त्रिलोचन शास्त्री का गीतकाव्य

डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल
डॉ. उमेश चन्द्र शुक्ल

त्रिलोचन शास्त्री भारतीय लोक साहित्य के बड़े सर्जक है। लगभग छ: दशक की लम्बी काव्ययात्रा की जीवन साधना में सृजन कर्म उनके लिए जीवन तपस्या से कम नहीं है। “अपनी साधारण लगने वाली कविताओं में उन्होंने जिस काव्य-मूल्य की सृष्टि की, वह आज के काव्य-परिदृश्य में एक उल्लेखनीय और युगांतरकारी घटना मानी जा रही है।” त्रिलोचन के गीतों का मूल्यांकन होना अभी बाकी है। पता नहीं क्यों समीक्षक त्रिलोचन के पास जाते ही दाये-बाँए देखने लगते है। बस संस्मरणों के आडम्बर गढ़,शब्दों के वाग्जाल में उलझा कर निकल जाना चाहते है। अगर कुछ सुनने को मिलता है तो शास्त्री जी की पत्नी से जुड़े कुछ रोचक संस्मरण,जिसका लब्बोलुआब यह की शास्त्री जी की पत्नी खडूस कड़क मिजाज थी,। केदारनाथ सिंह बड़ी आसानी से यह कह कर निकल जाते है की त्रिलोचन “चतुर्दश पदी में लिखते है”संदेह होने लगता है की कही यह एक बड़े रचनाकार को ख़ारिज करने के लिए तो नहीं कह दिया गया। क्योकि त्रिलोचन की पहचान ‘सानेट’ लिखने वाले के रूप में की जाती है। नामवर सिंह ने बार-बार यही कहा की “त्रिलोचन सानेट अच्छा लिखते है। यह किसी स्थापित समीक्षक के सोचे-समझे शब्द हो सकते है।” जबकी त्रिलोचन के गीतों की तरलता से कही न कहीं सभी प्रभावित रहे है। सानेट की जमीन भारतीय नहीं है ,जबकि त्रिलोचन की काव्य भूमी में चिरानी पट्टी से लेकर काशी की पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता,संस्कृति की गंगा तरंगायित है। त्रिलोचन के प्रथम गीत संग्रह “धरती ”के प्रकाशन के बाद शिवप्रसाद सिंह,त्रिभुवन सिंह,नामवर सिंह,केदारनाथ सिंह,शुकदेव सिंह के भी गीत संग्रह प्रकाशित हुए है। सभी स्वनामधन्य त्रिलोचन के मित्र मंडल के दैदीप्यमान नक्षत्र है। जिन्होंने समय के साथ अपने कलम की दिशा कथा साहित्य,निबंध और आलोचना की ओर मोड़ दिया। ,काशीनाथ सिंह,शायद अंतिम कड़ी डॉ.चौथी राम यादव के पास त्रिलोचन के काव्य दृष्टि के मूल्यांकन के लिए अवकाश न था या इसका कुछ और कारण है बात समझ से परे है। त्रिलोचन का यह गीत त्रिलोचन के बनने और कवि त्रिलोचन की रचना प्रक्रिया को समझने में दृष्टि देता है।
“आँसू बाँधे है मैं ने गठरिया में
अपने भी है और पराए भी है ये
उपराए है तो तराए भी है ये
आप आ गए है बराए भी है ये
साधे हैं मैं ने कन कन डगरिया में ॥”
त्रिलोचन के मित्रों की गठरियाँ में कुछ और था जबकि गीतकार त्रिलोचन के जीवन गठरी में गाँव से काशी तक आसुंओं का शैलाब था। जिसे शास्त्री जी संजोकर रख रहे थे,शायद अपनों को इन्हीं आंसुओं में पाकर कवि अपनेपन का अनुभव करता रहा हो। त्रिलोचन की रचना प्रक्रिया का रास्ता कहीं न कही इसी के आसपास से होकर गुजरता है। त्रिलोचन के गीत की पंक्तियाँ तरलता,सरलता,भावाभिव्यक्ति,प्रभावान्विति गीति की सभी विशेषताओं को समेटे है-
“देखा ये पत्थर के ऊपर चुए हैं
चुपके से चू चूकर चुप हुए हैं
सूने में अटके अभी अनछुए हैं
काँधे हैं मैं ने बढ़ के नगरिया में ॥”
               यहाँ तक की रामविलास शर्मा,मैनेजर पाण्डेय जैसे समीक्षकों की दृष्टि भी त्रिलोचन की तरफ नहीं उठी। त्रिलोचन शास्त्री चिरानी पट्टी,काशी और मित्र मंडली के साथ काव्य साधना में सतत अग्रसर रहे। सानेट का कर्ता अपने गीतों को चतुर्दश पंक्तियों में बाँध कर नया प्रयोग कर रहा था। निराला का मुक्त छंद संभवतः
त्रिलोचन के यहाँ सानेट में गवई,गंध,गुलाब में ढल रहा था। जिसका ठीक-ठीक पहचाना जाना शेष है,यह हिंदी काव्यालोचना परंपरा के लिये एक गहरी चुनौती है।त्रिलोचन के काव्य-संसार का अब तक न तो समग्र मूल्यांकन हो पाया, न उनकी वह प्रतिष्ठा ही हिंदी साहित्य में हो पायी जिसके वे सही मानो में हक़दार थे।त्रिलोचन गाँव के कृषक-संस्कार के काफ़ी करीब थे जो उन्हें चिरानीपट्टी गाँव और काशी में मिला था। चिरानीपट्टी ने उनको लोक की समझ दी और काशी ने काव्य- चिंतन की। उनका लोक जिन तत्वों से बना है, उसमें बडी़-बडी़ बातों के लिये जगह नहीं।त्रिलोचन शास्त्री बिना लागलपेट के सीधे बनारसी अंदाज में अपनी बात कहने में विश्वास करते थे, इसलिये कविता के बाहर भी निकल आना चाहते थे अर्थात् कला के बंधन में नहीं फँसते थे। वे वस्तु के निकटतम स्थानापन्न, बल्कि वही हो जाना चाहते थे। जैसे जहाँ जिस रूप में देखा, हू-ब-हू वैसा ही रच दिया। अपनी ओर से जोड़-तोड़ से परहेज बरतते थे। यही लोक का स्वभाव भी है, यानि खरा, पवित्र। यहाँ भावना प्रधान होती है, न कि कला।-
" मुझे वह रूप नहीं मिला है जिससे कोई
सुंदर कहलाता है,हृदय मिला है
जिससे मनुष्यता का निर्मल कमल खिला है।"-त्रिलोचन
त्रिलोचन किसान लोक के ज्यादा करीब हैं जिसमें भारत की आत्मा बसती है, इसलिये जीवन के प्रति निष्कवच खुलापन त्रिलोचन को आधुनिकता और लोकधर्मिता के बृहत्तर दायरे में लेकर चलती है।जीवन से गहरा लगाव, जन के साथ तादात्म्यता और संघर्ष में तपकर निखरते जीवन के प्रति विराट निष्ठाबोध ही सच्चे अर्थों में त्रिलोचन को आधुनिक बनाता है। यह आधुनिकता न तो आयातित है, न अंधविश्वास या स्वांग भर। इस आधुनिकता का भारतीय संदर्भ है।रामदरश मिश्र त्रिलोचन को गीतकार को रेखांकित करते हुए लिखते है की “त्रिलोचन लोकधर्मी गीतकार है जिन्हें खाद-पानी संस्कारों से मिलाता रहा है”मिश्र जी की दृष्टि में त्रिलोचन का गीतकार पक्ष अन्य पक्षों के साथ मुखर है। त्रिलोचन के गीत भारतीय गीत परम्परा की भागीरथी से संस्कारित है। लोक से गहरा जुडाव,धरती की गंध का प्रणव अनुरागी त्रिलोचन का गीतकार रूप,रस गंध से आप्लावित है।
“मुझमें जीवन की लय जागी
मैं धरती का हूँ अनुरागी।”
                एक उदात्त नैतिक एवं सामाजिक चेतना उन्हें दायित्व बोधों के प्रति सचेत करती रहती है।
गीतिकाव्य में संगीत के तीन स्वरों की उपस्थिति मानी जाती है--शब्द संगीत,नाद संगीत और भाव या विचार संगीत। संवेगों की तीव्रता और उद्वेलन की सामान्य परिस्थितियों में भावाकुल अभिव्यक्ति ने स्वरों का रूप लिया--ऐसे शब्द और अर्थ तथा उनकी पुनरावृत्ति--यही गीतिकाव्य है।’“छन्दबद्धता, गीतिमयता, संक्षिप्त भावना की अभिव्यक्ति तथा घटना प्रवाह की त्वरा उनका प्रमुख घटक है। अर्थात् गीतिवाद्यों के साथ गाया जाने वाला छन्द काव्य गीतिकाव्य होगा।”गीति की प्राथमिक आवश्यकता है संवेगात्मक एकता और भाव संकलन की सुरक्षा। बगैर कोई भूमिका बनाए सहज उद्रेक और सद्यः स्फूर्ति के रूप में गीति प्रारम्भ होता है, जिसकी मूल प्रेरणा से उद्दीप्त भाव अत्यन्त सुनियोजित ढंग से व्यक्त होता है। गीति के भाव-विकास की चरम स्थिति आते ही, उसका अवसान हो जाता है।कई बार तो श्रेष्ठ कोटि की गीति भावोत्तेजना के चरम आने से पूर्व ही समाप्त हो जाती है और अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ जाती है—
“खिल उठे है फूल,हँसते उपवन।
जीवन ही जीवन भरा भुवन
अनिवार्य निरंतर आवाहन
सुनता रहता हूँ कुछ निःस्वन
द्यावा पृथिवी के कण-कण का
अग-जग का प्रेरक संजीवन ॥”- सबका अपना आकाश पृष्ठ
गीति की भावमूलक एकता के लिए उसके आकार की लघुता, उसका विशेष गुण साबित होता है। अनुभूतिमूलक संवेगात्मक एकता की स्थिति सामान्यतया देर तक बनी नहीं रहती।गीति के आकार की लघुता का इस अल्पजीविता के साथ सम्भवतः अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।“लघुत्व और लघिमा का यह अनुगुम्फन किसी गीति को पुनरुक्ति, उपदेशात्मकता,वर्णनात्मकता और प्रभावहीनता से बचाता है, और सम्प्रेषणीयता एवं प्रभावोत्पादकता को उन्नत करता है।”अर्थात, गीति की लघुकायता में ही कोई रचनाकार अपनी आत्मनिष्ठ भावानुभूति को समेकित, वेगमय और अखण्ड अभिव्यक्ति दे सकता है; और उस संवेग को   सुरक्षित रख पाता है, जिसका उद्रेक उसके भीतर हुआ है। गीतिकाव्य को परिभाषित करते हुए प्रो. मैनेजर पाण्डेय लिखते हैं, “गीतकाव्य व्यक्ति के संवेदनशील चित्त में रूपायित भावनाओं का आवेगमय लयात्मक सहज प्रकाशन है। भावनाओं की तीव्र आत्मानुभूति गीतकाव्य में कवि के व्यक्ति चित्त और लोकचित्त का एकात्म्य जरूरी होता है ।”
“गीत बन जाते ह्रदय के भाव
गीत बन जाते
तोड़ बंधन और बाधा
गीत ये फिर-फिर उमड़ते
उड़ स्वरों के पंख फिर
वर्ण भास्वर गगन जाते
जब नयन में रूप आता,रंग आता
तब तरंगित
हंस मानस छोड़ उड़ते
नील नभ को पार करते ॥”
त्रिलोचन निराशा के नहीं, आशा के सर्जक है। त्रिलोचन अपनी राह चले, अपनी अदा से,अपने अंदाज में। अगर किसी परंपरा से वे जुड़ते दिखाई पड़ते हैं तो एक हद तक निराला से और कुछ-कुछ नागार्जुन से। मिटटी,मनुष्यता,सच्चाई एवं एकता के साथ हमेशा खड़े दिखाई पड़ते है। त्रिलोचन का संस्कारित दृढ कवि व्यक्तित्व हमें अपनी ओर आकर्षित करता है,उनके जैसा बनने को प्रेरित करता है।त्रिलोचन “अपने अंतर की अनुभूति को बिना रँगे चुने” अपनी आत्मा की अतल गहराई में प्रवाहित भाव-जल में सिझा कर कागज पर उतारते हैं “उनका गीतकार साधना प्रदत्त औदात्य का नहीं ,अमूमन सरल-सहज का अभ्यस्त है। उनके गीतों में आस्था की अभिव्यक्ति हुई है ,लेकिन उसका संदर्भ लौकिक है,जीवन की गहमा-गहमी,चहल-पहल है। त्रिलोचन के भाव विचार मनोवैज्ञानिक दाँव-पेंच से मुक्त भाव विचार हैं।” त्रिलोचन का दर्द, उनके सपने और उनका आत्मविश्वास सब हमें अपना लगाने लगता है प्रेमानुभूति की सरस,आवरणमुक्त अभिव्यक्ति गीतों की तरल धार में फूट पड़ती है --
“आज सुन स्वर में तुम्हारें गीत अपने याद आए
याद आए भूल मैं जिनको चुका था
मधुर सपने
देख-देख भरे नयन के भाव
भाव वे जिनमें
न रंच दुराव या बिलगाव ॥”-धरती पृष्ठ -39
यहाँ गीत की रचना प्रक्रिया और त्रिलोचन की गीत रचना प्रक्रिया को समझा जा सकता है।” गीत का भावपरकता से स्वाभाविक संबंध है। कवि पर गीतिमत्त का दबाव जितना अधिक होता है,उतना ही उसका जीवनानुभव,चिंतन और लक्ष्य आवेग से आच्छन्न हो जाता है। इसमे आधुनिक मनोवैज्ञानिक दृष्टि ही नहीं उपजती जो प्रेक्षण,अनुभुति और कल्पना की निस्संग शल्यक्रिया करती है। भावबोध के साथ मूल्यबोध की दोहरी चेतना ,जो कारण की जटिलता का अन्वेषण करती है,गीत की अभिवृति नहीं है। इसीलिए गीतकार प्रायः उद्वेग,आकर्षण ,लालसा,मनस्ताप,करुणा आदि की काल्पनिक अनुभूति से ग्रस्त रहता है। गीत के रूप तंत्र से मुक्त हुए बिना ,किसी कवि के लिए काल्पनिक अनुभूतियों के दबाव से मुक्त होना प्रायः संभव नहीं होता ।” -डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय –कालत्रयी है कविता पृष्ठ -119
“नदी किनारे संध्या बेला
खोया सा मैं कहीं अकेला
रहता हूँ तब हवा साँझ की ,
दें-दें कुछ अवसाद जाती
मुझे तुम्हारी याद आती ॥” -धरती पृष्ठ-118
गीतकाव्य में काव्यानुभूति के साथ गीतकार की तन्मयता के अनुरूप ही पाठकीय तन्मयता सम्भव होती है। गीतकाव्य वैयक्तिक अनुभूति की व्यंजना है, किन्तु उसमें लोक-हृदय का स्पन्दन भी होता है, यही कारण है कि वैयक्तिक गीत समूहगीत बन जाते हैं ।
“हरा भरा संसार है आँखों के आगे
ताल हरे हैं
खेत भरे हैं
नई-नई बाले बालें लहराएँ
झूम रहे हैं
धान हरे हैं
झरती हैं भीनी मंजरियाँ
खेल रही है लोल लहरियाँ
जीवन का विस्तार है
आँखों के आगे ॥” -सबका अपना आकाश पृष्ठ -17

“धूप सुन्दर
धूप में जगरूप सुंदर
सहज सुंदर
व्योम निर्मल
दृश्य जितना
स्पृश्य जितना
भूमी का वैभव तरंगित
रूप सुन्दर
सहज सुन्दर  ॥” -धरती,पृष्ठ-86
त्रिलोचन के गीतों की रवानी और प्राकृतिक दृश्यों का मनोरम वर्णन गजब का है। मन के भावों का आवेग विचारों से आप्लावित है। त्रिलोचन के गीतों को पढ़ते समय लगता है जैसे कोई दार्शनिक,चित्रकार तुलिका से,संगीत के रिदम पर दृश्यों को टांक रहा हो। गति और यति द्रष्टव्य है --
“चाँदनी चर्चित
परम प्रार्थित
समर्पित
स्नेह सी यह रात
स्तब्ध नीरव रात
क्षितिज है संकीर्ण
कुहरे में
सघन अवरुद्ध
दिन जैसा नहीं विस्तीर्ण
वस्तुओं का
रूप अब तो और कुछ है ॥”धरती,पृष्ठ- 87
त्रिलोचना मात्र शब्दों से चित्रकारी ही नहीं करते बल्कि गीत के भीतर वर्ण्य वास्तु पर व्यापक चर्चा-परिचर्चा भी करते है। त्रिलोचन के पास दृश्यांकन के लिए गजब की सामर्थ्य है। प्रकृति का वस्तु के रूप में भरपूर उपयोग करते है । —
“राका आई
शारदा उतर आईं
स्मिति की ज्योत्स्ना
छाई
चन्द्रमा व्योम में मुस्काया
सागर में इधर
ज्वार आया
तारे हैं इधर-उधर पर्वत
चाँदनी खेलती है भू पर ॥”-सबका अपना आकाश पृष्ठ -13
त्रिलोचन की कविताओं में आकर्षण का एक और कारण है, उनकी कविताओं में बड़ी मात्रा में लोक-चित्रों और प्रकृति का समुपस्थित होना। वे अपने आस-पास की प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर गीतों की सुन्दर माला रच देते हैं। इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर उनके गीतों में कला  का स्वत: प्रस्फुटन हो जाता है।
“चल रही हवा धीरे-धीरे।
सीरी-सीरी
उड़ रहे गगन में झीने-झीने
कजरारे चंचल बादल
छिपते-छिपते जब तक तारे उज्ज्वलझलमल
चाँदनी चमकती है।
गंगा बहती जाती है ।” - धरती,पृष्ठ -30
त्रिलोचन के प्रकृत्ति-चित्र दृष्टि सीमा तक विशद् और फैले हुए हैं। प्रकृति उनके गीतों में आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में आयी है। सांध्य-काल में नौका-विहार करते हुए गंगा में शत-शत कम्पमान ज्योति-लताएँ, हरित-फौव्वारों सरीखे धान, प्रभातकाल के लघुवृत्त दीपालोक, नदी के पार के पेड़ों पर उगे हुए मृगशिरा नक्षत्र, पारदर्शी नील जल में सिंहरते शैवाल, स्वर-ताग में पल्लव-सरीखे पंछियों का सुभग बन्दनवार सूचीभेद्य घन के द्वार, शाम के सादे बदरफट घाम, रात के भीतर उभरती रात-सी परिचित-अपरिचित जिसके तनों की फांक के उस पार चमकता है। प्रकृति से तादात्म्य,मौसम का ज्ञान,पुरवा हवा के साथ गर्मी का जाना बादलों का उमडना-घुमणना जल भरे घने बादलों के साथ हवा की संगति क्लासिकल संगीत से सुर साधना की मनोरम भावभूमि दिखाई पड़ने लगाती है --
“बादल घिर आए
ताप गया पुरवा लहराई
दल के दल घन ले कर आई
जगी वनस्पतियाँ मुरझाई
जलधर तिर आए

बरखा, मेघ-मृदंग थाप पर
लहरों से देती है जी भर
रिमझिम-रिमझिम नृत्य-ताल पर
पवन अथिर आए

दादुर, मोर, पपीहे, बोले
धरती ने सोंधे स्वर खोले
मौन, समीर तरंगित हो ले
यह दिन फिर आए  ॥”
शशि घुला निःसीम कल्प खुला-खुला-सा ताल,सवेग चलते हुए एक टहनी से फुदककर दूसरी फिर तीसरी पर उड़ रहा चंचल चिड़ी-सा चाँद; सब में त्रिलोचन दूसरे कवियों से अलग दिखाई देते हैं। वर्ण, गंध, शब्द, रूप इन सभी विषयों का सह-चित्रण करने में तथा जागरूक पाठक के हृदय में उसकी समानुभूति जगा देने की सामर्थ्य रखते है -
“नावें चलती हैं तने पाल
तट भूमी हरित,निर्मल विशाल
कुछ जुते खेत कृषि अंकमाल
श्रमशील विपुल मानव समूह
कर बलशाली
बहती है गंगा लहराती लहरोंवाली ॥”- धरती,पृष्ठ - 35

लोक की कोख से जन्मा साहित्य मनुष्य को उसकी अपनी अस्मिता और ज़मीन से जोड़ता है। दुनियाभर में श्रम की संस्कृति को प्रतिस्थापित करता है और आदर भी। इसलिये कहा जा सकता है कि यह मनुष्यता की संस्कृति में विश्वास रखता है।–
“नई चेतना के रथ पर आरूढ़
नई शक्ति से भरे हुए सानंद
अपने पथ को पर करो स्वच्छंद
बाधाओं की ओर न आँख उठाओ

नव मनुष्यता को ले कर विश्वास
अधिकारी मनुष्य के अत्याचार
के विरूद्ध करते ही चलो प्रहार
अत्याचारी को निस्तेज बनाओ

पिछले दिन भी इसी तरह बीते हैं
जीते हैं जो तब के अब कहते हैं
जीवित जन क्या पड़े-पड़े रहते हैं
पराजयों में गान विजय के गाओ । । ”

इस संदर्भ में त्रिलोचन के गीतों को देखने से यह पता चलता है कि उनके गीत उस लोक-हृदय का पता देती है जिसमें बाजार के लिये जगह नहीं। अत: बाजार से बेजा़र होते इस लोक-समय में उनकी गीतों का महत्व और बढ़ जाता है जो बाजार के विपरीत, मानव की मूल संवेदना को जगाने में समर्थ है क्योंकि दुनियाभर में संप्रति चल रहे लूट-खसोट, छल-छद्म, हिंसा, दंभ, अहंकार, प्रदर्शन, अन्याय और उत्पीड़न से अलग वह एक प्रेममय, विलक्षण संसार की रचना करता है जिसमें सच्चाई को प्रतिष्ठित करने की और आदमी को झूठ से अलगाने की शब्दों की ताक़त है। अपने समय के साथ खुला मुक्त भाव से संवाद है ,जिसमें जीवन की अनंत संभावनाएँ व्याप्त है तो संस्कारों की मजबूत गठरी भी पास में। जहाँ जीवन घुटता नहीं बल्कि विकसित होता है।
“फूलों भरी राह मिलती कहाँ है
हँसते नए फूल जग की जलन भूल
क्षण इन्द्रधनु छाँह, क्षण छा रही धूल,
जिस को पड़े देखना कुछ न प्रतिकूल
ऐसी कली कोई खिलती कहाँ है ।

कुछ जान पहचान, कुछ कंठ में गान,
कुछ भावमय रूप, कुछ चित्रमय ध्यान,
होता यही आ रहा प्राण-संधान
मन की कठिन गाँठ खुलती कहाँ है ।

पावस गगन-गान, मधु भूमि का मान,
शुचि का प्रखर तेज, नव कल्प का ध्यान
तप के बिना कब गला हिम शिलाप्राण
मन की चुनी चाह फलती कहाँ है  । । ”
त्रिलोचन का लेखन मूल भारतीय संस्कृति व परंपरा को ही अपना लक्ष्य व ध्येय स्वीकारता है; जिस प्रकार सारे भारतीय दर्शन की खोज सत्यं शिवं सुन्दरम्‌ की खोज है; उसी प्रकार त्रिलोचन के गीत उसमें स्वर मिलाती । जीवन व जगत्‌ के सारे व्यवहारों की मर्यादा से आत्मतत्व व सत्यं, शिवं, सुंदरम्‌ का अन्वेषण करने की यह प्रक्रिया वस्तुतः जड़ता, कलुष, कृत्रिमता आदि की सर्वव्यापी दुर्बलताओं से परे निष्कलुष की ओर जाती है। ’जीने की कला’ आ जाए तो जीवन सुगम हो और जीवन सुगम हो तो जगत्‌ सुंदर — की उद्‌भावना अनेकशः उनके गीतों में आविर्भूत हुई है। गीति तत्वों को जीवन में जीने वाले त्रिलोचन जीवन के तार-तार को झंकार से भर देना चाहते है। जीवन की झंकार गीति के झंकार से झंकृत हो उठे। मनसा,वाचा कर्मणा सरस स्वर की साधना साधक का प्रेय है --
“बीन बजाओं
तार तार झंकार कर उठे
भोर व्यथा का भार हर उठे
प्राण प्राण से एक स्वर उठे
तान उठाओ
प्राणों को भर कर स्वर छलके
आभा नै मुखों पर झलके
भूल जायँ सब को दुःख कल
गीत सुनाओ ॥”
त्रिलोचन अपने आस-पास बिखरे जीवन की संभावनाओं और प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण परिक्षण करते हैं,। उनकी बारीक गतिविधियों का अवगाहन करते हैं और सीधी-सादी भाषा की लड़ियों में पिरोकर गीतों की सुन्दर माला रच देते हैं।इस प्रकार प्रकृति के व्यापारों से न्यस्त होकर उनके गीतों में जीवन कला  का स्वत: प्रस्फुटन हो जाता है। गीत त्रिलोचन के श्वास-प्रश्वास में तरंगायित है।
“शब्दों से ही वर्ण गंध का काम लिया है
मैंने शब्दों को असहाय नहीं पाया है ॥”-शब्द

सन्दर्भ ग्रन्थ :-

1. सबका अपना आकाश - (1987)
2. धरती-  (1945) दूसरा संस्करण-1977-नीलाभ प्रकाशन-इलाहाबाद
3. ताप के ताए हुए दिन- (1980) संभावना प्रकाशन-हापुड़
4. डॉ.प्रभाकर श्रोत्रिय –कालत्रयी है कविता पृष्ठ -119

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