काव्य - सुजश कुमार शर्मा

1. सुन रही हो तुम

मैं रिक्त हो के रहूँगा
पूर्ण
कि मात्र तुम ही संभव
रह जाओगी ‘मुझ’ में।

अभी एक गहन शून्य को
जीना शेष है
‘मुझ’ में जो भी है
है अद्वितीय, प्रथम और नैसर्गिक
किंतु, मेरा नहीं है।

हाँ, तब हुआ था मेरा
उन क्षणगुच्छों में,
मगर अब विसर्जित करना होगा
उन्हीं महकते, खिले क्षणगुच्छों को
अजस्र प्रवाह में वक़्त के
और होना होगा मुक्त
कल के अर्चन से,
कि नदी का जल कब का बह चुका।

आज जो धार है
वही सत्य
एक मात्र सत्य
इसका बोध, गहनतम है मुझमें,
उन क्षणगुच्छों को विसर्जित तो करना है
मगर
नथुनों में महक भरने की क्षमता को नहीं
ताज़गी में जीने की आदत को नहीं
खिलावट को सतत बनाए रखने की
भावना को नहीं,
अत:
वे क्षणगुच्छ विदा-विसर्जित तो होंगे ही
मगर दे जाएँगे
नैसर्गिकता का और भी बहुआयामी बोध
जीवन के समस्त अद्वितीयता का होश
और एक मात्र, प्रथम होने की
हर क्षण को सहज प्रार्थना।

जानती हो तुम !
मुझमें ‘कुछ’ है
जो है स्वयं में प्रमाणिक, पवित्र और जीवंत
इसे ही
मैं ‘तुम’ में मिलाना चाहता हूँ,
इसके बाद
मैं न रहूँगा शेष
हो जाऊँगा तुम ही।


2. चाहता हूँ हो सकूँ रिक्त

चाहता हूँ
हो सकूँ रिक्त
अब तक के सब कुछ से,
कि तुम में मिलने पूर्व
शेष रहूँ
‘मुझ’ में मैं ही बस।

बस इतना-सा ही
परख लेना चाहता हूँ
स्वयं की क्षमता।

एक बार फिर
अस्तित्व के नए सिरे से
ढूँढ़ना चाहता हूँ
ख़ुद में पूर्ण पवित्रता,
माँ के आँचल के छोर में
बँधे सिक्के-सी
नहीं मिलेगी अब मुझमें,
इसके बावज़ूद भी
अपने होने के हर जेब में
ढूँढ़ूँगा उसे।

जानता हूँ
इस सिक्के को ख़र्च नहीं किया हूँ
हाँ, रख ज़रूर दिया हूँ
कुछ ज़्यादा हिफ़ाज़त से
ताकि खो न जाए,
मगर अब वक़्त के वजूद पर
ये क्षण यौवन की तरह उभरा है
जहाँ मिलाना है मुझे
तुम्हारे सिक्के की खनक से
इस सिक्के की खनक,
देखना है
दोनों में से कोई
खोटा तो नहीं रह गया है।

कहीं ऐसा तो नहीं
ये शाश्वत सिक्के
आज चलन के बाहर हो गए हों,
परखना है उन पर उभरे
सन् की सार्थकता,
जिस काल, जिस देश की हैं ये मुद्राएँ
उसका आधार अब भी सत्य है
अथवा नहीं।

हाँ, तुम्हारी आँखों की निश्छल चमक करती है
प्रमाणित
इनका सत्य,
और तुम्हारी मुस्कान
जिसमें गहन शांति महसूस रहा मैं
बताती है इनकी सार्थकता।

अब परवाह नहीं मुझे
इनके चलन के बाहर हो जाने की
क्योंकि
तुम्हारे गालों पर उभरी लाज की परिधि
कह रही है,
दोनों सिक्के उतने ही खरे हैं
जितनी मधुर
इनके मिलन की खनक है,

ये क्षण
जो वक़्त के वजूद पर उभरा है
निश्चय ही रिक्त है
अब तक के सब कुछ से।

यही क्षण,
ये क्षणगुच्छ
आप स्वीकार करेंगी क्या ?


3. वेदना पथ

न ही होना था मुझे संन्यासी
न ही कवि।

मैं
सदैव से हूँ
मुझमें है प्रणय पीयूष
पीड़ा के कण
यही हूँ
मैं।

जब से मुझे मालूम ही न था कि हूँ
तब से, तभी से ही
वो हदें पार हो गईं
जिसे शब्द भी बाँध न सके।

मेरे भीतर है एक जुनून
छटपटाने का (प्यार करने का नहीं)
तड़फड़ाने का (प्यार किए जाने का नहीं)
बिलबिलाने का (प्यार में होने का)
और यदि ये घुटन
मैं जाता हूँ लिख
या इसकी वजह से अंततः
है मुझमें विरक्ति
तो न ही मैं कवि हुआ
न ही संन्यासी।

मैं हूँ
एक वेदनापथी
मैं वेदनांश हूँ,
हाँ, ज़िंदा हूँ,
ज़िंदा रखा है मुझे
विरक्ति से भरा यह पथ।         
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