कविता: रिश्वत

- मुकेश कुमार वैष्णव (भावसा), पीएच.डी. कोटा विश्वविद्यालय, कोटा
चलभाष: +91 850 283 3810, +91 946 758 1108; ईमेल: vaishnavmukesh2014@gmail.com

मुकेश कुमार वैष्णव
रिश्वत देने के बाद की ख़ुशी
शब्दों में बयाँ नहीं हो सकती।
सौ रूपये में हजारों का काम
तुरंत-फुरंत, बिना किसी झंझट के।
मन दुखी तो तब होता है जब
कोई बाबू कहता है-
साहब, तुम मुझे सभी की तरह
रिश्वतखोरी समझते हो?
अरे, में तो ईमानदार, वफ़ादार, कर्तव्यनिष्ठ हूँ
पर में परवाह नहीं करता
डटा रहता हूँ
पुरखों की दी गयी अमानत पर।
मन करता है गला दबा दूँ
ऐसे बाबू का
जो ईमानदारी का पक्का चेला है।
रिश्वत न देना मुसीबतें मोल लेना है।
रिश्वत दो और मुक्त हो जाओ
मुशीबतों के जाल से
आदत ही ऐसी की रिश्वत देकर ही

मन को सकून मिलता है ।
बिना रिश्वत के काम यानि
लम्बा इंतज़ार ,असीम इन्तजार
कभी-कभी तो जीवन के कई साल
व्यतीत हो जाने के बाद भी इन्तजार
इन्तजार ही रह जाता है ।
साहब में तो यह कहता हूँ –
रिश्वत एक, फायदे अनेक।

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