कविताएँ - अनीता  महुवार

अनीता  महुवार

देश 

सपनों के किस देश
की बात करूँ?
अब तो न सपने
न देश
नहीं कुछ भी शेष

फिर भी उठती है
ह्दय में एक कूक
न जाने क्यों

जगाती है उम्मीदें
बढ़ती है कुछ आस
कुछ करने की
कुछ पाने की

उत्सुक है भूमि भी
बीज...
अंकुर...
फूटने को

शेष है अभी
देश का भविष्य
तैयार है लोग
अपनी धरती
अपनी मिट्टी
अपने लोग।
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क्रूर नजरें

1.
लोगों की क्रूरु नजरें
पलक झपकते क्रूरुता फैलाती हैं।...
कभी तन को, कभी मन को
झकझोर देती है।

अपनी कड़वाहट को
विचारों से प्रस्तुत करती है।
लोगों की क्रूरु नजरें
पलक झपकते क्रूरुता फैलाती हैं।...

2. 
नारी, पुरुष, बच्चे,
न बूढ़े
क्रूरता से बच पाए हैं।

जाति और धर्म दोनों
तलवार की धार पर
चलते बिगड़ते आए हैं।

अमीर न गरीब क्रूरुता के
 विनाश से बच पाए हैं।

लोगों की क्रूरु नजरें
पलके झपकते क्रूरुता फैलाती हैं।...

3.
क्रूर नजरें हमेशा
क्रूरुता की स्याही दिखाती है।

इस अत्याचारी शहर में
कई भ्रष्ट नेताओं का गान है।

इसमें कहीं दुख, तो कहीं सुख
कहीं खुशी, कहीं गम

कहीं गुस्सा, तो कहीं शंका
कहीं बदनामी, तो कहीं गुंड़ागर्दी

लोगो की क्रूरु नजरें
पलके झपकते क्रूरुता फैलाती हैं।

4.
इस भीड़-भाड़ में
सभी को अकेला कर देती है।

स्त्री हो या वस्तु
पक्षी हो या पशु
वृक्ष हो या बगीचे
सभी में बेचैनी
और डर फैलाती..

लोगों की क्रूर नजरें
पलक झपकते क्रूरता फैलाती हैं।

5.
समय समय पर अपना क्रूर रुप दिखाती
यह कई रुपों से बनी-सँवरी है।

इन क्रूर नजरों ने किसी का
सम्मान न किया और न करेगी।

इसने कोमलता को हर पथ-पथ पर
कुचला और लज्जित किया।

स्त्री के स्त्रीत्व को खंडित करती
लोगों की क्रूर नजरें

पलके झपकते क्रूरुता फैलाती हैं।

6.
इसकी क्रूरुता अग्नि की
भांति सबको जलाकर राख कर देती।

दंगों में सब को भडक़ा देती
आग में घी डालने का काम करती।

हरी भरी भूमि को उजाड़ देती
निंदा, चुगली मानवीयता का कत्ल करती।

नकाब ओढ़े चेहरों का
और भयंकर रुप दिखाती।

लोगों की क्रूर नजरें
पलक झपकते क्रूरता फैलाती हैं।

7. 
प्रश्न विचारणीय कई हैं
परंतु शब्द पड़ गए मेरे कम!

दोष कई आधुनिक मानव में हैं
क्या गिनाएँ क्या छोड़े हम?

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