कहानी: वापसी एक दुष्चक्र से

रश्मि रविजा

- रश्मि रविजा

कच्ची पक्की घुमावदार सडक पर बस तेजी से चली जा रही थी। इस क्षेत्र में तो मौसम हमेशा ही सुहाना रहता है। दूर ऊँची चोटियों पर घिरे बादल, चीड़ के पेड़ों के बीच से सरसराती हवा, नीचे घाटियों  में पेड़ों को ऊपर से देखने से ऐसा लग रहा था मानो हरी चादर बिछी हो। बीच बीच में गुलमोहर से लदे पेड़, हरी चादर में कढ़े लाल बूटे का आभास दे रहे थे। ऐसे दृश्य किसी का भी मूड खुशनुमा बना दें पर साहिल का मन गहरी उदासियों में डूबा जा रहा था। पूरे दो साल बाद साहिल अपने घर, अपने माता-पिता-बहन के पास वापस जा रहा था। पर क्या सबकुछ पहले जैसा हो पायेगा? वे बेफिक्री वाले दिन कभी वापस लौट पायेंगे? बीच की चौड़ी होती खाई कभी पट पाएगी?

शरारतें करते, माँ से जिद करते, पिता से डाँट खाते, छोटी बहन के बाल खींचते, साहिल की एक धुंधली सी याद भर बची है, मन में। सिर्फ तीन वर्षों में इतना कुछ उलट पुलट हो गया कि उसकी जगह एक गंभीर खामोश साहिल ने ले ली है। पहले माँ खीझती रहती थीं, अब मुँह बंद करो और जाकर चुपचाप अपना काम करो। ... और बाद मे माँ उसके पास देर तक बैठी मनुहार करती रहती,  कुछ तो बात करो और उसके पास कुछ कहने को नहीं होता, आदत ही नहीं रही थी और इच्छा भी। बस, अब मैदानी इलाके में आ गई थी। गर्मी लगने लगी थी पर साहिल ने गले तक शर्ट के बटन बंद कर रखे थे। सार्वजनिक जगहों पर कभी बटन नहीं खोलता। क्या पता किसकी नजर पड़ जाए और गले और छाती पर के निशान उनकी आँखों में कौतूहल जगा दें। उन दिनों को बहुत पीछे छोड़ आया था, साहिल। उन दिनों की परछाईं भी किसी की आँखों में देखना गवारा नहीं था उसे।

छुटपन में सारे बच्चों की तरह बहुत शैतान था। पाँच बरस तक उसका घर पर एकछत्र राज था। पापा की आँखों का तारा। माँ कुछ अनुशासन में रखने की कोशिश करतीं पर पापा सब पर पानी  फेर देते। वह तो अच्छा था, वे साहिल से सिर्फ डेढ़ दिनों के लिए ही मिलते। शनिवार दोपहर से इतवार की रात तक। वरना बाकि दिन तो वे साहिल के सोने के बाद घर आते और सुबह ऐसे दौड़-भाग कर तैयार होते कि साहिल उन्हें नजर भी नहीं आता पर इन डेढ़ दिनों में साहिल उनसे फेविकोल की तरह चिपका होता, उसका खाना-पीना-सोना सब पापा के साथ होता। आस-पास की आंटी बुलाती रह जातीं, साहिल उनकी तरफ देखता भी नहीं। "जा पापा का चमचा अब अईयो सोमवार को मेरे पास", वे चिढ़कर कहतीं पर वह अकड़ कर अपने पापा का हाथ थामे चलते रहता। उसकी हर फरमाईश पापा पूरी कर देते थे।

 फिर आई नन्ही तूलिका, मम्मी  तो सारा दिन तूलिका के काम में बिजी रहतीं। कभी उसके कपड़े बदल रही हैं, कभी उसे दूध पिला रही हैं,तो कभी कंधे पर थपक कर सुला रही हैं। वह कुछ कहने भी आता तो होठों पर हाथ रखकर चुप रहने का इशारा करतीं और फिर उसे कमरे  से चले जाने के लिए कहतीं। दूसरे कमरे  में उसे जो भी मिलता,कुशन, किताबें अखबार सब वह गुस्से में जमीन पर गिरा देता। पापा भी ऑफिस से आ बस तूलिका को ही गोद में उठाये, पुचकारते रहते। वह भी आस-पास मंडराता रहता पर पापा का उसकी तरफ ध्यान ही नहीं जाता। कभी कहते भी तो बस यही जरा नैपकिन दो वहाँ से, इसका मुँह पोंछ दूँ। उसकी पानी की बोतल ले आओ जरा। तूलिका से पता नहीं कैसी अजीब सी भाषा में बातें करते। जब तूलिका बुक्का फाड़ रो देती तो साहिल को बड़ा मजा आता, और करिए अल्लू  बुल्लू... अपनी तरफ ध्यान खींचने के लिए कभी वह जान बूझकर तूलिका की  बोतल गिरा देता, कभी उसके लिए लाए टेडी बियर को पैरों से रौंद देता, उसके कपड़े गिरा देता और फिर मम्मी-पापा दोनों से डांट खाता। उसकी ऊटपटांग हरकतें बढती जा रही थीं, अपनी किताबें फेंक देता, कपड़े पर पानी गिरा लेता कि किसी तरह मम्मी-पापा उसकी तरफ देखें, उसके काम करें  पर दोनों ही गुस्से में बोलने लगते, "जरा भी शऊर नहीं, इतने बड़े हो गए हो। ज़रा भी ध्यान से काम  नहीं करते। जाओ कपड़े बदलो।" पहले मम्मी उसके पीछे कपड़े लेकर घूमती रहतीं थीं, वह भाग कर परदे के पीछे छुप जाता, बिस्तर पर चढ़ जाता, टेबल के नीचे छुप जाता। मम्मी हंसते हुए उसे खींच कर उसके कपड़े बदलती थीं। अब तो सीधा कह देती हैं, "जाओ खुद बदलो।" चाहे उस से बटन ना लगे, चाहे टी शर्ट गले में फँस जाए, पर मम्मी को कोई फिक्र ही नहीं। वह बाथरूम में खूब समय लगाता। अच्छा है, तूलिका के आने के बाद मम्मी अब उसे नहीं  नहलातीं। कैसे रगड़ रगड़  कर साबुन लगाती थीं। अब कहती, "वह बड़ा हो गया है... खुद नहा सकता है" और वह बाथरूम में देर तक खेलता रहता। मग में पानी भर कर टाइल्स पर उड़ेलता। शावर खोलकर दूर हट जाता सिर्फ अपने हाथ आगे कर पानी के अंदर अपनी हथेलियाँ नचाता। मम्मी बाहर से चीखती रहतीं, स्कूल के लिए लेट हो जाओगे, जल्दी निकलो। उन्हें खिझाने को वह जानबूझकर और देर लगाता। तूलिका के आने के बाद कभी उसने मम्मी को शान्ति से कोई काम करते, या हँसते-मुस्कराते नहीं देखा। सुबह से भागती रहतीं। पापा का टिफिन बनातीं, उसे स्कूल के लिए तैयार करतीं, बीच बीच  में तूलिका के मुँह से बोतल लगातीं, कभी उसके कपड़े बदलतीं और जैसे खींचते हुए साहिल को बस स्टॉप तक ले जातीं। शाम को तुली को गोद में लेकर होमवर्क  करवाने बैठती। बीच में दस बार उठतीं। कभी कभी वह बाथरूम में जाकर दोनों हाथों से आँखे मल मल कर  देर तक रोता। अब क्यों उसे कोई भी प्यार नहीं करता। तूलिका बड़ी होने लगी, उसे दादा कहते उसके पीछे घूमती रहती। पर उसे गुस्सा आता। कभी उसकी गुड़िया  दूर फेंक देता, कभी उसके बाल खींच देता और फिर डांट खाता। पापा अब भी घर आकर 'मेरी प्यारी बिटिया 'कहते तू लिका को  गोद में उठा लेते।

पापा तूलिका के लिए सुंदर सुंदर फ्रॉक, जूते, क्लिप, गुड़िया  खरीद लाते। और उसके लिए बड़े जटिल से बोर्ड गेम  ले आते। जो उसे समझ भी नहीं आता। और कौन समझाये उसे।मम्मी सारा दिन कम में लगी रहतीं, और पापा को जितना भी समय मिलता तू लिका को गोद में बिठाए टी वी देखते रहते या फिर तू लिका को उछालते रहते, उसके साथ खेलते रहते। तू लिका भी पापा की चमची थी। अपने छोटे छोटे हाथों से उनके जूते उठा कर रखने लगती, डगमग पैरों से उनके लिए पानी की  बोतल ले आती। पापा निहाल हो जाते। पापा से साहिल की दूरी बढती जा रही थी। वैसे भी अब वह घर में ज्यादा देर टिकता नहीं। स्कूल से आकर बैग पटक  खेलने निकल जाता। माँ  मुश्किल से दूध का ग्लास हाथ में पकडाती जिसे कभी गमले में उंडेल देता,  कभी किचन के सिंक में गिराकर भाग जाता। तुली उस पर पूरी नजर रखती और फिर मम्मी  से जाकर शिकायत कर देती। मम्मी  से डांट पड़ती और वह बदला लेने के लिए वह तुली की  गुडिया की टांग तोड़ देता या गुडिया के बाल काट देता। इस पर  तो पापा के सामने उसकी पेशी होती,  पापा कभी उसे डांटते और कभी ऑफिस के काम से परेशान होते तो मम्मी पर ही बिगड़ पड़ते, "एक बच्चा नहीं सम्भाला जा सकता तुमसे,  घर बाहर सब मैं ही देखूँ।" मम्मी को डाँट पड़ते देख उसे बुरा लगता और वह सोच लेता, मम्मी कितनी परेशान रहती हैं,अब कोई शैतानी नहीं करेगा। पर वह जानबूझकर शैतानी थोड़े ही करता था। अगले दिन फिर कोई शरारत सूझ जाती और फिर सारी कवायदें दुहराई जातीं।

 स्कूल, दोस्त, खेल, ट्यूशन इन्ही के इर्द गिर्द दिन बीत रहे थे। क्लास में फर्स्ट नहीं आता था पर टॉप फाइव में आ ही जाता। लेकिन मम्मी को हमेशा शिकायत रहती थी, और नम्बर क्यों नहीं आये, हर वक्त पढने के लिए टोका करतीं। अपनी सहेलियों, रिश्तेदारों से बस एक ही शिकायत  करती, 'बिलकुल नहीं पढता। क्या इसका भविष्य होगा, समझ नहीं आता'। वह क्लास के चालीस बच्चों से आगे रहता, यह मम्मी  को नहीं दिखता पर चार से पीछे कैसे है,  इसकी  चिंता जरूर होती। और फिर वह और धीरे धीरे वह मम्मी से भी दूर होने लगा। स्कूल की बातें भी नहीं  बताता। एक बार स्कूल बस की खिड़की के पास बैठा था, नेहा  के स्टॉप पर नेहा  से पहले उसका भाई चढा और साहिल का कॉलर पकड़ कर उसके गाल पर एक जोरदार थप्पड़ लगा दिया। वह हक्का बक्का रह गया। तब तक पीछे से आती नेहा  ने कहा, "भैया ये नहीं वह लडका तो आज आया ही नहीं" पता चला,  रोहित जो रोज उस जगह बैठता था और नेहा  को परेशान करता था। आज आया ही नहीं था। उसने घर में इस बातकी कोई चर्चा नहीं की पर साहिल के स्टॉप से चढने वाली शिखा ने अपनी ममी को बताई और उसकी मम्मी ने साहिल की मम्मी को। मम्मी को  बहुत बुरा लगा, 'तुमने मुझे क्यों  नहीं बताया' वह क्या बताता। हर बात  पर तो उसे ही  डांट पड़ जाती थी। पर फिर मम्मी ने स्कूल जाकर प्रिंसिपल से शिकायत की। नेहा  के पैरेंट्स को स्कूल में आकर सॉरी कहना पड़ा। उसे अच्छा लगा, और मम्मी के वह थोडा करीब भी आ गया था, स्कूल की बातें उनसे शेयर भी करने लगा था पर तभी जैसे उसके छोटे से संसार में भयंकर तूफ़ान आ गया।

पापा को मिडल ईस्ट के मस्कट से एक बहुत अच्छी नौकरी का ऑफर आया। इतने सारे पैसे  का लोभ पापा संवरण नहीं कर पाए और जाने का फैसला कर लिया। कंपनी परिवार के लिए फ़्लैट दे रही  थी। माँ दुविधा में थीं। पापा को किचन का कोई काम नहीं आत था। लिहाजा माँ को साथ जाना होगा, तुली तो मम्मी के  साथ ही जाती। पर साहिल नवीं पास कर दसवीं में जाने वाल था। उसके लिए  स्कूल बदलना मुश्किल था। साहिल के  लिए पापा ने फैसला कर लिया कि उसे अपने एक चचेरे भाई 'सौरभ' के यहाँ रख देंगे। उसके स्कूल में हॉस्टल की सुविधा नहीं  थी। माँ ने क्षीण सा प्रतिवाद  किया कि 'अगले साल साहिल का बोर्ड है, ऐसे में जगह बदलना ठीक नहीं,। बच्चा डिस्टर्ब हो जाएगा'। पर पापा का तर्क था, "उसी के लिए कर रहा हूँ, उसकी आगे की पढाई में ढेरों रुपये लगने वाले है , कहाँ से आयेंगे पैसे? रोज के खर्चे, इनके महंगे स्कूल की फीस से ही हर महीने कतर ब्योंत करनी पडती है। पैसे जमा कैसे होंगे। सारी जिंदगी किराए के घर में कट जायेगी। एक फ़्लैट तक नहीं ले  सकूँगा। वहाँ बस, दस साल कमा कर वापस आ जाऊँगा, बढ़िया फ़्लैट, बड़ी गाड़ी और फिर सारी जिंदगी  आराम से रहेंगे। तुम्हीं लोगों के लिए सब कर रहा हूँ। मुझे क्या वहाँ नई जगह में काम करने  में मन लगेगा। यहाँ इतने वषों से काम कर रहा  था। सबसे अच्छी जान पहचान थी। कोई टेंशन नहीं, अब बिलकुल नई जगह जाकर खुद को स्थापित करना होगा। साहिल का स्कूल तो नहीं बदल रहा। ट्यूशन क्लास भी वही है। वह घर में रहता ही कितनी देर है,  बस सोने के लिए ही तो सौरभ के घर जाएगा। एक साल ही तो बचा है, समय यूँ निकल जाएगा फिर उसे किसी अच्छे  कॉलेज के हॉस्टल में डाल देंगे, इन सबके लिए पैसे तो चाहिए।"

मम्मी निरुत्तर हो गईं। पैसे की बात तो थी। फिर भी मम्मी ने कोशिश की, "अगले साल कोशिश  कीजियेगा। हो सकता है, इस से भी अच्छी  नौकरी का अवसर मिले।"

पर पापा ने "औपर्च्युनिटी नेवर नॉक्स ट्वाईस" कहकर बात खत्म कर दी और उठ कर दूसरे कमरे में चले गए। साहिल  तो सन्नाटे में  आ गया। सौरभ चाचा का परिवार कभी कभी उनके घर आता था। उनके बच्चे बहुत  छोटे थे। आठ साल का बेटा पिंटू, पांच साल की बेटी रिंकू। चाचा स्नेहिल थे पर ज्यादा बातें नहीं करते थे। चाची तो मम्मी से हमेशा चिढ़ी रहती थीं क्यूंकि चाचा कई बार चाची के सामने ही मम्मी की तारीफ़ कर देते, "आप कितने अच्छे  से सब कुछ सम्भालती हैं, भैया तो एकदम निश्चिन्त रहते हैं अनीता से तो कुछ होता ही नहीं।" मम्मी कहतीं, "वह भी सीख  जायेगी... अभी उसके बच्चे छोटे हैं।"

"आपके बच्चे भी तो छोटे थे। तब से देख रहा हूँ,  भैया तो हमेशा ही देर से घर आते। आप ही स्कूल बाज़ार। घर सब संभालती थीं।"

 मम्मी हँसकर कहतीं, "टिपिकल पति, हर पति को ऐसा ही लगता है कि दूसरे की बीवी ज्यादा काम करती  है तुम निश्चिन्त रहो अनीता, अभी कौशल भी यही कहेंगे। आप रायता तो लीजिये।"

"हाँ हाँ दीजिये आपके हाथ की बनी तो  हर चीज़ स्वादिष्ट होती है। चाचा समझ ही नहीं पाते।"

अपनी प्लेट में सब्जी डालता साहिल,  चाची का गम्भीर पड़ता चेहरा देख लेता। वे लोग जब भी आते सिर्फ डायनिंग टेबल पर ही उसकी मुलाक़ात होती। वह नमस्ते कर उनकी बातों का जबाब दे अपने कमरे में  चला जाता। दोनों बच्चे भी तुली के पीछे घूमते रहते। उस से दूर ही रहते। इन  लोगों के बीच  वह घर का सदस्य बन कैसे रह पायेगा?  पापा बताते कि वे लोग तो ऐसे ही  चाचा, मामा, बुआ के यहाँ रहकर  पढ़ते थे। किसी का बच्चा किसी भी रिश्तेदार के घर  रहकर पढता। पर साहिल ने  तो ऐसा एक भी उदाहरण नहीं देखा उसके सारे दोस्त उसकी तरह ही अपने मम्मी पापा के पास ही रहते थे। पर पापा को कौन समझाये, मम्मी ने कोशिश भी की लेकिन पापा नहीं माने, सौरभ चाचा से भी बात कर ली। साहिल, सौरभ चाचा के चेहरे पर नजरे गढ़ाए देख रहा था पर सौरभ चाचा ने  जैसे पापा से आँखें चुराते हुए उसे पास बुलाकर उसके गले में हाथ डाल दिया, "हाँ भैया , आप पूछ भी क्यों रहे हैं, साहिल अपना बच्चा है बिलकुल रिंकू, पिंटू की तरह रहेगा।" पापा उन्हें आगे बताते रहे, "यह तो ज्यादातर घर से बाहर  ही रहेगा, स्कूल है, कोचिंग क्लासेज हैं। तुमलोगों को कोई परेशानी नहीं होगी।"
साहिल बिलकुल ही चुप हो गया था। रहना उसे था, पर उसकी  राय तो पूछी ही नहीं जा रही थी। वह सौरभ चाचा के यहाँ रह पायेगा आया नहीं, कोई पूछ ही नहीं रहा था। बस एक सामान की तरह उसे यहाँ से उठाकर वहाँ रख देने का प्लान था। गर्मी छुट्टी में नानी-दादी के घर जाना अलग बात थी, तब तो सिर्फ खेलना कूदना होता था। और पता होता था, एक महीने बाद वह अपने शहर लौटने वाला है। पर यहाँ तो एक साल से कुछ अधिक ही दूसरे के घर में रहना पड़ेगा। कभी पापा की तरफ से सोचता तो लगता, पापा के पास और कोई उपाय ही नहीं है। इतने ज्यादा पैसे उन्हें यहाँ दस साल बाद भी नहीं मिलेंगे और उसकी और तूलिका की आगे की पढ़ाई के लिए पैसे तो चाहिए। पर उसे चाचा के घर नहीं रहना, वह भी मम्मी पापा के साथ ही चला जायेगा न, बोर्ड बदल जाएगा तो क्या, एक वर्ष  ब्रेक ले लेगा। तूलिका का भी तो बोर्ड बदल रहा है पर तूलिका छठी में थी, उसके पास अच्छा समय था। मम्मी  से एक बार कहा भी तो उन्होंने कहा, "उसका पूरा कैरियर खराब हो जाएगा। दसवीं में  जाकर बोर्ड बदलने में उसे बहुत परेशानी होगी।" वह मुँह बना कर बैठ गया। मम्मी सामान छाँटती रहीं, अलग अलग अटैचियों में भरती रहीं। दो बड़ी अटैची और दो कार्टन में उसका समान भी पैक  किया जाने लगा। सामान पैक करते मम्मी  आँखें पोंछती रहतीं,पर वह देख कर भी अनदेखा कर  देता। "इतना दुःख हो रहा है तो छोड़ कर जा ही क्यों रही हैं। मम्मी  क्यों नहीं रुक जातीं, जिन आंटी के  पति शिप पर हैं वे लोग भी तो अकेली बच्चों के साथ  रहती हैं। फिर मम्मी क्यों  नहीं रह सकतीं। पर उनके पतियों के पास परिवार ले जाने का ऑप्शन नहीं है, पापा के पास है। और फिर पापा को  खाना बनाना भी नहीं आता। फिर भी माँ चाहतीं तो अड़ जातीं, रुक सकती थीं। पापा सीख लेते खाना बनाना, नहीं तो बाहर खाते। पापा हैं तो गुस्से वाले पर कभी तो मम्मी को उनके सामने खड़े होना  चाहिए या क्या पता मम्मी  को भी नया देश, नई  जगह जाने का  शौक हो। साहिल की किसे परवाह है, फेंक दे रहे हैं चाचा के यहाँ। मन आक्रोश से भर जाता।"

पर जब जाने से एक दिन पहले,सौरभ चाचा के यहाँ साहिल को शिफ्ट करने गए तब तो पापा भी सकते में आ गए। जब पापा ने कहा था कि तुम्हें तकलीफ तो होगी तो सौरभ चाचा ने एकदम से कहा  था, 'तकलीफ कैसी, रिंकू तो वैसे भी अपनी मम्मी को छोड़ कर नहीं सोती। वह तो जब घर के फर्नीचर बनवा  रहा था तो बच्चों के कमरे का भी बनवा दिया। रिंकू के बेड पर साहिल रह लेगा। साहिल  और पिंटू मजे से उस कमरे में रहेंगे"। पर जब साहिल का सामान लेकर वे लोग गए तो पाया, उनलोगों ने  पीछे की बालकनी को प्लास्टिक से कवर कर दिया  है। बालकनी में एक पतला सा तख्त पड़ा  था। एक स्टूल पर टेबल फैन रखा था, किनारे एक व्हील वाली छोटी सी टेबल और एक लकड़ी की आलमारी। आलमारी के  ऊपर के दो रैक साहिल के लिए खाली कर दिए गए थे। नीचे वाली रैक  में आम के अचार के जार और अल्लम गल्लम रखे हुए थे। उसकी आँखों में तो आंसू झिलमिला आये। पापा का चेहरा भी सफेद पड़ गया। मम्मी  आँखों में कुछ पड़ जाने का बहाना  करने लगीं। सौरभ  चाचा भी झेंपे हुए से थे पर चाची बड़ा चहक चहक कर मुस्करा  कर बोल रही थीं, "अब साहिल दसवीं में है, उसका बोर्ड है ये रिंकू-पिंटू तो अपने कमरे में उसे परेशान करते रहेंगे। उसकी पढाई नहीं  हो  पाएगी। यहाँ वह मजे में पढ़ पायेगा। वैसे तो उसका अपना घर ही है, जहाँ चाहे रहे, पढ़े सोये। बेटा हमें बिलकुल भी पराया नहीं समझना, ठीक है न।" वह होंठ भींचे खड़ा रहा। मम्मी ने आवाज़ संयत करते  हुए पूछा, "कुछ पुराने अखबार दे दो, साहिल की किताबें जमा दूँ।" अलमारी के दो रैक में उसकी सारी किताबें नहीं आतीं। कपड़ों की अटैची, किताबों के कार्टन  सब तख्त के नीचे सरका दिये। अब उसे  रोज अटैची खींच कर अपने कपड़े निकालने थे। उसका सामान रख वे लोग घर लौट आये। पापा बहुत गमजदा थे, बार बार कह रहे थे, "मैंने कभी नहीं सोचा था, सौरभ ऐसा करेगा। ज़रा भी अंदाजा  होता तो मैं कुछ दूसरा उपाय करता।" मम्मी गुस्से से बिफरी हुई थीं, "क्यों नहीं ऐसा करेंगे? कोई उनका बच्चा  है... दूसरे के बच्चे को छत और खाना दे देंगे ना, इतना अहसान  समझिये, कितना  कहा था आपको, मुझे एक साल यहीं रहने दीजिये।" कहते मम्मी का गला रूँध गया। पापा अपना रोष छुपाने को मम्मी पर बरस पड़े, "और मैं क्या करता?  भूखा मर जाता? तुम लोगों को चाहिए कि बस  कमा कमा कर पैसे देता रहूँ, जीऊँ या मरुँ उस से कोई मतलब नहीं। ... सिर्फ एक साल की तो बात है, पढने के लिए कैसे कैसे कष्ट उठाते हैं बच्चे। समय कैसे निकल जाएगा,पता ही नहीं चलेगा।" वह  उठकर दूसरे कमरे में चला गया जहाँ तूलिका सहमी सी बैठी थी। उसे  देखते ही डर कर बोली, 'भैया तुम वहाँ कैसे रहोगे?" और पहली बार वह तूलिका को गले लगा रो पड़ा। तूलिका भी सिसकती रही।

फिर वह उन लोगों के जाने तक एक शब्द नहीं बोला। उनकी तरफ एक बार देखा भी नहीं। एयरपोर्ट पर मम्मी ने गले लगाना चाहा तो शरीर कड़ा किए वह दूर हट गया। पापा तो खुद ही उस से नज़रें  नहीं मिला रहे थे। सौरभ चाचा से बातें करते रहे। तूलिका जब उस से लिपट कर रोते हुए बोली, "दादा अच्छे  से पढ़ाई करना और जल्दी आ जाना।" तो साहिल की आँखें भी गीली हो आईं। तूलिका के  बालों पर हाथ फेरता रह गया, कुछ बोल नहीं पाया।

सौरभ चाचा के यहाँ चाची ने दूरी बनाये रखी, जिसे बढाने में उसने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। स्कूल से आकर सीधा बालकनी में अपने बिस्तर पर धम्म से गिर जाता। चाची टेबल पर खाना रख आवाज़ देती। वह कभी खाता, कभी बिना खाए क्लास के लिए निकल जाता। एक बार चाची ने कहा, "खाना बर्बाद होता है" तो उसने भी कह दिया, "रख दिया कीजिये रात में खा लूँगा।" रात में चाचा बुलाते तब भी वह डायनिंग टेबल पर नहीं जाता। कहता, "अभी भूख नहीं, पढ़ रहा हूँ बाद में खा लूंगा।"

वह क्यों जाए उनके परिवार के बीच उनका सदस्य बनने? जब उसे बालकनी में पटक दिया है तो वह भी अलग थलग ही रहेगा। चाचा कभी कभार जरूर उसके पास आ दो चार सवाल करते, बात करना चाहते पर वह सर उठाता ही नहीं, पढने का बहाना किये, सर नीचा किये  हाँ हूँ में जबाब देता। वे भी थक कर चले जाते। बच्चों को तो ऐसे घुड़क कर भगाता कि वे लोग उसके पास भी नहीं फटकते।

पर उस से पढाई बिलकुल भी नहीं हो पाती। स्कूल तो निभा ले जाता क्यूंकि स्कूल में ज्यादा पढाई ही नहीं होती।पर कोचिंग क्लास में रोज डांट पड़ती। पहली बेंच पर बैठने वाला लड़का पीछे खिसकते  अब अंतिम बेंच पर बैठने लगा था। बहुत कोशिश करता कि किसी टीचर की नजर उसपर ना पड़े पर होमवर्क दिखाना ही पड़ता। वह तो अच्छा था, मम्मी पापा मस्कट में थे वरना उन्हें रोज फोन आते  पर तब शायद पढाई में इतनी लापरवाही भी ना होती। उसके पुराने दोस्त उस से दूरी बनाने लगे थे। वे क्लास खत्म होते ही घर की तरफ भागते। जबकि वह इधर उधर,  यूँ ही भटकता रहता। घर  लौटने का मन ही नहीं होता, वह घर था भी कहाँ। उसके पास एक चाबी होती थी क्यूंकि चाची अक्सर रिंकू, पिंटू को छोड़ने-लेने या किसी सहेली के घर गई हुईं होतीं। वह बिना यूनिफ़ॉर्म बदले बिस्तर  पर पड़े छत घूरता रहता,  किताब कॉपी निकाल पढने बैठता तो नींद  आने लगती। रोज रोज टीचर को टोकते देख एक दिन पिछली बेंच पर बैठने वाले महेश ने पूछ लिया, "क्या बात है, आजकल  होमवर्क क्यों नहीं करते?"

 "नींद आ जाती है यार, किताब खोली और आँखें झपकने लगती हैं।

"एक उपाय है... नींद  नहीं आएगी। मैं भी आजमाता हूँ और मेरे बहुत सारे दोस्त भी। फिर  उसने चुपके से छोटी छोटी लाल गोलियों का एक पत्ता उसके हाथ में सरका दिया, "बस एक गोली खा लेना,  देखना नींद कैसे फुर्र हो जाती है।"

उस रात साहिल ने गोली खाई और सचमुच नींद नहीं आई,  बल्कि उसे आलस भी नहीं लगा, मन बड़ा खुश खुश लग रहा था। उसने खुश खुश महेश को बताया। महेश मुस्करा कर रह गया। अब तो  रोज का नियम हो गया। वह एक गोली लेता और नींद दूर भाग जाती, सर हल्का हो जाता, एक खुशनुमा अहसास घेरे रहता। दिन में स्कूल में जरूर उसे बहुत भारीपन महसूस होता, शरीर गिरा गिरा सा  लगता पर शाम की सोच वह ज्यादा ध्यान नहीं देता। होमवर्क भी करने लगा था। जब एक पत्ता खत्म हो गया तो उसने महेश से और गोलियाँ मांगीं। महेश ने कहा, "वह तो अपने पास से मैंने तुम्हें दे दिये थे। अब तो खरीदने पड़ेंगे, पैसे लगेंगे।"

साहिल के पास कौन सी पैसे की कमी थी। मम्मी भी जाते वक्त अलग से कुछ हज़ार देकर गईं थीं, "जब चाहे मैक्डोनल्ड चले जाना, पिज्जा खा लेना, तुम्हें पसंद है न" हर महीने पापा उसके अकाउंट में अच्छी रकम डाल देते थे। गोली उसे महंगी तो लगी पर उसने परवाह नहीं की। कुछ दिनों बाद सुबह आँखें नहीं खुलतीं, स्कूल में इतना आलस लगता कि उसने सुबह भी एक गोली लेनी शुरू कर दी। और फिर स्कूल से आने के बाद भी एक गोली ले लेता। पैसे कम पड़ने लगे थे। मम्मी  से फोन पर कहता कि नई किताबें लेनी हैं, एक्स्ट्रा क्लास के पैसे लगेंगे, जूते फट गए हैं, बैग लेना है। कैंटीन में सब कुछ महंगा हो गया है। सैकड़ों बहाने थे। और मम्मी -पापा उसे अकेले छोड़ने का गिल्ट छुपाने के लिए और पैसे भेज देते। पढाई जैसे तैसे चल रही थी। मम्मी फोन करतीं, वह बात करने के मूड में नहीं होता और माँ समझतीं वह उस से नाराज़ है। सिर्फ एक ही बात कहतीं, 'बस बोर्ड एग्जाम हो जाए और तुम हमारे पास चले आओ, तरस गई हूँ तुम्हें देखने को।" मम्मी  वीडियो कॉल के लिए कहतीं  पर वह मना कर देता, जाने कैसा डर होता कि माँ शायद चेहरा देखते ही कुछ समझ जायेंगीं। प्रिपरेशन लीव शुरू हो गई, वह सारा सारा दिन सोया रहता, एक शाम चाची को चाचा से कहते सुना, "महीने  भर बाद इसके एग्जाम है, पढता ही नहीं।"

चाचा कहते, 'पूरी रात पढता होगा... आजकल के बच्चे ऐसा ही करते हैं। पूरी रात पढ़ते हैं और दिन भर सोते हैं। ऑफिस में सब अपने बच्चों के बारे में ऐसा ही कहते  हैं। चाची कंधे उचका देतीं, उन्हें  क्या,...। हाँ उन्हें क्या। उन्हें तो बस इस बात की  चिंता थी कि कब उसके इम्तहान हों और कब वह जाए। जागते-सोते, थोडा-थोडा पढ़ते, उसके इम्तहान भी खत्म हो ही गए। पापा ने उसी शाम की   टिकट भेज दी थी पर घर जाने सबसे मिलने का जैसे उसे के कोई उत्साह ही नहीं रह गया था। वह अपने आप में ही डूबा रहता। मन होता कोई उसे न  छेड़े, कोई बात करने की  कोशिश ना करे बस  उसे अपने हाल पर छोड़ दिया जाए। साहिल को बस एक ही चिंता थी,  वह दवाइयां लेकर मस्कट कैसे जाए? अब दवा का असर चार पांच घंटे ही रहता उसके बाद उसे बेचैनी होने लगती। उपाय  महेश  ने ही बताया। महेश दो साल से फेल हो रहा था। शायद उसका यही काम था, क्लास में ऐसे लडकों पर नजर रखना और उन्हें दवा की आदत डलवाना। महेश ने बताय उसके लिए स्पेशल जींस   सिलवायेगा जिसके दोनों पैर के पायंचे में गोलियां भर कर सिल दिए जायेंगे और कमर पर भी बेल्ट के अंदर एक पट्टी  होगी जिसमें गोलियां भर दी जायेंगी। उसकी नसों में एक रोमांच दौड़ गया। फिल्मों  में देखे कई दृश्य आँखों के आगे तैर गए। डर भी नहीं लगा बल्कि मन हो रहा था कब ये दिन पार हो जाएँ और उसे वह जींस पहनने का मौक़ा मिले। एग्जाम  जैसे तैसे दे ही दिए। इस एक साल  में तो उसने नाम मात्र की  पढाई की  थी पर पहले का पढ़ा काम आया था । फेल होने का सीन नहीं था। अंतिम पेपर के बाद सीधा, महेश के अड्डे पर गया, महेश ने दिखाया कि पूरे दो महीने की  खुराक उस जींस में सिली हुई है। महेश ने बताया भी कि कैसे सिलाई उधेड़नी है और फिर सारी गोलियाँ  निकाल कर एक पाउच में डाल कर कपड़ों में छुपा देना है। उसने  जींस ट्राई कर के भी देखा,   और एक रोमांच से ऊसका पूरा बदन सिहर  गया। चाचा के यहाँ आकर सामान पैक किया, जींस  के ऊपर लम्बी सी टी शर्ट पहनी और एयरपोर्ट के लिए चल दिया। चाचा ऑफिस से जल्दी आ गये थे, एयरपोर्ट तक छोड़ना चाहते थे पर उसने मना कर दिया। वहाँ  महेश, शॉन, हार्दिक पूरा गैंग आने वाला था। एक टैक्सी बुलाई और चल दिया।

महेश, शॉन, हार्दिक, नवल सबने उसके पीठ पर हाथ मार उसका उत्साह बढ़ाया। वह एकदम हीरो जैसा महसूस कर रहा था। जैसे कितना बड़ा काम करने जा रहा हो। एयरपोर्ट पर उसे ज़रा भी डर नहीं लगा,  बल्कि इंतज़ार कर रहा था कब सिक्युरिटी चेकिंग में जाए, अपने हाथ उठाये और उसकी चेकिंग हो। मोटी जींस के पाँयचे के अंदर छुपी छोटी छोटी गोलियां बिलकुल भी पता नहीं चल रही थीं बेल्ट के अंदर की डबल सिलाई के अंदर भी कुछ गोलियां थीं। उसे अजब सा थ्रिल महसूस हो रहा था। इतने सारे लोगों को बुद्धू बना रहा है, यह  ख्याल चेहरे से मुस्कराहट मिटने नहीं दे रहा था। वह आराम से एयरक्राफ्ट में बैठ गया। कहीं कोई गड़बड़ नहीं हुई।

मस्कट में एयरपोर्ट पर मम्मी-पापा और तूलिका आये थे। पूरे एक साल बाद मिल रहा था उनसे। एकबारगी बहुत सारा प्यार उमड़ा पर फिर इस ख्याल ने कि ये लोग तो यहाँ आराम से रहे वह किन  मुश्किलों में रहा, उस प्यार को पीछे धकेल दिया। मम्मी बार बार सर पर हाथ फेर रही थीं, पीठ से घेर पास ला रही थीं पर उसका सारा शरीर जैसे स्टिफ हो गया था। गोली का असर भी खत्म हो रहा था और उसके सर पर भारीपन तारी  होने लगी थी। उसकी कोशिश थी कैसे जल्दी घर पहुँच कर गोलियाँ निकाले।

पापा को बहुत बड़ा घर मिला था, खूब बड़े बड़े कमरे। उसके लिए एक अलग कमरा था, जिसके परदे, चादर, तौलिये, डोरमैट सब नए लग रहे थे। उसने मुँह टेढ़ा कर  लिया। यह सब करने से उस बालकनी में टेबल फैन के सहारे उस पतले से बिस्तर पर सोने की याद मिट जायेगी क्या? मम्मी  ने उसकी पसंद की भिन्डी और पालक दाल बनाये थे। पर वह कोशिश में था, कब कमरे में जाकर जींस में से गोलियाँ  निकाले। मम्मी से जब कैंची मांगी तो वे चौंक गईं, "क्यों चाहिए?"

"काम है... अगर देना है तो दे दो" उसने रूखे स्वर में बोला तो मम्मी ने चुपचाप कैंची दे दी।

"बहुत थक गया हूँ, सोने जा रहा हूँ" कहकर उसने धड़ाम से दरवाजा बंद कर सिटकनी लगा दी। जल्दी से जींस के एक पाँयचे के नीचे थोड़ी सी कट लगाई तो गोलियाँ एक-एक कर गिरने लगीं। बिना पानी के ही एक गोली गटककर वह बिस्तर पर पड़ गया। सर का भारीपन छँटने लगा, शरीर हल्का हो गया। अभी प्लेन में बैठकर आया था, अब ऐसा लगा रहा था, बिना प्लेन के ही बादलों में उड़ रहा है।

सब उसका बहुत ख्याल रख रहे थे। मम्मी उसकी पसंद का खाना बनातीं, पापा ने नया लैपटॉप लाकर दिया था ताकि वह फ़िल्में या अंग्रेजी सीरियल देख सके। ड्राइंग रूम में जाता तो तुली भी तत्परता से  उसके हाथों में रिमोट दे देती, "तुम्हें जो मन हो तुम देखो भैया।"

पर वह अपनी दुनिया में ही डूबा रहता...। मम्मी  ही अक्सर टोकतीं या बातें करने की कोशिश करतीं पर वह उन्हें रूखा सा जबाब  दे दिया करता। एक बार मम्मी ने अधखुली बेतरतीब अटैची देख , लाड़ से कहा, लाओ तुम्हारे कपड़े अलमारी में लगा दूँ। वह बुरी तरह बिफर गया, "एक साल से खुद  ही अपने सारे कम कर रहा हूँ न! मुझे आदत नहीं रही किसी के हेल्प की, जब मन होगा, सम्भाल लूंगा कपड़े।"

मम्मी आँसू छुपाती उठ गईं थीं। उसे डर था कपड़ों के बीच रखे पाउच केअंदर रखी गोलियों पर कहीं मम्मी की  नजर न पड़ जाए। आज सोचता है, काश मम्मी उसके कहे का बुरा नहीं मानती जबरदस्ती उसके कपड़े संभालतीं। उनकी नजर उन गोलियों पर पड़ जाती और वह इस बुरी तरह उस दलदल में नहीं फंसता। दलदल में गिरना कितना आसान था पर निकलना कितना मुश्किल, ये इन दो वर्षों में पल पल महसूस किया साहिल ने।

मस्कट में न कोई दोस्त थे, न बाहर घूमने की जगह। ज्यादातर वक्त, या तो अपने लैपटॉप में सर घुसाये हुए, या फिर नशे में आधी बेहोशी में पड़ा रहता और सब यही समझते कि रात-रात भर जागकर फ़िल्में देखता है और फिर दिन में  सोता है। रिजल्ट भी  आ गया...। नब्बे प्रतिशत से ऊपर की हसरत रखने वाले माता पिता को उसके 54 प्रतिशत ने निराश तो बहुत किया होगा, पर उन्होंने  इसे जाहिर नहीं किया। यही कहते रहे, कि अंतिम वर्ष में बहुत डिस्टर्ब रहने के कारण पढाई पर असर पड़ा और रिजल्ट खराब  हो गया। पिता शायद अपना अपराध बोध छुपाने को उसे आश्वस्त करते, "चिंता ना करो कुछ कॉन्टैक्ट्स हैं, तुम्हारा एडमिशन अच्छे कॉलेज में हो जाएगा। पर अब मन लगाकर पढना। पूरे भविष्य का दारोमदार इसी दो वर्ष की  मेहनत पर टिका हुआ है।" और दिल्ली के एक बहुत ही प्रतिष्ठित कॉलेज में शायद भारी डोनेशन देकर उसका एडमिशन हो गया। मम्मी  बहुत खुश थीं, "मैंने कभी सोचा भी नहीं था, तुम्हें इतने हेप कॉलेज में भेज पायेंगे हम। देखो, पापा मस्कट नहीं आते तो ये सम्भव नहीं हो पाता  अब खूब मन लगाकर पढना बेटा, यहाँ तुम्हारी सारी पर्सनैलिटी ही बदल जायेगी। बहुत बड़े बड़े लोगों के बच्चे पढ़ते हैं वहाँ" और इन्हीं बड़े लोगों के बेटे ने बेडा गर्क किया उसका।

मस्कट से लौटते हुए वह इतना खुश था,मानो अपने घर लौट रहा हो। अब महेश, हार्दिक, नवल के अपने गैंग से मिल पायेगा। साथ बैठे, अधसोए से आँखें मूंदे बादलों की  सैर करने में एक अलग ही आनन्द था। पहले ही मैसेज कर दिया था। उसकी पूरी गैंग ही मौजूद थी। सीधा महेश के अड्डे पर गया। इस बार तो महेश ने कागज़ में लपेट कर कुछ सुलगा कर उसका कश लगाने को दिया। एक कश लगाते ही आँखों के आगे लाल पीले सितारे नाचने लगे, दिमाग में एक अलग सी सनसनी महसूस हुई। महेश ने कंधे पर हाथ रख  कर कहा, "अब तू कॉलेज में आ गया है,क्या यह बच्चों वाली गोलियाँ लेता रहेगा। तुम्हारे कॉलेज के हॉस्टल के लडकों से मिलवा दूंगा। वहाँ छत पर अड्डा जमाते हैं सब।" धीरे धीरे कई लड़कों से दोस्ती हो गई। अक्सर किसी के घर पर पार्टी होती, खूब तेज म्यूजिक,  और सुट्टा लगाकर झूमना। आँखें बंद किये सतरंगी दुनिया की सैर करना, इस से बढ़कर सुख कुछ और नहीं लगता। सुबह मॉर्निंग टी की जगह अब इसी चरस ने ले ली थी, दिमाग की नसें खुल जातीं। क्लास में खूब जिंदादिल, बेबात कहकहे लगाना, लच्छेदार बातों के जाल बुनते जाना। अपने इस व्यक्तित्व का उसे पता नहीं था। स्कूल में वह बहुत शर्मीला नहीं था, पर ऐसा वाचाल भी नहीं था। पर अब तो जैसे उसके व्यक्तित्व की परतें खुलतीं जा रही थीं। उसके महंगे ब्रांडेड कपड़े, जूते,  बैग, और अमेरिकी एक्सेंट वाली अंग्रेजी ने ढेरों लड़के-लड़कियों को उसकी तरफ खींच लाए थे। मस्कट में लगातार, अंग्रेजी सीरियल के कई सीजन देख देख कर वह उनकी अंदाज़ में ही बोलने लगा था। लड़कियों में एक आकाक कक्षा उसे भी अच्छी लगती, अपने चेहरे पर दो तीन बार उसकी  नजर देख, आकांक्षा भी समझ गई और खुद ही ज्यादा देर तक साहिल के  साथ रहने लगी। एकाध बार साथ मूवी और, रेस्टोरेंट भी गए। पर उसे समझ नहीं आता, आकांक्षा से क्या बातें करे। चार पाँच घंटे बाद हिरोईन का असर कम होने लगता, उसे तलब लगती कि एक बार कमरे में  जाकर एक सुट्टा लगा आये। आकांक्षा उसके सामने अपने नीले  नाखून फैला देती, "देखो तो ये कलर कैसा लग रहा है?" साहिल उसका आशय समझता था  कि वह चाहती है, वह उसका हाथ थाम उन नाखूनों पर अपनी अंगुलियाँ फिराए। पर उसे जॉइंट की ऐसी तलब लगती कि उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता और उसे लगता अगर आकांक्षा का  हाथ थामा तो फिर कुछ समय और निकल जाएगा। यहाँ से उठने के बहाने नहीं बना पायेगा। आकांक्षा अपने हाथ समेट लेती और नथुने फुला कर बोलती, "तुम सबके सामने तो बहुत बातें  करते हो पर अकेले में चुप से हो जाते हो... मैं तुम्हें अच्छी नहीं लगती?"

"नहीं तुम बहुत सुंदर हो, बहुत अच्छी लगती हो, पर ज़रा टेन्स हूँ, वाशरूम जाना है' और वहाँ से उठ जाता। दौड़ता भागता अपने रूम पर आकर दो चार सुट्टा लगाता और फिर देर तक पड़ा रहता। एक पार्टी में एक सीनियर को इंजेक्शन लेते देख उसने भी अपनी इच्छा जताई। सीनियर ने मना किया।और रुआब झाड़ा, "पता है, यह इंजेक्शन रेस से पहले घोड़ों को दिया जाता है ताकि वे तेज दौड़ सकें। तेरे वश का नहीं है, इसे लेना... जा जा फक्की फाँक और धुआँ उड़ा।" उसे भी जोश आ गया, ऐसा कैसे। दुसरे सीनियर वीरेन ने भी साहिल को रोकने की कोशिश की पर वह भी अड़ा रहा और एक  इंजेक्शन ले ही लिया। लेते ही उसे लगा सर बहुत तेजी से घूम रहा है । वह ऊपर और ऊपर उड़ता जा रहा है... उसे लगा,, आस्मां तक पहुँच गया है और नीचे सारे लोगों को देख पा रहा है। पार्टी कब तक  चली, गाने कब बंद हुए, किसने क्या खाया पिया, उसे कुछ पता नहीं। जब पलकें खुलीं तो देखा,  उसकी तरह ही चार पाँच लोग इधर उधर पड़े हुए हैं। किसी तरह खुद को धकेलता अपने रूम तक ले आया और अपने बिस्तर पर देर तक पडा रहा। पर उसे मजा बहुत आया, अब तो इंजेक्शन ही लेने लगा। अब पापा से छोटा मोटा अमाउंट नहीं मंगवाता, सीधा पचास हज़ार की मांग करता करता, "लैपटॉप खराब हो गया है, नया लेना है, फोन गुम हो गया है, कॉलेज-ट्रिप पर जाना है" बहाने तो कई थे। कॉलेज जाना भी लगभग बंद हो गया था। एक पीरियड के बाद ही इंजेक्शन लेने  की ऐसी तलब लगती कि वापस हॉस्टल में अपने रूम में आ जाता। दोनों हाथों की नसें अब साथ नहीं देतीं। एक दोस्त ने बताया अपनी छाती पर और गले के पास भी ले सकता है। आईने में देखकर वहाँ इंजेक्शन लेने लगा। दोनों हाथों पर अनगिनत निशान थे। छाती और गले पर भी नए निशान बनने लगे।

एक दिन कुछ हेवी डोज़ ले लिया। पूरे  दो दिनों तक  सोता रहा। किसी ने उसकी खोजखबर भी नहीं ली। अब उसके ऐसे दोस्त थे, जिन्हें अपनी ही खबर नहीं होती,उसकी खबर कहाँ से लेते। दो रातें और एक पूरा दिन सोने के बाद जब आँखें खुली तो पाया वह बिस्तर से उठ ही नहीं पा रहा। आँखों के आगे रंगीन पटाखे से फूट रहे थे। कानों में झनझनाहट हो रही थी। बेतरह डर गया, ये क्या हो गया उसे। वह तो यूँ पड़ा पड़ा मर ही जाएगा। किसी को खबर भी नहीं होगी। किसी तरह खुद को घसीटते हुए बाथरूम तक ले गया। मुंह पर कुछ छींटे मार वापस बिस्तर पर पड़ गया। इतने में ही पस्त हो चुका था। पेट में कुछ गए तो शायद 48 घंटे हो चुके थे। चारपाई से एक हाथ नीचे लटक रहा था, दोनों पैर भी नीचे ही थे, इस तरह कैसे चलेगा। वह तो किसी काम का नहीं रह गया है। किसी तरह उसने मोबाइल उठा कर वाट्सएप खोला। देखा मम्मी ऑनलाइन  थीं, उसने बस टाइप किया, 'मा' और उधर से तुरंत मैसेज आया... 'हाँ बोलो बेटा ' जैसे मम्मी  ने टाइप नहीं किया हो,  प्यार से पुकारा हो। वह फफक कर रो पड़ा। मम्मी के तीन मैसेज आ गए, "क्या बात है  बेटा?" ... "टैल मी" ... "आर यू देयर?"

"मम्मा आयम इन डीप ट्रबल" बस इतना ही टाइप कर सका।  "क्या हुआ?" ... "व्हाट हैपेण्ड???" कई क्वश्चन मार्क्स के साथ मम्मी के कई मैसेज आ गये। फिर फोन ही आया। वह फोन पकड़ कर देर तक रोता रहा। मम्मी  ने बहुत हिम्मत बंधाई तो उसने धीर धीरे ड्रग्स लेने की अपनी सारी कहानी बता दी। उसे लगा, माँ चीखेंगी, चिल्लायेंगी, उसे कोसेंगी, "इसीलिए तुझे इतने अच्छे कॉलेज में भेजा था, नाम डूबा दिया तुमने। कहीं का नहीं रखा... क्या मुंह दिखाऊँगी सबको?" यही सब कहेंगी। पर मम्मी बिलकुल शांत रहीं, बोलीं, "जो हो गया, सो हो गया...। अब इस से बाहर कैसे निकला जाए हम दोनों को ये सोचना है। पहले तुम  हाथ मुँह धोकर कुछ खा लो। मैं कल ही वहाँ पहुँचती हूँ। तुम्हें अब वहां नहीं रहना है।"

थोड़ी देर तक तो वह वैसे ही पड़ा रहा। पर मम्मी के तसल्लीबख्श शब्दों ने जैसे उसकी खोई शक्ति लौटा दी  थी। हाथ मुँह धोकर कैंटीन तक गया। एक पीस ब्रेड बटर खाकर, एक कप कॉफी पी। सर पर पर जैसे कोई हथौड़े मार रहा था। फिर भी उसने किसी ड्रग को हाथ नहीं लगाया। रूम पर आकर सारे ड्रग्स समेट कर किनारे पड़े गंदे डस्टबिन में डाल दिए। पर दो तीन घंटे में ही ऐसी हालत हो गई कि फिर उसी डस्टबिन में से बीनकर थोड़ी हिरोईन ले आया। कांपते हाथों  से रोल बनाए और पीने लगा। जब दुबारा मम्मी  ने फोन किया तो वह नशे में धुत्त, बिस्तर पर सो रहा था। अगले दिन ही मम्मी आ गईं। उन्हें देखते ही छोटे बच्चों सा रो पड़ा। मम्मी छाती से उसे लगाए देर तक उसके सर पर हाथ फेरती रहीं और दिलासा देती रहीं, "चिंता मत करो, तुम्हे यहाँ से बाहर निकालने ही आई हूँ। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा। तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे। अच्छा  किया तुमने समय से मुझे बता दिया।" मम्मी ने जल्दी जल्दी उसका समान समेटा। कमरे में इधर उधर खाली सिरिंज, छोटे छोटे खाली पाउच, बिखरे पड़े थे। उसे शर्म आ रही थी पर अब तो मम्मी को सब मालूम था। माँ ने बड़े धैर्य से काम लिया। उसका सारा सामान समेटा। नानी के शहर की फ्लाईट वे पहले ही बुक कर चुकी थीं। उसे लेकर नानी के पास आ गईं।

 वह निढाल सा पडा रहता। पूर बदन दर्द से ऐंठता रहता। बदन को ड्रग्स  के खुराक की जरूरत थी जो सब कमरे में छोड़ आय था। नानी तो उसे देख डर ही गईं। एकदम हड्डियों का ढांचा लग रहा था। मम्मी ने उन्हें क्या बताया नहीं पता। पर मम्मी को ये हिम्मत और साहस शायद नानी से ही विरासत में मिली थी। नानी जरा भी विचलित नहीं हुईं, "कुछ दिन मेरे पास ही रहकर इसकी देखभाल कर, बच्चा बिलकुल ठीक हो जाएगा।" वह बिस्तर पर निढाल पड़ा रहता  नानी देर तक पास बैठी उसके बाल सहलातीं रहती। माँ उसे पौष्टिक चीजें खिलाने की  कोशिश करतीं पर उस से खाया नहीं जाता। दो निवाले खाते ही हाँफने लगता। आँखें लाल हो सूज गईं थीं, जैसे बाहर ही निकल आएँगी। मम्मी ने पापा को कितना क्या बताय था, पता नहीं  पर पापा ने एक बार भी उस से बात नहीं की। कई बार सुनता, माँ पापा से कहती रहतीं, "एक बार उसका हाल चाल पूछ लीजिये, बच्चे को हौसला मिलेगा। उम्र ही क्या है उसकी... अब गलती कर बैठा पर है तो अपना बच्चा ही।" पर पापा शायद सिर्फ पैसे के बारे में ही पूछते थे क्योंकि  मम्मी गुस्से में कहतीं, "पैसे ने ही उसका ये हाल किया है। अभी भी पैसा ही  पूछ रहे हैं, रखिये अपना पैसा, नहीं चाहिए।" उसे अहसास  था, पापा उस से बहुत नाराज़ हैं। उसने काम भी तो ऐसा ही किया है। वह फिर से डिप्रेशन के गहरे गर्त में उतर जाता। पूरा पूरा दिन बिस्तर पर पड़ा रहता। मम्मी को लगता वह ड्रग्स से दूर रहेगा तो धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। पर दस दिन बाद भी उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। शरीर में जरा भी शक्ति नहीं लौटी। आँखें देर तक खुली नहीं रख पाता। माँ ने अपने छोटे भाई से सलाह ली। मामा ने सलाह दी कि उसे किसी 'रिहैब सेंटर' में डाल दो। उन्हें पता होता है, विड्राल सिम्पटम होने पर पर कौन सी दवाएँ दी जानी  चाहिए। कुछ एक्टिविटी में एंगेज रखेंगे। अपने जैसे लोगों को वहां देखेगा तो शर्म महसूस नहीं करेगा। डिप्रेशन से बाहर आ जाएगा उसे लगेगा उसकी तरह के और लोग भी हैं दुनिया में। यहाँ तो अपराध बोध के अहसास से ही शायद बाहर नहीं निकल पा रहा।" मामा ने ही दो चार रिहैब सेंटर का पता कर वहाँ बात की। मम्मी ने एक बार फिर पापा से आने के लिए कहा, पर पापा ने तूलिका का बहाना बनाया। जबकि मम्मी ने कहा था, दो दिन के लिए उनकी सहेली  के यहाँ छोड़ सकते हैं। उनकी बेटी भी तूलिका की दोस्त थी। तूलिका आराम से रह जाती पर पापा नहीं आये। सिर्फ पैसे भेज दिए। यहाँ पैसे भी बहुत लगने वाले थे। यह सब वह आधी बेहोशी की हालत में सुनता रहता। कुछ बातें उस तक पहुँच पातीं, कुछ नहीं।

फिर मम्मी  ने धीरे धीरे उसके सर पर हाथ फेरते सब बताया कि उसे कुछ दिन देहरादून में एक रिहैब सेंटर में रहना होगा, वहाँ इलाज होगा, कितना समय लगेगा नहीं कहा जा सकता पर वह बिलकुल ठीक हो जाएगा। उसने सब सुना पर 'बिलकुल ठीक  हो जाएगा' ये तीन शब्द उसके जेहन में बिंध गए। उसे  हर हाल में। बिल्कुल ठीक होना ही  है, मामा भी उसके और मम्मी के साथ रिहैब सेंटर तक आये। वे भी बहुत प्यार से उस से बातें करते रहे। मानो उसका ड्रग में पड़ना, उसका नहीं,,  इन सबका दोष हो। उसे पता ही नहीं था, सब उस से इतना प्यारा करते हैं। आँखें छलछला आतीं उसकी। एक वर्ष के लिए मम्मी-पापा ने चाचा के घर क्या छोड़ा, उसका कंट्रोल ही नहीं रहा जिंदगी पर। वह सुबक उठता, मम्मी दौड़ी हुई आतीं, उसका सर कंधे से लगा, देर तक पीठ सहलातीं,  "मेरा  यकीन करो, तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे... तुम उन सबके नाम जानते हो न... जो लोग ड्रग की  दुनिया से लौट आये हैं।तुम भी लौट आओगे।और खूब पढोगे, बहुत बड़े आदमी बनोगे। मेरी बात भूलना मत, याद रखना तुम" मम्मी जैसे खुद को ही आश्वस्त करतीं।

मामा भी मम्मी और उसके साथ 'रिहैब सेंटर' ले  जाने के लिए आये थे। उन्होंने सहारा देकर घर के बाहर खड़ी टैक्सी में तो बिठा दिया पर एयरपोर्ट पर वह नहीं चल पाया। उसके लिए व्हील चेयर मंगवाना पड़ा। सिहर उठा वह, उसने अपना ऐसा हाल कर लिया है, सोलह साल की  उम्र जो सितारे छू लेने का हौसला रखने की होती है। वह बस रेंगने लायक बची है।

रिहैब में आकर सचमुच उसे बहुत अच्छा लगा। कुछ दवाइयाँ मिलीं जिनसे पहला आराम तो उन ऐंठती नसों को मिला। बदन दर्द कुछ कम हुआ, सर का भारीपन और आँखों की लाली जाती रही। एक  हफ्ता उसने सिर्फ आराम किया। फिर धीरे धीरे उसे दूसरों  से मिलने, कैरम खेलने, लाइब्रेरी जाने का मौक़ा मिला। कुछ दोस्त भी बन गए, जो उस से पहले आये थे और अब काफी ठीक हो चुके थे, उनके गाल भर गए थे, वे फुर्तीले हो गए थे। समय से उठते, बाहर बैडमिन्टन  खेलते, उछल कूद करते। उन्हें देख आश्वस्त होता मन, वह भी इनकी तरह हो पायेगा।

पर इतना आसान  नहीं था। उसे लगता कि सब सहज सामान्य है पर फिर डिप्रेशन का ऐसा दौरा पड़ता कि मन होता बस चुपचाप एक कोने में बैठा रहे। खुद को खींच कर गतिविधियों में शामिल करना  पड़ता। उनलोगों की काउंसलिंग भी होती, जिसमें बताया गया था कि ऐसा होगा,  इसलिए ज्यादा चिंता नहीं हुई। पर हौसला जरूर टूट जाता, फिर से शुरुआत करनी पड़ती। पर धीरे धीरे वह रिकवर करने  लगा। दो महीने बाद जब मम्मी से  फोन पर बात की तो उसकी आवाज में ताजगी और जोश सुनकर वह रो पड़ीं। इस बार उसने मम्मी को दिलासा दिया, "चिंता मत करो...। मैं बिलकुल ठीक हो  जाऊँगा... सब कुछ ठीक हो जाएगा"

धीरे धीरे वह सेंटर की हर एक्टिविटी में भाग लेने लगा। लाइब्रेरी में जाकर पढने लगा। साल गुजरते वह काफी सामान्य हो गया। रिहैब में एक प्रोग्राम था, जिसके तहत आपस में से ही किसी एक के घर,एक हफ्ते के लिए  दो-तीन लोग जाकर रहते। अकेले ट्रेन या बस से जाते, वहाँ रहकर घूमते फिरते ताकि आमलोगों से वे आसानी से घुल मिल सकें। उनमें आत्मविश्वास पैदा हो कि वे ड्रग्स के बिना भी रह सकते हैं। घरवालों को भी उनके व्यवहार की रिपोर्ट देनी होती। उसका घर तो मस्कट में था। उसके यहाँ कोई नहीं जा सकता पर वह अपने हमउम्र शाहिद और उम्र में बहुत बड़े नवजोत शर्मा के घर एक एक हफ्ते के लिए रह आया था। उसे बहुत अच्छा लगा, सबकुछ सामान्य। ऐसा लगा ही नहीं वह किसी दुश्चक्र से निकल आया है। अब उसे अपनी पढाई की चिंता होने लगी। उसने सोच लिया, अब प्रायवेट से बारहवीं की परीक्षा देगा। फिर किसी अच्छे लॉ स्कूल में एडमिशन लेगा। कानून की पढाई कर वह कुछ ऐसे क़ानून का अध्ययन करेगा जिनमें बच्चों तक नशे की चीज़ें पहुँचाने पर कड़े दंड की व्यवस्था हो। बच्चों को नशीली चीजें न पहुँच पाए, ऐसी कोशिश में वह अपना सारा जीवन लगा देगा। पापा ने अब तक उस से बात नहीं की थी। मन में एक टीस सी उठती। पापा उस से बिलकुल ही निराश हो चुके हैं पर वह ऐसा कुछ जरूर करेगा, जिस से पापा को उसपर गर्व भले न हो पर उन्हें उसे लेकर  कोई शर्मिंदगी ना हो। साहिल ने मम्मी को अपनी इच्छा बताई तो उन्होंने कोर्स की सारी किताबें, डाइजेस्ट, रेफरेंस बुक सब भिजवा दिए। वह रिहैब सेंटर में ही पढने लगा। वहाँ बहुत पढ़े लिखे, सीए, एमबीए, मेडिकल आदि की डिग्री लिए लोग भी थे। जिन्होंने अपनी नौकरी की टेंशन भुलाने के लिए शराब का सहारा लिया था और बाद में शराब ही उन्हें पीने लगी थी। उसका उत्साह देख वे पढने में उसकी मदद कर  देते,जहाँ कुछ समझ नहीं आता समझा देते। अब वह करीब-करीब ठीक हो चुका था। विड्राल सिम्पटम वाली दवाइयाँ भी बंद हो चुकी थीं। रिक्वेस्ट  करने पर उसे रिहैब से छुट्टी भी मिल  सकती थी पर उसे यहीं अच्छा लगता था। उसने बारहवीं बोर्ड का फॉर्म भर दिया, रिहैब सेंटर से ही जाकर परीक्षा भी दे दी और अब  अकेला मस्कट जा रहा था। यहाँ से बस से दिल्ली और फिर वहाँ  से मस्कट की फ्लाईट थी।

माँ ने बार बार कहा, अब वे उसे अकेला नहीं छोड़ेंगी, जिस कॉलेज में उसका एडमिशन होगा, उस शहर में मकान लेकर उसके साथ रहेंगीं, उसका  ख्याल रखेंगी। माँ ने उसका बहुत साथ  दिया है, उनकी कोशिशों से ही वह इस दुष्चक्र से बाहर निकल पाया है। पर फिर भी उसके मन में एक फाँस गढ़ी है जो बार बार चुभती है। वह इस गली गया ही क्यों? उसे यह सब भोगना क्यों पडा? इस छोटी सी उम्र में ऐसी मर्मान्तक क्यों पीड़ा सहनी पड़ी? अपने माता-पिता की उपेक्षाओं के कारण ही न। उसपर से उसे बेहिसाब पैसे देते रहे, पैसे देकर उन्होंने क्या सोचा। उनका बेटा सिर्फ पिज्जा बर्गर ही खायेगा और महंगे कपड़े ही पहनेगा? ये पैसे उसे गलत रास्ते पर भी ले जा सकते हैं, ये ख्याल उनके मन में क्यों नहीं आया? उन्होंने उसके बारे में ज्यादा सोचा ही नहीं। अपनी जिंदगी में व्यस्त रहे। तो अब वह भी उनकी जिंदगी में खलल नहीं डालेगा। तीन वर्षों से वह अकेला ही सारी परिस्थितियों से लड़ता रहा, अपने तन और मन पर कैसे कैसे कष्ट सहे अब उसने सोच लिया है, वह बिलकुल भी  उनके साथ नहीं रहेगा। होस्टल में रहे या पेइंग गेस्ट की तरह पर अकेला ही रहेगा। जब उसे उनकी जरूरत थी। चौदह वर्ष का किशोर था, तब तो उसे अकेला छोड़ चले गए अब तो जैसे वह, एक जीवन चक्र ही पूरा कर बाहर आ चुका है। भँवर में डूबा भी और निकल भी आया, अब अकेले ही जीवन का सामना कर सकता है।

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