समीक्षा: नॉट इक्वल टू लव

पुस्तक: नॉट इक्वल टू लव
लेखक: सूरज प्रकाश
प्रकाशन वर्ष: 2016
प्रकाशक: स्टोरी मिरर
मूल्य: ₹ 150.00
पृष्ठ: 198, पेपरबैक
आईएसबीएन: 9789386305053


सूरज प्रकाश के उपन्यास 'नॉट इक्वल टू लव' से गुजरते हुए - समीर लाल 'समीर'

छोटी सी है दुनिया!
कितनी भीड़ से भरी
है यकीन मुझको
कि मिल ही जाएंगे कहीं!

लेखक: सूरज प्रकाश
यह डायलॉग भले ही छवि ने देव से एक ऑनलाईन चैट के दौरान कहा हो जो कि मुख्य पात्र हैं सूरज प्रकाश की उपन्यास 'नॉट इक्यूल टू लव' के मगर मेरे लिए तो सूरज प्रकाश से, बिना इस उपन्यास को पढ़े और पाये, उस वार्तालाप का हिस्सा है जो उनसे मेरी उस समय हुई थी जब उन्होंने मुझे बताया था कि उनका एक नया हिन्दी का पहला चैट आधारित उपन्यास आया है और मैं रुक न पाया था कि कैसे जल्दी से जल्दी उनके इस उपन्यास को प्राप्त किया जाये।

सूरज प्रकाश के लेखन से पूर्व परिचय रहा है. उनकी गतिविधियां और समय समय से उनसे चैट पर संपर्क, कभी मेरे आलेखों पर उनकी प्रतिक्रिया, यही संबंधों के तार जोड़े था एक दूसरे के साथ।

"किताब डाक से आने में समय लगेगा, इन्तजार करियेगा" सूरज प्रकाश ने चैट पर मुझसे कहा था।

"नहीं, आपने जो खाका बताया है अपने उपन्यास का, उसे पढ़ने के लिए इतना रुकना मेरे लिए संभव नहीं। कोई और मार्ग सुझायें, किसी के द्वारा मंगवा लेता हूँ?"

तय पाया माध्यम और बस, अगले दिन ही उपन्यास मेरे पास था। तुरंत ही पढ़ना शुरु किया। उपन्यास के नायक देव में मैं खुद दिखा न जाने कितनी जगहों पर, और छवि तो मानो छवि हो हर उस पंक्ति की जो उभरती है एक अनजान सी मगर जानी पहचानी से ज्यादा करीब, मेरी चैट बॉक्स में अक्सर ही। लगा कि सूरज प्रकाश ने मेरा चैट बाक्स चुरा कर उस में हल्का सा फेर बदल कर खुद का उपन्यास बना लिया।

समीक्षक: समीर लाल
एक अन्य मित्र से बात हुई तो उसकी भी यही शिकायत कि यार! ये सूरज प्रकाश जो है न, उसने मेरे चैट बॉक्स में न जाने कैसे घुसपैठ बना ली और फिर अपना उपन्यास लिख मारा पूरा का पूरा। मैं मुस्करा कर रह गया, अरे, यही तो मेरी भी फीलिंग थी। फिर सोचा कि इस धरा पर शायद ही कोई भी मचलता संवेदनशील लेखक हृदय जिसका वर्चुअल दुनिया से साबका रहा है, इसे अपनी कहानी ही पायेगा।

पूरा का पूरा उपन्यास, छवि और देव , जो कि दोनों ही वर्चुअल नाम हैं ताकि कंफर्ट लेवल बना रहे, मानो समीर खुद को उड़न तश्तरी कह रहा हो, और पद्मिनी खुद को ऋतुपर्णा, एक दूसरे के द्वारा एक दूसरे के लिए चुने हुए नाम, कोई छिपाव नहीं, कोई दुराव नहीं। नायक नायिका, एक दोस्त, न न, एक प्रेमी नहीं, बस! एक दोस्त, जिनमें हर वो रिश्ता उगा जो जिस्मानी न था मगर रिश्तों की गरमाहट, उससे भी अधिक। बानगी देखें, "मैं पीड़ित और वो सब नहीं हूँ। लेकिन एक चीज है, इंटेलेक्चुअल जरुरत। उसी सेक्टर में मेरे सब खाने खाली हैं, आसपास कोई नहीं जिससे अपने मन की बात कह सकूँ या किसी चीज को ले कर बहस कर सकूँ।"

बीच बीच में चैटकर्ता करीब आते है, दूर जाते हैं, नाराज होते हैं, खुश होते हैं, दर्द साझा करते हैं, पढ़ते पढ़ते जब देव का बैकपेन उसे परेशान करता है तो मैं खुद भी अहसासता हूँ अपने बैक में उसी पेन को, इतना जिन्दा लेखन! दोनों खुशी मनाते हैं, ज्ञान शेयर करते हैं।

"हमारे एक कवि शुरु शुरु में शहतूत के पेड़ पर बैठकर कविता लिखते थे। राही मासूम रज़ा अपने ही घर पर ही बच्चों के शोर शराबे के बीच ही लिख पाते थे। नोएल कावर का ये दावा था कि वे हर सुबह टाइम्स में मृत्यु के शोक संदेशों वाला कॉलम पढ़कर अपना दिन शुरु करते थे, अगर उसमें उनका नाम नहीं होता था तो वे काम शुरु कर पाते थे।"

चैट आधारित उपन्यास पढ़ते पढ़ते अंत में लगता कि अब छवि और देव का आपस में मिलने का समय आ गया है। फिर एकाएक वही मोड़ आ जाता है जो सचमुच वर्चुअल दुनिया को उसे असल दुनिया से अलग रख कर उसकी अजब सी कसक और खूबसूरती को बरकरार रखती है। न देव कभी छवि से मिल पाया और न छवि कभी देव से, एक दिन मिलने से एक मुहाने पहले तक आ कर भी।

उपन्यास न पढ़ा हो मानो चन्द घंटो में खुद अपनी ही कहानी पढ़ कर कई दिनों के लिए खो गये हों उसमें, यह अहसास होता है उपन्यास खत्म कर के। लगता है जहाँ उपन्यास खत्म हुआ है वह अंत नहीं, एक अंतराल है। कितना कुछ बाकी है हो जाने को। बधाई सूरज प्रकाश को, इस बुनावट के लिए, आप भी पढ़ें और खोजे खुद को देव में या छवि में, यह तय हैं कि कहीं न कहीं पा ही लेंगे खुद को आप इस उपन्यास से गुजरते।

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