लघुकथाएँ: संगीता गांधी

संगीता गांधी

संगीता गांधी
खिलती अनुभूतियाँ

“वाह! क्या लगती हो!
इस उम्र में भी पटाखा हो! ”
गली में तेजी से जाती हुई प्रीति पर पीछे से आते।बाइक सवार ने फब्ती कसी।
प्रीति  चालीस साल की ग्रहणी, जल्दी जल्दी घर पहुँचना चाहती थी।
बारिश हो रही  थी। मुख्य सड़क पर पानी भरा होने के कारण गली वाले रास्ते पर जा रही थी।
“मैडम, बात तो सुनिए।”
प्रीति चुपचाप चल रही थी।
18-19 साल के लड़के की उदंडता बढ़ती जा रही थी। उसने मौका देख प्रीति की पीठ पर ज़ोर से हाथ मारा।
अब प्रीति चुप न रह सकी, “शर्म नहीं आती, तुम्हारी माँ की उम्र की हूँ।”
“मैडम, हम तो आपको एक औरत की तरह देख रहे हैं। खुश होइए इस उम्र में कोई इन नज़रों से आपको देख रहा है।”
लड़के ने अपनी आंखों में बेशर्मी चमकाते हुए बदतमीजी से सना जुमला फेंका।
प्रीति ने अपनी चाल तेज कर दी।
गली में आगे अंधेरा था। बारिश का भरा पानी नहीं दिखा। बैलेंस बिगड़ने से लड़का बाइक समेत गड्ढे में गिरा।
प्रीति ने मुड़ कर देखा। मन हुआ बहुत अच्छा हुआ इस जैसे छिछोरे के साथ यही होना चाहिए।
 प्रीति कुछ आगे बढ़ कर रुक गयी। पीछे लौटी।
“लो हाथ पकड़ो।”
लड़के को गड्ढे से बाहर खींचा। उसके सिर व बाहों पर चोट लगी थी।
“चलो डॉक्टर के पास।”
लड़का बड़ी हैरानी और कुछ शर्मिंदगी से प्रीति को देख रहा था।
“मैं आपको छेड़ रहा था। बदतमीजी कर रहा था। फिर भी आपने मेरी मदद की। मुझे डॉक्टर के पास ले जाने को कह रहीं हैं! ”
कुछ देर पहले की बदतमीजी शर्म बन कर लड़के की आंखों से छलकी। शब्दों में भी शर्मिंदगी जगह बना चुकी थी।
“तुम्हारी नज़रों में मैं बस एक हाड़-माँस की औरत थी!
पर मेरी नज़रों में तुम मेरे बेटे जैसे हो। एक माँ बेटे की चोट देख मुँह कैसे फेर सकती है।”
लड़का शर्म से पानी-पानी हो चुका था।
उसके अंदर का गन्दा पुरुष विलुप्त होकर अब बेटा बन माँ के साथ चल पड़ा।
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एक नियति

“माँ, देखो एक बार फिर सोच लो। ये वृद्धाश्रम में रहने का निर्णय आपका है, हमारा नहीं।”
“अब कुछ नहीं सोचना! बेटा, तुम्हारे घर में मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं पर ...."
कहते कहते माँ के शब्द मूक हो गए।
“पर क्या, माँ?”
“एक अकेली बुढ़िया दिन भर कमरे में अकेली पड़ी रहे!
नोकर आकर खाना-पानी दे जाए बस!”
“तो माँ और क्या करें आपके लिए, समय से सब कुछ मिलता है न!”
“दो रोटियां तो वृद्धाश्रम में भी मिल जाएंगी।
हाँ यहाँ साथ बात करने वाले लोग भी होंगे।”
“घर में सब अपना काम करें या आपके साथ गप्पे लगाएं!” बेटे ने चिढ़ कर कहा।
“बेटा तुम्हारे घर में कुत्ते को दो बार बाहर घुमाने का सबके पास समय है!  अम्मा से दो बोल बोलने का नहीं!”
“ठीक है, जो आपकी मर्जी।”
“आप यहाँ बैठो, मैं अंदर जाकर सारी प्रक्रिया पूरी करता हूँ।”
वृद्धाश्रम का संचालक, “तो शर्मा जी आप क्या करते हैं?”
“एक बड़े प्रतिष्ठान में हिंदी अधिकारी हूँ।”
“जी बहुत खूब। हिंदी की जो दशा है, उस विषय में आप क्या सोचते हैं शर्मा जी?”
संचालक ने कागजी कार्यवाही करते शर्मा जी से पूछा।
“जी, देश  में भले हिंदी का सम्मान कम हो पर मैं तो मानता हूँ कि हिंदी हमारी माँ है।”
संचालक ज़ोर से हँसा फिर व्यंग्यभेदी दृष्टि शर्मा जी पर उछालते हुए बोला, “हाँ जी, आजकल  असली माँ हो या भाषा दोनों की नियति वृद्धाश्रम है!  घर में दोनों का सम्मान नहीं!”
शर्मा जी की आँखें झुक चुकीं थीं।
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सम्वेदनाओं का पलस्तर 

रविवार स्कूल की छुट्टी थी। मानसी चाय का कप लेकर बालकनी में आ गयी। सड़क पर सुबह की सैर से लौट रहे कुछ दंपतियों पर मानसी की नज़र गयी। कितने अच्छे लग रहे थे। विवाह की सुखद अनुभतियाँ, “मैंने कभी महसूस नहीं कीं! ” मानसी बुदबुदायी।
चीनी के बाद भी चाय फीकी लग रही थी। ठीक वैसे ही बहुत सुंदर, सरकारी स्कूल की टीचर मानसी का जीवन था। कभी इस बालकनी में माँ, पापा, भाई के साथ बैठ चाय पीती थी। माँ, पापा मरने से पहले यह मंज़िल उसके नाम कर गए पर वो अपने जीवन का सूनापन किससे बाँटें?
हल्की बरसात शुरू हो चुकी थी। हथेलियों से फुहार को स्पर्श करते हुए अतीत की स्मृतियाँ मानसी को स्पर्श करने लगीं।
पापा ने धूमधाम से विवाह किया था। भरा-पूरा ससुराल, सब धन-वैभव पर सुख एकदिन न मिला। जिसके साथ जीवन बिताना था वो ही अपना न हुआ!  विवाह के साल भर बाद मानसी जान गई थी कि पति का रिश्ते की भाभी से अवैध सम्बन्ध है।
खूब क्लेश किया। कमाऊ बेटे के आगे सास-ससुर मौन रहे। पति ने साफ कह दिया, “रहना है रहो नहीं तो …! मैं उसे नहीं छोडूंगा।”
नतीजा तलाक और मानसी दो साल में ही मायके वापिस आ गयी। समय के साथ घाव भरा। दूसरे विवाह के लिए सबने ज़ोर दिया। पर मानसी  विवाह के नाम से घबराती थी। जब तक कुछ सम्भली - माता -पिता जा चुके थे। उम्र हाथों से फिसल चुकी थी।
आज भाई का अपना परिवार है। मानसी के पास है- उसकी नॉकरी, उसका अपना पोर्शन और जीवन  की दीवारों से झड़ता सूनापन!
तभी भाभी ने आवाज़ दी, “दीदी, ज़रा नीचे आइए।”
मानसी अतीत से वर्तमान में लौटी। सीढ़ियाँ उतर नीचे गयी।
“दीदी, हम कुछ दिन के लिए बाहर जा रहे हैं। इनके दफ्तर का एक टूर है। बच्चे भी साथ जा रहे हैं।”
इतना कह भाभी ने कनखियों से भाई को देखा। भाई ने बड़ी सावधानी से शब्दों को पिघलाते हुए कहा, “मानसी, वो टूर है न तो बस पति-पत्नी व बच्चे ही साथ जा सकते हैं। वरना तुम्हें भी ले जाते।”
भाई-भाभी की नज़रें मिलीं। नज़रों की भाषा और शब्दों की भाषा का अंतर मानसी समझ गयी थी।
“अच्छा घर का ध्यान रखना।” इतना कह भाई परिवार सहित  बाहर चला गया।
आंगन में अकेली खड़ी मानसी ने दरवाज़ा बन्द किया। भाई के पोर्शन पर दरवाजों पर लटकते ताले मानों मानसी को मुँह चिढ़ा रहे थे!
थके कदमों से चलते हुए मानसी सीढ़ियों की ओर बढ़ी। दो सीढ़ियाँ चढ़ते ही निढाल तीसरी सीढ़ी पर बैठ गयी।
अंदर कब से रोक कर रखी सिसकियाँ बाँध तोड़ कर बह निकलीं। रोते हुए मानसी उठकर अपने पोर्शन पर आ गयी। कमरे की छत  से पलस्तर झड़ कर मानसी पर गिरा!  दबी, घुटी चीखों के साथ मानसी की सूनी सम्वेदनाओं का पलस्तर भी झड़ने लगा।
48 वर्षीय मानसी ने अपने स्कूल के 50 वर्षीय अध्यापक विवेक को फोन मिलाया। विवेक की दो बेटियाँ विवाहित थीं। पत्नी की  मृत्यु के बाद नितांत अकेले थे।
“विवेक, मुझसे शादी करोगे?”
जवाब सुन मानसी के चेहरे पर खिली मुस्कान ने सम्वेदनाओं का पलस्तर पक्का कर दिया।

6 comments :

  1. संगीता जी की तीनों लघुकथाएँ मुझे अच्छी लगीं । बधाई सेतु में स्थान पाने के लिए ।

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  2. Sangeeta ji bahut achchhi laghukathaye badhai

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  3. सेतु मे प्रकाशन के लिए बधाई

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  4. बहुत सुन्दर कहानियाँ | बहुत अच्छा लिखी है...बधाईयाँ |

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  5. कहानियाँ हमारे आसपास ही होती हैं, बस आँखों पर संवेदनशीलता का चश्मा चढाओ तो सामने तैरती दिखाई देने लगती हैं। आपने बड़े प्रासंगिक विषयों को पकड़ कर लिखा है। बधाई । आशा है आगे भी पढ़ने को मिलता रहेगा ।

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  6. तीनों ही अच्‍छी रचनाएँ हैं। तीसरी को थोड़ा और कसा जा सकता है।

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