हमारा नेता कैसा हो? क्या वह गांधी जैसा हो?

(नेतृत्व की सामूहिकता और गांधी की भूमिका)

- अतुल कुमार मिश्र

(महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा)

“किसी व्यक्ति की असल पहचान इस बात से नहीं होती कि सामान्य व सुखद स्थितियों में वह क्या फैसले करता है, बल्कि इस बात से होती है कि चुनौतियों एवं दबावों के वक़्त उसके फैसले क्या रहे।” मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) की यह बात यूं तो हर व्यक्ति पर लागू होती है लेकिन वे लोग जिन्हें समाज अपने आदर्श एवं मार्गदर्शक के रूप में स्वीकारता है, विपरीत हालातों में किए गए अपने इन्हीं महत्वपूर्ण फैसलों और इन फैसलों पर टिके रहते हुए मुश्किलों का सामना करने के अपने हौसले और हिम्मत से ही समाज के प्रति इस नेतृत्वकारी भूमिका को हासिल करते हैं। इसी तरह जॉन सी. मैक्सवेल नेता होने की काबिलियत को इन तीन मुख्य खासियतों के बतौर सूत्रबद्ध करते हैं कि ‘A leader is one who knows the way, goes the way, and shows the way’. यानि वह जो सही राह जानता है, उस पर चलता है और सबको यह सही राह दिखाता भी है। मतलब कि समाज को रास्ता दिखाने वाला और उस रास्ते पर सबको साथ लेकर चलने वाला पथ प्रदर्शक।

नेतृत्व करना हमेशा से ही समाज के लिए एक विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण गुण रहा है और यहाँ तक कि मनुष्यों के अलावा समूह में रहने वाले कई अन्य जानवरों में भी यह विशेषता देखने में आती है। चूंकि मनुष्य हमेशा ही समूह में रहना पसंद करता रहा, इसलिए एक पुख्ता अनुमान के बतौर यह बात कही जा सकती है कि आदिम समाज में भी अघोषित रूप से ही सही लेकिन समूह में किसी एक या एकाधिक लोगों की नेतृत्वकर्ता (नेता) जैसी भूमिका बनती रही होगी। यद्यपि नेता की इस भूमिका को अनुमानतः कोई विशिष्ट दर्जा हासिल नहीं रहा होगा जैसा कि हम कई जानवरों में देखते हैं। लेकिन आदिम समाज के थोड़ा व्यवस्थित व स्थायी होने के साथ-साथ ही कबीलाई होने की प्रक्रिया ने नेतृत्व करने की इस भूमिका को ज़रूरी एवं ख़ास बनाया। निश्चित रूप से शुरुआत में कबीले का सबसे अनुभवी व्यक्ति ही ‘सरदार’ की इस भूमिका के लिए चुना गया होगा क्योंकि तब सिर्फ अनुभव ही समझदारी का पैमाना था लेकिन कबीलों के आपसी संघर्ष बढ़ने के साथ समझदारी के अलावा समूह में ताकतवर होना भी अहम बना। अर्थात अपने समय-समाज की जरूरतों के हिसाब से लगातार नेता होने की भौतिक विशेषताएँ बदलती रही हैं। जैसे कि दुनिया जब विश्वयुद्धों की चपेट में थी, तब चर्चिल व रूज़वेल्ट तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियों में नेता एवं नायक के बतौर उभरे। इसी प्रकार तमाम बुराइयों के बावजूद एक कमजोर एवं पहले विश्व युद्ध की पराजय से टूटे हुए देश को फिर से दुनिया की महाशक्तियों के बरक्स खड़ा कर देने वाला हिटलर भी अपने समय और अपने देश के लिए नेता ही था। लेकिन 1865 में नस्लभेद और गृहयुद्ध से जूझते अमेरिका के लिए नेता अब्राहम लिंकन थे और 1776 की अमेरिकी क्रांति और उसके बाद एक राष्ट्र के निर्माण के लिए ज़रूरी दूरदर्शिता रखने वाले जॉर्ज वाशिंगटन। लिंकन और वाशिंगटन युद्धोन्माद के माहौल में अपनी कुशल रणनीतियों से हार को जीत में तब्दील कर देने वाले कोई चमत्कारिक युद्ध-नेता नहीं थे, बल्कि वे किसी राष्ट्र की नींव रखने और उसे मजबूत आधार देते हुए एक खूबसूरत आकार दे सकने में कुशल, निर्माण के नेता थे। युद्ध एवं निर्माण की दोनों ही स्थितियों में रूस के लिए नेता वे स्टालिन भी थे जिन्होंने 1921 के एक बेहद गरीब और पिछड़े हुए देश को दूसरे विश्वयुद्ध में दुनिया की महाशक्ति बना दिया। जबकि रंगभेद के खिलाफ लड़ते हुए अपनी ज़िंदगी बिता देने वाले नेल्सन मंडेला के लिए हार-जीत की अपेक्षा अपने मूल्यों एवं सिद्धांतों पर टिके रहने की अहमियत ज्यादा थी। दूसरी तरफ जब दुनिया एक आध्यात्मिक जड़ता की शिकार थी, उस वक़्त ज्ञान और सत्य की रोशनी लेकर आए बुद्ध और ईसा मसीह भी अपने समय-समाज के नेता ही थे। यानि इसका मतलब यह कि एक तो तत्कालीन परिस्थितियाँ अपना नेता खुद तैयार करती हैं और दूसरा, नेता होने के आदर्श भी हर व्यक्ति/समाज के लिए अलग- अलग होते हैं। बावजूद इसके नेता होने की कुछ आधारभूत विशेषताएं हमेशा ही रही हैं और जिन्हें दुनिया के सभी महत्वपूर्ण नेताओं में सामान्यतः देखा जा सकता है। इन विशेषताओं में सबसे महत्वपूर्ण वह भरोसा, वह विश्वास है जो किसी समूह या समाज में कोई नेता अपने प्रति पैदा करता है।

निश्चित रूप से समूह का मुखिया होने के नाते किसी नेता के लिए उसके प्रति लोगों का यह भरोसा उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। यह भी सच है कि इस भरोसे और विश्वास को हासिल करना एक लंबी एवं सतत प्रक्रिया के तहत ही होता है और यह प्रक्रिया भी कोई एकतरफा नहीं होती। लेकिन अगर एक अच्छा नेता होने की कुछ मूलभूत विशेषताएँ होती हैं तो दरअसल ये विशेषताएं ही अपने समय-समाज के संदर्भों से जुड़कर किसी नेता और उसके समाज के बीच भरोसे की इस डोर को मजबूत बनाती हैं। कोई नेता अपने जीवन और अपने कामों से इस भरोसे को हासिल करता है। यह भरोसा जितना गहरा, जितना व्यापक होगा, निश्चित तौर पर उस नेता का कद और उसका दायरा भी उतना ही बड़ा होगा। जब हम आदर्श नेता की बात करते हैं तो हमारे दिमागों में जो तस्वीर बनती है, वह विश्वास के इस फ़लक को इतना विस्तृत कर देती है कि यह एक गहरी आस्था में तब्दील हो जाता है। एक ऐसी आस्था जो देश-काल की सीमाओं को पार कर जाती है। भारतीय संदर्भों में अपने समय के आदर्श रहे कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के मिथकीयकरण को इसी रूप में देखा जा सकता है जो तत्कालीन परिस्थितियों में अपने समाज के लिए नेता की भूमिका में ही थे और जिनके प्रति अपनी आस्था को बचाए व बनाए रखने के लिए ही लोकमानस ने उन्हें अपनी स्मृतियों में मिथकीय स्वरूप दे दिया।

यद्यपि हम जानते हैं कि कोई शाश्वत या सार्वभौमिक आदर्श जैसी चीज़ नहीं होती, लेकिन चूंकि मनुष्य होने के नाते मानव-समाज के लिए कुछ आधारभूत मानवीय मूल्य होते ही हैं, इसलिए इन मूलभूत मानवीय-मूल्यों को अपने जीवन में आत्मसात कर सकने के आधार पर ही दरअसल यह सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक आदर्श निर्मित होता है।

मोटे तौर पर देखें तो नेता के जिस रूप की हम बात कर रहे हैं, वह आधुनिकता के साथ विकसित होता है। चूंकि व्यक्तिपरकता (इंडिविजुअलिटी) आधुनिकता की सबसे प्रभावी प्रघटना के बतौर सामने आती है, इसलिए आधुनिक समाज में नेतृत्व क्षमता एक महत्वपूर्ण गुण बनता है और यह गुण व्यक्ति को सत्ता- संरचना में एक पायदान ऊपर उठाते हुए विशिष्ट दर्जा देता है। इसीलिए आधुनिक समाज में एक कुशल नेता के लिए ज़रूरी माने जाने वाली विशेषताओं में उसका एक अच्छा वक्ता होना, भावनाओं पर नियंत्रण रखना, तार्किक होना, अपने उद्देश्यों को लेकर निश्चित एवं दृढ़ होना, इतिहास की भूलों और अपने अलावा दूसरे की गलतियों से भी सीख लेना, कूटनीतिक होना और सही-गलत में फर्क कर सकने के साथ तुरंत निर्णय ले सकने में सक्षम प्रभावशाली व्यक्तित्व का होना आदि चीज़ें बहुत मायने रखती हैं। इन विशेषताओं से सम्पन्न किसी व्यक्ति के लिए समाज को रास्ता दिखाने वाले पथ-प्रदर्शक एवं मार्गदर्शक की भूमिका में होना, जिसकी ज़िम्मेदारी समाज को सही दिशा में आगे ले जाने की है, यकीनी तौर पर समूह में किसी एक के सर्वश्रेष्ठ होने (यानि बाकियों के उससे हीन होने) की व्यावहारिक पुष्टि करता है। जबकि ‘महाआख्यानों’ एवं ‘महानायकों’ को गढ़ रही यही आधुनिकता अपनी सैद्धांतिकी में ‘समानता’ के आधुनिक मूल्यबोध को भी सबसे मुखर रूप में स्थापित कर रही होती है। आधुनिकता के इस अंतर्विरोध को अगर छोड़ भी दें तो भी इसके बरक्स इस सवाल पर ज़रूर ही सोचा जाना चाहिए कि क्या गैर-आधुनिक (या गैर-पश्चिमी) समाजों में नेता होने का हमेशा से वही मतलब रहा है जो आधुनिकता के साथ यूरोप में निर्मित होता है और फिर यूरोप प्रायोजित आधुनिकता के सहारे पूरी दुनिया में विस्तारित कर दिया जाता है? इस सवाल की ज़रूरत और इसके जवाब को खोजे जाने की अनिवार्यता इसलिए है क्योंकि सामूहिक नेतृत्व की गांधीवादी परिकल्पना कम से कम इस मूल सवाल का जवाब तलाशे बिना मुमकिन नहीं हो सकती।

आधुनिकता अपने साथ नेता की जो छवि गढ़ती है, उसमें वह समाज का हिस्सा होते हुए भी उससे ‘वाह्य’ (आउटर) हो जाता है। यह वाह्य हो जाना ही अन्य लोगों के मुक़ाबले उसे विशिष्ट, श्रेष्ठ और सत्ता-संरचना में ताकतवर बनाता है। जबकि उन गैर-आधुनिक समाजों में जहां सामूहिकता जीवन के एक मूल्य की तरह आज भी बची हुई है – वो चाहे चेतना की भौतिक दुनिया के परे अवचेतन में बसी सामूहिक बोध की किसी धुंधली सी स्मृति के रूप में ही क्यों न हो, उनके बीच से निकली आदर्श नेता की छवि कोई ‘वाह्य’ न गढ़कर उनकी सामूहिकता के एक हिस्से के रूप में ही निर्मित होती है। इसीलिए यहाँ नेता होने की वही छवि अपनी विशिष्टता के बावजूद कोई सत्ता-संरचना नहीं बनाती। इस बात को भारतीय संदर्भों में गांधी के उदाहरण से बेहतर समझा जा सकता है। गांधी का व्यापक जनमानस के साथ भरोसे एवं आस्था का जो संबंध बनता है, वह उन्हें समय की सीमाओं को पार कर एक आदर्श जननेता साबित करता है। महान नेताओं के बारे में यह कथन अक्सर उद्धृत किया जाता है कि असल में बड़ा नेता वह है जो नेता पैदा करता है, इस आधार पर गांधी को देखें तो पूरे आज़ादी आंदोलन के दौरान और उसके बाद की पीढ़ी पर उनका जो असर है, उसने सैकड़ों नेता पैदा किए। फिर भी गांधी नेता होने के उस पैमाने पर खरे नहीं उतरते जो आधुनिकता से जन्मता है। आधुनिकता के इस पैमाने पर नेहरू ज्यादा सटीक बैठते हैं, लेकिन आम जनमानस में गांधी का जितना असर रहा, उतना नेहरू का नहीं रहा। नेहरू अपने चमत्कारिक व्यक्तित्व से लोगों को गहरे तक प्रभावित एवं आकर्षित करते हैं। गांधी बहुत ध्यान नही खींचते लेकिन लोगों के साथ उनका जुड़ाव वैसा ही है जैसा गाँव की चौपाल में बैठे किसी समझदार बुजुर्ग का गाँव वालों के साथ होता है। जीवन को जीने के अपने ढंग में गांधी देश की व्यापक जनता के साथ सीधे अलिखित एवं अमौखिक संवाद करते हैं। अपनी करिश्माई भाषण-शैली से वे लोगों को किसी काम के लिए प्रेरित नहीं करते बल्कि सिर्फ “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है” कहकर चुप हो जाते हैं। उन्हें किसी खांचे में फिट करने की कोशिशें हमेशा नाकाम होती हैं, अपनी ही कही बात को नए अनुभवों के साथ बदल देते हैं, रोज़ कुछ नया सीखते हैं, हर रोज़ खुद को परखते हैं, लेकिन जिस चीज़ को सही मानते हैं, सारी दुनिया की खिलाफ़त झेलने के बाद भी उस बात से पीछे नहीं हटते। ऐसा नहीं है कि दुनिया के तमाम अन्य बड़े नेताओं में ऐसी विशेषताएं नहीं होंगी मगर सिर्फ अपने कहने को नहीं बल्कि अपने सोचने को भी जीवन-व्यवहार में उतारने की यह सनक भरी जिद कहीं और नहीं मिलती और यही उन्हें लोकमानस में रचा-बसा एक ऐसा नेता बनाती है जो अपने समय में ही जीते जी मिथ बन गया हमारे वक़्त का आखिरी आदमी था।

लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि गांधी अपने उसी स्वरूप में आज भी उतने ही प्रासंगिक है। सवाल प्रासंगिकता का है भी नहीं। गांधी अपने समय की ही निर्मिति थे, वैसे ही जैसे हर समय अपना नेता खुद चुनता है। आज वक़्त और हालात गांधी के दौर से कहीं आगे बढ़ चुके हैं, इसलिए आज के परिप्रेक्ष्य में हमारे समय को गांधी की ज़रूरत अलग तरह से होगी। गांधी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने जीने और सोचने के अपने वैकल्पिक ढंग से पहली बार आधुनिकता एवं आधुनिक जीवन-शैली को एक प्रबल चुनौती दी और इसीलिए वे हमेशा ही न केवल अंग्रेजों बल्कि पूरे पश्चिम के लिए सबसे खतरनाक बने रहे। आज पूंजीवाद के नए अवतार के बतौर भूमंडलीकरण ने विकास और आधुनिकता के प्रसार एवं विस्तार के लिए जो नए-नए हथकंडे अपनाए हैं, उनसे जीवन जीने के इन वैकल्पिक तौर-तरीकों और सामूहिकता की उस लोक चेतना को अपना कर ही पार पाया जा सकता है। गांधी आज नहीं हैं और न ही हो सकते हैं क्योंकि ‘महानायकों’ या ‘तारणहारों’ का वक़्त और उम्मीद खत्म हो चुकी है। यह समय किसी एक आदर्श या बहुत महान नेता के अचानक से सामने आकर सब कुछ ठीक कर देने का नहीं है। यह छोटे-छोटे किन्तु आधारभूत जीवन-मूल्यों एवं आदर्शों के हर तरफ बिखेर दिए जाने का समय है। पूंजीवादी आधुनिकता ने व्यक्तिपरकता एवं केन्द्रीकरण का जो ताना-बाना रचा है, उसका प्रतिरोध विकेंद्रित सामूहिकता से ही संभव है। अब पूरे देश या दुनिया को रास्ता दिखाने वाला कोई एक ही व्यक्ति नहीं हो सकता, बल्कि जीवन के अलग-अलग हिस्सों और अलग-अलग समयों में अनेक लोगों को यह भूमिका निभानी होगी। शुरू में हमने समूह में रहने वाले जानवरों में भी किसी एक के ज्यादा अनुभवी होने पर उसके नेता जैसा होने की बात की थी। इसी तरह आसमान में उड़ती चिड़ियों के समूह में गौर करने वाली एक महत्वपूर्ण बात दिखती है। चिड़ियों का समूह एक त्रिभुज बनाता हुआ उड़ता है – एक चिड़िया सबसे आगे और फिर उसके पीछे दो, फिर उन दो के पीछे चार और इसी तरह पीछे की ओर फैलता हुआ समूह। सबसे आगे वाली चिड़िया को अगर नेता जैसा मान लें तो गौर करने और सीखने वाली सबसे ज़रूरी बात ये है कि जब आगे वाली चिड़िया हवा से लड़ते हुए थक जाती है तो पीछे से एक दूसरी चिड़िया आकर उसकी जगह ले लेती है। इसी तरह एक-एक कर पीछे से दूसरी चिड़ियाएं आकर आगे की जगहों को भरती जाती हैं। यकीनन सामूहिक नेतृत्व का इससे बेहतर उदाहरण मिलना मुश्किल है और यह हमें प्रकृति उपलब्ध करा रही है। आज के समय में एक नेता के बतौर गांधी की प्रासंगिकता दुनिया भर में फैले हुए ऐसे ही असंख्य लोगों की सामूहिकता को एक आकार दे देने में है। यद्यपि यह भी है कि इन तमाम लोगों के भीतर अपने जीवन से संदेश देने और अपने विश्वासों पर अडिग रहते हुए लाइन में लगे अंतिम आदमी तक की फिक्र कर सकने की नैतिकता और काबिलियत की उम्मीद न केवल वाजिब है, बल्कि दरअसल यही उनकी असली परीक्षा भी है।

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