काव्य: दिनेश रविकर

दिनेश रविकर

- दिनेश रविकर

वरिष्ठ तकनीकी सहायक, इंडियन स्कूल ऑफ़ माइंस, धनबाद (झारखण्ड)
जन्म: 15 अगस्त 1960; पटरंगा मंडी (जनपद फैजाबाद), उत्तर प्रदेश

कुंडलियाँ

(1)
डेंगू-डेंगा सम जमा, तरह तरह के कीट।
खूब पटाखे दागिए, मार विषाणु घसीट।
मार विषाणु घसीट, एक दिन का यह उपक्रम।
मना एकश: पर्व, दिखा दे दुर्दम दम-ख़म।
लौ में लोलुप-लोप, धुँआ कल्याण करेगा।
सह बारूदी गंध, मिटा दे डेंगू-डेंगा।|

(2)
त्योहारों की टाइमिंग, हतप्रभ हुआ विदेश।
चौमासा बीता नहीं, आ जाता सन्देश।
आ जाता सन्देश, घरों की रंग-पुताई।
सजे नगर पथ ग्राम, नई दुल्हन की नाई।
सब में नव उत्साह, दिशाएँ हर्षित चारों।
लम्बी यह शृंखला, करूँ स्वागत त्योहारों।।

(3)
रो ले ऐ अन्धेर तू, ख़त्म आज साम्राज्य।
प्रेम नेम से बट रहा, घृणा द्वेष   त्याज्य।
घृणा द्वेष अघ त्याज्य, अमावस यह अति पावन।
स्वागत है श्री राम, आइये पाप नशावन।
धूम आज सर्वत्र, यहाँ भी देवी  हो ले।
सुख सामृद्ध सौहार्द, दान दे पढ़कर रोले।

(4)
देह देहरी देहरा,  दो, दो दिया जलाय।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय।
कुल अघ तम दहकाय , दीप दस  घूर नरदहा।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा।
देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी।
सुख सामृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी।।

देह, देहरी, देहरा = काया, द्वार, देवालय
घूर = कूड़ा
लक्षि  = लक्ष्मी

त्यौहार का मौसम 

बीत गया भीगा चौमासा। उर्वर धरती बढती आशा।
त्योहारों का मौसम आये।  सेठ अशर्फी लाल भुलाए।

विघ्नविनाशक गणपति देवा। लडुवन का कर रहे कलेवा।
गाँव नगर नवरात्रि मनाये। माँ दुर्गे की महिमा गाये।

विजया बीती करवा आए। पति-पत्नी का प्यार बढाए।
जमा जुआड़ी चौसर ताशा। फेंके पाशा बदली भाषा।।

एकादशी रमा की आई।  वीणा बाग़-द्वादशी गाई।
धनतेरस को धातु खरीदें। नई नई जागी उम्मीदें।

धन्वन्तरि की जय जय बोले।  तन मन बुद्धि निरोगी होले।
काली पूजा बंगाली की। लक्ष्मी पूजा दीवाली की।।

झालर दीपक बल्ब लगाते। फोड़ें बम फुलझड़ी चलाते।
खाते कुल पकवान खिलाते। एक साथ सब मिलें मनाते।

लाल अशर्फी फड़ पर बैठी। रहती लेकिन किस्मत ऐंठी।
फिर आया जमघंट बीतता। बर्बादी ही जुआ जीतता।।

लाल अशर्फी होती काली। कौड़ी कौड़ी हुई दिवाली।
भ्रात द्वितीया बहना करती। सकल बलाएँ पीड़ा हरती।

चित्रगुप्त की पूजा देखा। प्रस्तुत हो घाटे का लेखा।
सूर्य देवता की अब बारी।  छठ पूजा की हो तैयारी।।

दोहे 

दे कुटीर उद्योग फिर, ग्रामीणों को काम।
चाक चकाचक चटुक चल, स्वालंबन पैगाम।।

हर्षित होता अत्यधिक,  कुटिया में जब दीप।
विषम परिस्थिति में पढ़े, बच्चे बैठ समीप।।

माटी की इस देह से, खाटी खुश्बू पाय।
तन मन दिल चैतन्य हो, प्राकृत जग  हरषाय।

बाता-बाती मनुज की, बाँट-बूँट में व्यस्त।
बाती बँटते नहिं दिखे, अपने में ही मस्त।।

अँधियारा अतिशय बढ़े , मन में नहीं उजास।
भीड़-भाड़ से भगे तब, गाँव करे परिहास।।

मत्तगयन्द सवैया  

मीत समीप दिखाय रहे कुछ दूर खड़े समझावत हैं।
बूझ सकूँ नहिं सैन सखे  तब हाथ गहे लइ जावत हैं।
जाग रहे कुल रात सबै, हठ चौसर में फँसवावत  हैं।
हार गया घरबार सभी, फिर भी शठ मीत कहावत हैं।।

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