लघुकथाएँ

विरेंदर ‘वीर’ मेहता

पत्थर दिल

पुत्रवधू के कहे शब्दों ने उन्हें इस कदर चोट पहुँचाई थी कि उनका मन स्वयं को घर लौटने के लिए तैयार नही कर पा रहा था। शाम ढलने लगी थी और वे काफी देर से इस पार्क में बैठे थे जहां अधिकतर वृद्ध लोगों का ही जमघट देखने में आता था। कुछ देर से उनकी नजरें सामने की एक बेंच पर लगी हुयी थी जहां दो वृद्ध आपस में अपने परिजनों की बातें कर रहे थे।

"केशू भाई, अब नही सहा जाता बच्चों का बेरुखा व्यवहार। कभी कभी मन करता है कि वृद्धाश्रम में ही चला जाऊं।"

"अरे सतबीर भाई तुम भी बच्चों की बातों को दिल से लगा लेते हो। मुझे देखो हर रोज 'बहू' कुछ न कुछ जला-कटा सुना ही देती है लेकिन मैंने कभी बुरा नही माना।"

"अब भाई तुम्हारे जैसा पत्थर दिल तो है नहीं अपना दिल।" कहते हुए सतबीर फीकी हँसी हँस दिया।

"हाँ भाई सतबीर!" दिल तो पत्थर का ही बना लिया है मैंने" अपनी बात कहते हुए केशू सहज ही गंभीर हो गया था। "पर बच्चों के लिखनेवाली ‘स्लेट’ के पत्थर जैसा, जिस पर लिखा हुआ सब कुछ अपने बच्चों की दिन में कही एक मीठी बात से ही साफ़ हो जाता है। अरे भाई हम भी तो बच्चों को गुस्से में न जाने कितना कुछ कह देते थे तो क्या वे घर छोड़ चले जाते थे।"

... चाहे अनचाहे केशू की बातें उनके दिल को ठंडक दे रही थी पर मन अभी अशांत था। घर लौटने के निर्णय पर वे अभी पशोपश में ही थे कि सामने बहू पोते का हाथ थामें आ खड़ी हुयी।

"ओह 'थैंकस गॉड' आप यहाँ है! बाऊजी आप भी न... मेरी बात पर बच्चों की तरह नाराज हो जाते है। पता है आप के बिना हमें घर कितना सूना लगता है।" चेहरे पर याचना, शिकायत और अपनत्व सभी झलक रहे थे।

"नहीं बहू नहीं, ऐसा तो कुछ भी नहीं। बस जरा हमउम्र लोगों के बीच वक़्त भूल गया था।" कहते हुए सहज ही, वे भी अपना दिल स्लेट के पत्थर का बना महसूस करने लगे थे।

कोशिश

"माँजी! मन तो हमारा भी नहीं कर रहा कि आप लोगों को छोड़ कर जाएँ लेकिन..." अपनी बात अधूरी ही छोड़ तनु, पुरू को साथ ले माँ के चरणों में झुक गयी।

"मैं समझ रही हूँ बेटी। हमें भी तुम्हारी कमी खलेगी और पुरू के बिना तो बहुत सूना-सुना लगेगा।"

माँ की नम आँखें और पिता की ख़ामोशी, वह भली-भाँति समझ रहा था लेकिन नौकरी के चलते उसका विदेश जाना मजबूरी बन गया था।

"अरे दादी आप उदास क्यों होती हो, मैं रोज वीडियो कॉल करूँगा न आपको।" नन्हा पुरू हँसते हुए कह रहा था। "और हम जल्दी ही लौट भी आएंगे न, कोई ज्यादा दूर थोड़े ही है इटली।"

"हाँ ठीक ही तो कह रहा है हमारा पुरू।" सुबह से चुप्पी साधे पिता पहली बार बोले थे, "इस हाई टेक जमाने में ये मीलों की दूरियां भला क्या मायने रखती है, बस मन के तार जुड़े रहने चाहिए।"

अपनी बात कहते हए उन्होंने पुरू के हाथ में एक छोटा सा पौधा रख दिया, "लो बेटा ये छोटा सा 'गिफ्ट' तुम्हारे लिये!"

"अरे बाबा ऐसे 'प्लांट' भी कोई गिफ्ट देता है क्या?"

"हाँ बेटा हम दे रहे है न तुम्हे। ये छोटा सा पौधा तुम अपने नए घर में जा कर लगा देना और जब वर्षो बाद ये खूब बड़ा हो जाएगा न, तब ये तुम्हे बाबा की तरह ही छाँव और प्यार देगा। पता नही, तब हम साथ होंगे भी या नहीं!"
पुरू तो बच्चा था लेकिन वह सहज ही पिता के मन के भावों को समझ गया। "पिताजी मैं वहां जा कर पूरी कोशिश करता हूँ न, आप लोगों को बुलाने..."

"बेटा, जीवन इतना सरल नही होता जितना दिखाई देता है।" पिता ने उसकी बात बीच में ही काट दी थी। "कभी-कभी इन कोशिशों में ही पूरा जीवन गुजर जाता है पर हम कामयाब नही हो पाते। बस रख सको तो हमारे अकेलेपन के अहसास को अपने मन में ज़िंदा रखना बेटा।" पिता की आखों में आई नमी के बीच उनका दर्द भी उभर आया था। बरसों पहले गाँव छोड़, शहर आ बसने के बाद कभी गाँव न लौट पाने का दर्द, और न ही कभी चाहकर भी 'दादा-दादी' को साथ ला कर शहर में रख पाने का दर्द...

2 comments :

  1. "पत्थर दिल"और "कोशिश"दोनो बेहतरीन लघुकथाएं।बच्चे और बूढ़ों की समान मानसिक अवस्था होती हैं।वृद्धावस्था में मान सम्मान पर गहरी चोट लगती है परंतु अपनत्व भरा हुआ व्यवहार उस पर भारी पड़ता है।पत्थर भी स्लेट जैसा हो तो अच्छा है,जिस पर लिखा हुआ जल्द ही मिट जाए।"कोशिश"में बेटे के पलायन का दर्द और स्वयं का अपराधबोध व पोते की कोशिश का मार्मिक चित्रण।हार्दिक बधाई।

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  2. पढ़ने के पश्चात कहने को कुछ बचा नही।

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