हिंदी उपन्यास परंपरा में प्रेमचंद का स्थान

डॉ. योगेश राव

डॉ. योगेश राव 

    हिन्दी में उपन्यास साहित्य का विकास अंग्रेजी उपन्यासों के प्रभावस्वरुप हुआ। आधुनिक हिन्दी गद्य की अन्य विधाओं की भांति इसका विकास भी भारतेंदु युग से होता है। पर इस विधा का पूर्ण परिपाक प्रेमचंद की रचनाओं में मिलता है। प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास की साहित्य-यात्रा विविधमुखी है और आज भी यह गद्य की सर्वाधिक प्रसिद्ध विधा के रूप में प्रतिष्ठित है।

    भारतेंदु युग में हिंदी-उपन्यास का प्रारंभ बंगला उपन्यासों के अनुवाद के रूप में हुआ। भारतेंदु का ‘पूर्णप्रकाश’ और ‘चंद्रप्रभा’ उपन्यास अनुवाद ही है। हिंदी का प्रथम मौलिक उपन्यास लाला श्रीनिवास दास कृत ‘परीक्षा-गुरु’ माना जाता है, लेकिन आचार्य रामचंद्र शुक्ल श्रद्धाराम फिल्लौरी कृत ‘भाग्यवती’ को हिंदी का प्रथम उपन्यास मानते हैं। ये दोनों सामाजिक उपन्यास हैं। इनके बाद भारतेंदु की अधूरी कृति ‘आपबीती-जगबीती’ को मौलिक उपन्यास माना जाता है। भारतेंदु युग के प्रतिष्ठित उपन्यासकारों में जगमोहन सिंह (श्यामा स्वप्न), बालकृष्ण भट्ट (नूतन ब्रह्मचारी, सौ अजान एक सुजान), देवी प्रसाद उपाध्याय (सुन्दर सरोजिनी),  राधाकृष्ण दास (निः सहाय हिन्दू), किशोरीलाल गोस्वामी (लवंगलता, कुसुम कुमारी), बालमुकुंद्गुप्त (कामिनी) आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन सामाजिक उपन्यासों के अतरिक्त इस युग में कुछ ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे गए, पर इनमे इतिहास कम ऐयारी अधिक है। ब्रजनंदन सहायकृत ‘लालचीन’ और मिश्रबंधुओं का ‘वीरमणि’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। लालचीन गयासुद्दीन बलबन के एक गुलाम की कहानी है और वीरमणि, अलाउद्दीन खिलजी द्वारा चित्तौड़ पर की गयी चढ़ाई का कल्पना-मंडित विवरण है। इस युग में मौलिक उपन्यासों से कही अधिक अनुदित उपन्यासों की भरमार रही। मौलिक और अनूदित उपन्यासों की यह परम्परा भारतेंदु युग से द्विवेदी युग तक फैली चली आती है। इन उपन्यासों के बाद हिंदी में तिलिस्मी और जासूसी उपन्यासों की धूम-सी मच गयी। देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता, चंद्रकांतासंतति तथा भूतनाथ (अपूर्ण) जैसे जासूसी और ऐयारी से भरे उपन्यास लिखे। इन अद्भुत उपन्यासों को पढ़ने के लिए कितने ही लोगो ने हिंदी पढ़ी। देवकीनंदन खत्री के पुत्र दुर्गाप्रसाद ने अपने पिता के कार्य को आगे बढ़ाया- रक्तमण्डल, लालपंजा, प्रतिशोध, सफेद शैतान आदि इनकी कृतियाँ हैं। गोपालराम गहमरी, देवीप्रसाद शर्मा, जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी तथा किशोरीलाल गोस्वामी आदि ने इस प्रकार के उपन्यास लिखे।

    प्रेमचंद और जासूसी उपन्यासों की कड़ी के रूप में में हरिऔध और लज्जाराम मेहता को लिया जा सकता है। हरिऔध के ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ तथा ‘अधखिला फूल’ उपन्यास तथा मेहता के ‘आदर्श हिन्दू’ और ‘हिन्दू गृहस्थ’ उपन्यास उल्लेखनीय हैं।

    संक्षेप में प्रेमचंद-पूर्व के उपन्यास विषयवस्तु, तत्व और भाषा सभी दृष्टियों से बिखरे हुए और अनेकरूपता लिए हुए है। अधिकतर उपन्यासों की रचना सामाजिक उपदेशों या फिर कुतूहलवर्धन की ही दृष्टि से हुई। सभी उपन्यासों में कथोपकथन शैली का आभाव और वर्णनात्मकता की प्रधानता है।

    प्रेमचंद के हिंदी उपन्यास-क्षेत्र में पदार्पण करते ही, हिंदी उपन्यास कला को एक अभूतपूर्व परिपक्वता  और एक निश्चित दिशा मिली। प्रेमचंद ने उर्दू से हिंदी में लिखना प्रारंभ किया। हिंदी उपन्यास को कलात्मक रूप प्रदान करने और उन्हें जनजीवन की समस्याओं के अधिक निकट लाने का श्रेय प्रेमचंद को है। प्रेमचंद के उपन्यास मनोरंजन के साथ ही तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक चेतनाओं से भी मंडित है। मानवीय जीवन का सारा संघर्ष-चित्र इनके उपन्यासों में स्पष्ट हो उठता है। प्रेमचंद की गंभीर चिंतन दृष्टि के कारन इनके उपन्यासों में मानवतावाद को प्रतिष्ठित करने का सफल प्रयास मिलता हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में- “ प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित, अपमानित और निष्पेषित कृषकों की आवाज थे; पर्दे में कैद, पद-पद पर लांछित और असहाय नारी जाति की महिमा के जबर्दस्त वकील थे; गरीबों और बेकसों के महत्त्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। झोपड़ियों से लेकर महलों, खोमचों वालों से लेकर बैंकों, गाँव से लेकर धारा-सभाओं तक आपको इतने कौशलपूर्वक और प्रमाणिक भाव से कोई नहीं ले जा सकता।”1

    प्रेमचंद उत्तर भारतीय जनजीवन को गहराई से जानने और समझने वाले संवेदनशील साहित्यकार थे। सामाजिक यथार्थों को उन्होंने देखा-सुना ही नहीं भोगा भी था। इसलिए इनके उपन्यास सामाजिकता के साक्षात् प्रतीक बन गए हैं। मानवता को सामाजिकता के इतने विस्तृत फलक पर चित्रित करने का प्रयास प्रेमचंद पूर्व के किसी भी साहित्यकार ने नहीं किया था।

    डॉ. शिवकुमार मिश्र के अनुसार- “जर्मन आलोचक राबर्ट वाईमान ने कभी शेक्सपीयर पर लिखते हुए क्लासिक को, किसी बड़े लेखक को, पहचानने का एक सूत्र दिया था। क्लासिक या महान लेखक वह होता है, जो अपने विगत के महत्व को बरकरार रखते हुए वर्तमान में भी हमारे लिए उतना ही अर्थवान हो। उनका सूत्र था – Past Significance and Present Meaningfulness - अर्थात् विगत की महत्ता और वर्तमान की अर्थवत्ता। उनके अनुसार, विगत की इस महत्ता और वर्तमान की अर्थवत्ता के बीच जितना तनाव होगा, लेखक का बड़प्पन उतना ही भास्वर होकर सामने आएगा। हम समझते हैं कि प्रेमचंद में हमें क्लासिक की यह पहचान मिलती है।”2 (प्रेमचंद का रचना संसार: पुनर्मूल्यांकन, संपादक- डॉ. सुशीला गुप्ता, ‘नयी सदी में प्रेमचंद’, डॉ. शिवकुमार कुमार मिश्र का लेख, पृष्ठ-27)

    कलम का सिपाही में अमृत राय प्रेमचंद के सन्दर्भ में कहते हैं, “कोई इसे गुण माने या दोष, सामयिकता मुंशी जी के कृति मन की प्रधान वृत्ति है। मुंशी जी वर्तमान में जीते हैं और वर्तमान के लिए लिखते हैं। वर्तमान को फलाँग कर भविष्य में नहीं पहुँचा जा सकता। वर्तमान से परांग्मुख होकर कोई कालजयी नहीं हुआ। वर्तमान को छोड़ते ही भविष्य की स्थिति आकाशबेल-सी हो जाती है, जो कभी नहीं फूलती। वर्तमान ही भविष्य का आधार है। उसकी खाद-मिटटी, और भविष्य की वर्तमान की सहज दिशा है, उसका गंतव्य।”3 (कलम का सिपाही, अमृत राय, पृष्ठ-306)

    प्रेमचंद समाज का अंग बनकर जिए, इसलिए वो समाज-व्यवस्था से असंतुष्ट थे और उसे तोड़ने के लिए अपनी रचना धर्मिता का भरपूर इस्तेमाल भी किया। समाज से हटकर साहित्य का कोई अर्थ उनके लिए नहीं था। साहित्य का उत्तरदायित्व सामाजिक परिवर्तन के लिए होता है- इस बात को वे बहुत गहरे अर्थ-बोध के साथ महसूस करते थे। संस्कृति और परम्पराओं के प्रति अंध-आस्था के वे पक्षधर नहीं थे। उनकी यह पुख्ता धारणा थी कि साहित्यकार का निजी जिन्दगी से नहीं, सामाजिक जिन्दगी से सरोकार होना चाहिए।

    सौंदर्य की व्याख्या करते हुए प्रेमचंद कहते हैं- “प्रश्न यह है कि सौंदर्य है क्या वस्तु? हमने सूरज का उगना और डूबना देखा है, उषा और संध्या की लालिमा देखी हैं, सुन्दर और सुगंधि भरे फूल देखे हैं, मीठी बोलिया बोलने वाली चिड़िया देखी हैं, कलकल निनादिनी नदियाँ देखी हैं, नाचते हुए झरने देखे हैं- यही है सौंदर्य। इन दृश्यों को देखकर हमारा अंतःकरण क्यों खिल उठता हैं? इसलिए कि इनमें रंग और ध्वनि का सामंजस्य है। बाजों का स्वर-साम्य अथवा मेल ही संगीत की मोहकता का कारण है। हमारी रचना ही तत्वों के समानुपात के संयोग से हुई है, इसलिए हमारी आत्मा सदा उसी साम्य तथा सामंजस्य की खोज में रहती है।”4

    प्रेमचंद आगे कहते हैं, “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा, जिसमे उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो- जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाए नहीं; क्योंकि अब और ज्यादा सोना मृत्यु का लक्षण है।”5

    ‘सोजे वतन’ से लेकर ‘मंगलसूत्र’ तक प्रेमचंद ने एक लम्बा रास्ता तय किया। इन दो छोरों के बीच राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके अनुभवों से प्रेमचंद की राजनैतिक चेतना के विकास और साहित्य में जीवन के यथार्थ की सच्ची पकड़ की कहानी है। ‘प्रेमा ’(1907) और ‘वरदान’ (1921) प्रेमचंद के प्रारंभिक उपन्यास हैं। ये उस समय के उपन्यास हैं जब प्रेमचंद उर्दू में नवाब राय के नाम से लिखते थे। ये दोनों उपन्यास क्रमशः ‘हमखुर्मा-ओ-हमशाबाब’ तथा ‘जलवाये ईसर’ (उर्दू) का हिंदी रूपांतर है। ये उपन्यास कला की दृष्टि से बहुत प्रौढ़ नहीं हैं। ‘कायाकल्प’ (1926)  के पहले जितने भी उपन्यास लिखे गए वे सब उर्दू में लिखे गए थे।

    ‘सेवासदन’ (1916) उनके उर्दू उपन्यास ‘बाजार-ए-हुस्न’ (1914) का हिंदी अनुवाद है। प्रेमचंद का नारी-समस्या विशेषकर वेश्या-उद्धार को लेकर लिखा गया उपन्यास है। ‘सेवासदन’ में वेश्यायों की समस्या को मध्यवर्गीय दृष्टिकोण से देखा गया है। शहर में वेश्यायों के रहने से मध्यवर्गीय युवक किस तरह बिगड़ जाते हैं और किस तरह उन्हें बचाया जा सकता है, सेवासदन की समस्या का एक पहलू यह है। उसका उत्तर यह है कि वेश्यायों को शहर से बाहर निकालकर उनमें चारित्रिक सुधार किया जाए। ‘सेवासदन’ की समस्या का दूसरा पहलू है वेश्यावृत्ति को ख़त्म कैसे किया जाए। किन्तु उसका उत्तर प्रेमचंद नहीं दे पाते। एक मध्यवर्गीय सुधारक की भांति सुमन को ‘सेवासदन’ की अधिष्ठात्री बनाकर जैसे वह इस समस्या से अपना पिंड छुड़ा लेते हैं। वेश्यावृत्ति के क्या सामाजिक या आर्थिक पहलू हैं इसका कोई संकेत हमें ‘सेवासदन’ नहीं मिलता। इस उपन्यास में समस्या प्रधानतः मध्यवर्ग की है और उत्तर भी मध्यवर्गीय दृष्टिकोण से दिया गया है।

    ‘प्रेमाश्रम’ जो 1918-19 में लिखा गया और 1922 में प्रकाशित हुआ। यहाँ प्रेमचंद ने ‘सेवासदन’ से एक कदम आगे बढ़ाया है, एक मध्यवर्गीय समस्या को छोड़कर राष्ट्रीय समस्या को अपने उपन्यास ‘प्रेमाश्रम’ का विषय बनाया। इस उपन्यास में प्रेमचंद ने सामंती व्यवस्था द्वारा किसानों पर किये गए अत्याचारों का चित्रण किया है, उनके विद्रोह को प्रस्तुत किया है, किन्तु उपन्यास का अंत संघर्ष द्वारा विजय या उसमे हार से नहीं होता, वरन यांत्रिक आदर्शवाद द्वारा होता है। किसानों के शोषण का जितना नंगा चित्र प्रेमचंद ने ‘प्रेमाश्रम’ में प्रस्तुत किया है उतना किसी उपन्यास में नहीं। ‘प्रेमाश्रम’ के खलनायक ज्ञानशंकर जैसा पतित चरित्र उनके किसी उपन्यास में नहीं मिलता। पुलिस और साम्राज्यवाद के अन्य यंत्रों द्वारा सामंती व्यवस्था को किस तरह शक्ति पहुँचाता है, इसका भी चित्र इन्होंने इस उपन्यास में खींचा है।

    ‘रंगभूमि’ (1924) प्रेमचंद का वृहदाकार का उपन्यास है। इसका फलक गोदान की अपेक्षा अधिक व्यापक और संघर्षकर्मी है। इसकी कथा बनारस से लेकर राजस्थान तक व्याप्त हैं। इसमें गांधी की असहयोगपरक नीति, औद्यौगीकरण की समस्या तथा स्वछंद प्रेम और बलिदान का चित्रण सफलतापूर्वक किया गया है। इसका मुख्य पात्र सूरदास है। जिसने अपने व्यक्तित्व द्वारा इस उपन्यास को महाकाव्यात्मक उपन्यास बना दिया है।

    ‘कर्मभूमि’ (1932) यदि राजनीतिक चेतना से मंडित उपन्यास है तो प्रतिज्ञा (1904) प्रेमचंद का एक सामाजिक एवं  यथार्थवादी उपन्यास, जो विधवा विवाह की समस्या पर आधारित है। यह उपन्यास विषम परिस्थितियों में घुट-घुटकर जी रही भारतीय नारी की विवशताओं और नियति का वृहत आख्यान है, तो वही निर्मला (1927) अनमेल विवाह और दहेज़-प्रथा की दुःखांत त्रासद महागाथा बन जाती है।

    ‘गबन’(1930) मध्यवर्गीय जीवन और मनोवृत्ति का जितना सफल चित्रण प्रेमचंद ने ‘गबन’ में किया है, उतना उनके साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। आभूषण-लालसा और अंग्रेजी कचहरियों में होने वाली धमाचौकड़ी तथा बेईमानी एवं नारी के विविध चरित्रों को बेहद करीब से दर्शाया गया है। औपन्यासिक  कला की दृष्टि से से भी यह एक सर्वोत्तम रचना हैं।

    ‘कायाकल्प’ (1928) प्रेमचंद का वायवी और योग सम्बन्धी कल्पनाओं से मंडित उपन्यास है। कृषक-जमींदार संघर्ष को इसमें भी स्थान मिला हैं। यह एक प्रयोगशील उपन्यास है किन्तु कथा विन्यास की दृष्टि से शिथिल उपन्यास कहा जा सकता है।

    ‘गोदान’ (1936) प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों से भिन्न यथार्थवादी-दृष्टीकोण से एक भारतीय कृषक की दीन-हीन दशा का चित्रण है। गोदान के पहले के उपन्यासों में प्रेमचंद का दृष्टिकोण प्रायः आदर्शवादी रहा है। घटनाओं का यथार्थ चित्रण करते हुए भी वे उनका समाधान आदर्श में करते रहे। इन उपन्यासों में वे एक तरह से आदर्शोन्मुख यथार्थवादी रहे। परन्तु ‘गोदान’ में होरी के यथार्थ चित्रण में उन्होंने पुराना दृष्टिकोण छोड़ दिया है। यहाँ वे  पूर्णतया यथार्थवादी रहे हैं। ‘गोदान’ के सन्दर्भ में वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव का कथन है- “1936 में ‘गोदान’ का प्रकाशन हिंदी उपन्यास का एक नया प्रस्थान बिंदु था, वही आज भी इसका प्रासंगिक बना रहना इसके कालजयी होने का प्रमाण है। होरी सरीखे किसानों की त्रासदी के सन्दर्भ तब चाहे जितने भिन्न रहे हों, लेकिन किंचित बदले हुए स्वरुप में वे आज भी मौजूद हैं। खेती का दिनोंदिन अनुत्पादक होते जाना, किसान की अपनी बेदखली, कृषि मजदूरों का शहरों की ओर पलायन, किसान से मजदूर होने की प्रक्रिया और जीवित रहने का संघर्ष जिस तरह आज वैश्वीकृत भारत का यथार्थ है, वह एक नए ‘गोदान’ की जरूरत दरपेश करता है।”6

    आलोचक वीरेंद्र यादव ‘गोदान’ की व्याख्या करते हुए कहते हैं- “सच है कि होरी देशज सत्ता-संरचना से ही उत्पीड़ित था। उसे खेत से बेदखल करने वाले गांव के पुरोहित और मुखिया थे। होरी के त्रासदी के मूल में दो घटनाएँ थी- द्वार पर खूँटे से बंधी गाय का मरना और बेटे गोबर द्वारा गैर-बिरादरी की विधवा झुनिया को पत्नी के रूप में अपनाना। होरी इन दोनों घटनाओं के लिए उत्तरदायी नहीं था। लेकिन वर्णाश्रम व्यवस्था में शूद्र होने की नियति के चलते उसे धर्म, बिरादरी, मरजाद के बंधनों में जकड़ कर पहले जुर्माना और डांड़ के बहाने कर्ज के जाल में फँसाया गया, फिर उसकी जमीन-जायदाद गिरवी रख कर किसान से मजदूर होने के लिए बाध्य किया गया। यहां प्रेमचंद भारतीय समाज की उस विभेदकारी जातिगत संरचना को बेपर्दा करते हैं, जो आज के भारत का सच है।”7

    जीवन और समाज के प्रति प्रेमचंद का यथार्थवादी दृष्टिकोण उनमें एक ऊंचे स्तर की मानवता को जन्म दे सका; वह मानवता जो शोषितों के लिए वेदना से भरी हुई थी और शोषकों के लिए घृणा से। ‘गोदान’ के सिलिया-मातादीन प्रसंग में सिलिया का पिता हरखू चर्मकार अधिकारपूर्वक यह मांग करता है कि ‘तुम हमें ब्राह्मण नहीं बना सकते, मुदा हम तुम्हें चमार बना सकते हैं... हमारी इज्जत लेते हो, अपना धरम हमें दो।’ हरखू द्वारा पंडित मातादीन के मुँह में हड्डी डालने के प्रसंग में प्रेमचंद सोच-समझकर प्रतिरोध का धार्मिक मुहावरा अपनाते हैं, क्योकि जो धर्म मात्र ‘खानपान’, ‘छूत विचार’ पर टिका हुआ था उसे ‘जनेऊ तोड़ने’ और खानपान को भ्रष्ट करके ही चुनौती दी जा सकती थी। वीरेंद्र यादव पुनः ‘गोदान’ के विषय में लिखते हैं- “सही अर्थ में ‘गोदान’ आजादी के पूर्व बनते हुए राष्ट्र का रूपक है। इसे किसान जीवन की महागाथा के रूप में सीमित न करके भारतीय राष्ट्रवाद के आलोचनात्मक भाष्य के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। ‘गोदान’ के जिन अंशो को नगरीय और ग्रामीण जीवन की फाँक के रूप में ग्रहण कर अनावश्यक मानने का सरलीकरण किया जाता रहा है, उन्हीं में भारतीय राष्ट्र बनने की प्रक्रिया और वर्तमान जनतंत्र की विकृति की पहचान भी की जा सकती है। राय साहब, मेहता, खन्ना और मिर्जा सरीखे आरामतलब भू-स्वामियों, बौद्धिकों, पूजीपतियों द्वारा पुष्पित-पल्लवित राष्ट्रीय आंदोलन किस तरह के जनतंत्र की नींव डालेगा, इसके भरपूर संकेत प्रेमचंद ने गोदान में दिए हैं।”8

    ‘मंगलसूत्र’ (1936) प्रेमचंद का अंतिम और अपूर्ण उपन्यास है। साहित्यिक के जीवन की समस्या पर आधारित इस  उपन्यास के सिर्फ चार अध्याय ही लिखे जा सके। समीक्षकों की दृष्टि में इसमें लेखक ने आत्मचरित निबद्ध करना चाहा था। ‘मंगलसूत्र’ उपन्यास का यह अंश विशेषरूप से उल्लेखनीय होगा जिसमें देवकुमार कहते हैं- “हाँ, देवता हमेशा रहेंगे और हमेशा रहे हैं। उन्हें अब भी संसार धर्म और नीति पर चलता हुआ नजर आता है। वे अपने जीवन की आहुति देकर संसार से विदा हो जाते हैं। लेकिन उन्हें देवता क्यों कहो? कायर कहो, स्वार्थी कहो, आत्मसेवी कहो। देवता वह है जो जो न्याय की रक्षा करे और उसके लिए प्राण दे दे। अगर वह जानकर अनजान बनता है तो धर्म से गिरता है। अगर उसकी आँखों में यह कुव्यवस्था खटकती ही नहीं तो वह अंधा भी है और मूर्ख भी, देवता किसी तरह नहीं। और देवता बनने की जरूरत भी नहीं देवताओं ने ही भाग्य और ईश्वर भक्ति की मिथ्याएँ फैलाकर इस अनीति को अमर बनाया है। मनुष्य ने अब तक इसका अंत कर दिया होता या समाज का ही अंत कर दिया होता तो इस दशा में जीने से कहीं अच्छा होता। नहीं, मनुष्यों में मनुष्य बनना पड़ेगा। दरिंदो के बीच में उनसे लड़ने के लिए हथियार बांधना पड़ेगा। उनके पंजो का शिकार बनना देवतापन नहीं जड़ता है।”9

    27 फरवरी 1933 के ‘जागरण’ के संपादकीय में प्रेमचंद लिखते हैं, “संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञानता है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक संपत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा तब तक मानव समाज का उद्धार नहीं हो सकता। मजदूरों के काम घटाइए, बेकारों को गुजारा दीजिये, जमीदारों और पूंजीपतियों के अधिकारों को घटाइए, मजदूरों और किसानों के स्वत्वों को बढ़ाइए, सिक्के के मूल्य घटाइए, इस तरह के चाहे जितने सुधार आप करें; लेकिन यह जीर्ण दीवार इस टीपटाप से नहीं खड़ी रह सकती। इसे नए सिरे से गिराकर उठाना होगा।”10

    श्री ज्योतिप्रसाद ‘निर्मल’ ने उन पर आक्रमण किया कि प्रेमचंद की कहानियों एवं उपन्यासों में ब्राह्मणों को काले रंग में चित्रित किया गया है क्योंकि उनमें पुजारियों और पुरोहितों पर आक्रमण किया गया है। प्रेमचंद ने इसका उत्तर उन्हें अत्यंत तीखे शब्दों में इस प्रकार दिया है- “हिन्दू जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक; यही टकेपंथी दल है, जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है। हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है। ... हमारा आदर्श सदैव से यह रहा है कि जहाँ धूर्तता, पाखण्ड और सबलो द्वारा निर्बलों पर अत्याचार देखो, उसको समाज के सामने रखो, चाहे हिन्दू हो, पण्डित हो, बाबू हो, मुसलमान हो या कोई हो। हमारा स्वराज्य केवल विदेशी जुए से अपने को मुक्त करना नहीं है, बल्कि सामाजिक जुए से भी, इस पाखण्डी जुए से भी, जो विदेशी शासन से अधिक घातक है।”11

    प्रेमचंद के पात्र सूरदास, होरी, गोबर, बलराज, धनियां, झुनिया और इनके जैसे अनेक व्यक्ति उनके उपन्यासों में हैं। उनमे वह निष्ठा, उत्सर्ग की भावना, संयम, संतोष, उद्दम से प्रेम, सामूहिकता की प्रवृत्ति, धैर्य इत्यादि गुण भी है जो हमें अन्यत्र नहीं मिलते और जो अवसर मिलने पर समाज में ऊंचा से ऊंचा सम्मान प्राप्त कर सकते हैं। उनके चरित्र में वे तत्व हैं जिनसे हम सुंदर से सुंदर, उच्च से उच्च संस्कृति का निर्माण कर सकते हैं। उनका व्यक्तित्व मानो कुम्हार की मिट्टी-सा है जिसको अच्छा सामाजिक सांचा मिलने पर रूपवान बनाया जा सकता है।

    इस प्रकार प्रेमचंद की भारतीय समाज की जो गहरी आंतरिक समझ थी वह उन्हें एक साथ महान लेखक और समाजशास्त्री के रूप में प्रतिस्थापित कर देती है। यही कारण है कि देश के विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के मतभेद कितने ही गहरे क्यों न हो परन्तु प्रेमचंद को एक महान मानवतावादी लेखक के रूप में स्वीकार करते हैं। यही प्रेमचंद होने की प्रासंगिकता है और सदैव बनी रहेगी।

सन्दर्भ
1. हिंदी साहित्य : उद्भव और विकास- हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृष्ठ- 229, प्रकाशन- राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.          1 बी., नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- 110002, संस्करण- 2003
2. ‘गोदान’ और दलित प्रसंग- ओम प्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ- 71, ‘वर्तमान साहित्य’, अप्रैल- 2009
3. ‘गोदान’ और दलित प्रसंग- ओम प्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ- 71, ‘वर्तमान साहित्य’, अप्रैल- 2009
4. ‘गोदान’ और दलित प्रसंग- ओम प्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ- 71, ‘वर्तमान साहित्य’, अप्रैल- 2009
5. ‘गोदान’ और दलित प्रसंग- ओम प्रकाश वाल्मीकि, पृष्ठ- 71, ‘वर्तमान साहित्य’, अप्रैल- 2009
6. ‘जहाँ से रोशनी की लकीर निकलती है’- वीरेंद्र यादव, जनसत्ता, 31 जुलाई, 2016
7. ‘जहाँ से रोशनी की लकीर निकलती है’- वीरेंद्र यादव, जनसत्ता, 31 जुलाई, 2016
8. ‘जहाँ से रोशनी की लकीर निकलती है’- वीरेंद्र यादव, जनसत्ता, 31 जुलाई, 2016
9. लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य- चंद्रबली सिंह, ‘प्रेमचंद की परंपरा’ आलेख से, पृष्ठ-137, प्रकाशन- पीपुल्स              लिटरेसी, 517 मटिया महल, दिल्ली- 110006, प्रथम संस्करण: 1986
10. लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य- चंद्रबली सिंह, ‘प्रेमचंद की परंपरा’ आलेख से, पृष्ठ-138, प्रकाशन- पीपुल्स              लिटरेसी, 517 मटिया महल, दिल्ली- 110006, प्रथम संस्करण: 1986
11. लोकदृष्टि और हिंदी साहित्य- चंद्रबली सिंह, ‘प्रेमचंद की परंपरा’ आलेख से, पृष्ठ-139, प्रकाशन- पीपुल्स             लिटरेसी, 517 मटिया महल, दिल्ली- 110006, प्रथम संस्करण: 1986

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