त्रिशंकु जीवन - एक भारतीय अमेरिकन

सुधीर रंजन
कविता - सुधीर रंजन, रवीना गोयल


ना इधर के रहे, ना उधर के,
बीच अधर बस अटके रहे,
ना इंडिया को भुला सके,
ना अमेरिका को अपना सके,
इंडियन-अमेरिकन बनके काम चलाते रहे।

ना हिन्दी को छोड़ सके,
ना अंग्रेजी को पकड़ सके,
देसी एक्सेंट में लोगों को कन्फ्यूज़ करते रहे, 
ना टर्की पका सके, ना ग्रेवी बना सके,
राम का नाम लेके थैंक्स गिविंग मनाते रहे।

न क्रिसमस ट्री मन से लगा सके, 
न बच्चों को सैंटा का मतलब समझा सके,
पर दिवाली पर सैंटा बनके 
तोहफे बाँटते रहे,
न शॉर्ट्स मन से पहन सके
न सलवार छोड़ सके,
जीन्स पे कुरता और स्नीकर्स चढ़ा के इतराते रहे।

न नाश्ते में डोनट खा सके,
न डिनर पे स्पघेटी,
पिज्जा पर मिर्च छिड़ककर मजा लेते रहे,
न गर्मियों को भुला सके
न बर्फ को अपना सके
खिड़की से सूरज को देखकर 'ब्युटीफुल डे' कहते रहे।

अब आई बारी भारत को जाने की,
तो वहां हाथ में पानी की बोतल लेकर चले,
न भेलपुरी खा सके,
न लस्सी पी सके,
पेट के दर्द से तड़पते मरे,
हरड़े-इसबगोल खाकर काम चलाते रहे।

ना खुड्डी पर बैठ सके,
ना कमोड़ को भूल सके,
बस बीच अधर झुकके काम चलाते रहे,
ना मच्छर से भाग सके,
ना डॉलर को छुपा सके,
नौकरों से भी पीछा छुड़ाकर भागते रहे।

सवाल पे सवाल पढ़कर,
नागरिकता तो बदलते रहे,
परन्तु मन में तिरंगा लपेटे,
ख़याली पुलाव पकाते रहे,
कुछ कर दिखाने की कस्में खाते रहे,
ना इधर के रहे, ना उधर के।

2 comments :

  1. Bahut Badhiyaa ; Laajawaab !!!
    Aur Yathaarth ko Vyakt kartee rachnaa !!!1

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।