अहिंसक होना आसान नहीं

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

सच्चे मायने में यदि देखें तो अहिंसा जीवन का आभूषण है। इसे धारण करना ईश्वर के साथ जीवन को जोड़ने जैसा है। जीवन को इस आभूषण से विभूषित करना और उसकी आत्मा के साथ जीना मनुष्य के ही बस का है। यह स्वभाव पशु-पक्षियों में भी विद्यमान हैं लेकिन मनुष्य इसे सुचिंतित जी सकता है। इसके माध्यम से अपने परिवेश, अपने देशकाल को प्रभावित कर सकता है। दुनिया में जितनी बार सभ्यताएं अपने उत्स को प्राप्त कीं उनका मार्ग अहिंसा का था तो उन्हें सदियों तक अच्छे मन से याद किया गया यदि वह हिंसक माध्यम से आयीं तो उनका नाश भी हुआ। गीता में जिस धर्म कि स्थापना की बात वासुदेव करते हैं उसका निहितार्थ भी उस सभ्यता का जन्म था जिससे अहिंसक प्रभुता की बढ़ोतरी हो और हिंसक और बर्बर मानसिकता का अंत हो। वासुदेव स्वयं कहते हैं ‘यदा यदा हि धर्मस्य...’ यानी अधर्म कि बढ़ोतरी पर ही हमें पृथ्वी पर आना पड़ता है, ऐसा उन्होंने उद्घाटित किया। पूरे महाभारत का युद्ध कहीं से अहिंसक नहीं लगेगा लेकिन वह लड़ाई हिंसा और अहिंसा के बीच की थी। धर्म और अहिंसा की स्थापना के लिए ईश्वर पृथ्वी पर आने के लिए बाध्य हुए। यह बात मैं इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि जब श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि वह सत्य के साथ खड़े हैं तो सत्य ही तो अहिंसा का दूसरा रूप है। यानी वह अहिंसा के साथ खड़े थे। यह बात अगर समझ ली जाय तो कोई भी कह सकेगा कि महाभारत की पूरी पार्श्वभूमि हिंसा और अहिंसा पर ही केन्द्रित थी जिसकी एक तरफ कौरव और दूसरी तरफ पांडव अपने कर्त्तव्य निर्वाह में सन्नद्ध थे।

खैर, मनुष्य का एक सबसे बड़ा विकार है उसके भीतर तमोगुण की अधिकता। निःसंदेह तमोगुण मनुष्य के लिए ही नहीं किसी सभ्यता के लिए हानिकारक है। मनुष्य के भीतर तो हिंसा के विचार ही तमोगुण की बढ़ोतरी से होते रहे हैं। यदि मनुष्य विचार से, मन और वाणी से हिंसा को न स्वीकार करे तो हिंसा के भाव आयेंगे ही नहीं। यदि व्यक्ति लालच और ईर्ष्या के भाव का त्याग कर दे तो हिंसा की भावना आएगी ही नहीं। यदि मनुष्य भौतिकवादी सोच से अपने को मुक्त कर ले और जगत के कल्याण के लिए सोचना शुरू कर दे तो वह नौबत ही नहीं आये जिससे हम सभी मनुष्य जाति को भय है। यदि हम सद्भाव की इच्छा रखें और दूसरों के बारे में हमेशा सकारात्मक हो जाएँ तो कोई ऐसी समस्या ही न आये जिससे हिंसा का भय सताए। लेकिन दुर्भाग्य है कि हम अब ज्यादा विकसित हो चुके हैं और हमारा अपराधकर्म भी उसी अनुपात में बढ़ा है। अपराधबोध तो लुप्त सा हो गया। हम न ही प्रकृति के बारे में चिंतित हैं और न ही अपने साथ जीने वाले दूसरे जीवों के बारे में। इससे हमारा अलग होना, हमारे लिए हानिप्रद रहा है। हमें मनुष्यता से दूर कर दिया इसलिए हम अहिंसक विचार से बहुत दूर जा चुके हैं। मशीने, नई तकनीकी और विकास के नारे कुछ लोगों के लिए वरदान साबित हुए हैं। लेकिन इन सबने मिलकर जो मनुष्य के बीच की दूरियां बढ़ाई, उसका असर किस पर हुआ है? इससे जो लोगों के बीच के रिश्ते टूटे उसका असर कितनी पीढ़ियों पर रहेगा इसका किसी को अंदाज़ा है? इससे जो लोगों का आध्यात्मिक और प्राकृतिक नाता टूटा है उससे आने वाली सभ्यता किस भविष्य के साथ खड़ी होगी इसका भी अंदाज़ा नहीं है। इसलिए मनुष्य के इस विकसित होने के भ्रम का सच समझना चाहिए। भ्रम के कारण भी हिंसा ज्यादा पुष्पित-पल्लवित हुई है। कभी यह भ्रम था कि हमारी संप्रभुता का विस्तार हो रहा है। कभी सुख का भ्रम रहा। कभी जीतने का भ्रम रहा। कभी हारकर जीतने के लिए युद्ध को आवश्यक समझने का भ्रम रहा। इस भ्रम ने मनुष्य को ज्यादा भ्रमित किया। विस्तारित होने का भ्रम। सबको अपने बस में कर लेने का भ्रम...। इसलिए हिंसा की एक जड़ मैं भ्रम को भी मानता हूँ। यदि मनुष्य के भ्रम टूट गए होते तो इतना हिंसक, बर्बर और आक्रांत समाज न देखने को मिलता। पूरा का पूरा इतिहास उठाकर देख लिया जाय तो जितने राजा-महाराजा, साम्राज्य विस्तारक और सत्तासुख पा लेने वाले हुए उनके भीतर भ्रम ज्यादा प्रबल रहे। इसलिए हम देखेंगे कि पूरी इतनी लम्बी मनुष्य की सभ्यता में अहिंसा की बात करने वाले कम और हिंसक लोगों की बहुलता दिखती है।

सवाल यह है कि क्या अहिंसक होना इतना कठिन है? सवाल यह है कि क्या मनुष्य होना ही हम नहीं चाहे जिसमें करुणा, प्रेम और परस्परता के भाव होते? और सवाल यह भी कि क्या ऐसा होना इतना कठिन है? मेरी दृष्टि में नहीं। लेकिन फिर भी यदि हुए हम ऐसे तो क्यों हुए, सवाल यह भी है। लोभ और लालच, कम समय में अधिक पा लेने की आकांक्षा और व्यक्ति की विघ्नकारी महत्वाकांक्षा जो मनुष्यता की शत्रु है, इसकी वजह से मनुष्य खुद मनुष्य से घृणा, अहंकार और बलजोरी से जीतने की इच्छा किया। इसी का परिणाम है कि जो व्यक्ति को सहज प्रकृति से गुण मिले उस पर आधिपत्य बुरी चीजों का ज्यादा होता गया और मनुष्य के भीतर के करुणाभाव, प्रेम की और सहानुभूति के भाव, दया के भाव समाप्त होते गए। व्यक्ति की इससे परस्परता कम बची। अब रिश्ते या तो सौदे पर आधारित बचे, या बाजार आधारित बचे, या अपने स्वार्थपूर्ति के लिए बचे। यह स्वार्थपूर्ति की वृत्ति मनुष्य को मनुष्य से दूर कर देती है। जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ घृणा, द्वेष और प्रतिस्पर्धा की भावना रहेगी ही। यदि यह प्रतिस्पर्धा अधिकतम प्रेम समर्पण के लिए होती तो यह नौबत ही नहीं आती। यदि यह प्रतिस्पर्धा सकारात्मक होती तो यह नौबत नहीं आती। यह नौबत इसलिए आई है क्योंकि मनुष्य संचय करने में अपना सारा दिमाग लगा रहा है। लूट की संस्कृति द्वेश की वजह से हुई है। द्वेश के कारण ही हम यह सोचते हैं कि उसके पास इतनी धन सम्पत्ति है हमारे पास कम है। अपने पास कम होने की चिंता से मनुष्य इस प्रकार की ओर ज्यादा ध्यान दिया है। यदि यह मान लें कि 'सबै भूमि गोपाल की' या त्याग से बढकर कुछ और नहीं है तो यह दशा हो ही नहीं। ऐसा नहीं है कि यह दशा केवल हिंदुस्तान में है बल्कि पूरी दुनिया में है। मनुष्य के समुच्चय से सृजित राज्य जैसी व्यवस्था में भी तो यही संप्रभुता की लड़ाई है। यह ‘पॉवरफुल’ शब्द ही मनुष्य के डिक्शनरी से जब हट जायेगा तो यह संभव है कि परस्परताबोध भी वापस आ जाए। मनुष्य की यह वापसी सचमुच एक नए समाज का सृजन कर सकती है। ऐसे में घृणा, द्वेश, ईर्ष्या, आतंकवाद, उग्रवाद, और युद्ध का भय नहीं हो सकता। फिर हमें किसी पुलिस व्यवस्था की जरुरत नहीं पड़ेगी। फिर हमें भय नहीं सताएगा। फिर हमारी परम्पराएं और रूढ़िवादिताएं हमारे किसी मार्ग में बाधा नहीं बनेंगी।

अब यह लोग कह सकते हैं कि मनुष्य के लिए ऐसा होना आसान नहीं है, यह सच है। मनुष्य के लिए अहिंसक होना भी आसान नहीं है। मनुष्य के लिए सहज मनुष्य होना भी आसान नहीं है। लेकिन यह आसान भी है एक मनुष्य के लिए। यह आसान है किसी सभ्यता के लिए। किसी राज्य के लिए भी अहिंसक संस्कृति का राज्य होना भी आसान है। लेकिन हो तो कैसे क्योंकि सभी यह सोचते हैं कि हमारा, उसका। यह मेरा, तेरा, हमारा, उसका, तू, मैं, इसका त्याग जरुरी है इसके लिए। इसके लिए जरुरी है की हम त्याग शब्द के महत्त्व को जानें। इसके लिए जरुरी है कि गलत और सही को समझ सकें। किसी की गरिमा को आहत न करें। किसी से द्वेश न रखे। किसी से घृणा न करें। अपने भीतर के अहंकार को दूर करें। सेवा और सुश्रुषा में विश्वास और आस्था को जगाएं। दूसरों के दुःख-दर्द को अपना दुःख-दर्द मानें। उसे एहसास करें। कमजोर का सहारा बनें। प्रकृति से अनुराग रखें। आध्यात्मिक बनें। अपने भीतर के तमस को दूर कर दूसरों को शिक्षित करें। यदि किसी को निःशक्त जीवन मिला है तो वक्त निकलकर उसके काम आएँ। सत्य को आत्मसात करें। सत्य बोलेन, सत्य बरतें। सत्य के अनुगामी बनें। संचय से बचें। सदाचारी बनें। अहिंसक हम अपने आप हो जायेंगे। अखंड शांति का उपाय है खुद को अनुशासित, संयमित और सेवाभावी बनाएँ।

यद्यपि यह एक आदर्शवादी स्थिति हो सकती है लेकिन आदर्शवादी मनुष्य बनने की कसौटी सिर्फ मनुष्य के पास है। फिर वह क्यों नहीं बन सकता? यदि इस आदर्शवाद से एक सदाचारी मनुष्य बिरादरी निर्मित हो सकती है तो ऐसा होना क्यों आसान नहीं? सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपनी इच्छाशक्ति से हारते हैं और इच्छाशक्ति से जीतते हैं। यदि अपने ऊपर अनुशासन हो गया तो कोई भी व्रत आसान है। फिर वह व्रत क्यों न अहिंसक होने का ही व्रत क्यों न हो। इसलिए शायद मनुष्य अपनी इच्छाशक्ति पर अभी तक विजय नहीं प्राप्त कर सका है। उसकी विघटनकारी व्यवस्था और मनुष्य की गरिमा के साथ खिलवाड़ करती इच्छाशक्ति तो दिखती है लेकिन मनुष्य के लिए और खुद को अनुशासित करने की इच्छाशक्ति कम लोगों के पास रही। यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि ये जो कम लोग हैं उन्हीं की वजह से हमारी सभ्यता बची हुई है। अभी भी दुनिया के तमाम भूभाग पर उन्हीं चंद लोगों की पुण्य और सेवाभाव से यह संसार संचालित है। यह इसलिए है क्योंकि उनकी इच्छाशक्ति अपनी ‘स्व’ को भूलकर ‘पर’ के लिए कार्य कर रही है, उसके लिए ही उनका यत्न है और वही इस पूरी सभ्यता को बचा लिया है वरना युद्धों और अशांति के इतिहास इस पूरी सभ्यता को विचलित कर देते हैं।

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डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।  

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर/निदेशक
यूजीसी-एचआरडीसी,
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय,
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