विपत्ति से मुक्त होने का मूलमंत्र: अहिंसा

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

मनुष्य निरंतर अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा ऐसे कार्यों में लगा देता है जो उसके दुःख का प्रायः कारण बनती है। यद्यपि दुःख के लिए उसके कोई प्रयास नहीं होते हैं फिर भी वह दुःख को ही पाता है, इसके पीछे कारण क्या है? यदि यह बात समझ में आ जाए तो व्यक्ति जीवन में व्यर्थ कार्य से बचेगा। लेकिन समस्या यही है कि आज तक कोई भी दुःख के मूल अवस्था को समझ नहीं सका। हमारे धर्मशास्त्रों में ऐसे कई उद्धरण देखने को मिलते हैं। वस्तुतः विपत्ति वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों का शिकार होता है। यही प्रतिकूल परिस्थितियाँ दुःख का आभाष कराती हैं। सवाल यह है कि आप प्रतिकूलता को कैसे देखते हैं? यह आपके जीवन में क्या भूमिका निभाती है? क्या आप मनुष्य होकर हमेशा इससे बचने का प्रयास करते हैं? क्या आप कभी-कभार इस चुनौती के बारे में सोचते हैं जो आपको यह एहसास दिलाती हैं कि बहुत मुश्किल हो सकता है? फिर ऐसा प्रयत्न मनुष्य क्यों करता है?

विश्लेषकों का यह मानना है कि चेतना के स्तर पर ही एक व्यक्ति मनुष्य खुद को खुश या दुखी रख सकता है। मनुष्य की चेतनता उसके समग्र दुःख या सुख का कारण होती हैं। उसकी चेतना सर्वप्रथम विपत्तियों या प्रतिकूलता का आस्वाद करती हैं। इससे वह आनन्द से दूर चला जाता है और विपत्ति का शिकार होता जाता है। निराशाएं उसके जीवन को जोंक की तरह उसे हिंसक बना देती हैं तो कभी-कभी नकारात्मकता की उस कोटि में पहुंचा देती हैं जिससे मनुष्य खुद अपने जीवन में विपत्ति बन जाता है। भावनाओं का इस दशा में दबाव महसूस करना व्यक्ति को बीमार बना देता है।

दुनिया में तनाव और नकारात्मक सोच की बढ़ोतरी इस बात की सूचक है कि मनुष्य की विपत्तियाँ बढ़ रही हैं। तनाव से दूर करने वाले चिकित्सकों, सलाहकारों का अभाव बढ़ा है। मनोवैज्ञानिकों की इस कमी से आत्महत्याएँ भी बढ़ी हैं। लोग अपने तक सीमित हो रहे थे, वह ठीक था लेकिन आत्मकुंठा के शिकार मनुष्य हिंसा की राह पकड़ने लगे हैं। इससे क्रूर हत्याएँ भी समाज में बड़ी तेजी से बढ़ी हैं।

ऐसे में, ऐसा कुछ है जिसे हम सभी मनुष्य जाति को याद दिलाया जाना चाहिए। पहले व्यवसाय में उपलब्धि के लिए गुण, चरित्र, ज्ञान और गुणवत्ता देखी जाती थी, इससे व्यक्ति संगठनात्मक सफलता को ज्यादा महत्त्व देता था व्यक्तिगत आनंद के लिए उसका प्रयास कम होता था। हमारे जीवन में चपलता भी एक सकारात्मक वृत्ति थी। सीखने, अनुकूलन के योग्य बनाने और अपनी क्षमता को प्रबल करने में हमारी मदद अनुभव करते थे क्योंकि हमारा कष्ट दूसरों के सुख के साथ उतना आनंद प्राप्त कर लेता था जितना उसे अकेले के आनंद से मिलता।

विडम्बना यह है कि मनुष्य नितांत अकेला होता जा रहा है। उसकी सोच, संवेदना और अधिकतम जुटाने की वृत्ति ने उसे बौना कर दिया। विपत्ति के समाजशास्त्रीय अध्ययन से यह पता चलता है कि उसकी इस वृत्ति के कारण वह मनुष्य कम रह गया है मनुष्येतर वृत्तियाँ उसके जीवन को सुख से कहीं दूर ले जा चुकी हैं। फलतः वह सुख तो नहीं किन्तु भ्रम की स्थिति में ज्यादा जी रहा है। व्यवहारिक ज्ञान सूचना तकनीकी के विकास के साथ कम हुआ है क्योंकि मनुष्य तकनिकी जीवन जी रहा है। लगाव कम हो गया है। विशुद्ध बौद्धिक और सैद्धांतिक जीवन भी समाज को समझने में बाधा है। ऐसे गुण मनुष्य को अपनों से अलग भी करने लगते हैं। उसके भीतर आत्मीयता की जगह तथ्यपरकता हावी होने लगती है और समाज जो कि रिश्ते-नाते से भी चलता है उससे ज्यादा बौद्धिक और सैद्धांतिक व्यक्ति दूर हो जाता है। ऐसे में, मशीनीकृत बुद्धि चेतना पर हावी हो जाती है और व्यक्ति सुख की तलाश में विपत्ति का शिकार होता चला जाता है। इससे हिंसा को मनुष्य मनोरंजन का साधन मान लेता है और अपनी चेतना में भी वह हिंसक हो जाता है। इस दशा में उसके द्वारा किया गया कार्य छद्म व हिंसक होता है। उसकी सोच, कार्यप्रणाली और जीवनशैली ही हिंसक हो जाती हैं। उससे वह परिणाम निकल नहीं पाता जिसकी जनमानस अपेक्षा किया होता है। ज्यादा समय तक ऐसी वृत्ति में जीने वाले मनुष्य अपने विस्तार में इस प्रकार संलग्न होते हैं कि वे तानाशाह बन जाते हैं। हिटलर, मुसोलीन और बहुत सारे दूसरे तानाशाह बचपन में तानाशाह नहीं थे। वे हिंसक नहीं थे। वे विनाश के बारे में ही नहीं सोचते थे। हमारी भारतीय परम्परा में ऐसे भी लोगों का उदाहरण है जो हिंसा छोड़कर अहिंसा का रास्ता अपनाए हैं और जगत के सुख का कारण बने हैं। बुद्ध ने बहुत पहले कहा था कि दुःख है, और दुःख का कारण है। यह एक दर्शन है। इसकी चपेट में आने से पूर्व बुद्ध ‘सत्य’ की खोज में चल देते हैं। सत्य के साथ साक्षात्कार यदि हो जाए तो व्यक्ति हिंसक वृत्ति का त्यागकर अहिंसक हो सकता है। प्रेम का पथ चयन कर सकता है।

आंतरिक प्रकृति या व्यक्ति के चरित्र को व्यक्ति काबू कर सकता है लेकिन हम हमेशा हमारी परिस्थितियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। परिस्थितियाँ संयम से नियंत्रित हो सकती हैं। धैर्य से नियंत्रित हो सकती हैं। यह समय, ऊर्जा, साहस, नम्रता और अनुशासन से गुण आता है। संयम अपने जीवन में लाना बहुत आसान नहीं होता। इसमें व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को बस में करता है। बिना उसके इन्द्रियाँ बस में नहीं आतीं। इन्द्रियों को बस में करना व्रत है। व्रत खुद एक अनुशासन है। इसमें नियम और त्याग की कमी अगर होती है तो व्रत, व्रत नहीं रह जाता।  ये गुण ‘आत्मनिर्भर नेतृत्व’ व्यक्ति में भर देते हैं। आत्मनिर्भर व्यक्ति सत्य का पालन कर लेता है। उसे कोई कठिनाई नहीं होती। सत्य का व्रत करना किसी व्यक्ति के भीतर करुणा और प्रेम को प्रश्रय देने जैसा है। इसमें व्यक्ति दयालु हो जाता है। दूसरे की चिंता, उसके प्रति त्याग, दूसरे की पीड़ा से दुखी होना व्यक्ति को करुणा का भाव देता है। दया और करुणा के अधीन व्यक्ति खुद को भूल जाता है और परपीड़ा-परदुःखकातरता की उसमें समझ बढ़ जाती है। इससे उसमें त्याग और सहन की क्षमता का विकास हो जाता है। यह एक व्यक्ति मनुष्य के अहिंसक होने और अहिंसक सभ्यता को बर्ताव में लाने की प्रक्रिया है। इससे व्यक्ति की विपत्ति गौण हो जाती है और परहित, सेवा और सुश्रुषा उसके लिए जीवन आचरण बन जाते हैं। जब परहित के भाव मन में प्रश्रय ले लेते हैं तो प्रतिकूलता की जगह ज्यादा नहीं बचती। जो बचती है उसे भी व्यक्ति बहुत आसान तरीके से अनुकूलता में परिवर्तित कर देता है। नेपोलियन कहता था कि प्रतिकूलता प्रतिभा की दाई होती है। इस प्रतिभा का बीज कैसे रोपित हो इसे समझने की जरूरत है क्योंकि समूल विमर्श को यदि एक बार पुनः ध्यान से देखें तो यह लगता है की अहिंसा तो प्रतिकूलता या विपत्ति से उद्धार दिलाने की असीम ताकत रखती है। लेकिन एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक तरीके से आत्मनिर्भर व्यक्ति मनुष्य ही अहिंसा को अपना सकता है। तो सवाल यह भी है कि ये गुण कैसे विकसित होंगे? अरस्तू कहता है कि अभ्यास से गुणों को प्राप्त करें। ‘उद्यमेन हि सिद्धिः’ और ‘करत-करत अभ्यास ते जड़मत होय सुजान, रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान’। हमारे यहाँ भी अभ्यास से गुण प्राप्त करने का मंत्र सिखाया गया है। इसलिए अहिंसा कोई बहुत अप्राप्य नहीं है। ऐसा नहीं कि उसे जीवन आचरण में हम उतार नहीं सकते। और यदि मनुष्य को मनुष्य बनाने की क्षमता इस जीवन पद्धति में है तो इसे प्रत्येक मनुष्य को अपनाने में क्या हर्ज़ है।

दुनिया के इस आपाधापी में मनुष्य खिलौना इसलिए बनकर रह गया है क्योंकि उसने अपना सरोकार उन वृत्तियों से जोड़ लिया है जिसमें केवल हिंसा, छद्म और ईर्ष्या है। उसके साथ प्रेम, करुणा और नम्रता की जगह क्रोध का घड़ा है जिसमें वह खुद कुढ़ता है और नई विपत्तियों को आमंत्रण देता है। यह विपत्तियाँ मनुष्य जाति को तोड़ देती हैं। उसे असहाय बना देती हैं। उसके जीवन में तनाव का कारण बनती हैं। मनुष्य एक नमूना बनकर रह जाता है। उसकी बुद्धि मर जाती है और ऐसे में विनाशकाले विपरीत बुद्धिः, उसपर सवार होकर किसी भी अनैतिक कार्य के लिए अभिप्रेरित कर बैठती है। मनुष्य अपराधी बन जाता है। उसमें घृणा भर जाती है तो अपने ही लोगों से नफरत करने लगता है। तो सकारात्मकता का यह अभाव व्यक्ति को समझ और अभ्यास से प्राप्त करने की आवश्यकता है। यह सकारात्मकता सत्य बोलने, सत्य बरतने और सत्य के साथ जीने से संभव है। यह सत्य के साथ जीना क्या आपको पता है मनुष्य को किन चीजों से साक्षात्कार करा देता है, ईश्वर से। ईश्वर से साक्षात्कार का अर्थ है प्रेम और अनुराग से साक्षात्कार क्योंकि ईश्वर हमेशा इसी मार्ग से अपनी अनुभूति कराता है। यह अनुभूति ही अहिंसा की पराकाष्ठा है। इस पराकाष्ठा को प्राप्त करने वाला समूल विपत्ति से मुक्त हो जाता है। आज आवश्यकता है कि इस अहिंसा मंत्र को मनुष्य समझे, नहीं तो विपत्ति से मुक्ति संभव नहीं है और न ही कभी वह सच्चा आनंद का भागीदार बन सकेगा।

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डॉ। कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।  

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
सागर-470003 (मध्य प्रदेश) भारत
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