हूँ।” वृन्दा ने बहुत मुश्किल से अपने पैरों से शान्ति को अलग किया। उसके माथे को चूमती हुई बोली, “पगली, आज मैं तुझको सबके सामने पहली बार कहूंगी पागल, तू पागल ही है। तुझको विवाह में शामिल होना था, हुई। इसमें ऋण कैसा। शायद मैने अपना कर्तव्य पूरा किया है।”

शान्ति के मुख पर लालिमा थी। कोई कारण नही जान सका। रात को बिस्तर पर सोने के लिए लेटी और शान्त हो गई। पूरी जिन्दगी दुखों में काटती रही। लोगों की गालियाँ सुनी। एक सुख पाकर शान्त हो गई। सारा मुहल्ला जो उस पर थूकता था। रोते रोते शवयात्रा में सम्मलित थे। एक पागल के शान्त होने पर सभी छोटे, बड़े रोए जा रहे थे। उसके शान्त होने पर ही उसका दुख समझ सके। पति और पुत्र ने अपना कर्तव्य अंतिम संस्कार करके निभाया। जो उसके घर से बच कर निकलते थे, आज रूक रूक कर घर के दरवाजे पर टकटकी लगाए हुए थे, शायद शान्ति घर से बाहर निकल आए।

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