डेमोक्रेसिया कहानी-संग्रह में चित्रित यथार्थ और शिल्प

स्वाति चौधरी
स्वाति चौधरी

साहित्य एक ललित कला है जिसमें समाज के बहुरंगी तथा बहुआयामी चित्र उद्घाटित किए जाते हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कहानी, उपन्यास, कविता, निबंध, आलोचना सभी में युगीन परिस्थितियों का चित्रांकन किया जाता हैं लेकिन हिंदी गद्य विधाओं में कहानी सबसे सशक्त विधा मानी जाती है। साठोत्तरी हिंदी कथा साहित्य को जिन रचनाकारों ने अपनी सार्थक रचनाशीलता के द्वारा विस्तृत फलक प्रदान किया; उसमें असग़र वजाहत का अविस्मरणीय योगदान है। उन्होंने अपनी कहानियों में जीवन के विविध रंगों को अभिव्यक्ति प्रदान की है अपने आसपास समाज की जिन विसंगतियों को देखा और भोगा उसी का यथार्थ चित्रण उन्होंने अपने साहित्य में किया। उनकी कहानियों में समाज की जिन समस्याओं का चित्रण किया गया है उसमें सामाजिक जीवन की वास्तविकता नजर आती है। उनकी कहानियों में भारतीय जन-जीवन अपने पूरे परिवेश के साथ भिन्न-भिन्न किस्मों में उभरकर सामने आया है, जो सीधे जनता से खासकर आमजन से जुड़ा हुआ है। उन्होंने विभाजन की त्रासदी के साथ-साथ टूटते मानवीय मूल्यों, कला और साहित्य के क्षेत्र में बढ़ते राजनैतिक हस्तक्षेपों तथा निम्न और मध्यवर्गीय चरित्र को पूरी जीवंतता के साथ अपनी कहानियों में उकेरा है। उनकी कहानियों में सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक सभी समस्याओं को उजागर किया गया हैं। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से समाजिक विकृतियों पर कटु व्यंग्य प्रहार किया है  जिसमें ‘डेमोक्रेसिया’ सबसे चर्चित और लोकप्रिय कहानी-संग्रह है। इसमें नवीन कथा शिल्प के माध्यम से डेमोक्रेसी तंत्र के अंतर्गत व्याप्त विसंगतियों एवं मूल्यहीनताओं का चित्रण करते हुए राजनीतिज्ञों के क्षुद्र आचरण पर कटु व्यंग्य प्रहार किया गया है। यह कहानी-संग्रह समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण और विषमता के विरुद्ध है।

समय और परिस्थितियों को आधार बनाकर लिखा गया यह कहानी-संग्रह शिल्प के धरातल पर एक नवीन प्रयोग है। इस संग्रह में 18 कहानियाँ संकलित हैं जो उनकी नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा की परिचायक हैं। कहानी-संग्रह का शीर्षक ही अपने आप में इसका द्योतक है। यह कहानी-संग्रह सामाजिक चेतना के विभिन्न स्तर अपने भीतर संजोए हुए है। संग्रह की भूमिका में ही कहानी की रचना-प्रक्रिया और कहानी-कला के बारे में अति महत्त्वपूर्ण बातें बतायी गयी हैं। जैसे :-
1. हर अभिव्यक्ति रोचक होनी चाहिए
2. रचना कुछ विचारों, मूल्यों, प्रतिक्रियाओं, अस्वीकृतियों के बिना निरर्थक है।
3. समाज को अधिक मानवीय बनाना ही रचनाओं का काम रहा है।
4. अच्छी रचना का रहस्य कई तरह के अनुपातों में छुपा हुआ होता है।
5. अच्छी रचना के अनुपातों का बिगड़ना, उनसे खिलवाड़ करना, उसे तोड़ना और जोड़ना आदि से अनुपात का विस्तार और कला की सुन्दरता में शुमार होता है।
6. ख़िलाड़ी और लेखक अपने-अपने में अद्भुत की तलाश करते हैं।
7. एक ही शैली की चपेट में आ जाना रचनाकार की मौत है।
8. जीवन इतना नंगा हो चुका है कि अब लेखक उसकी पर्तें क्या उघाड़ेगा? रोज अखबारों में जो छपता है वह समाज को नंगा करने के लिए काफी है।
9. मानवीय मूल्यों में जितनी गिरावट आई है, सत्ता जैसा निर्मम नाच दिखा रही है, मूल्यहीनता की जो स्थिति है, हिंसा और अपराध का जो बोलबाला है, वह पहले नहीं था। रचनाकार के लिए यह चुनौतियों से भरा समय है।
10. उत्तर आधुनिक और दूसरे साहित्यिक सामाजिक आन्दोलन जो कहीं और किसी और देश के इतिहास में महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, वे हमारे यहाँ भी होंगे, यह मानना ज्यादती होगी।
डेमोक्रेसिया
लेखक: असग़र वजाहत
144 पृष्ठ, पुश्ती (Hardcover)
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष: 2013
ISBN: 978-8126724215
दरअसल हम पश्चिम से आक्रांत हैं। अंग्रेजी राज और उसके सांस्कृतिक साम्राज्य का दबदबा आज भी हमारे दिलों-दिमाग पर छाया हुआ है आदि। इस कहानी-संग्रह में सामाजिक विसंगतियों, राजनेताओं की वास्तविक स्थिति एवं स्वतंत्र भारत की समस्याओं एवं लोकतंत्र के विडम्बनापूर्ण, त्रासद और हास्यास्पद होते चले जाने का यथार्थ रूप उद्घाटित किया गया है। जीवन के जटिल यथार्थों का चित्रण इसमें किया गया है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक आदि यथार्थों के माध्यम से समाज की वास्तविक स्थिति को हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है।

नारी की यथार्थ स्थिति का चित्रण ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियाँ’ कहानी में किया गया है। भारतीय पुरुषप्रधान समाज मेंआदिकाल से ही स्त्री के चरित्र को स्वर्गिक दैवीय गुणों और शक्तियों के ढाँचे से मंडित किया जाता रहा है। जैसे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता’ लेकिन इस देवीत्व के बोझ के नीचे स्त्री का मनुष्यत्व कब घुट-घुट कर दम तोड़ देता है, उसे वह स्वयं ही नहीं समझ पाती है। स्त्रियों को आदिकाल से ही देवी, पूज्या माना जाता रहा है, लेकिन मात्र नैतिक मान्यताओं के कारण। आदिकाल से लेकर आज तक कई काल बदले, समस्याओं के समाधान निकले लेकिन पुरुषसत्तावादी समाज में नारी की स्थिति आज भी वैसी की वैसी ही बनी हुई है। इस पुरुषसत्तावादी समाज में स्त्रियों के रहने, बोलने, चलने, पहनने, खाने, सुनने-सुनाने सभी में वहीं व्यवहार किया जाता है जो पुरुष वर्ग चाहता है। क्षमा शर्मा लिखती हैं “स्त्रियों को देवी का संबोधन देने वाला समाज इस तथाकथित संबोधन की आड़ में सदियों से उसे प्रताड़ित करता आया है। स्त्रियाँ कैसी हों, वे कैसे चलें, कैसे बैठें, कैसे हँसें, कैसे बात करें ? पुरुष ने अपने विचारों और अवधारणा के अनुसार स्त्री का निर्माण किया। स्त्री ने स्वयं अपने बारे में, अपनी भावना, अपनी इच्छा, अपनी अनिच्छा के बारे में कभी कुछ नहीं कहा।”  स्त्री की इसी चुप्पी के परिणामस्वरूप उसे शोषण का शिकार बनाया जाता रहा है। ‘ड्रेन में रहने वाली लड़कियाँ’ कहानी में इसी वास्तविकता को उजागर किया गया है। घर में तीन-तीन, चार-चार लड़के पैदा हो सकते हैं लेकिन लड़की का जन्म अभिशाप माना जाता है। जैसे - “उसे दोपहर को होश आया था और नर्स ने बताया कि उसे लड़की हुई है। नर्स को नहीं मालूम कि सरला के यहाँ यह तीसरी लड़की है। नर्स बताकर चली गई थी। सरला से मिलने कोई नहीं आया था। न सास, न ससुर, न पति, न देवर, न ननद, सरला चाहती भी नहीं थी कि वे आएँ। दस साल यानी शरीर पर निकले दस बड़े-बड़े फोड़े। पहली लड़की का जन्म, फिर दूसरी और अब तीसरी।”  इसी तरह हर लड़की के जन्म पर घर मेंखुशी का माहौल मातम में बदल जाता है। लड़के की आस में लड़की का जन्म तो हो जाता है लेकिन उसके जीवन को सार्थक बनाने के लिए उसके माँ-बाप को क्या करना पड़ता है उसका चित्रण भी इस कहानी में किया गया है। आखिर सरला को भी वहीं करना पड़ता है जो हर तीसरी लड़की के जन्म होने पर किया जाता है। “सरला बच्ची को लेकर उठी, बाथरूम गई। बच्ची को ‘पाट’ में डाला और जंजीर चला दी। यह देखने को भी नहीं रुकी कि बच्ची फ्लश के पानी से बहकर गटर में गई या नहीं।”

यह कहानी नारी की वास्तविक स्थिति को उजागर करने वाली एक सर्वश्रेष्ठ कहानी है। इस कहानी में समसामयिक वीभत्स सच्चाई को फैंटेसी के माध्यम से संसार से लड़कियों के गायब होते जाने और नालियों में आबाद होते जाने की कल्पना के सहारे पुरुषसत्तावादी मानसिकता पर गहरी चोट की गई है।

दहेज़ रूपी दानवी प्रथा का यथार्थ चित्रण भी इस कहानी में किया गया है। सरला किसी काम की औरत नहीं है वह मात्र लड़कियाँ पैदा करने वाली मशीन है। बेटों की आस लगाये बैठे घरवाले क्यों उसे अपने परिवार में रखे। इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए जगदीश्वर की शादी के लिए दूसरा रिश्ता तय होता है। वह भी दहेज़ की लालसा के साथ। घर में एक पत्नी पहले से ही है फिर भी दूसरा रिश्ता तय किया जाता है। “भगवान का करना कुछ ऐसा हुआ कि सरला के पति जगदीश्वर को बिरादरी में ही अच्छा रिश्ता मिला। दहेज़ भी अच्छा मिलना था। चिंता थी तो बस यह कि यह सरला है। ”  इस समस्या का समाधान भी आसानी से ही निकाल लिया जाता है। “जगदीश्वर की बात और किसी ने नहीं घर के ‘स्टोव’ ने सुन ली। तेल न होने के बावजूद ‘स्टोव’ फटा और इस तरह फटा कि सरला सौ प्रतिशत जल गयी। ”  दहेज़ की प्राप्ति के लिए हर घर के स्टोव बिना तेल के ही इसी तरह फटते हैं और बिना तेल के ही सरला जैसी स्त्रियाँ ऐसे ही सौ प्रतिशत जलती रहती हैं। जिसका यथार्थ चित्रण इस कहानी में किया गया है।

खेलों में होने वाली धाँधली, घोटाले व खेलों की वास्तविक स्थिति का यथार्थ चित्रण ‘खेल का बूढ़ा मैदान गुस्से में’ कहानी में किया गया है। यह कहानी 9 खण्डों में विभक्त है। वर्तमान समय में खेल प्रारम्भ होने से पहले ही खिलाड़ियों की नीलामी आरंभ हो जाती है। लाखों-करोड़ों के घोटाले कर दिए जाते हैं। पहले ही हारने-जीतने के पैसे तय हो जाते हैं। जिसका वास्तविक चित्रण इस कहानी में किया गया है। “रात में बारिश भी नहीं हुई थी। तब इतना पानी कहाँ से आ गया। कल ही तो यहाँ खिलाड़ियों की नीलामी हुई थी। बोलियाँ लगी थीं। ख़िलाड़ी बन-सँवरकर आये थे। तब तो यहाँ एक बूँद पानी नहीं था। आज कहाँ से आ गया।”

खेल आजकल पैसों के लिए खेला जा रहा है। सभी अपने-अपने हितों की पूर्ति करने में लगे हुए हैं। खेलों के वास्तविक महत्त्व और उद्देश्यों से किसी को कुछ लेना-देना नहीं है। सभी अपने अपने स्वार्थों की रोटियाँ सेक रहे हैं। इसे इस उदाहरण से देखा जा सकता है। “एम्पायर विकेट लगाने आए। वे जब विकेट लगाने लगे तो पता चला कि खेल का मैदान तो पत्थर का हो गया है। एम्पायर किसी तरह विकेट लगाने में कामयाब नहीं हो सके। प्रीमियर लीग के मैनेजर भी विकेट न लगा सके। टीमों के कप्तान हजार कोशिश करने के बाद भी विकेट न लगा सके।
तो क्या मैच नहीं होगा ?
दस हजार करोड़ रुपये दाव पर लगे है स्पांसर कहने लगे - हम लोग लुट जाएँगे।
टीम के मैनेजर और कप्तान कहने लगे मैच तो खेला ही जाना चाहिए। 
मीडिया ने कहा किसी भी कीमत पर...मैच तो होना ही चाहिए। ...पाँच हजार करोड़ के विज्ञापन लाइन में लगे हुए हैं। ”  इससे स्पष्ट है कि खेलों को किस तरह कमाई का जरिया माना जाता है। वर्तमान समय में खेलों की यही वास्तविक स्थिति है। जिसका यथार्थ चित्रण इस कहानी में किया गया है।

 सामाजिक न्याय व्यवस्था की यथार्थ स्थिति का चित्रण ‘तमाशे में डूबा देश’ कहानी में देखा जा सकता है। वर्तमान समय में वैश्वीकरण के इस युग में आधुनिकता और भौतिकता की दौड़ में मनुष्य अपनी मनुष्यता को खोता जा रहा है। मानवीय मूल्यों का दिन-प्रतिदिन ह्रास हो रहा है। इन्हीं मानवीय मूल्यों में होने वाले ह्रास का चित्रण ‘नो रेड लाईट इन इंडिया’ कहानी में किया गया है। वर्तमान समय की शिक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का यथार्थ चित्रण ‘पढ़ोंगे लिखोगे तो होगे ख़राब’ कहानी में किया गया है। इस कहानी में बताया गया है कि शिक्षा पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं लेकिन उनका वास्तविक लाभ विद्यार्थियों को नहीं मिल पाता है। ‘मैं और पद्मश्री’ कहानी में पुरस्कार वितरण में होने वाली धाँधली का यथार्थ चित्रण किया गया है। इस प्रकार लेखक ने समाज की विभिन्न समस्याओं का यथार्थ चित्रण सामाजिक यथार्थ के माध्यम से किया है।

‘मुखमंत्री और डेमोक्रेसिया’ की कहानियों में बताया गया है कि देश में अकाल, बाढ़, दंगे कैसी भी स्थितियाँ हो मुख्यमंत्री ऐशो-आराम से जीवन-यापन करते हैं। जब मुख्यमंत्री बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करते हैं तब ब्रेकफास्ट, लंच, डिनर सभी का इंतजाम हेलीकॉप्टर में ही होता है। “अकाल हो या बाढ़, दंगे हों या स्टेम्पीड, मुख्यमंत्री सुखमंत्री रहते हैं। आजकल मुखमंत्री हेलीकोप्टरवा से बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का सघन दौरा करने लगे हैं। ब्रेकफास्टवा से लेके डिनरवा तक सबै हेलीकॉप्टरवा में होता है। ”  बाढ़ग्रस्त क्षेत्र की स्थिति बहुत भयानक है सैकड़ों गाँवों में पानी भरा हुआ है। हजारों जानवर मर चुके है। बीमारियाँ बढ़ रही है। लेकिन फिर भी बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के बचाव कार्य में मुख्यमंत्री जी अपने स्वार्थो की पूर्ति करने में लगे हुए हैं, वोटों के लिए सिर्फ अपने-अपने वोटरों की ही लाशें बाहर निकालते हैं। जिससे फिर से सत्ता हासिल करने में आसानी हो जाये। वहाँ मुख्यमंत्री जी के लिए जनता का हित मुख्य न होकर अपना स्वार्थ प्रमुख है। “वे सीधे कोसी की मुख्यधारा में गिरे और नीचे चले गए। सैकड़ों फुट नीचे चले गए। वहाँ उन्होंने देखा कि कीचड़ और गाद में लोगों की लाशें फँसी पड़ी हैं। मुख्यमंत्री उन लोगों को पहचान-पहचान कर निकालने लगे।
जब वे ऊपर आए तो उनके साथ चार सौ लोगों की लाशें थीं।
मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज दी। परधानमंत्री ने मुखमंत्री को बधाई सन्देश भेजा।
मीडिया ने मुखमंत्री से पूछा, “हमने सुना है, आप केवल अपने वोटरों की लाशें ही निकल कर लाए हैं। ”
मुखमंत्री ने कहा, “अरे तो विरोधी दल वाले भी चले जाते कोसी की गोद में, अरे ये तो डेमोक्रेसिया है। ”  इस प्रकार उन्होंने व्यंग्यात्मक तरीके से राजनेताओं की वास्तविक स्थितियों का चित्रण किया है तथा राजनेताओं द्वारा की जाने वाली निजी स्वार्थों की सिद्धि पर कटु व्यंग्य किया है।

आर्थिक यथार्थ के अंतर्गत समाज में व्याप्त निर्धनता, बेरोजगारी, आर्थिक विषमता आदि का यथार्थ चित्रण किया गया है। आर्थिक यथार्थ में समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं का लेखक ने वास्तविक चित्रण किया है। ‘दो पहियों वाले रिक्शे’ में व्यंग्यात्मक तरीके से आरक्षण और बेरोजगारी की स्थिति का चित्रण किया है। ‘यहाँ से देखो’ में आमजनता की वास्तविक स्थिति का उद्घाटन किया गया है। ‘तमाशे में डूबा हुआ देश’ कहानी में भी आर्थिक विषमता की खाई को दिखाया गया है।

आज आतंकवाद सम्पूर्ण विश्व के सामने समस्या बना हुआ है। जिसमें आतंकवादी अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की पूर्ति करने के लिए सामान्य आमजन को अपना निशाना बनाते हैं। इसी आतंकवाद की समस्या का यथार्थ चित्रण ‘आत्मघाती कहानियाँ’ में किया गया है। इन कहानियों में मानव बम और आतंकवाद का वास्तविक चित्रण कर उस पर कटु  व्यंग्य किया गया है। भारत में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपनाया गया है लेकिन वर्तमान समय में भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में सभी राजनेता अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति करने में लगे हुए है। जिसका वास्तविक रूप ‘तमाशे में डूबा देश’, ‘यहाँ से देखो’, मुख्यमंत्री और डेमोक्रेसिया’, ‘सदन में शहीदे आजम’ आदि कहानियों में देखा जा सकता है। इन कहानियों में डेमोक्रेसी तंत्र में चुने हुए सांसदों, मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, प्रधानमंत्री आदि के क्षुद्र आचरण का मजाक उड़ाते हुए उन पर व्यंग्य किया गया है।

भूमंडलीकरण के इस युग में बाजारवाद व्यापक स्तर पर फ़ैल रहा है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए अलग-अलग नामों से अनेक प्रोड्क्ट निकालती रहती हैं और विज्ञापनों के माध्यम से आमजन को भ्रम में डालकर अपने स्वार्थों की पूर्ति करती हैं। इसी कटु यथार्थ का चित्रण ‘सूफी का जूता’ कहानी में किया गया है।

 साहित्य एक ललित कला है। जिसमें साहित्यकार भावनाओं और विचारों को अभिव्यक्त ही नहीं करता बल्कि भावों को शिल्प की दृष्टि से भी रोचकता और आकर्षणप्रदान करता है। असग़र वजाहत की कहानियों में विभिन्न शिल्पगत विविधताएँ देखने को मिलती हैं। उन्होंने समाज की विसंगतियों का चित्रण करने के लिए मूर्त और अमूर्त बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से भाषा को अधिक व्यंग्यात्मक बनाया है। प्रतीकों के प्रयोग से इनकी रचनाओं में गहनता और संप्रेषणीयता में वृद्धि हुई है। ‘डेमोक्रेसिया’भीशिल्प की दृष्टि से एक नवीन प्रयोग है। जिसमें लेखक का मूल उद्देश्य समाज में व्याप्त अन्याय, शोषण और विषमता को उजागर करना है। इस कहानी-संग्रह के माध्यम से रचनाकार का उद्देश्य कोई कहानी कहना नहीं है बल्कि अमूर्तन के माध्यम से अपने समाज की विसंगतियों और  मूल्यहीनताओं को अभिव्यक्त करना है। जिसमें समय ही मुख्य है। लेखक शिल्प के सम्बन्ध ‘डेमोक्रेसिया’ की भूमिका में लिखते हैं कि “अख़बारी लेखन और कहानी लेखन के अंतर्द्वंद्व ने मेरी कहानियों पर प्रभाव डाला है। पहला प्रभाव यह पड़ा है कि मेरी कहानियों से केन्द्रीय पात्र गायब हो गए हैं। अब समय मेरी कहानियों का मुख्य पात्र है। इस कारण कहानियों में व्यंग्य चाहे जितना बढ़ा हो मानवीय संवेदना बड़ी हद तक व्यक्ति नहीं समूह केन्द्रित होती चली गई है जिसकी प्रस्तुति अमूर्तन के माध्यम से ही हो पाती है।”

 रचनाकर वर्तमान सामाजिक जीवन की भयावहता से इतना आक्रांत है कि सही तरीके से अभिव्यक्ति भी नहीं कर पा रहा है। जिसके कारण इसमें कहानी तत्व का लोप हो गया है। रचनाओं की रोचकता भी प्रभावित हुई है। कहानियों को अनेक छोटे-छोटे खण्डों में विभक्त कर दिया गया है और नवीन कथा-शिल्प का प्रयोग किया गया है। रोचकता और कहानीपन लुप्त होने के बावजूद भी ‘डेमोक्रेसिया’ सामाजिक परिवेश की विसंगतियों को उजागर करने में पूर्णतः सफल है। साधारण आमजन भी इन कहानियों का उद्देश्य और समाज की विसंगतियों को आसानी से समझ सकता है। भाषा में किसी विशेष पद्धति का चुनाव न करके सरल, साधारण, आम-बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है। हास्य, व्यंग्य और नाटकीयता के माध्यम से अपने समय और समाज की वास्तविक स्थिति का उद्घाटन किया है। इस प्रकार यह कहानी-संग्रह भाव, विचार, कथ्य और शिल्प के स्तर पर अपना अलग ही स्थान रखता है।

इस कहानी-संग्रह की सात रचनाओं का शिल्प लघु विस्तार खण्डों में विभक्त है। जिसमें पाँच से दस खंड हैं। कहानियों को पढ़कर लगता है कि लेखक कोई स्वप्न देख रहा हो और उसी का चित्रण कर रहा हो। अनेक अटपटे अद्भुत दृश्य आते रहते हैं जिससे कहानियाँ सार्थक बन पाती हैं और सशक्त भीं। इसीलिए समकालीन परिवेश को उजागर करने की क्षमता इन कहानियों में है। जैसे:-‘खेल का मैदान गुस्से में है’ कहानी नो खण्डों में विभक्त है। जिसका सम्बन्ध स्टेडियम, क्रिकेट, मैच, एम्पायर आदि से हैं। यथा:- मैदान तो पत्थर का हो गया है विकेट लगाना संभव नहीं है, संसार में पहली बार बिना विकेट लगाये क्रिकेट खेला जा रहा है, बूढ़ा खेल का मैदान पिच पर आकर खड़ा हो गया, दो-लाख देने पर ही नहीं हटता आदि से पता चलता है कि क्रिकेट मैचों में धाँधली और पैसों का लेन-देन होता है। लेखक के लिए सामाजिक परिस्थितियाँ एवं समाज की विसंगतियाँ महत्त्वपूर्ण है जिनका चित्रण ‘डेमोक्रेसिया’ में किया गया है।

संदर्भ ग्रंथ-सूची
1. क्षमा शर्मा, ‘स्त्रीवादी विमर्श : समाज और साहित्य’ (2002), ‘राजकमल प्रकाशन’, नई दिल्ली, पृ.128
2. असग़र वजाहत, ‘डेमोक्रेसिया’ (2013), ‘राजकमल प्रकाशन’, नई दिल्ली, पृ.17
3. वही पृ.17
4. वही पृ. 18
5. वही पृ.18
6. वही पृ. 36
7. वही पृ. 31
8. वही पृ. 104
9. वही पृ. 105
10. वही पृ. 03

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